29 July, 2007

सुगम मिली सिरकारी ताकत

कविता के शहरी भूगोल और ठेठ गंवई मिजाज में जो एक बडा फर्क है वह संदर्भों का है. शहरी कविता के संदर्भ जहां बडे दूर और उंचे-उंचे दिखाई देते हैं. वहीं देशज कविता जिसे प्रचलन में लोक कविता कहा जाता है अपने आसपास के दृश्यों, छवियों के साथ खलनायकों का बेहद साफ और बिना लाग लपेट का कथ्य होती है.महेश कटारे "सुगम" के गीत (जो गजलों के बेहद करीब है) इसीलिए अपने कथ्य में परिचित और संदर्भों में सुपरिचित हैं. सुगम जी बुंदलखंड के मध्यप्रदेशी कस्बे कुरवाई में रहते हैं. वे वहां इसलिए रहते हैं क्योंकि नौकरी करते हैं. नौकरी के अलावा वे बुंदेली समाज की विसंगतियों के साथ समाज के सबसे जाने पहचाने बुरे चेहरों और सरकारी कारिंदों की कारगुजारियों को बेपर्दा करते हैं. सुगम बेहद सीधे सच्चे लफ्जों में सरकार के सबसे निचले हाकिमों और गांव की हवेली के बीच के रिश्ते बताते हैं, ताकतवर की हरकतों को नोट करते हैं और एक सधी आंख से घरों के भीतर होने वाले उंच नीच को पकडते हैं. हालांकि पटवारियों, पुलिस, लंबरदारों और पटेलों आदि के चरित्रों से ग्राम्य समाज परिचित है, लेकिन काव्य के साथ इन पर किये व्यंग्य को महसूसना मजा तो देता ही है उकसाता भी है. और जब गांव खेडे के बच्चे बूढे समय कुसमय इन गीतों की पंक्तियां फैंकते हैं, तो वह सही जगह घाव भी करती है. कविता का इससे बेहतर इस्तेमाल भी होता है क्या?
कवि मित्र हरिओम राजोरिया ने नई इबारतें के लिए महेश कटारे सुगम जी की तीन गजलें उपलब्ध करवाईं उनका शुक्रिया।

ऐई गांव के ग्योंडें

भैया जबसे थानों खुल गऔ ऐई गांव के ग्योंडें
सुनो कुजानें को को लुट गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

पुलस, दरोगा, डिप्टी, मुतके गोला और बंदूकें
इत्तौ बडौ हजम्मा जुर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

एक सिपईया बडौ हरामी दिन भर पियै फिरतौ
कुसमा कोरन खौं लै उड गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

इत्तौ जुरम हतौ घंसू कौ मुरगा नई लै गऔ तो
पीठ कौ सबरौ मांस उघर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

हलकैंया मेंतर थाने की सब पोलें जानत्तौ
एक दिना गोली से मर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

भौत रात तक गांव को मुखिया थाने में बैठत है
उ कौ सोई ईमान बिगर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

सुगम ऐई थाने ने मोरौ गांव लूट डारौ है
हत्यारौ जौ काय खौं खुल गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

गऔ पैले कौ पटवारी

भैया बडौ जुलम वौ कर गऔ पैले कौ पटवारी
ई कौ रकबा उ खौं लिख गऔ पैले कौ पटवारी

अब जौ आ गऔ नऔ पटवारी पोलें सब खुल रई हैं
परती तक पै कब्जा लिख गऔ पैले कौ पटवारी

ग्राम सभा की सोला एकड सभापति खौं दै गऔ
नासमिटौ जौ कैसी कर गऔ पैले कौ पटवारी

धनुआ ने रिशपत नई दई ती बस एइ कारन सें
उ कौ पट्टौ कैंसल कर गऔ पैले कौ पटवारी

नऔ पटवारी जे कै रऔ तौ सुगम लडे तुम हुइयौ
एइ से ऐसी तैसी कर गऔ पैले कौ पटवारी

गुंडा हो गऔ गांव सभापत

अब तौ सबकी हो गई आफत
गुंडा हो गऔ गांव सभापत

लच्छन उके नोंने नंइयां
पीवौ खावौ उकी आदत

ज्वान मोंडियें रौताने की
अब नें बच हैं एकउ साबत

जित्ती जगा हती सिरकारी
अब फिर रऔ है उखौं नापत

अब बन जै है पैसा बारो
काल फिरत्तो सब से मांगत

लट्ठ बाज वौ हतौ पैल से
सुगम मिली सिरकारी ताकत

संपर्कः महेश कटारे सुगम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कुरवाई, वाया बीना, जिला विदिशा। फ़ोन +919425134462.

24 July, 2007

रोमांस व मस्ती का मिश्रण है 'पार्टनर'

अजय ब्रह्मात्मज

फिल्म समीक्षक

रोमांस कम, मस्ती ज्यादा और वह भी अल्हड़पन से लबरेज। 'पार्टनर' में डेविड धवन ने अपने परंपरागत फार्मूले में थोड़ा बदलाव किया है। उनकी इस नयी फिल्म में द्विअर्थी संवाद नहीं हैं। हो सकता है कि उन्होंने अपनी आलोचनाओं का ख्याल रखा हो। फिल्म में हीरो-हीरोइन से अधिक दोनों हीरो की जोड़ी जमती है। जैसे ही सलमान खान और गोविंदा एक साथ पर्दे पर आते हैं तो हंसी के फव्वारे फूटने लगते हैं।

'पार्टनर' विशुद्ध कॉमिक फिल्म है। लव गुरु यानी माडर्न कामदेव प्रेम (सलमान खान) लड़कों को प्यार करने के गुर सिखाता है। वह प्यार के टिप्स देते समय यह ख्याल जरूर रखता है कि कोई सिर्फ अय्य ाशी के लिए उससे लड़की पटाने के गुर न सीखे ले। भास्कर (गोविंदा) उसके लिए चुनौती है, क्योंकि उसे अपनी कंपनी की मालकिन प्रिया (कैटरीना कैफ) से ही प्रेम हो गया है। शुरू में प्रेम उसका तिरस्कार करता है, लेकिन बाद में तंग आकर कुछ टिप्स देता है। भास्कर अपनी मालकिन को प्रभावित कर लेता है। उधर दूसरों को प्यार का प्रशिक्षण देने वाला प्रेम खुद नैना (लारा दत्ता) को पसंद करता है, लेकिन उसे शादी के लिए राजी नहीं कर पाता। आखिरकार दोनों ही सफल होते हैं, लेकिन इस बीच कई नाच-गाने और हंसी-मस्ती के लगातार खूब प्रसंग आते हैं। डेविड धवन ने एक बार कहा था कि कॉमेडी फिल्मों की बंधी-बंधाई स्क्रिप्ट नहीं होती। शूटिंग के लोकेशन, स्टार्स के मूड और सिचुएशन से सीन इम्प्रूव किये जाते हैं। 'पार्टनर' देखते हुए साफ लगता है कि गोविंदा और सलमान खान की निजी भागीदारी से सीन लिखे और बढ़ाए गए हैं। वापसी के बाद तीसरी फिल्म 'पार्टनर' में गोविंदा अपने फुल फार्म में नजर आए हैं। अपनी उपस्थिति मात्र से दर्शकों को आकर्षित करने में माहिर सलमान खान के लिए कई दृश्यों में गोविंदा मुश्किलें खड़ी कर देते हैं। सलमान खान में सहज आकर्षण है तो गोविंदा सहज अभिनय के उदाहरण हैं। नृत्य में अपने थुलथुल शरीर के बावजूद हृष्ट-पुष्ट सलमान खान से कहीं भी नीचे या कमजोर नहीं दिखते गोविंदा। गोविंदा के नृत्य में भी अभिनय की छटा दिखती है। गोविंदा के पहले किशोर कुमार इस हुनर के उस्ताद कहे जा सकते हैं। हीरोइनों में लारा दत्ता निखार पर हैं। वह लगातार दर्शकों के करीब आ रही हैं। इस फिल्म में कैटरीना की जगह और कोई अभिनेत्री रहती तो फिल्म ज्यादा इंटरेस्टिंग बन जाती। चारों मुख्य कलाकारों में कैटरीना कैफ कमजोर कड़ी हैं। कामेडी फिल्मों में अभिनय के साथ संवाद अदायगी का भी कमाल रहता है। अगर आपको भाषा ही नहीं आती हो तो लड़खड़ाना स्वाभाविक है। फिल्म की कहानी से छोटा डॉन (राजपाल यादव) के ट्रैक का कोई संबंध नहीं है, लेकिन वह जब भी आते हैं, अपनी अदाओं से हंसाते हैं। अपने गहन आत्मविश्वास से राजपाल यादव दर्शकों को लुभाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत मस्ती और जोश से भरपूर है। हीरोइनों से ज्यादा दोनों हीरो नाच-गाने से दर्शकों का मन बहलाते हैं। वैसे भी सलमान खान और गोविंदा नाच रहे हैं तो किसी और पर नजर नहीं टिकती। शुद्ध मनोरंजन के लिए यह फिल्म देखने जाएं और हर प्रकार के लॉजिक सिनेमाघर के बाहर ही छोड़ दें।

साभार :जागरण.काम

चे ग्वेवारा का ( फिदेल को संबोधित) क्यूबावासियों के नाम अंतिम पत्र


क्यूबा में सफल क्रांति के बाद और चे ग्वेवारा के क्यूबाई राष्टीय बैंक का अध्यक्ष बनने पर जुलाई 1960 में अमेरिकी न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट में कहा गया था -"अर्नेस्टो चे ग्वेवारा ही कास्ट्रो सरकार का मष्तिष्क है।ग्वेवारा क्यूबाई नहीं बल्कि अर्जेंटीनी है, वह स्वभाव से कोई भावुक लातिन अमेरिकी नहीं है, बल्कि ठंडे दिमाग से सोच विचार करने वाला कम्यूनिस्ट है. यह ग्वेवारा है, फिदेल या राउल कास्ट्रो नहीं जो तेजी से घूमने वाले आज के कालचक्र को नियंत्रित कर रहा है, जबकि क्यूबा में निवेशित विशाल अमेरिकी पूंजी को जब्त किया जा रहा है. ग्वेवारा और उसके कम्यूनिस्ट सहायकों के लिये क्यूबा उनके मिशन की एक घटना मात्र है और वह मिशन है लातिन अमेरिका के अधिकांश हिस्से में कम्यूनिस्ट सत्ता स्थापित करने के लिये क्यूबा को एक अड्डे की तरह विकसित करना ". यह पंक्तियां अमेरिकी साम्राज्यवाद के उस प्रवक्ता ने लिखी हैं, जिन्हे फेलिक्स ग्रीन ने एक किताब में बिल्कुल सही नाम दिया है-दुश्मन. उपरोक्त विलाप का दूसरा पक्ष भी है कि चे में अपने घोर विचारधारात्मक शत्रुओं को प्रभावित करने, उनको अपनी प्रशंसा के लिये बाध्य करने का गुण था. चे का जीवन इस बात का उदाहारण है कि एक व्यक्ति जो विश्व की जनता की मुक्ति के क्रांतिकारी संघर्षों से जूझ रहा हो कैसे जनता के शत्रुओं से भी मान्यता व आदर प्राप्त कर सकता है.यहां हम चे का फिदेल कास्त्रो को लिखा अंतिम पत्र प्रकाशित कर रहे हैं. यह पत्र चे ने फिदेल को 1 अप्रैल 1965 को लिखा था। 1965 की शुरुआत में साम्राज्यवाद के विरुद्ध पूरी दुनिया में चल रहे आंदोलनों की एकजुटता के लिए सघन यात्राएं करने के बाद चे 14 मार्च 1965 को हवाना लौटे और उसके बाद सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिये. तकरीबन एक माह बाद इस बारे में फिदेल ने महज इतना कहा-"वह हमेशा वहीं रहेगा जहां क्रांति के लिए वह सबसे लाभदायक रहेगा.इससे पुष्टि हो गई कि चे क्यूबा में नहीं है। लेकिन कहां है? इस सवाल का जवाब पूंजीवादी अखबार भिन्न भिन्न तरह से दे रहे थे। कुछ का अनुमान था कि वे वियतनाम, ग्वेटेमाला, वेनेजुएला, पेरू, कोलंबिया, ब्राजील या इक्वाडोर में हैं. कुछ ने लिखा कि वे डोमेनिक गणतंत्र के संविधानवादियों के संघर्ष में भाग लेते हुए कत्ल कर दिये गये. अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक ने 9 जुलाई 1965 को लिखा कि चे ने क्यूबा के गुप्त सूत्र एक करोड डालर में बेच दिये और भागकर छिप गये. उरुग्वे के साप्ताहिक 'मोर्चा' ने लिखा कि चे ओरिएंटे प्रांत में लिखने का काम कर रहे हैं और लंदन के इवनिंग पोस्ट ने लिखा कि वे चीन में हैं. 3 अक्तूबर 1965 को फिदेल ने इन भ्रांतियों और दुष्प्रचारों पर रोक लगाते हुए चे के उपरोक्त पत्र को केंद्रीय कमेटी के एक अधिवेशन में रखा और पढा. पत्र इस प्रकार है---
कृषि वर्ष
हवाना,
1 अप्रैल 1965
फिदेल
इस समय मैं कई चीजों को याद कर रहा हूं। जब मैं तुमसे मारिया अंटोनियो (क्यूबाई क्रांतिकारी)के घर पर मिला था। कैसे तुमने "यात्रा" का प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए जोरदार तैयारियां चल रही थीं. एक बार मुझसे पूछा गया था कि यदि मेरी मृत्यु हो जाए तो किसे सूचित किया जाए. मैं इस तथ्य से चकित था कि क्या ऐसा होना संभव है. बाद में मैंने जाना कि यह सच था. क्रांति (यदि वह सचमुच क्रांति है) में या तो जीत मिलती है या मौत. जीत के इस रास्ते में बहुत से साथी शहीद हो चुके थे. आज उन बातों को कम नाटकीय ढंग से प्रकट किया जाता है, क्योंकि हम अधिक परिपक्व हो गये हैं, लेकिन स्थिति वही की वही बनी हुई है. मैं महसूस करता हूं कि मैंने अपने कर्तव्य को आंशिक रूप से पूरा किया है, जिसने मुझे क्यूबा की भूमि पर क्यूबा की क्रांति से बांध रखा था और इसलिए मैं तुमसे, कामरेडों से, तुम्हारे लोगों से, जो अब मेरे अपने हो गये हैं, विदा लेता हूं. पार्टी नेतृत्व के सभी पदों से मैं औपचारिक रूप से इस्तीफा देता हूं, मंत्री पद छोडता हूं, मेजर का पद छोडता हूं और क्यूबा की नागरिकता भी त्याग रहा हूं। आधिकारिक रूप से अब क्यूबा से मेरा कोई संबंध नहीं है, जो संबंध हैं वे अन्य प्रकार के हैं, जिनको पदों की भांति छोडा नहीं जा सकता.
जब मैं अपने बीते हुए जीवन पर नजर डालता हूं तो महसूस करता हूं कि मैंने क्रांति की विजय और उसकी मजबूती के लिये पर्याप्त ईमानदारी व समर्पण की भावना से काम किया। मेरी गंभीर गलती केवल यह थी कि सियेरा मिस्ट्रा के प्रथम दिनों से ही मैं तुम्हारे उपर और अधिक विश्वास नहीं रख सका। और एक नेता व क्रांतिकारी के रूप में तुम्हारे गुणों को भली भांति व शीघ्रता से समझ नहीं पाया.
मैंने बहुत शानदार दिन गुजारे हैं और तुम्हारे साथ रहकर मैंने कैरबियन (मिसाइल) सफर के गौरवपूर्ण व कठिन दिनों में अपनी जनता के साथ होने का गर्व महसूस किया है। एक राजनेता के रूप में तुम्हारे गुण उतने कभी नहीं निखरे थे, जितने कि उस समय। मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने बिना हिचकिचाहट के तुम्हारा अनुसरण किया और सोचने व देखने तथा खतरों व उसूलों का आकलन करने के तुम्हारे ढंग से अपने को एकाकार कियाण
अब मेरी विनम्र सेवाओं की विश्व के दूसरे राष्ट्रों को आवश्यकता है। मैं वह कर सकता हूं जिसको करने से तुम वंचित हो क्योंकि प्रधान के रूप में क्यूबा की जिम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर है और अब विदा होने का समय आ गया है।
मैं यह जता देना चाहता हूं कि मैं हर्ष और विषाद दोनों का अनुभव करते हुए ऐसा कर रहा हूं। एक निर्माता और अपने प्रियजनों के सबसे प्यारे व्यक्ति के रूप में मैं अपने पीछे अति उज्जवल आशाएं छोडे जा रहा हूं। मैं उन लोगों से विदा ले रहा हूं, जिन्होंने अपने पुत्र के रूप में मुझे स्वीकार किया. इससे मेरी भावना आहत हो रही है. मैं युद्ध के नए मोर्चे पर अपने साथ वह आस्था लेकर जा रहा हूं, जिसे तुमने जागृत किया था. मैं अपने लोगों की क्रांतिकारी भावना और सबसे पुनीत कर्तव्य को पूरा करने की भावना लेकर जा रहा हूं, जो यह है :कोई कहीं भी हो उसे साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करना है. यह संकल्प मुझे सुकून देता है और गहरे से गहरे घाव को भर देता है
मैं इस बात को दोहराता हूं कि मैं क्यूबा को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करता हूं सिवाय उसके जो क्यूबा की मिसाल से पैदा होती है। यदि मेरा अंतिम समय किसी अन्य देश के आकाश के तले आता है तो भी मेरा अंतिम विचार इस देश की जनता के लिए और खासकर तुम्हारे बारे में होगा। जो कुछ तुमने मुझे सिखाया है उसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूं. तुम्हारे अपने जीवन के उदाहरण के लिए मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूं और प्रण करता हूं कि अंत समय तक मैं अपने उद्देश्य के प्रति वफादार रहूंगा.
मैं अपनी क्रांति की विदेश नीति से सदैव एकाकार रहा हूं और आज भी हूं। मैं जहां भी रहूंगामैं अपनी क्रांति की विदेश नीति से सदैव एकाकार रहा हूं और आज भी हूं। मैं जहां भी रहूंगा मुझे क्यूबाई क्रांतिकारी होने के नाते अपनी जिम्मेदारियों का बोध रहेगा और उसी प्रकार आचरण करूंगा. मुझे इस बात का अफसोस नहीं है कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के लिए कोई भी भौतिक वस्तु छोडकर नहीं जा रहा हूं. मैं प्रसन्न हूं कि ऐसा हो रहा है. मैं उनके लिए कुछ भी नहीं मांगता. राज्य उनके भरण -पोषण और शिक्षा के लिए पर्याप्त प्रबंध करेगा.
मैं तुमसे और हमारी जनता से और बहुत कुछ कह सकता हूं परंतु मैं समझता हूं कि वह अनावश्यक है। जो मैं तुमसे और हमारी जनता से कहना चाहता हूं उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है और कागज बरबाद करने से कोई फायदा नहीं है।
सदैव विजय की ओर!
स्वदेश या मृत्यु!
क्रांतिकारी जोश के साथ मैं तुम्हारा आलिंगन करता हूं
चे
उन लोगों के लिये जो क्रांतिकारियों के बारे में बात करते हुए उन्हें ह्रदयहीन, भावनाहीन जडवत प्राणी समझते हैं, यह पत्र उदाहरण पेश करता है कि एक क्रांतिकारी के ह्रदय में कितनी शुद्धता और श्रेष्ठता की भावना पाई जाती है। चे ने क्यूबा इसलिये छोडा क्योंकि वे हथियारबंद होकर साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष करना चाहते थे
इसे वे अपना परम कर्तव्य मानते थे इसलिये युद्ध में भाग लेने की उनमें जबरदस्त ख्वाहिश पाई जाती थी। 1956 में चे एक अनजान अर्जेंटीनी डाक्टर थे, जो परिस्थितिवश मैक्सिको आ गया था और फिदेल के नेतृत्व में सक्रिय क्रांतिकारियों से उनकी मुलाकात हो गई थी. 1965 में चे विजयी क्यूबा के एक प्रमुख नेता और क्रांतिकारी सरकार की महत्वपूर्ण हस्ती थे. वही चे अब नये क्रांतिकारी क्रिया कलापों की तलाश में क्यूबा छोडकर अचानक बाहर चले गये थे. बेहतर और सुंदर दुनिया का स्वपन देखने वाला यह यायावर नवंबर 1966 के पहले सप्ताह में छदम नाम से बोलिविया पहुंचा और वहां एक स्थान पर बोलिविया के छापामार आंदोलन का अड्डा स्थापित किया.
बोलिविया की जनता ने चे के नेतृत्व में उभरते छापामार आंदोलन का स्वागत किया। अगस्त 1967 के शुरू में लातिन अमेरिकी एकजुटता संगठन का सम्मेलन हवाना में हुआ। जिसमें पूरे लातिन अमेरिका में चल रहे छापामार आंदोलन का समर्थन किया गया और चे को आनरेरी अध्यक्ष चुना गया. चे ने इस आंदोलन, जिसे ट्रिकांटिनेंटल भी कहा जाता है, को भेजे गए संदेश में कहा था- आइये हम सच्चे सर्वाहारा अंतर्राष्ट्रीयवाद का विकास करें.....
8 अक्तूबर 1967 को 17 छापामारों और बोलिविया की सैन्य टुकडी के बीच घमासान लडाई हुई जिसमें चे गंभीर रूप से घायल हो गये। और बंदी बना लिये गये। चे के पकडने वाले कमांडर पराडो सालमन ने चे को फौरन पहचान लिया उसने संदेश भेजा 500 "कैन्साडो" अर्थात-चे को पकड लिया है.
चे व साथियों को कडी निगरानी में हिग्वेरा भेजा गया। सुबह होते ही बोलिविया सरकार की बडी सैन्य हस्तियां और सीआईए एजेंट हिग्वेरा पहूंचने लगे। एजेंट डाक्टर गोन्जालेज ने चे से पूछा था: " तुम क्या सोच रहे हो?"
चे ने कहा- मैं क्रांति के अमरत्व के बारे में सोच रहा हूं।
संभवतः यह चे के अंतिम शब्द थे।

19 July, 2007

कमजोर 'नकाब'

अजय ब्रह्मात्मज

फिल्म समीक्षक

हमें इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि पॉपुलर अभिनेताओं और सफल निर्देशक की हर फिल्म औसत से बेहतर होगी। अब्बास-मस्तान आम दर्शकों की रुचि के हिसाब से एवरेज फिल्में बनाते रहे हैं। उन्हें थ्रिलर फिल्मों का कामयाब निर्देशक माना जाता है, लेकिन 'नकाब' में निर्देशक दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाने में बुरी तरह असफल रहे।

कहानी सोफी (उर्वशी शर्मा), विक्की (अक्षय खन्ना) और करण (बॉबी देओल) की है। यह एक अनोखा प्रेम त्रिकोण है, जिसमें सोफी पाला बदलती रहती है। करण का एक दूसरा चेहरा भी है राहुल। कहानी रोचक और समझ में आने लायक तरीके से आगे बढ़ती है, लेकिन करण की नकली आत्म हत्या के बाद कहानी के तार ऐसे उलझते हैं कि हम बार-बार क्यों॥क्यों सवाल करते हैं और हमें किरदारों के बदलते रवैए का कारण समझ में नहीं आता। रहस्यात्मक और थ्रिलर कहानियों में जब रहस्य खुलता है, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। 'नकाब' में अंत तक पता ही नहीं चलता कि किरदारों के संबंध क्यों और कैसे बदल रहे हैं? इसके अलावा, हिंदी फिल्मों और भारतीय कथा परंपरा में कभी खल चरित्रों को विजयी होता नहीं दिखाया जाता, 'नकाब' में हत्यारे छूट निकलते हैं। यह 21वीं सदी का बॉलीवुड सिनेमा है। इस फिल्म की एकमात्र उपलब्धि उर्वशी शर्मा है। पहली फिल्म में भी उनका आत्मविश्वास झलकता है। सोफी के द्वंद्व और दुविधा को वह एक हद तक निभा ले जाती हैं। आधुनिक हीरोइनों के लिए जरूरी नृत्य और अन्य अदाओं में भी वह उपयुक्त लगती हैं। बॉबी देओल और अक्षय खन्ना अपने-अपने किरदारों को सफाई से अदा कर देते हैं। उनके लिए कोई चुनौती थी भी नहीं।

अमूमन अब्बास-मस्तान की फिल्मों का संगीत मधुर और लोकरुचि का होता है। म्यूजिक कंपनी टिप्स की फिल्म होने के बावजूद 'नकाब' का संगीत साधारण है। प्रीतम का संगीत 'मेट्रो' में बहुत लोकप्रिय हुआ था, लेकिन 'नकाब' के चालू संगीत में वे निराश करते हैं। क्या रमेश तौरानी कानसेन (सुनकर संगीत समझने वाले) नहीं रहे? 'नकाब' निर्देशक अब्बास-मस्तान की कमजोर और लचर फिल्म है।

15 July, 2007

हिंदीवाद और हिंदूवाद दो अलग अलग चीजें हैं

विश्व हिंदी सम्मेलन के बहाने

मंगलेश डबराल


दुनिया के कई देशों में यह सम्मेलन आयोजित हो चुका है. अब यह आठवाँ हिंदी सम्मेलन न्यूयॉर्क में हो रहा है. पिछले सात सम्मेलनों में क्या हुआ- इसका कोई लेखा-जोखा हमारे पास नहीं है. लेकिन इन सभी सम्मेलनों के उद्देश्य संदिग्ध रहे हैं. अभी तक जहाँ भी हिंदी सम्मेलन हुए हैं उन पर हिंदूवादियों और पुनरुत्थानवादियों का ही वर्चस्व रहा है. दरअसल हिंदीवाद और हिंदूवाद दो अलग अलग चीजें हैं. हिंदूवाद से हिंदी का भला होना संभव नहीं है. इनके वर्चस्व को कम करने की कोई कोशिश अबतक नहीं की गई है. ऐसी हिंदी की स्थापना की कोशिश नहीं की गई जो सच्चे अर्थों में आधुनिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष हो. जहाँ हिंदी का स्वरूप लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने की कोशिश नहीं दिखाई दे रही हो उस सम्मेलन में मैं एक लेखक की हैसियत से शामिल नहीं हो सकताइस सम्मेलन में कौन लोग जा रहे हैं उससे अधिक महत्वपूर्ण ये जानना है कि ये लोग क्यों जा रहे हैं. इस बार सम्मेलन में लगभग एक हज़ार लोग इकट्ठा हो रहे हैं. और ये लोग कुछ ठोस कर पाने में सक्षम नहीं दिखते.न्यूयॉर्क जाकर कुछ नहीं किया जा सकता. संयुक्त राष्ट संघ के समक्ष जुलूस लेकर निकलने से हिंदी का भला नहीं होने वाला यह बात हमें समझ लेनी चाहिए. हमारे देश में हिंदी जाति की अपनी समस्याएँ हैं, हिंदी साहित्य के संकट हैं उन्हें कोई भी संबोधित नहीं कर रहा है. अगर हिंदी के लेखकों पर नजर डालें तो कम से 20 लेखक तो ऐसे हैं ही जो नोबल पुरस्कार पाने के हकदार थे/हैं, लेकिन इस बारे में कोई पहल नहीं की गई. इसके लिए दुनिया के दूसरे देशों में हिंदी को सही रूप में पेश किए जाने की ज़रूरत है. इस सम्मेलन में जिन लोगों को इस बार सम्मानित किया जा रहा है उनसे तो हिंदी साहित्य समाज परिचित भी नहीं है. अगर मैं कहूँ कि सम्मेलन के आयोजन में बड़ी भूमिका निभाने वाले लक्ष्मीमल सिंघवी का हिंदी साहित्य में क्या योगदान है तो शायद ही कोई कुछ जानता होगा. हिंदी के जानेमाने कवि केदारनाथ सिंह का हिंदी सम्मेलन में सम्मान होना तय हुआ लेकिन उनके जाने में ही कई तरह की दिक्कतें सामने आईं. केदारनाथ सिंह ने हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में लिखा कि उन्हें विदेश मंत्रालय से संदेश आया कि पहले वो 4200 रुपए वीज़ा शुल्क जमा करें. इंटरनेट से वीज़ा के लिए अर्जी दें. अमरीकी दूतावास से वीज़ा लें. वीज़ा मिलने पर किसी ट्रैवल एजेंट से टिकट के लिए संपर्क करें.इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार इन आयोजनों और हिंदी साहित्यकारों को लेकर कितनी गंभीर है.इन सरकारी आयोजनों के समानांतर सम्मेलन किए जाने की बात भी संभव नहीं लगती क्योंकि हिंदी का साहित्यकार एक निर्धन समाज का साहित्यकार है.हिंदीभाषी क्षेत्र ही अपनेआप में निर्धन हैं. हिंदी के साहित्कारों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे समानांतर सम्मेलन आयोजित कर सकें. सरकार का यह दायित्व है कि वो अपनी भाषा के विकास और समृद्धि के लिए कोशिश करे और अपने साहित्कारों का सम्मान करे. चिंता इस बात को लेकर होनी चाहिए कि हम हिंदी को दूसरे देशों में सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. जो हिंदी आज न्यूयॉर्क पहुँच रही है उसके किसी लेखक को आज तक नोबल पुरस्कार नहीं मिला है।
(बीबीसी से साभार)

12 July, 2007

एनीमेशन+आस्था= माई फ्रेंड गणेशा

अजय ब्रह्मत्मज जी से आप सभी परिचत होंगे। शुक्रवारा रिलीज के बारे में दू टूक कहने के अलावा वे फिल्मों के बारे में कुछ मौजू और दिलचस्प जानकारी भी हमें देते हैं. हमने उनसे नई ईबारतें पर आने का आग्रह किया और वे आदत के मुताबिक इनकार नहीं कर सके. अजय जी की ईबारतों को आप यहां लगातार पाते रहेंगे

अजय ब्रह्मात्मज
लाइव और एनीमेशन कैरेक्टर के मेल से दर्शकों का मनोरंजन करने की तकनीक हाल ही में भारत पहुंची है। भारतीय दर्शक अब एनीमेशन कैरेक्टर और फिल्में पसंद करने लगे हैं। नतीजा है कि एनीमेशन फिल्मों का तेजी से विस्तार हो रहा है लेकिन बढ़ती जरूरत के अनुपात में कल्पनाशीलता के अभाव में विषय के लिहाज से लचर फिल्में आ रही हैं। ताजा उदाहरण है 'माई फ्रेंड गणेशा'। इस फिल्म में आस्था और एनीमेशन का मिश्रण किया गया है।
आशु अपने परिवार का अकेला लड़का है। हालांकि वह अपने माता-पिता, बुआ और बाई गंगूताई के साथ रहता है लेकिन अकेलापन महसूस करता है। स्कूल में उसका कोई दोस्त नहीं है और घर में किसी को फुर्सत नहीं है। ले-देकर एक गंगूताई है, जिससे वह अपने मन की बातें करता है। मुंबई की बारिश में डूब रहे चूहे को वह बचाता है। गंगूताई इस नेक काम के लिए उसकी तारीफ करती है और उसे गोश और मूषकराज की कहानी सुनाती है। वह बताती है कि गणेश उससे खुश हुए होंगे और अगर घर में गणेश पूजा के समय उनकी मूर्ति की स्थापना की जाए तो वे उसके दोस्त भी बन सकते हैं। घर में मूर्ति लाई जाती है और आशु की मनोकामना भी पूरी हो जाती है। गणेश उसके साथ खेलते हैं और उसका आत्मविश्वास जगाते हैं। 11 दिनों में आशु के घर की मुश्किलें भी खत्म कर देते हैं। विसर्जन के दिन आशु रोता है कि उसके सखा गणेश चले जाएंगे तो गंगूताई समझाती है कि वे अगले साल भी आयेंगे। बाल गणेश की कल्पना रोचक है,लेकिन उनके साथ अविश्वसनीय संयोगों को जोड़ कर लेखक और निर्देशक ने अपनी कल्पनाशीलता की सीमा जाहिर कर दी है। यह गलत संदेश जाता है कि घर में सिर्फ गणेश की मूर्ति लाने से सारी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। आस्था का यह दुरुपयोग बाल मन को नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर सकता है। भारतीय फीचर फिल्मों की तरह एनीमेशन फिल्में भी अपने आरंभिक दौर में धार्मिक और मिथकीय चरित्रों का उपयोग कर रही हैं लेकिन उसके पीछे वैज्ञानिक सोच रहना चाहिए। बाल कलाकार एहसास चानना ने अच्छा काम किया है। उसके माता-पिता कहानी में पूरक मात्र हैं। गंगूताई की भूमिका में उपासना सिंह लाउड हैं और उन्होंने अनावश्यक रूप से अपना सुर ऊंचा रखा है। फिल्म में इतने सारे गीतकार और संगीतकार थे। उनका क्या उपयोग हुआ है? गणेश को गणेशा कह कर संबोधित करना उचित नहीं लगता। लगता है यह फिल्म शहरों के बच्चों को ध्यान में रख कर बनायी गई है। अपनी सीमाओं के बावजूद 2डी एनीमेशन में बनी यह फिल्म सराहनीय है क्योंकि इससे एनीमेशन फिल्मों के दर्शक बढेंगे।

9 July, 2007


करुणा और बाजार एक साथ नहीं चल सकते. बाजार, मुनाफा चाहता है. इस देश के गरीब मुनाफा कमाने के रा मैटेरियल बनेंगे, तो देश अशांत होगा.
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर

मैं चंद्रशेखर जी को नहीं जानता था. उसी तरह जैसे मैं लातेहार के बस स्टैंड पर दातून बेचने वाले रामेश्वर को नहीं जानता. आप कहेंगे दोनों को न जानना अलग अलग किस्म की अज्ञानता है. हां है, लेकिन साम्य भी है. चंद्रशेखर के वक्तव्यों में रामेश्वर का जिक्र आता था. वे उसे जानते रहे होंगे. मैं दोनों को नहीं जानता था. लेकिन चंद्रशेखर को सुनता था. उनका बोलना ऐसा लगता था जैसे किसी ने अपनी बात कही हो संसद में अब अपनी बात बोलने वाले कितने हैं पता नहीं लेकिन बोलता अब कोई नहीं है- आज इतना ही