19 November, 2007

चित्रकूट का सपना, सपने की किरचें


शुरुआत हमेशा से मुश्किल भरा काम रहा है। मेरे लिए। क्रिकेट के जानकार इसे कोई फार्मूला दे सकते हैं। पत्रकारों के पास तो इसके रेडीमेड जवाब होंगे ही। मुझे नहीं मिलता जवाब. शुरुआत को आसान करनs का नुस्खा भी नहीं और कोई रामबाण औषधि भी नहीं है. कई बार शुरुआत में चीजें गलत कर देता हूं. यशवंत जी के शब्दों में कहूं तो अपने 20 नंबर पहले ही काट लेता हूं फिर 80 के लिए जूझता हूं. और कमोबेश 1st डिवीजन पा लेता हूं. मेरा अकादमिक रिकार्ड पुष्टि करता है. बहरकैफ इतना काफी है शुरुआत के लिए. बोझिलपने के लिए मुआफी.
अब चलते हैं चित्रकूट
यहां अभी सुबह हुई है। रूपेश जागकर चाय मंगा चुके हैं और ट्रेन चल रही है. कर्वी पहुंचेगी अभी. अभी आएगा स्टेशन. वहां तय जीप होगी. ग्वालियर से आने वाले आशिष जी, भुवनेश जी, जयंत जी..... के साथ हम तीनों (रमेंद्र भी साथ हैं) होटल रामदरबार पहुंचेंगे. वहीं पहुंचकर हमें पता चलेगा कि भोपाल से आने वाली जंबो टीम दोपहर में पहुंचेगी. और अश्विनी पंकज जी और निराला जी वहां पहले ही मौजूद होंगे. यह सब होगा लेकिन अभी तो ट्रेन भाग रही है- धडगडम- धडगडम-धड- धड- धडगडम- धडगडम- धडगडम-धड- धड- धडगडम- धडगडम- धडगडम-धड- धड- धडगडम- यहां पटरियों के किनारे खेत हैं. लोग दिशा मैदान का जरूरी काम निबटा रहे हैं- पटरियों के किनारे और पगडंडी के बाद खेतों के बीच की जगह में, जो देश के 90 फीसदी किनारों का दृश्य है. वनस्पतियां हैं, जिनमें से 95 फीसदी के मैं नाम नहीं जानता और एक कुल जमा आसमान है, जिसका 100 फीसदी मेरे लिए शून्य है. फिलवक्त.
तो रूपेश ने चाय के साथ जगाया है, मैं मन में कुडता ऊपर से थेंक्यू का स्वर निकालता रात के सपने को सोच रहा हूं, जिसमें कृष्ण कल्पित थे। कहते हुए-
सबने लिक्खा वली दक्कनी
सबने लिक्खे - मृतकों के बयान
किसी ने नहीं लिखा
वहां पर थी शराब पीने पर पाबंदी
शराबियों से वहां
अपराधियों का सा सलूक किया जाता था।
मैंने कहा-
किसी मोहल्ले में नहीं
बैठकी की जगह
किसी कस्बे में नहीं बची चौपाल
किसी हिंदुस्तानी की डायरी में दर्ज नहीं है
बजार की सबसे पुरानी का जिक्र ही नहीं कहीं
कहीं नहीं है
रुक सकने लायक हवा
यह एक सपना था जाहिर है सपने के साथ जो अतार्किकता होती है इसमें भी थी। यानी यह अपनी शक्ल का भरपूर चकत्ता चिकनोटी सपना था। चिन्मय जी की दाडी सा सफेद नहीं न ही मेरे दिल की तरह काला. यह सपना था जो अब सच्चा था. इसे चलना था 8 अक्टूबर तक. दिल्ली के शोर का विस्फोट ही इसे तोड सकता था. मैंने इसी सपने के साथ ठंडी होने से पहले चाय सुडक ली. सपना तो सपना था. कोई दीक्षित जी की क्लास नहीं कि मेरा नंबर सबसे बाद में आए और बीजेएच के बाकी सुघड चेहरे आगे आ जाएं. कब वक्त 11 पर पहुंच गया पता ही नहीं चला. अब मैं अश्विनी के साथ गोल्ड फ्लैक के कस ले रहा था. रूपेश ने रमेंद्र और निराला के लिए पान का आर्डर देकर पांच चाय के लिए कह दिया था. चित्रकूट विश्वविद्यालय के बाहर की ओर सतना रोड पर हम इंतजार में वक्त काट रहे थे- बातों से. जिनके सहारे हमने विकास का अब तक का अरण्य पार किया था. जब काम से जी चुराते हुए अच्छे वर्कर बन कर हमने 25 गुणा 4 के विज्ञापन के लिए जगह छोडकर तीन पैकेज के साथ टाइट ले आउट बना कर खबरें भरवा दी थीं. धोनी को मिले पिछले एक साल के चैकों का टैक्स प्रतिशत था. शाहरुख की नई फिल्मों के कारोबार और अति आदर-णीय (कृपया इसे दयनीय न पढे) वाजपेयी "जी" के गुणगान का पूरा पैकेज था और कर्नाटक में सत्ता की बाजीगरी का तीन कॉलम 17 की हाइट में टंगा था. नंदीग्राम भी अपनी जगह पा चुका था. यानी एक भरा पूरा इंडिया था, जिसमें छतरपुर के बिसनू की पिछले साल मरी गाय का कोई जिक्र नहीं होना था सो नहीं हुआ. पूरन की मंझली बेटी के ब्याह में लिए कर्ज का ब्याज उसकी जमीन का तीन गुना हो गया था, जिसके कारणा वह पागलों की सी हरकतें करता था. इसे बॉटम नहीं बनाया जा सकता था. पहला कारणा रीडैबिलिटी है. दूसरे विज्ञापन हैं बॉटम की जगह कहा? फिर इससे तो अच्छा है कोई गिनीज बुक का पुराना रिकार्ड निकालकर उसका एंकर तैयार किया जाए. हां, अगर हैदरबाद विस्फोट में मारे गए लोगों के परिवार का या फिर छत्तीसगढ के नक्सली हमले के पीडित की कोई ह्यूमन एंगल स्टोरी हो तो वो ले सकते हैं- पर ध्यान रखना तीन चार मोटी मोटी बातें आ जाएं कि कैसे उग्रवाद ने जीवन नारकीय बना रखा है वहां. वहां विकास की कोई गंगा नहीं बह पा रही. विदेशी कंपनियों ने अपने पांव खींच लिए हैं. सबसे जरूरी वह बाक्स लेना जिसमें अब तक हुए नक्सली हमलों में जान और माल की क्षति का "तथ्यात्मक" न्यूमेरिक टेबिल है. यस सर. पेज पास. लंबी तानो सो जाओ.
(दूसरी किस्त जल्द)
पुनश्च:
मैंने चित्रकूट यात्रा का शुरुआती खाका ठीक नहीं खींचा है। यह मैं जानता हूं। या वो जानते होंगे जो इस अनुभव में हमारे सहभागी थे. मैंने कोशिश की थी. इसलिए कि यात्रा का स्केच तैयार करना- किसी जगह का पूरा पूरा चित्र खींच देना तकरीबन नामुमकिन है. कई जगह रंग छूट जाते हैं. कई जगह लाल ज्याद हो जाता है या फिर हरा बिखर जाता है. या फिर केसरिया अपनी जगह से ज्यादा टांगें पसार लेता है. और सभी को गडबडा देता है. मैंने महज इतना किया है कि वहां पहुंचे लोगों को उकसाऊं कि वे अपनी यादों की गठरी खोलें, जिस वजह से चित्रकूट गए थे उसे निकालें. उसमें झांकें जरूरत पडे तो फिर वहीं पहूंचे. कुछ निकालें मुट्ठी बंद कर लाएं और बाहर निकलकर यूं खोल दें कि- यह रहा कमाल का दिखनौटा.
कोशिशें हर बार असफल ही रहती हैं क्या?
सचिन श्रीवास्तव, लुधियाना
09780418417

18 November, 2007

क्रांति से ईश्वरों की गुहार

अश्विनी पंकज एक पॉलिटिकल प्रेम कवि हैं। जब वे पॉलिटिकल कविताएं लिखते हैं. मसलों पर अपने स्टैंड लेते हैं. मनुष्य के पक्ष में खडे होते हैं. नीचे, तलछट की छटपटाहट और बेचैनी की कविताएं तब उनके वाक्य बनती हैं. तब वे दुनिया के बीचों बीच खडे होकर ललकारते से प्रतीक होते हैं मनुष्य विरोधियों को. इसके विपरीत प्रेम कवि अश्विनी अपने एकांत में बरियातु पहाड के ऊपर शाम में डूबते सूरज की तरफ पीठ किए बैठा है. यादों में चलती रील के साथ बहता हुआ अश्विनी किसी बच्चे सा दिखाई देता है. उसकी सफेद दाडी की आवाज उस खरखराहट से मिलती है, जो किसी बढई के कलौचे से छिलती लकडी का रुदन होती है.
इसके अलावा पंकज का एक रूप पॉलिटिकल प्रेम कवि का है। मुझे इसी अश्विनी से मिलना अच्छा लगता है. यह वह सबसे अच्छा मनुष्य होता है. प्रेम से भरा पूरा. लोगों के मुखौटों के भीतर का हिस्सा उजागर करता. अपनी दुनिया का सबसे अंतिम आदमी जो पहला भी होता है यानी सब कुछ यहां बराबर होता है.
पिछले दिनों वह हैदराबाद गए थे। दलित कांफ्रेन्स में. लौटते वक्त बंगाल बंद के दौरान उनकी ट्रेन लेट हुई. अश्विनी खाली नहीं बैठ पाते. उन्होंने इस दरमयान कई कविताएं लिखीं जो मुझे पहले फोन पर सुनाईं और फिर मेल कीं. इनमें से एक कविता इसी पॉलिटिकल प्रेम कवि की थी. जहां उनकी प्रेयसी से गुहार है. ईश्वरत्व की यह गुहार असल में मनुष्यता को अपनी पूरी गरिमा पर प्रतिस्थापित करने की आदिम इच्छा है. क्या आप इसमें शामिल होंगे.

कारीगर की प्रार्थना

इस क्षण मैं ईश्वर होता
यदि तुम पास होतीं
मुझे नफरत है
उस मंदिर से
उस महंत से
घर परिवार
उस समाज से
जिसने ईश्वर होने की
कुछ खास शर्त गढ डाली हैं

तुम्हारी कोई शर्त नहीं

यही एक बात
तुम्हें उस सभी से
अलग कर देती है
जिनके पास ईश्वर नहीं है
जबकि तुम
मुझे ईश्वर बना सकती हो
रच सकती हो मेरे इंसान को
पुन: पुन:
अनकों बार

यहां कारीगरों की कद्र नहीं है
मंच बाजीगरों से भरा है

डरे हुए लोग
टीवी पर लाइव कवरेज में डूबे हैं
झारखंड दिल्ली इस्लामाबाद
फौज के कब्जे में हैं
गुजरात में मोदी
नई लीला रच रहा है
भगवान का बर्थ सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं पोंगापंथी
एडम ब्रिज पर बजरंगियों की रामधुन
शुरू हो चुकी है
नरमेध के लिए
तैयार हो रहे हैं रथी

वे इस आशंका से ही
भयभीत हैं
कि कहीं तुम आ न जाओ
उन्हें मालूम हैकी तुम्हारे आते ही
मैं हो जाउंगा ईश्वर

इसलिए वे पूरी ताकत से लगे हैं
हर तरफ बाडेबंदी है
कानूनों को उन्होंने
अपने अनुकूल बना लिया है
सुप्रीम कोर्ट बार बार
चीख रहा है
अभिव्यक्ति के अधिकार का
यह मतलब हरगिज नहीं
कि आप बार बार
सडकों पर उतरें
कि कोई भी नगर की दिनचर्या में खलल डाले
राज्य को निर्देश है
शांति व्यवस्था बनी रहे

मुझे मालूम है
तुम आओगी
तुम आ रही हो
दसों दिशाओं से
मठों को ध्वस्त करते
द्रौपदी के मिथक को
तार तार करती
अपने वक्ष में भरपूर दूध लिए
नख से शिख तक
कमनीय
रमणीय
मेरा ईश्वरत्व लिए

क्योंकि तुम्हें ही रचना है मुझे

प्रिय तुम ही रचोगी
यह नया ईश्वर
तुम ही प्रतिष्ठित करोगी
उन सभी देहों को
जिनमें मेहनत भरी है
अपनी सांस सांस से
जो रच रहे हैं
अन्न, औजार और हथियार
फूल, तितलियां और खिलौने

ओ प्रियतमा
क्रांति
आओ
और तौड डालो सारे फर्जी
ईश्वरों की मूर्तियां
गौरवांवित होने दो मुझे
कि मैं स्वयं ईश्वर हूं
आओ और प्रतिष्ठित करो
फिर से मुझे
हम सबको

15 November, 2007

लुधियाना से लुधियाना वाया लुधियाना













हुए
बहुत दिन ब्लॉगर एक

करता था हर रोज एक पोस्ट
आया एक शहर में वह
काम नहीं था कोई उसको
फिर भी दूर ब्लॉगिंग से वो


क्या मैं मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। ना काम ना धाम बस आराम ही आराम। फिर भी ब्लॉगिंग से दूर. किसका कसूर. यहां लुधियाना को देखा . बहुत करीब अभी शहर के नहीं गया हूं. लेकिन जितना देखा , उतना सीखा . कभी आपके साथ हुआ है ऐसा कि लगे अब समझ का एक मोटा मोटा तजुर्बा अर्जित कर लिया. फिर सडक पर निकलें और पता चले कि जीवन का यह हिस्सा तो जाना ही नहीं था . कमअक्ली पर न हंस पाएं न उस अनुभव को पूरा पूरा गुपड पाएं . आधा गले के भीतर और आधा जबान पर. जैसे गुलजार के सीने में नज्म उलझती है. कांच के टुकडे की तरह हलक में.
सुबह उतरा था लुधियाना में। दीवाली की छुट्टियों के बाद। कुछ नोट्स लिए। यह कविता की शक्ल में नहीं हैं. कविता जैसे लगें तो इसे कुसंगति मानें .
रिक्शा हैं
रिक्शावाला कहीं नहीं
हिस्सा हो गया है सीट से जुडकर
2
शोर-शोर- शोर
दिल्ली यहीं, मुंबई यहीं, कानपुर यहीं
पूर्वांचल : नहीं- नहीं-नहीं
3
डिराइवर बाबू घंटाघर चलो
समाराला चौक- आगे बढो

4
पूर्वांचल आ बसा है पंजाब में
पंजाब जा बसा है कैनेडा में
5
कैसे हो पिया
गोरखपुर से आई चिट्ठी लुधियाना
कट पेस्ट ई मेल गया कैनेडा
आई मिस यू

6
अकेली औरत
पिया का करती इंतजार
मोहल्ले को नजर आती " संभावना"

7
जिसने देखा
उसने सोचा
इतना गंदा
वही धंधा

8
500 साल पुराना शहर
5 मिनिट में बदल गया
जो चुप था
बोलते ही पराया हुआ

9
सचिन एक खबर
शाहरुख एंकर
यहां भी, वहां भी
वही टैस्ट वही नजर
रीडेबल-रीडेबल- रीडेबल

10
मुरी एक्सप्रैस में मत जाना
पंजाब मेल बढिया है
राजधानी सुबह निकलेगी
जेब संभाल लें
हम सब जानते हैं
सब शक्ल से ही दिखते हैं चोर
सचिन श्रीवास्तव 09780418417

8 November, 2007

खुशियों से हो जीवन में उजियारा

सभी ब्लागर बंधुओं और नई इबारतें के पाठकों को दीपावली की लख लख बधाइयां.