एपी पर फोटो सर्च कर रहा था.. इंडिया वर्ड के साथ. तीन पेज खुले और आखिरी पेज पर सबसे आखिरी फोटो इंडियन कम्यूनिस्ट के कैप्शन के साथ है.. फोटो की जगह लिखा है मिसिंग ऑर डिलीटेड.. कैप्शन पूरा पढने से पता चलता है कि विश्व के कम्यूनिस्ट लीडर्स के साथ भारतीय नेताओं के फोटोग्राफ का पोस्टर बेचता एक लडका इस तस्वीर में था... बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ कि एपी का कोई फोटो डिलीट किया गया... कुछ खास बात है क्या इसमें???
31 March, 2008
ये तो डिलीट हो लिए..
17 March, 2008
"मस्तराम" नहीं रहे
यह खबर जब मुझे मिली तब तक "मस्तराम" को यह दुनिया छोडे हुए तीन दिन हो चुके थे. मिलने जुलने वालों ने बताया कि अंतिम समय में वे खुद को कोस रहे थे. यूं मस्तराम का असली नाम कुछ और है.. लेकिन वे लिखाई पढाई के हल्के में हल्की सी तिरछी हंसी के साथ "मस्तराम" के नाम से ही जाने जाते थे. असल में यह नाम उन्होंने खुद नहीं चुना था. आर्थिक तंगी के दिनों में कुछ चटखारेदार सवाल पूछने की कला ने उन्हें आगरा के प्रकाशन उद्योग का दरवाजा दिखाया और वहीं से उन्हें दिल्ली मैं रहने की सलाह मिली. उसके बाद मस्तराम के साथ वह कई तरह की कलाबाजियां दिखाते रहे. जो उन्हें जानते हैं उनके बीच कई उनकी "खूबी" से परिचित नहीं हैं. इसलिए उनका असली नाम मैं यहां जाहिर नहीं कर रहा हूं. उन्ही के माध्यम से पता चला कि इसी नाम से कई और लोग भी पच्हत्तर रुपए प्रति प्रश्न की दर पर लिखते हैं.
मस्तराम को उनके असली नाम से बुलाने की जिद में कई बार मैंने उन्हें घेरा लेकिन कभी उन्होंने नहीं बताया. बहुत बाद में एक सार्टिफिकेट देखते हुए उनके जनेऊधारी नाम से पहचान हुई. जब भी वे मिले आर्थिक तंगी से जूझते रहे. चटखारेदार सवाल लिखकर पैसा कमाने का रास्ता उन्होंने कुछ मुसीबतों से उबरने के लिए चुना था और फिर कई वर्षों तक उससे बाहर नहीं आ सके. यूं अपने समय के कई अन्य लोगों की तरह वे भी लेखन को विशुद्ध पैसा कमाने का पैसा मानते थे. हालांकि जयशंकर प्रसाद की कई पंक्तियों को वे सुरीली आवाज में लयबद्ध ढंग से गुनगुनाते थे और मुक्तिबोध को हद से ज्यादा पसंद करते थे. बात बेबात कई जगह परसाई को कोट भी करते थे और कई सारे अंग्रेजी लेखकों के बारे में गहन जानकारी रखते थे, जिनके नाम उनके मुंह से सुनने के बाद मैं भूल जाया करता था. कई बार उनसे अपनी कमजोर अंग्रेजी के लिए फटकार सुनी और ही ही करके बात टाल दी.
अपने आखिरी वक्त में चाचू (यह भी एक नाम था जिससे उन्हें पुकारा जाता था) बेहद अकेले थे. दीवारों को घूरते हुए वह खुद को कोसते थे और जो मौत वे हर वक्त मर रहे थे उसके लिए उन बापों की बद्दुआओं को जिम्मेदार मानते थे जिनके बेटे उनका साहित्य पढकर दूसरी राह पर चल निकले या फिर एक समय को बरबाद कर लिया. 14 से 22 के बीच के लोगों में खूब पढे गुने गए मस्तराम जी अब हमारे बीच नहीं है. मेरे लिए तो यह निजी क्षति है. आपके लिए??????
वहां बदलाव की लय सुनी जा सकती है
पिछले दिनों भोपाल में था मैं. कुछ पारिवारिक दिक्कतों से फारिग होकर माखनलाल यूनिवर्सिटी पहुंचा. ऐसा हमेशा होता है. भोपाल के दौरे में से दो चीजों के लिए वक्त जरूर चुराता हूं. माखनलाल और लालघाटी. आज बात माखनलाल की.
मेरे समय का विवि अब यहां नहीं रहा. बिल्डिंग बदल गई है. सात नंबर स्टॉप से प्रेस कॉम्पलेक्स आते हुए यूनिवर्सिटी ने कई चीजों छोडी हैं.. नई चीजों की जगह बनाने के लिए ही... शायद... इस बदलाव पर हम बात कर चुके हैं.
इस बार भी यहां एक पुरसुकून माहौल था. एक बदलाव और देखा था.. "पत्रकार क्यों बनना चाहते हो?" यह सवाल इस क्षेत्र के हर नवांगतुक से थोडे बहुत हेरफेर के साथ कभी न कभी जरूर पूछा जाता है. हमसे भी पूछा गया था. मेरे साथियों के साथ मैंने भी कुछ रटे रटाए जुमलों को जवाब की शक्ल दी थी- "समाज के लिए कुछ बेहतर करना है", "अपने इस तरीके से दुनिया में पैदा हुई खामियां ठीक करने की कोशिश", "भ्रष्टाचार को बेपर्दा करना है", "कमजोरों की मदद"........ जैसे बयान थे हमारे.
चाहते हुए भी हम झूठ नहीं बोल रहे थे. अच्छे अच्छे जवाब देने की कोशिश तो थी लेकिन कहीं न कहीं वह जज्बा था. पता नहीं न्यूज रूम की भागदौड और प्रेशर के बीच अब कही कुछ कम हुआ है. बीच के रास्ते खोजे हैं बाजार से तालमेल बैठाने के. कुछ छोटी मोटी लडाइयां भी लडीं. और हथियार भी डाले.. भारी मन से नहीं गलबहियां करते हुए. खैर.
तो उन जवाबों में क्या था. क्या वह सुनने वालों को हौसला देते होंगे. बिल्कुल. इस बार माखनलाल में खुद में ये जवाब सुनकर भरोसे की दीवार से टिक गया था. हालांकि उन चेहरे पर उतना आत्मविश्वास न पाकर और उनकी मासूमियत देखकर कुछ दरक भी रहा था. भीतर से... ये लोग जल्द हथियार डालेंगे या फिर खेत हो जाएंगे.
माखनलाल में नए साथियों से जब मैंने वही सनातन सवाल पूछा था तो कुछ हेरफेर के साथ वही जवाब मिले थे. इक्का दुक्का जवाब- "यह भी एक फील्ड है, जिसमें कैरियर बनाया जा सकता है" थे, लेकिन उनके भीतर की अराजकता चेहरे से टपक रही थी.
खैर रचनात्मकता की एक दिलचस्प जादूबयानी वाला मामला अलग कर दिया जाए, तो क्या यह जवाब हौसला नहीं देते.. अपनी तमाम खामियों के बीच पत्रकारिता वहां पनप रही है. वहां कुछ कदम पांव ले रहे हैं. क्या उन कदमों के लिए ये पहाड पीछे सरकेंगे, नदियां रास्ता देंगीत.. देखते हैं..
.... एक बात और माखनलाल के नए विद्यार्थियों ने एक ब्लॉग बनाया है. अभी इस पर कुछ लिखा नहीं गया है. पर उम्मीद की जानी चाहिए कि पत्रकारिता के नए तेवर की बानगी यहां मिलेगी.. उत्साह तो आप लोग बढाएंगे ही..
मेरे समय का विवि अब यहां नहीं रहा. बिल्डिंग बदल गई है. सात नंबर स्टॉप से प्रेस कॉम्पलेक्स आते हुए यूनिवर्सिटी ने कई चीजों छोडी हैं.. नई चीजों की जगह बनाने के लिए ही... शायद... इस बदलाव पर हम बात कर चुके हैं.
इस बार भी यहां एक पुरसुकून माहौल था. एक बदलाव और देखा था.. "पत्रकार क्यों बनना चाहते हो?" यह सवाल इस क्षेत्र के हर नवांगतुक से थोडे बहुत हेरफेर के साथ कभी न कभी जरूर पूछा जाता है. हमसे भी पूछा गया था. मेरे साथियों के साथ मैंने भी कुछ रटे रटाए जुमलों को जवाब की शक्ल दी थी- "समाज के लिए कुछ बेहतर करना है", "अपने इस तरीके से दुनिया में पैदा हुई खामियां ठीक करने की कोशिश", "भ्रष्टाचार को बेपर्दा करना है", "कमजोरों की मदद"........ जैसे बयान थे हमारे.
चाहते हुए भी हम झूठ नहीं बोल रहे थे. अच्छे अच्छे जवाब देने की कोशिश तो थी लेकिन कहीं न कहीं वह जज्बा था. पता नहीं न्यूज रूम की भागदौड और प्रेशर के बीच अब कही कुछ कम हुआ है. बीच के रास्ते खोजे हैं बाजार से तालमेल बैठाने के. कुछ छोटी मोटी लडाइयां भी लडीं. और हथियार भी डाले.. भारी मन से नहीं गलबहियां करते हुए. खैर.
तो उन जवाबों में क्या था. क्या वह सुनने वालों को हौसला देते होंगे. बिल्कुल. इस बार माखनलाल में खुद में ये जवाब सुनकर भरोसे की दीवार से टिक गया था. हालांकि उन चेहरे पर उतना आत्मविश्वास न पाकर और उनकी मासूमियत देखकर कुछ दरक भी रहा था. भीतर से... ये लोग जल्द हथियार डालेंगे या फिर खेत हो जाएंगे.
माखनलाल में नए साथियों से जब मैंने वही सनातन सवाल पूछा था तो कुछ हेरफेर के साथ वही जवाब मिले थे. इक्का दुक्का जवाब- "यह भी एक फील्ड है, जिसमें कैरियर बनाया जा सकता है" थे, लेकिन उनके भीतर की अराजकता चेहरे से टपक रही थी.
खैर रचनात्मकता की एक दिलचस्प जादूबयानी वाला मामला अलग कर दिया जाए, तो क्या यह जवाब हौसला नहीं देते.. अपनी तमाम खामियों के बीच पत्रकारिता वहां पनप रही है. वहां कुछ कदम पांव ले रहे हैं. क्या उन कदमों के लिए ये पहाड पीछे सरकेंगे, नदियां रास्ता देंगीत.. देखते हैं..
.... एक बात और माखनलाल के नए विद्यार्थियों ने एक ब्लॉग बनाया है. अभी इस पर कुछ लिखा नहीं गया है. पर उम्मीद की जानी चाहिए कि पत्रकारिता के नए तेवर की बानगी यहां मिलेगी.. उत्साह तो आप लोग बढाएंगे ही..
16 March, 2008
क्या ब्लॉगवाणी भी चला नारद की राह
आज पूरे दिन ब्लॉगवाणी पर भडास दिखाई नहीं दिया. क्या इस बहुचर्चित ब्लॉग को बैन कर दिया है? बहुचर्चित इसलिए कि सारे दिन एग्रीगेटर पर पोस्ट न आने के बावजूद भडास को पूरे दिन में साढे तीन सौ से ज्यादा लोगों ने पढा. यह बात पहले भी उठ चुकी है कि कोई ब्लॉग कितना चर्चित है इसमें एग्रीगेटर का कोई खास रोल नहीं होता. खैर जुदा मसला है... आज में भडास पर गया था तो उसमें कोई आपत्तिजनक भाषा कम से कम पिछली सात आठ पोस्ट में तो नहीं ही थी. यानी जब भडासी सुधरने लगे तो उन पर बैन का कोडा चला दिया गया. अगर ऐसा है तो शर्म है. जिस शोर के साथ ब्लॉगवाणी शुरू हुआ था वह जज्बा खतम हो गया क्या. चलो अच्छा हुआ एक भ्रम और टूटा कि बोलने की आजादी ब्लॉग पर है... किस ढंग से बात कही जाए इसे मिलबैठकर समझाया जा सकता था.. लेकिन नहीं यहां तो मुंह बंद करने की सलाहियत ही है.. क्या बात है!!!! ब्लॉगवाणी की लोकतांत्रिक आवाजें कहां गई? कहां गए बजार पर बैन के विरोधी? सो गए क्या? चलिए अपन भी सोते हैं.... साली निकल गई अपनी भडास
तो संजीदा सोज बशारत मंजिल में बैठे सोचते होंगे कि क्या अगडम बगडम आंय बांय बक रहा हूं.... तो सोज साहब यह हमारे समय का सबसे नया खिलौना है जिससे हम मन बहलाव के लिए खेलते हैं... बशारत मंजिल से निकलकर बताशों वाली गली से होते हुए चावडी बाजार की तरफ आएं तो कल मुझे बुला लीजिएगा... कल इस खिलौने के कुछ और मजेदार किस्से सुनाउंगा....
4 March, 2008
आज बस इतना ही
1 March, 2008
मोहल्ले और भडास की असली औकात या यूं कहें कि "ताकत"
पिछले दिन मोहल्ला और भडास पर जो विवाद चल रहा है. उसमें कई बार मठाधीशी का जिक्र आया है. मैं मुद्दे पर बहस करने के पक्ष में हूं. यहां मैं एक क्षेपक की तरह कुछ आंकडे रख रहा हूं. इसे मूल बहस से दूर रखकर बस इतना भर जान लें कि क्या सचमुच अविनाश और यशवंत की हैसियत ब्लॉगिंग की मठाधीशी करने की है.. या फिर ये दोनों भी किसी और के हाथों की कठपुतली भर हैं और किसी अन्य के खेल में मोहरे की तरह इस्तेमल हो रहे हैं? साथ में यह भी सोचें कि आपके अपने ब्लॉग की हैसियत इस खेल में क्या है... ये जो इतना सारा फ्री स्पेश मुहैया कराया गया है क्या महज दिल बहलाव के लिए है? अथवा इसकी कई और पर्तें भी हैं... दोस्तो खेल बहुत बडा है....
जरा इन बिंदुओं पर नजर डालें
शुरुआत: मोहल्ले की शुरुआत एक फरवरी 2007 को हुई और भडास की हालिया यानी दूसरी पारी 12 जनवरी 2008 को शुरु हुई. यूं भडास की पहली पारी मई 2007 के आसपास शुरु हुई थी.. दोनों ही स्थितियों में ब्लॉगिंग में अविनाश यशवंत से सीनियर प्लेयर हैं.पोस्ट: अपने तकरीबन 13 महीने के कार्यकाल में मोहल्ले पर 482 पोस्टें डाली गईं जो उसके 41 मेंबर लेखकों ने डालीं. इसी तरह अपने हालिया दो माही कार्यकाल में भडास पर 1208 पोस्टें डाली गई, जिनमें से 437 पोस्टें ड्राफ्ट में ही रहीं यानी प्रकाशित नहीं की गईं यानी कुल 771 पोस्टें जो 229 भडासियों ने डालीं.कमेंट: भडास की पोस्टों पर कुल मिलाकर 1079 कमेंट आए तो मोहल्ले पर 2779 कमेंट विभिन्न ब्लॉगरों ने डाले.. ध्यान रखने वाली बात यह है कि भडास पर ज्यादातर लोग कमेंट की बात भी नई पोस्ट की शक्ल में कहते रहे. इसलिए जहां भडास पर पोस्टें अधिक हैं वहीं कमेंट की संख्या कम है.. इसे भडास पर लिखने की खुली छूट भी बडा कारण रही.. इसके बरअक्स मोहल्ले में एक किस्म से कमान अविनाश जी के हाथ में ही रही..विजिटर: लगे हाथ दोनों ब्लॉग के हिट्स भी देखें. अपनी पूरी अवधि में जहां मोहल्ले पर एक मार्च को रात बारह बजे तक 78 हजार पांच सौ 66 लोगों ने दस्तक देकर एक लाख 46 हजार 245 पन्ने खोले. वहीं भडास पर 28 हजार 810 विजिटर ने 45 हजार 470 पन्ने पढे.
कल कुछ और आंकडे पढने को मिलेंगे क्या?
(सभी आंकडे एक मार्च को रात बारह बजे तक)
क्या अविनाश और यशवंत में सवालों का सामना करने की हिम्मत है?
जो कुछ भी अभी हो रहा है... उसे खत्म करने की में बिल्कुल भी वकालत नहीं करूंगा.. चीजों पर बात किए बिना न तो ढंग से समझ आ सकती है न मुद्दे की पहचान हो सकती है... मेरी एक राय है.. मैथिली जी इसे और आगे बढा सकते हैं... अविनाश जी और यशवंत जी भी इस मुद्दे पर ध्यान दें... इस पूरे मुद्दे में एक पक्ष यशवंत हैं... वे सही हैं या गलत यह या वे खुद जानते हैं या फिर उनके बारे में लिखने वाले... मसला जो भी हो... यशवंत जी मैं आपको एक सलाह देता हूं बिन मांगे की... भडास पर आप एक पोस्ट लिखिए जिसमें आप अपने ऑनलाइन होने का वक्त मुकर्रर कर लें... उस दौरान जिन साथियों को यशवंत से जो जो कुछ जिस जिस भाषा में पूछना हो वे पूछ लें... वह कमेंट की तरह हो जाए तो और अच्छा ताकि बाकी लोग देखते रहें और सवालों का रिपीटेशन न हो... यही प्रक्रिया मोहल्ले पर अविनाश जी अपनाएं... मुझे लगता है मनीषा जी जिस चैट को लेकर परेशान हैं उस बातचीत पर वे भी खुद सीधे बात करें और अविनाश जी को भोंपू बनाना छोडकर अपनी लडाई खुद लडें... हम उनका साथ भर दे सकते हैं और यह लडाई इतनी बडी नहीं है कि फौज फाटे के साथ लडी जाए छोटी सी तकरार है यारो निपट लो... बात इतनी ही है... मैथिली जी, अनूप शुक्ला जी बुजुर्गियत का कुछ ख्याल कीजिए... गालियां हम भी खूब देते हैं पर बुजुर्गों की डांट पडते ही घरों का या फिर नदिया की पारिया का रास्ता नाप लेते हैं... बच्चों को थोडा सोंटा दिखाइये.... बडे बड्डे भापा जी बनते हैं... उठाइये जरा कलम लिखिए जरा खरी खरी... वो ब्लॉगिंग की दाद खाज पंगेबाज मियां किधर हैं... पंगे लेने की खबेदी कहां बिला गई हुजूर...
मेरा ऑनलाइन वाला ख्याल अगर सिरे चढे तो बता दीजिए अविनाश जी, यशवंत जी... बहुत सवाल है अपने पास भी...
ये लडाई सडक पर भी आएगी क्या?
"और भाई आजकल कहीं दिखाई ही नहीं देते कहां चले गए थे?"
"अरे कहीं नहीं हम तो यहीं थे बस मजा ले रहे हैं."
"कैसा मजा?"
"अरे तुम्हें नहीं पता, कहां रहते हो, भोपाल गए थे. वहां खबरें नहीं पहुंचती क्या?"
"अरे यार पहेलिया न बुझाओ? क्या चल रहा है सो बताओ?"
"पहेली फहेली कुछ नहीं. अभी अभी अल्ली पार वाले बांके ने एक मुद्दा उछाला है. मुद्दा क्या है पूरा पैकेज है. स्त्री है, भाषा है, वाद है, संवाद है, मूल्य है, मेल है, मिलाप है, कुछ नई अभिव्यक्ति का घोंट है कुछ पुरानी नैतिकता का छौंक है. कुल मिलाकर खूब लत्तम जुत्तम है. अभी तो कुल जमा जुबानी खर्च ही चल रहा है. यार किसी का सिर फिर फूटे तो मजा आ जाए. इस किसम की सिर फुट्टौव्वल बहुत दिनों से नहीं देखी..."
"यार क्या बक रहे हो कुछ समझ में नहीं आ रहा. कोई सिरा तो पकडाओ... हम भी कहीं इस में न पिस जाएं... कोई विवाद से हम यदि इसी समाज में हैं तो अछूते नहीं रह सकते."
"साले, सठियाओ न. इन विवादों में तुम क्या खाकर कूदोगे. अल्ली पार के बांके की अपनी जमात है और पल्ली पार का बांके तो शुरू से ही उजड्ड है. वैसे उजड्ड पना तो अल्ली पार के बांके में भी है लेकिन उसने कुछ हद तक अपनी एक ग्रेविटी मेंटेंने की है. ये वाला पढता लिखता खूब है सो चीजों को अपने हक में करने की कूटनीतिक समझ भी उसे खूब है.. हां पल्ली पार वाला जब नंगई पे उतरता है तो वो समझता है कोई वाद का विवाद खडा कर रहा है जबकि होता उलट है... वैसे अभी भी जो लोग इस तू तू मैं मैं में शामिल हैं वे दूध के धुले नहीं है... बजार पर खूब गाली गलौच की थी इन्होंने... सब साले एक ही थैली के हैं..."
"अबे तुम चुप भी करो ऐसा कहीं होता है. तुम तो सबको एक ही तराजू में तौल रहे हो.. यार कोई मसला होता है तो एक पक्ष गलत या कुछ हद तक गलत जरूर होता है. सभी चीजों को एक साथ रखकर नहीं देखना चाहिए... मैं तो कहता हूं थोडा रुककर तेल देखो और तेल की धार.... और प्लीज ये सिर फुट्टौव्वल के लिए मत मरे जाओ... इससे तुम्हारा तो असली चेहरा दिखता ही है... ये भी तो हो सकता है कि इस बहस कोई किसी सिरे पर पहुंचने की सच्ची कोशिश कर रहा हो... मुझे तो यही लगता है... अभी देखता हूं कि मैं इस बाजार में किस जगह खडा हूं...."
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