July 28, 2008

हमसे पूछो न दोस्ती का सिला

वे दोनों दोस्त नहीं थे लेकिन दोस्त की तरह दिखते थे. एक उम्र में कुछ बडा था और दूसरा उम्र में कुछ छोटा. उम्र की ही तरह समझदारी में भी कमीबेसी उसी आयतन में थी. उन दोनों ने दोस्ती दिखाना एक कला की तरह शुरू किया था, जो हमारे समय में आम पाई जाती है. आपके आसपास भी ऐसे कई चेहरे होंगे जो दोस्त की तरह दिखाई देते होंगे, लेकिन एक दिन अचानक पता चलता है कि उन्होंने दोस्ती के झूठ को गुब्बारे की तरह फुला रखा था, जिसकी हवा वे लगातार चैक करते रहते थे. हालांकि हमारी बातचीत के बीच जिनका जिक्र है वे अब भी कामयाबी से अपने चेहरे पर दोस्ती चस्पां किए हुए हैं. इस बीच कई बार हवा कुछ कम हुई और गुब्बारा पिचका लेकिन फिर उन दोनों ने उसे पहले की तरह दुरुस्त कर लिया..

मैं उनके बारे में कुछ नहीं बताता अगर हाल ही में उनके हिस्से की कुछ मजेदार कतरनें, जिन्हें आप सुविधानुसार कुछ भी नाम दे सकते हैं, मेरे पास न आती हुआ यूं कि एक बार रात में छोटे वाले से मेरी मुलाकात हुई. मैं सडक पर अकेला चला जा रहा था सो वक्त काटने के लिए मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी. चूंकि एक से बातचीत में दूसरे का और दूसरे से बातचीत में पहले का जिक्र होना ही होता है, इसलिए मैंने दूसरे के बारे में बातचीत की. मैंने जैसे ही उससे दूसरे के बारे में पूछा ठीक उसी वक्त सामने से आती एक कार की रोशनी उसके चेहरे पर पडी और ठीक उसी समय मैंने उसके मुंह की तरफ जवाब के लिए देखा. मैं असमंजस में था कि अमूमन दूसरे का जिक्र करने पर उसका चेहरा खिल उठता था, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर एक अजीब-सी कडवाहट थी जिसे छुपाने की भी उसने कोशिश नहीं की. फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया जिसकी मुट्ठी बंद थी. मेरा ध्यान उसके जवाब पर नहीं गया, जो बेहद औपचारिक था. उसने बहुत आत्मीय शब्दों के साथ बताया था लेकिन फिर भी मुझे उसकी आवाज के साथ कुछ कांटे मिले हुए दिखे, जिनपर उसने अपनी मिठास का मुलम्मा चढाया हुआ था. अब सडक पर अंधेरा था, लेकिन मेरी आंखों में उसका चेहरा पूरा साफ साफ छप चुका था. अब वही चेहरा मैंने उसके पुराने चेहरे से मिलाया. उनमें कोई साम्य नहीं था. यह उसका शायद सबसे पुराना चेहरा था, जो कभी वह सामने नहीं लाता था. हमने चलते चलते और भी बातचीत की लेकिन उसमें कहीं भी कुछ वैसा नहीं था जो उसके पहले से चले आ रहे व्यवहार से भिन्न हो.. उसने अपनी नपी तुली और व्यवस्थित भाषा में बातचीत को औपचारिक अभिवादन पर खत्म किया. मैं उस रात के बाद कभी उसका वैसा चेहरा नहीं देख पाया लेकिन और लोगों से, जिन्हें तकरीबन दोस्त कहा जा सकता है, इस बारे में जिक्र किया तो कोई मानने को तैयार नहीं है कि उनके बीच दोस्ती महज दिखाने भर की है.

फिर मैं धीरे धीरे इस बात को भूलने लगा. हाल ही में मेरी मुलाकात दूसरे यानी दोस्ती के बडी उम्र की साझीदार से हुई. मैं किसी काम के सिलसिले में घर गया था. उसके दो बेटे हैं एक की उम्र उतनी है जितने में लडके अपने पिता के सामने नजरें झुकाकर ही सही लेकिन अपने तर्क रखने लगते हैं. उसका दूसरा बेटा अभी उम्र के उस हिस्से में हैं जहां वह पिता की गोद में बैठकर अपनी दिनभर की बातों को दोहरा लेता है. वह मूंछे रखता है और मौके बमौके अपनी मूंछों पर हाथ भी फेरता है. अमूमन वह मूंछ को नीचे की तरफ रखता है लेकिन नुकील मूंछे कई बार जगह छोडकर तन जाती हैं जिन्हें वह फिर हाथ फेरकर झुका लेता है. ऐसा संभव नहीं था कि हमारी बातचीत में उसके दोस्त का जिक्र न आता. जिक्र आया तो वह कुछ उदास हुआ. यह दोस्ती की उदासी थी जिसमें उसने चिंता मिला दी थी और लंबी सांस भरकर उसके प्रति अपने प्रेम को बताते हुए कहा कि वह अपने बारे में ठीक ढंग से नहीं सोचता और अब उसे व्यवस्थित जीवन के प्रति गंभीरता से सोचना चाहिए. यह शाम का वक्त था जब हमने बातचीत का सिरा इस ओर मोडा था. घिरते अंधेरे के साथ हमारी बातचीत से भी रोशनी गायब होने लगी और उसने फिर से बातचीत का सिरा पकडकर अपने दोस्त की अच्छाइयों की तरफ मेरा ध्यान दिलाया. हालांकि मैं उसकी भली आदतों से पहले ही परिचित था. लेकिन अच्छे दोस्त की तरह वह लगातार अपने दोस्त के बारे में भला भला कहता रहा. वह यह लगातार करता था क्योंकि वह मानता था कि अपने दोस्तों की अच्छी बातें हमें लगातार लोगों को बताते रहना चाहिए ताकि उनकी अच्छाइयों का रंग गाढा हो जाए. इस बीच अंधेरा कुछ और गहरा हुआ. हम बातचीत करते रहे. इस बीच बाहर अंधेरा गहरा होता गया और कमरे में हमने ट्यूबलाइट जला ली. फिर हमारी बातचीत में मौसम का जिक्र आने लगा तो मैंने जाने के बारे में सोचा. उसने भी औपचारिकताओं के बाद फिर मिलने के बारे में कहा और मैं वापस जाने लगा. इस बीच मुझे कुछ याद आया और मैं पलटा. मैं भौचक रह गया उस वक्त वह दरवाजा बंद कर रहा था और उसका चेहरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैंने पहले वाले का उस कार की रोशनी में देखा था. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उससे कुछ कह पाउं.

July 14, 2008

नमस्कार, सर

वह एक विवेकपूर्ण नमस्कार था
जिसे मैंने ऑफिस की सीढियां चढते
हुए थोडा थोडा खर्च किया
इसके बदले में कई बार मुझे एक मुस्कुराहट मिली कई बार उठा हुआ सीने तक जाता हाथ
पर मेरे लिए इनका कोई मतलब नहीं था
नमस्कार मेरे पास बहुत से थे
सो उनके खर्च में कंजूसी का कोई बहुत मतलब नहीं था

लांग टर्म बेनिफिट इनका मिलना ही था
ये नमस्कार अभी के अभी नहीं बदल जाते मिल्कियत में
सिगरेट की तरह नहीं होते नमस्कार
कि दोस्त तुम्हारी जेबों से निकाल ले पूरा पैकेट और तुम्हें नाराज करके भी लगाता रहे लंबे लंबे कश
हालांकि यह दीगर बात कि बाद में दोस्त की यह हरकत आपके चेहरे पर हंसी ला देती है
जिसे आप यादों से निकले एक खूबसूरत दृश्य की हंसी का नाम दे सकते हैं
खैर यह किस्सा कुछ और है
और मार्के की बात यह कि अभी नमस्कारों ने फिर अपने रंग बदलना शुरू कर दिए हैं
जिन्हें कभी हम नमस्कार करते थे वे अब खुद पहले हाथ मिलाने के लिए आगे आने लगे हैं
जो महज चश्में के ऊपर से झांकते थे वे मुंडी हिलाने लगे हैं
और जो अपनी कुर्सी से खडे हो जाते थे
अब झुकने लगे हैं
यह वही दौर है
जब दुश्मन को सीधे सीधे हुंकारा भरकर नहीं ललकारा जाता
अब जड से उखाडने के लिए नींव टटोली जा रही है
भला इसके लिए झुकना तो पडेगा ही