28 June, 2007

मनीष की एक कविता

मनीष दिल्ली में पाये जाते हैं । इनका एक दिमाग, दो हाथ, दो पांव, एक नाक एक ......... और दिल के बारे में पता चलना बाकी हैं वैसे संभवतः किसी को दे चुके हैं । नाटकों की दुनिया में इनका मन रमता हैं और अर्थशास्त्र की शास्त्रीय और लोक दोनों ही समझ रखते हैं । बजाहिर आदमी और मन से कवि ही हैं । अमेरिका में कुछ वक़्त गुज़ारा हैं इस वज़ह से या फिर पढाई के चलते, पता नहीं- आजकल अंग्रेज़ी में ही ज्यादा हाथ चला रहे हैं यूं अन्दर की बात ये है कि सपने हिंदी में ही देखते हैं । फिलहाल आख़िरी बात, मनीष अच्छे बांसुरीवादक भी हैं ।

हद्द हो गई

एक ही पेड पर इक्कीस रंग के गुलाब
खिला चुका हूं जनाब
बागवानी में मेरा नाम यूं ही नहीं है
दुनिया जानती है भरतपुर नर्सरी के पप्पू खान को
आप चाहें तो देख सकते हैं मेरा पुरस्कार
फतेहपुर सीकरी के मेरे घर में
रखा है अभी तक अलमारी में

मेरे चेहरे पर ना जाएं
पैंतालीस पूरे कर चुका हूं
इक्कीस घाट का पानी पीया है मैंने
और आप जितना तो बेटा है मेरा
मेरे फन ने मुझे दुनिया घुमाई है
कोने कोने से बुलाते हैं लोग मुझे
हर कोई चाहता है
इक्कीस फूल खिलें उसके आंगन में

फन की हर जगह पूछ होती है साहब
मेरे भाई अमरुद्दीन 'एक्टर'
अपने फन की बदौलत ही घूमे हैं संसार में
रसूलपुर की रामलीला कंपनी का नाम है उनकी वजह से
गांव गांव से लोग बुलाते हैं उन्हें
वे खेलते हैं राम का पार्ट
और देखने वाले देखते रहते हैं उन्हें आंखें फाडे

लोग जानते हैं उन्हें मुन्ने उस्ताद के नाम से
कोई नहीं जानता उनका असल नाम अमरुद्दीन खान
बदल रखा है उन्होंने अपना नाम
नहीं तो दुनिया क्या कहेगी
रामलीला में राम का पार्ट खेले एक मुसलमान
ये तो हद्द हो गई ।

24 June, 2007

कार्टून और हंसी

पिछले दिनों राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भारतीय मीडिया को सलाह दी थी कि कार्टून को अख़बारों के पहले पेज पर वापस लाया जाना चाहिए क्योंकि इससे लोगों को सुबह मुस्कुराने का मौक़ा मिलता है । साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अख़बार के पहले पन्ने पर राजनीति की ख़बरों को कम किया जाना चाहिए । निजी तौर पर में राजनीति को पहले पन्ने पर देने के साथ ही इस बात का भी समर्थक हूँ कि क्यों पाठक के सामने देश की हंसती मुस्कुराती तस्वीर रखी जाये जो जैसा है वैसा दिखे की तर्ज़ पर कालिख क्यों ना सुबह सुबह आपके दिन को तय करे । साथ ही में यह भी मानता हूँ कि कार्टून को देखने से हंसी नहीं बल्कि अफ़सोस ही होता है हमारे समय की विदुर्प्ताओं पर जिसे हम हंसकर टाल देते हैं । यकीन नहीं होता तो नीचे दिए कार्टून पर नज़र डालिये ......


राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से संबंधित पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां दॊ बार टुनकी मारें

14 June, 2007

स्कूल से आती जाती लडकियां

कल जो कविता डाली थी उस पर टिप्पणियाँ तो आपने देख हीं लीं हैं । कुछ मित्रों ने फोन भी किया. उत्साहित हूँ सो एक और पेल रह हूँ. यह जालंधर में लिखी थी. शायद मार्च 2003 था । लीजिये चाखिये जरा.

जहाँ में खड़ा हूँ
वहां से दिख रहीं हैं
स्कूल आती जाती लडकियां
पहले इनकी जगह दूसरी लडकियां गुज़रती थीं यहाँ से
इनके बाद कोई दूसरी गुज़रेंगी

इस सच से अनजान और लापरवाह लडकियां
खिलखिला रहीं हैं
चुहल कर रहीं हैं
(जैसे कह रहीं हों )
देखो हमारा हौंसला
बुरे से बुरे वक़्त में हंस सकती हैं लडकियां

इन्हें पता है कि
एक एक कर विदा हो जायेंगी वे
अपने भाइयों के घरों से
जो हिम्मती होंगीं
वे चुन लेंगीं
अपनी पसंद का लड़का
बाकी माँ बाप की मजबूरी और हैसियत
गले में लटकाकर
चल देंगीं भाइयों के घरों से निकलकर
अदेखे चेहरों के पीछे

क्या सचमुच इन्हें भय नहीं है ?
इनके उजास और भरे चहरे
गृहस्थी के चरखे में घूमकर लटक जायेंगे

ये लडकियां सास के दुलार और दुत्कार को
एक भाव से लेकर
खटती रहेंगी
बच्चों की पैदाइश में ढीली होकर
झेलती रहेंगी पति की उपेक्षा और दंभ

ऐसा ही होता रहा है
होगा
और (शायद) होता रहेगा !!

सब कुछ जानते हुये भी
खिलखिला रहीं हैं
हंस रहीं हैं
चुहल रहीं हैं
बेपरवाह, बेफिक्र,........ बेशर्म !!
स्कूल से आती जाती लडकियां .

सपनों का रथ

यूँ तो कविताई संवेदनशील लोगों का काम है, लेकिन मैंने भी अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत में कविता से मुडभेड की थी । शायद उन दिनों संवेदनाएँ जीवित थीं । इधर के दिनों में तो अखबारों ने मनुष्यता का यह सहारा भी छीन लिया । कल भाई सौरव सुमन ने मुझे याद दिलाया कि पत्रकारिता में मुझे कवि नाम से भी पुकारा जाता रहा है । प्रभात खबर में काम करते हुये मुझे याद नहीं पड़ता कि श्री बैजनाथ मिश्रा जी ने कभी मुझे सचिन नाम से पुकारा हो वे कविराज कहकर ही पुकारते थे । उनका यह आत्मीय संबोधन आज भी मुझे अपने मनुष्य होने के विश्वास से भर देता है । दिसंबर 2003 में रांची में पुस्तक मेले में बैजनाथ जी ने मंच पर भी पहुंचा दिया था । तब डरते डरते कुछ कवितायेँ पडी थीं मंच पर पहली बार । अविनाश जी ने काफी हौंसला अफजाई की थी । लेकिन फिर कभी हिम्मत नहीं पडी । दूसरी बार मेरी कवितायेँ (अगर वे सचमुच कवितायेँ हैं तो) सार्वजानिक करने में फिर अविनाश जी की "खुरापात" रही । उन्होंने अरुण नारायण को उकसाया और प्रभात खबर में कविता प्रकाशित हुई । इसके अलावा कवि रुप में नवभारत, भोपाल में अखिलेश्वर पाण्डेय ने छापा । यह भूमिका महज़ इसलिये क्योंकि मुझे अपने को कवि कहे जाने पर संकोच होता है । मुझे लगता है कि मुझमें वह योग्यता नहीं है जो एक कवि जीवन के लिए जरूरी है । फिर भी हिम्मत कर कुछ सामने रख रहा हूँ यह कविता भोपाल में पत्रकारिता की पढाई के दौरान लिखी थी । अच्छी लगे तो सराहें, कच्चापन हो तो माफ़ करें और महज़ एकालाप हो तो बता दें आगे से ऎसी कोशिश ना करूंगा ।

सपनों का रथ
इतने करीब से गुजरता है
कि बस अब हो गया जन्म सफल
लंबी लंबी रातों और उनके टुकड़ों में
पानी पीने और मूतने की उबाऊ प्रक्रिया के बीच
कोई ना कोई हिस्सा
मिल जाता है सपनों से बचा
मिला लेते हैं उसे
सपनों की फेहरिस्त में !

रात का पूरा कालापन
डरा नहीं पाता
अपने बेरोजगार अँधेरे को
सूरज के इंतज़ार में
बिना बतियाये ही हंसकर काट देते हैं
इतनी जल्दी में होता हैं सब कुछ
कि मन से अछूती रह जाती हैं समय की चौहाद्दी

बस एक रील की तरह
पहिये की गति से
गड्ड-मड्ड सा घूम जाता है
पूरा एकांत

व्यवहार इतना रहस्यमय होता हैं
कि ना वह चकित करता है
ना लगता है एकदम सोच समझा !

धरती के हर हिस्से में
एक साथ चीखने की आजादी को भुनाकर
धीरे धीरे दारुण रुदन चलता है!

बेरंग चित्र में असामंजस्य
और बेतरतीब फुहारें
कोने घेरती हैं

चुपके से कोई प्रेमिका आकर
गाल पर चिकोटी काट जाती है
प्रेम कर नहीं सकते
अन्य दुस्साहसों के हिज्जे ठीक नहीं !

बस एक सनक और नक़ल में
साबित करने की होड़ लगाते हैं
मुर्दा दिमागों से

पूरे के पूरे द्रश्य में एकरूपता बनी चली आती है
ना घेर पाते हैं आकाश
धरती में अपनी विरासत में मिली जगह !

भरना था हर जगह का खालीपन

भर रहे हैं बिखराव और भटकाव

कभी कभी जब कोई आगे वाले की उंगली पकड़कर

करना चाहता है बवंडर पार

रात 12 और 2 तक उड़ाते हैं उसका मज़ाक

धीरे धीरे जिन सपनों से शुरू हुये थे

उन्हें बेचने की जुगत भिडाते हैं

और शामिल हो जाते हैं

घिचपिच बाज़ार में !!

12 June, 2007

चिट्ठाकारों की मुलाकात

3 जून को दिल्ली में एनसीआर के चिट्ठाकारों ने मुलाक़ात की । इस दौरान हिंदी चिट्ठों पर बातचीत हुई जिसमें भविष्य की योजनाओं और हालिया समस्याओं पर चर्चा हुई । इस बैठक की पूरी रपट पढने के लिए यहाँ दो बार टुनकी मारिये ।

जाकी रही भावना जैसी......

पिछले दो दिनों में बहुतों ने कई तरीके से गरियाया है । भडास प्रकरण के कारण कुछ दोस्तियाँ टूटते टूटते बनीं तो कुछ टूट ही गईं । खैर, गम किसी बात का होता नहीं हमे, इश्क में सीखा है हंसकर छुपा लेना दर्द । कुछ दोस्त गए हैं तो जाहिर है कि नए आएंगे । वैसे भी मेरा दिल बहुत छोटा है । सबके लिए जगह कहॉ है . इतना छोटा कि पिछले तीन साल से एक ही लडकी के इश्क में बुरी तरह गिरफ्तार हूँ । कभी भी नौकरी छोड़ देता हूँ । जिसे भाई लोग मेरा मानसिक दीवालियापन कहते हैं . हाँ दोस्तो में हूँ ही दीवाना - लोग सुनते रहे दिमागों की, हम चले दिल को रहनुमा करके के अंदाज़ में अब तक गुज़ारे जीवन को अक्ल वाले यही तो कहेंगे । यूँ भी में मानता हूँ कि - अक्ल की बातें करने वाले, क्या समझेंगे दिल की धड़कन । हमारे बुजुर्गों ने तो यही बताया है कि - प्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आएगा, जिन्हे ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया है । सुन रहे हो दिल्ली वालो !!!!!!!!!!!!!!!

10 June, 2007

मनोज झा की दारू पार्टी

मनोज जी ने इन दिनों दारू छोड़ रखी है । इसे यूं कहें तो ज्यादा सही होगा कि सबके सामने छूते ही नहीं है । ब्लोग पर पहली बार आये हैं । उत्साह बड़ाइये । जूतामपैज़ार बाद में करिये

इधर कई दिनों से ख्वाब दिन में परेशान कर रहे हैं । जिस्म पिघलाने वाली गर्मी और उमस में जब आज थोडी देर के लिए कूलर की छाँव में झपकी ली तो कम्बख्त ख्वाब फिर छेड़खानी करने लगा । देखता हूँ कि किसी नंगी छत पर शाम के धुंधलके में चार यार मिल बैठे हैं और एक थैले में दारू की कुछ बोतलें पडी हैं । दोस्तो में यशवंत जी और गांव के मेरे अजीज़ लड्डू काका की स्मृति है बाकी का पता नहीं । जगह भी पता नहीं हाँ अर्ध ग्रामीण टाइप परिवेश था । अरविंद सांगवान के घर पूंठ जैसा । थैले से बोतलें निकालते समय भिड़ गई और टूट गईं । जमने कि छोड़िये महफ़िल सजने से पहले ही वहां अफरा तफरी मच गई कोई कटोरा तो कोई गिलास लेकर थैले पर लपका । थैला किसी जाफरानी जर्दा कम्पनी का था और कपडे कि मोटी परत थी । थैले में बोतल और नमकीन के अलावा मूली, गाज़र, खीरा, प्याज़, हरी मिर्च, छूरी, कागज की प्लेटें, किसी बंधू की कैप आदि पडी थीं । पांच सात खडे खडे नीट पीने वाला लड्डू भड़का - भोसडी का सब गुड़ गोबर हो गया । इतने में यशवंत जी बोले - डायरेक्ट पीने वाले देर ना करें, चुल्लू बनायें, में सीधे उसमें डालता हूँ, थैले में दारू अभी पडी है । देखा तो प्याज़ के छिलके व गाज़र आदि की मिट्टी से सनी हुई दारू बाहर झांक रही थी । खांटी दरूबाजों की महफ़िल में कुछ ने मुहं में गुटका भरे रहने के बावजूद फुर्ती की और चुल्लू बाँध लिया । इतने में लाईट गायब हो गई और गर्मी के भाबके से आंख खुल गई । करीब महीने भर से दारू छोड़ने के बाद उसने आज पहली बार ख्वाब में दबोचने की कोशिश की ।

यशवंत बोले तो मेरठ टू दिल्ली वाया कानपुर

ये जो यशवंत हैं ना बहुत अगड्म बगड्म लिख बोल रहे हैं आजकल । एक तो दिल्ली की गर्मी ने इनकी फाड़ रखी है दूसरे वो कहावत सुनी है ना कि नया मुल्ला प्याज़ ज्यादा खाता है । ब्लोग पर नए नए आये हैं तो ज्यादा ही गर्रा रहे हैं । पता नहीं है कि यहाँ जितना स्वागत होता है उतना ही ज़ूतामपैज़ार भी होता है । वैसे कुछ भी कहो आदमी खरा है । सच्ची बात किसी के भी थोबडे पर कह डालता है पट्ठा । कल्ले में दम है । अगर पत्रकार ना होता तो तय मानो गुरू सारंडा के जंगलों में क्रांति के लिए पिल्पिला रहा होता । वैसे जानने वाले जरूर कहेंगे की अपने सीनियर और गुरू के बारे में ऐसा लिखते हो ? तो भैया जब गुरू खुद ही दे दारी की दे मचाये हो तो हम का करें । रियाज़ तमंचा जी जो दिल में आये सो पेल मारो । इन राजधानी वालों के दिमाग में गर्मी घुस गई है आओ इसे ठण्डा कर दें । सालों से पत्रकारिता में तो कुछ होता नहीं बस्स येई सब करेंगे अब तो । चलो बाकी पोल पत्ती बाद में बताऊंगा
आगे पढें : आई नेक्सट, कानपुर में यशवंत सिंह