July 30, 2010

दुबे जी, हम करेंगे आपके सपने पूरे

(दुबे जी को प्यार करने वालों का दायरा बेहद बडा था। जिन जिन को सूचना मिली उन्होंने एक साथी का जाना बताया। वे एक बार जिससे मिलते थे उसे अपना मुरीद बना लेते थे। दुबे जी की उम्र के बारे में उनसे मिलकर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था था। अभी अभी आनंद जी ने बताया कि उनकी जन्मतिथि 7 अक्टूबर 1931 है। इस अक्टूबर में दुबे जी का 79वां जन्मदिन होगा। आप कुछ सोच रहे हैं क्या? खैर। भाई राकेश मालवीय की यादों से भी दुबे जी का मजबूत इरादों वाला चेहरा झांकता है।)

- राकेश मालवीय

दुबे जी ने कहा था आप लोग शुरू करो, दिल्ली से हर संभव मदद दिलाने का मैं वायदा करता हूं। अफसोस उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते इससे पहले ही वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात, हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह, और सम्मान को समझा जा सकता था। आज सुबह यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था। हम सभी के लिए यह एक गहरा आघात था। केवल एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, मीडिया के बदलते परिवेश में वह उन चंद लोगों में थे जो अब भी अखबारनवीसों की ताकत को एकजुट होने की बात कहते थे, मीडिया में बदलाव की बात करते थे, मानकों की बात करते थे। महेश्वर में मीडिया सम्मेलन के बाद दुबे जी हमारे लिए एक प्रेरणा पुरूष बन गए थे। दुबेजी से कोई बहुत पुराना नाता नहीं थी। इसी साल में जब विकास संवाद के सालाना सम्मेलन के लिए लोगों से बातचीत हो रही थी तो पशुपति भाई ने दुबे जी के बारे मे बताया था। भाई प्रशांत दुबे ने उनसे बात की तो पहला फोन ही लगभग पौन घंटे की अवधि का रहा होगा। इसी से उनकी जिज्ञासा को समझा जा सकता है। पशुपति भाई के साथ जब दुबे जी 14-15 घंटे का लंबा सफर तय करके महेश्वर पहुंचे थे। उनको देखा तो एक बारगी सोच में पड़ गया कि आखिर कौन सी उर्जा है इस व्यक्ति के अंदर जो इस अवस्था में इतने कष्ट सहने के बाद एक सम्मेलन में शरीक होने चला आया है।

इस बार सम्मेलन में हमने नर्मदा घाटी के पांच गांवों में चलने की यात्रा करने की योजना तैयार की थी। बातचीत के बाद तय किया गया था कि पहले ही दिन गांवों में जाया जाए, वहां लोगों से बात करें। घाटी के लोगों ने हमसे पहले ही वायदा ले लिया था कि मेहमानों को हम ही भोजन कराएंगे। पांच समूह निकले थे। तीन जीप से और दो बस से। मैं जिस जीप में था उसकी अगली सीट पर दुबे जी विराजमान थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता रामकुंवर भी साथ थीं। बीच की सीट पर राकेश दीवान, रितुजी, रानूजी, सीमाजी बैठे थे। पीछे शेख भाई, आसिफ भाई, आशीष अंशु भाई और मैं ठुसे हुए थे। खास बात यह थी कि हमारा गांव मरदाना सबसे दूर था और रास्ता बेहद खराब। लगभग तीन घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद हम गांव में पहुंचे थे। लगभग आठ बजे हमने एक घर में चाय पी। उनसे सामान्य बातचीत होती रही। यह घर बेहद जुदा अंदाज में बना हुआ था। दुबे जी घर की उसारी में पड़े झूले पर बैठे। चाय पी। इसके बाद हमें नर्मदा किनारे एक मंदिर में जाना थां। अंधेरे के कारण इस घाट के सौंदर्य को तो हम नहीं देख सके, लेकिन दाल-बाटी और चावल खाना बहुत राहत भरा था। मंदिर से लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बीच पूरे गांव में खबर हो गई थी और लोग बातचीत के लिए जमा थे। कोई घरों की टिपटियों पर, कोई फट्टों पर और कोई अपने जूतों और चप्पलों को ही नीचे दबाकर बैठा था। गांव वाले पूरे तथ्यों और आंकड़ो के साथ अपनी-अपनी बातें कह रहे थे। इतनी कहानियां, इतनी बातें थी कि पूरी रात भी बैठक चल सकती थी। मुझे बीच में आना पड़ा और मैंने निवेदन किया कि दुबे जी सहित सभी लोग काफी दूर-दूर से आए हैं, थके हुए हैं और अभी लंबा सफर तय करके वापस महेश्वर भी जाना है। आखिरी बातचीत के रूप में दुबे जी ही सामने आए थे। वह अभिभूत थे। इस पूरी लड़ाई को और लड़ने वालों को उन्होंने प्रणाम किया था। उन्होंने आशा भी जताई थी कि एक न एक दिन यह लड़ाई जरूर बेहतर परिणाम की तरफ जाएगी। उन्होंने कहा था आज मुझे लग रहा है कि हम दिल्ली में बैठकर कुछ भी नहीं कर रहे, असली लड़ाई जो है वह आप लोग ही लड़ रहे हैं।

पूरे रास्ते भर आते-जाते उन्होंने बातचीत में एक सूत्रधार की भूमिका अदा की। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ राकेश भैया का एक लंबा रिश्ता रहा है। उनके पास आंदोलन की कहानियों का विशाल भंडार है। राकेश भैया की जान-पहचान और दोस्ती का दायरा भी बहुत बड़ा है, लेकिन दुबे जी से उनकी भी यह पहली मुलाकात थी। बात जब इधर-उधर के चुटकुलों से आंदोलन की कहानियों पर आई तो राकेश भैया एक के बाद एक सुनाते चले गए। कहानियों में हुंकारा भरने वालों में भी दुबे जी सबसे आगे थे। इतनी लंबी यात्रा के बाद उनका शरीर भले ही थक-थक जा रहा हो, लेकिन वह नहीं थके थे। महेष्वर से 12 किमी दूर एक जगह हमने गाड़ी रोककर चाय पी,। महेश्वर पहुंचे तो हमारे अलावा बाकी के सभी लोग कहीं पहले पहुंच गए थे। कई बिस्तरों में जा पहुंचे थे। अजीत सर, अखलाक भाई, पुष्यमित्र ने बाहर मंडली जमा रखी थी।

दूसरे दिन आधार वक्तव्य के बाद कृष्णन दुबेजी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि सभी को मालूम है कि समस्या क्या है, हमें उसके हल की तरफ बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा था कि मौजूदा दौर में टे्रड यूनियन या तो खत्म हो गए हैं या निष्क्रिय हैं,। सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि जगह-जगह ट्रेड यूनियन का गठन किया जाए ताकि पत्रकार तो कम से कम अपने पर हो रहे अन्याय का विरोध कर सके। दूसरे उपाय के तौर पर उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के बढ़ावे की बात कही थी। इसके लिए एक लाख रूपए की मदद दिल्ली स्तर पर करने की बात भी की थी। पूरे सम्मेलन में वह सबकी बातों को ध्यान से सुनते रहे। कभी हॉल में बैठकर, थक जाते तो बाहर कुर्सी लगाकर बैठ जाते।

सम्मेलन से लौटकर दुबे जी ने सम्मेलन की थीम मीडिया के मानक और समाज पर हमें एक लंबा आलेख भेजा था। लगभग आठ पेज के इस आलेख में उनकी सोच, सपने और नजरिया साफ झलकता है। दुबे जी का चले जाना एक खालीपन के आ जाने जैसा है। अलग-अलग लोगों के साथ उनके कितने-कितने अनुभव थे। दुबे जी आप याद आते रहेंगे। आपकी बातें हम सभी के लिए हमेशा प्रेरणा रहेंगी.

July 29, 2010

"महानता" के बीच इंसानी हुनर की अनदेखी

क्रिकेट। क्रिकेट। क्रिकेट। और क्रिकेट। ये पहला शतक, वो 48वां, अब सौ पूरे होंगे। फिर कौन तोड़ेगा रिर्काड। खबरों की भरमार। जब तक क्रिकेट जीवित है। भारतीय चैनलों और अखबारी दुनिया में न खबरों की कमी है। न खबर के एंगल की। भारतीय खेलों का पर्याय बन चुके इस एक खेल ने जहां रगों में उत्तेजना भरने और सांस रोक देने वाले क्षण मुहैया कराये हैं, वहीं बाकी खेलों के लिए अंधेरे की एक सुरंग बना दी है। जहां से जब तब निकलकर कुछ नाम तो सामने आते हैं, लेकिन खेलों का वह जादू नहीं दिखता, जहां सब बराबर हो। पैसे और शोहरत के बीच जीते क्रिकेटरों की कामयाबी रोमांच पैदा करती है, लेकिन अन्य खेलों के आला दर्जे के खिलाड़ी बदहाल और गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं।

एकरसता और अति हर चीज की बुरी होती है और भारतीय खेलों के साथ इन दिनों यह अति बेहद तीखे अंदाज में हो रही है। बीती सदी के आखिरी दशक में जब सब कुछ बिकने लगा तो भारत खेलों के खरीदार भी सामने आये। हॉकी की दुर्दशा और अन्य खेलों में कोई बड़ी उपलब्धि न होने के कारण बाजार की नजर क्रिकेट पर पड़ी। कपिल देव की जांबाज टीम ने कैरबियन तूफान को थामकर उम्मीदों को आसमान पर पहुंचा दिया था और फिल्मों के दीवाने देश में गावस्कर, शास्त्री, पटौदी, पाटिल युवाओं के आइकॉन बनने लगे। ठीक इसी वक्त में एक नाटे कद के खिलाड़ी का पदार्पण हुआ, जिसे बाद में भगवान की संज्ञा दी गई। यानी खरीदारों के लिए सबसे अच्छा माल था क्रिकेट। दो दशक पहले शुरू हुआ यह खरीद-फरोख्त का दौर अब पूरे सबाब पर है।

क्रिकेट की चमक और अन्य खेलों का अंधेरा
खेलों में आये पैसे की यह तस्वीर कुछ बुरी नहीं लगती, लेकिन बुरा है दूसरे खेलों का गुमनामी की तरफ जाना और क्रिकेट का खेल से कुछ ज्यादा हो जाना। क्रिकेट अब कॅरियर है, पॉवर है, शोहरत है और पैसा है इसके बरअक्स बाकी खेल-वक्त की बरबादी। यही वजह है कि छुटभैये क्रिकेटर की तारीफ के कसीदों का वजन विजेंदर और अखिल के मुक्के से ज्यादा होता है और अभिनव के अचूक निशाने से ज्यादा तारीफ तीन डंडों पर पांच मीटर की दूरी से फेंका गया थ्रो पाता है। क्रिकेट की उपलब्धियों पर खुशी स्वाभाविक है लेकिन, सवाल ये है कि ये खुशी तब क्यों नहीं होती जब दूसरे खेल में मेडल मिलते हैं। ओलंपिक का पदक और बॉक्सिंग चैंपियन का तमगा भी विजेंदर को दिल्ली में ऑटो की सवारी करने की मजबूरी से बचा नहीं पाता, अजलान कप की सफलता भी ध्यानचंद की पौध को फिर हरियाली नहीं दे पाती, पेस-भूपित के हाथ में चमचमाती ट्रॉफी के बावजूद टेनिस के रैकेट थामने वाले हाथ कम ही हैं।

बाजार के हथियार से दिलों पर राज
यानी कोई वजह तो है जो क्रिकेट भारतीय आवाम की धड़कनों में इस तरह बसा हुआ है कि वहां किसी और खेल के लिए जगह नहीं बन पाती। असल में यह जगह बाजार ने ही बनाई है। क्रिकेट बाजार को रियायत देता है। इसमें खुशी के लिए जीत ही सब कुछ नहीं है। अगर टीम हार भी जाये तो किसी के शतक का ढिंढोरा पीटा जा सकता है, हैट्रिक के आंकड़े खोजे जा सकते हैं, अच्छी फील्डिंग और चंद रोमांचक क्षणों को बेचा जा सकता है। हॉकी के बजाय क्रिकेट में व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए ज्यादा जगह है। इसमें हर रन, हर ओवर, हर विकेट पैसे बरसाता है।

मैदान और मैदान के बाहर की चुनौती
ऐसे में अन्य खेलों के लिए क्या किया जाए? क्या उन्हें इस तरह छोड़ दिया जाए? या फिर विभिन्न खेलों में आगे बढऩे को बेताव नन्हें इरादों को सहारा दिया जाये? जाहिर है दूसरा रास्ता ही बेहतर खेल माहौल की नींव बनेगा। अफसोस यह है कि भारतीय खेलों के कर्ताधर्ता इस बात को तवज्जोह नहीं देते। हम कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर वाहवाही भले ही लूट लें, लेकिन अगर भारत फिसड्डी साबित हुआ, तो इसका अफसोस शायद मन से कभी न जा सकेगा। अन्य खेलों का बाजार बनाने के लिए जरूरी है कि सितारा हैसियत रखने वाले खिलाड़ी पूरी ऊर्जा के साथ इस काम में लगें और नये खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन दें। इसकी मिसाल हाल ही में फिल्म अभिनेता जॉन अब्राहम और फुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया ने दी। वे चाहते हैं कि भारत में फुटबॉल को बढ़ावा मिले। भूटिया कहते हैं कि क्रिकेट के दीवाने भारत में अगर फुटबॉल को लोकप्रिय बनाना है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी है। जाहिर है इसके लिए सरकारी नीति और प्रोत्साहन जरूरी कवायदें हैं।
2010 फीफा फुटबॉल वल्र्ड कप दक्षिण अफ्रीका में 11 जून से 11 जुलाई तक खेला जाएगा। दुनिया भर में फुटबॉल के चढ़ते बुखार के बीच भारत में भूटिया और जॉन अब्राहम इस खेल का प्रचार कर रहे हैं। बाइचुंग कहते हैं- भारतीय फुटबॉल फेडरेशन और मुझ जैसे खिलाडिय़ों को इस खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। जब तक भारतीय फुटबॉल अंतराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है, तब तक इसका लोकप्रिय होना मुश्किल है। बाइचुंग कहते हैं कि अगर कोई भी खेल क्रिकेट जैसी लोकप्रियता चाहता है तो उसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत है। हालांकि जॉन बाइचुंग की बात से इत्तेफाक नहीं रखते वे कहते हैं- नये फुटबॉल खिलाडिय़ों को बढ़ावा देने के लिए अच्छे सरकारी तंत्र की जरूरत है। सिर्फ एक बाइचुंग कैसे इस खेल की स्थिति को सुधार सकता है, हमें बाइचुंग जैसे कई बढिय़ा खिलाडिय़ों की जरूरत है। जॉन मानते हैं कि एक अभिनेता होने के नाते खेल से जुड़ी फिल्में भी करनी चाहिए। जॉन आगे कहते हैं कि मेरी फिल्म धन धना धन गोल के बाद शायद इसकी अगली कड़ी भी बने। वे आगे भी खेल से जुड़ी फिल्में करने कि उम्मीद रखते हैं और यह किसी भी अभिनेता के लिए जरूरी मानते हैं। भूटिया और जॉन की सदइच्छाओं के साथ जो बात सामने आती है वह यह कि क्रिकेट का घटाटोप इतना बड़ा है किसी और खेल के लिए युद्धस्तरीय प्रयास ही ऊंचाई दे सकते हैं। क्रिकेट के बाजार ने मीडिया को उसके पीछे लगा दिया है, जहां अन्य खेलों के लिए जगह लगातार घटती जा रही है। यानी अन्य खेलों के खिलाडिय़ों के लिए चुनौती दोहरी है। उन्हें मैदान और मैदान के बाहर दोनों जगह खुद को साबित करना है। अन्य खेलों का बाजार बनने की पहली शर्त बेहतरीन प्रदर्शन ही है, जिसे सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों में पाना होगा।

राष्ट्रमंडल खेलों से उम्मीद
इस साल अक्टूबर में आयोजित होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों से कइयों की उम्मीदें जुड़ी हैं। इनमें से एक दूरदर्शन भी है। देश में सबसे ज्यादा पहुंच रखने वाले इस चैनल को राष्ट्रमंडल विज्ञापनों से अच्छी आमदनी होने की उम्मीद है, जिससे इसकी कमाई 1,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर सकती है। इसके बरअक्स महज एक टूर्नामेंट में क्रिकेट की कमाई देखें तो हाल ही में खत्म हुए आईसीसी विश्व कप ट्वेंटी-20 के जरिये प्रसारक चैनल ने विज्ञापनों से 250 से 300 करोड़ रुपये की कमाई की जबकि डेढ़ महीने तक चले इंडियन प्रीमियर लीग का प्रसारण करने वाले चैनल सोनी सेट मैक्स ने विज्ञापनों से 700 करोड़ रुपये की कमाई की।

और अंत में नाउम्मीदी का पानी
भारत में क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को हमेशा ही परेशानी का सामना करना पड़ता है। भारत सरकार की उपेक्षा के कारण भी इनकी स्थिति और बदतर हुई है। यानी अन्य खेलों का दुश्मन नंबर एक है क्रिकेट और नंबर दो है बाजार, जिसे क्रिकेट के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता। इसके अलावा भारतीय मध्यम वर्ग ने भी अन्य खेल के प्रति उपेक्षा दिखा कर सत्यानाश किया है। वैसे अन्य खेलों की बदहाली के लिए उनके फेडरेशन भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। क्रिकेट की तुलना में अन्य भारतीय खेलों की खबरें स्कैंडलों और जूतमपैजार के रूप में ही सामने आती हैं। हालांकि इसे भी शक की निगाह से देखा जाना चाहिए, क्या यह अन्य खेलों को पीछे धकेलने की एक और चाल है?
आज क्रिकेटरों की माल की तरह नीलामी की जा रही है। इसमें पैसों की चमक बढ़ाकर दूसरे या अन्य सभी खेलों को बौना बनाया जा रहा है जिसके कारण दूसरे खेलों के खिलाडिय़ों में हीन भावना घर करती जा रही है। यदि ऐसा ही रवैया चलता रहा तो आने वाली नई पीढ़ी क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को भूल भी जाएगी। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मौजूदा राष्ट्रीय हॉकी टीम के कुछ खिलाडिय़ों ने एक समय में अपने साथ सौतेला व्यवहार किए जाने की शिकायत करते हुए भूख हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी। उनका कहना था कि ट्वेंटी-20 क्रिकेट विश्वकप जीतकर लौटी भारतीय क्रिकेट टीम पर तो इनामों की बौछार की जा रही है, लेकिन एशिया कप जीतने वाली हॉकी टीम को नजरअंदाज किया जा रहा है। कुल मिलाकर यह समझना चाहिए कि क्रिकेट ने भारतीय खेलों का 'भगवान' दिया है है, लेकिन, सचिन की कला के साथ राजपाल सिंह, संदीप सिंह, भूटिया, पंकज आडवाणी, विश्वनाथन आनंद, विजेंद्र सिंह, अखिल कुमार, साइना नेहवाल, अभिन्न श्याम गुप्ता, लिएंडर पेस, महेश भूपति और देश के दूसरे महान खिलाडिय़ों के 'इंसानी' हुनर को भी वह इज्जत और शोहरत देनी चाहिए जिसके वे हकदार हैं।

एक इंसान का जाना उर्फ दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे

मौत हमारे लिए खबर होती है। कई बार तो मौत ही हमारे लिए खबर होती है। दुबे जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णन दुबे जी के साथ। दुबे जी अब नहीं रहे। इसके पहले के कुछ दिनों में वे क्या सोच रहे थे? दुनिया को किस ढंग से देख रहे थे? कितने उदास थे और कितने ऊर्जावान इसकी कोई खबर नहीं है। बीते पांच सालों में उनसे कम ही मुलाकातें हुई, लेकिन वे हर बार ऊर्जा और अपनत्व से भरे हुए मिले। उनका रहना अपूरणीय क्षति नहीं है, क्योंकि वे महान नहीं थे। इंसान थे। गलतियों से सीखने वाले और हर समय नये नये सपनों में रंग भरने वाले इंसान। वे कहते थे- हर कोई पत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियर होना चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी शर्त इंसान होना है। यह शर्त दुबे जी पूरी करते थे। वे भरपूर इंसान थे। सुख में हंसने और दुख में रोने वाले इंसान।

पहली मुलाकात रांची में हुई थी। पब्लिक एजेंडा मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीन स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप्पणी करते हुए नाश्ता मंगवाया और चल दिये। 8 बजे हम डाल्टेनगंज यानी मेदिनीनगर के लिए निकले। गर्मी खासी थी सो एसी चल रहा था। रातू रोड पार करते करते उन्होंने कार की खिड़की खोल ली। ताजी हवा के लिए। सिगरेट भी सुलगा चुके थे। 76 वर्षीय दुबे जी किस्सों के साथ ताजा राजनीतिक घटनाओं का माक्र्सवादी विश्लेषण करते जाते थे। उनकी जानकारी और अध्ययन प्रवृत्ति के बारे में सुन रखा था लेकिन वे सुने से कहीं ज्यादा पढ़ाकू थे। हर विषय पर स्पष्ट राय और उत्साहित करने वाली जानकारी उनके पास थी। मेरे लिए यह मजेदार सफर होने वाला था। उन्होंने रूट मेप तैयार कर रखा था। किस शहर में किससे मिलना है, क्या बात करनी है? कौन सी इन्फारमेशन निकालनी है? कहां कितना रुकना है और अगले शहर तक पहुंचने के लिए कम से कम कितने बजे निकलना है से लेकर कहां नाश्ता और कहां खाना-खाना है तक को वे मोटे तौर पर निर्धारित कर चुके थे। डाल्टेनगंज, गढ़वा, गुमला, राउरकेला, सिमडेगा के हालात पर चर्चा होती रही। कई खबरों के बारे में और रांची के अखबारों के बारे में भी। प्रभात खबर में छपने वाली छोटी छोटी खबरों के बारे में उनकी मायनीखेज टिप्पणी आज भी नहीं भूलती कि-''अखबार को रोजनामचा होने से बचना चाहिए। कौन सी खबर पढ़ानी है इसकी समझ संपादकीय साथियों को जरूर होनी चाहिए। पेज पर ज्यादा खबरें देना संपादकीय अयोग्यता ही है।"

हम शाम तक लातेहार और डॉल्टेनगंज का काम निपटा कर गढ़वा पहुंच चुके थे। इस बीच मांडर, चान्हो, कुडू, मनिका में भी रुके। सिगरेट और राजनीतिक बातचीत चलती रही। अखबारी दुनिया पर टिप्पणी के साथ वनस्पितियों के बारे में भी दुबे जी बताते जा रहे थे। हैन्सन शाम की 'व्यवस्था' के लिए परेशान थे। गढ़वा के राज होटल में रुके थे हम। मच्छरों ने सारी रात परेशान किया और सुबह सुबह बिना चाय पिये ही हम सरगुजा की ओर चले। रंका पहुंचकर चाय नाश्ता किया और आगे बढ़े। रामानुजगंज से छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है। हम रामानुजगंज से तकरीबन 10-15 किलोमीटर आगे तक निकल गये थे। यहां एक गांव था, नाम याद नहीं आ रहा। वहां जाम लगा था सो लौट लिये। दुबे जी की इच्छा थी कि रुककर इंतजार करते हैं जाम खुलने का। पता चला गांव ग्रामीणों ने लगाया है। कोई ट्रक किसी पशु को टक्कर मारकर चला गया था, जिसके विरोध में जाम लगा था। धूप बढ़ती जा रही थी और जाम खुलने के आसार नहीं थे। सो लौट लिये। गढ़वा की ओर। रास्ते में तय हुआ कि नेतरहाट चलते हैं। गढ़वा के पहले ही कोलिबिरा जाने वाली रोड पर मुड़ गये और तकरीबन पांच बजे शाम को हम नेतरहाट की पहाड़ी पर थे। झारखंड की खूबसूरती का एक शानदार नमूना। यहां के प्रभात होटल में रुके। शाम आठ बजे तक पहाड़ी से दूर तक फैले खेत और पहाड़ों को ताकते हुए हमने कई सिगरेटें सुलगाई और बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा।

नक्सलवाद पर हैन्सन और दुबे जी के बीच थ्योरिटीकल बातचीत होती रही। बीच-बीच में मैंने स्थानीय हकीकतों को जस्टीफाई किया तो दुबे जी तकरीबन भड़क गये। वे मानने को तैयार नहीं थे कि नक्सल पॉलिटिक्स में आपराधिक तत्व हो सकते हैं। उन्हें गुरिल्ला वॉरफेयर के चेक्स एंड कंट्रोल पर पूरा भरोसा था। दरहकीकत वे अपनी खीज मिटा रहे थे। चांदनी रात में शराबनोशी के साथ उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की पॉलिटिक्स को जमकर लताड़ा। हिंदुस्तान में रेवोल्यूशनरी पॉलिटिक्स की कमी और टैक्टिस पॉलिटिक्स की हालिया खामियों पर बोलते रहे। 10 बजते बजते वे तकरीबन एकालाप की स्थिति में थे। यह गुस्सा था जो निकल रहा था। वे करीब 12 बजे सोये। सुबह-सबेरे वे जागे और हैन्सन व मुझे जगाया। घूमने निकले और स्थानीय लोगों से बातचीत की शुरुआत की। दोपहर के खाने से पहले तक यह सिलसिला चलता रहा। आदिवासियों के बीच हनुमान की मूर्तियों को लेकर दुबे जी खासे आतंकित थे। वे इस रूपांतरण के आर्थिक और राजनीतिक आधार देख रहे थे। चर्च की भूमिका और हिंदू संगठनों के कार्यों से वे साथ-साथ नाराजगी जाहिर कर चुके थे।

इसी दिन शाम में हम गुमला पहुंच चुके थे। बीच में छऊ नाच की एक मंडली से यादगार भेंट, सिमडेगा में जनी शिकार पर निकली महिलाओं के फोटो और खेतों में घूमने की रंगतों के बीच देर रात को हम राऊरकेला में थे। यहां की झारखंडी पॉपुलेशन, सर्कुलेशन और खबरों के रिवाज को परखते परखते रात के तीन बज गये थे। हम सो गये। दूसरे दिन ताजा दम हो तकरीबन दस बजे फिर निकले इस बार बिरमित्रपुर होते हुए हमें कोलिबिरा पहुंचना था। रास्ते में ग्रामीणों से बातचीत और मुकेश के गानों पर भी बातचीत होती रही। ओपी नैयर की धुनों के दीवाने दुबे जी भारतीय संगीत के अच्छे श्रोताओं में से एक थे। वे गीतों को गुनगुनाते हुए लय और ताल का पूरा ख्याल रखते थे। अपनी उम्र को छकाते हुए वे जबरदस्त स्टेमिना के साथ गाते थे।

उनकी स्टेमिना का दूसरा नमूना पूर्णिया में मिला। पशुपति जी की शादी में। बारात पूर्णिया से रायगंज, पश्चिम बंगाल जानी थी। हम कुछ दोस्त एक गाडी में बैठ गये। दुबे जी को छोड़ दिया तो बीच में जब नाश्ते के लिए रुके तो वे हमारे साथ हो लिये। जब मैंने कहा कि दुबे जी आपको बुजुर्गों के साथ रहा चाहिए। तो बोले- वहां खतरा ज्यादा है। मैंने कहा कि- लौंडों की सोहबत में ढेले की सनसनाहट भी सुननी पड़ती है। तो मुस्कुराते हुए बोले- ढेले हमने भी फेंके हैं और यकीन मानो तुम लोगों से ज्यादा सनसनाहट पैदा की है। पूरे कार्यक्रम के दौरान वे उत्साह से भरपूर रहे। शादी के बाद जब हम कुछ मित्र भागलपुर गये तो वे पूर्णिया में ही रुक गये। दूसरे दिन मैं लौटा तो उपाध्याय जी और वे भिडे हुए थे। उपाध्याय जी खांटी संघी थे और दुबे जी क्लासिकल माक्र्सवादी। दोनों ने एक साथ पूरा दिन कैसे गुजारा होगा यह मैं अनुमान लगा सकता था, लेकिन इनके साथ मुझे दिल्ली तक की यात्रा करनी थी। यह सोचकर मैं सिहर गया। पूरी यात्रा के दौरान दुबे जी चालू रहे। संघी सोच के तर्कों को उदाहरणों और यकीनी जनवाद से रौंदते हुए वे थोड़े पजेसिव भी लगे। लेकिन उनका माक्र्सवाद में विश्वास ताकत देता था।

बाद में छुटपुट मुलाकातें उनके घर और पूसा रोड स्थित पब्लिक एजेंडा के ऑफिस में होती रही। खाने और पीने के शौकीन दुबे जी के साथ पब्लिक एजेंडा ऑफिस में हुई मुलाकात मेरे लिए अपनी सबसे अच्छी दोपहरों में से एक रही है। अब अंधेरी कोठरी का वह रोशनदान बंद हो चुका है, लेकिन जो रोशनी उन्होंने फैलायी वह यकीनन भरोसा देते है, उजाले का। इस रात में जब हर तरफ रोशनी की दरकार शिद्दत से महसूस की जा रही है, दुबे जी याद आते हैं। उन्हे यकीन था कि सुबह होगी। वे सुबह का इंतजार कर रहे थे। रोशनी को बचाने की जुगत भी कर रहे थे। अफसोस वे सुबह के पहले ही चले गये, इस काली रात में। सुबह जब रोशनी होगी, तब आप बहुत याद आओगे दुबे जी।
फोटो: मार्फत अजय जनज्वार वाले

July 1, 2010

समानता

वह 47 के पहले था
कि दूर देश से आये दुर्दांत हत्यारों ने
कंपनी में भरती किये जवान
इसी देश के
और थमा दिये उन्हें कारतूस बंदूकों समेत, जिनमें थीं संगीनें
बंदूकों के निशाने पर थे
इसी देश के आमजन
जो कराह रहे थे कंपनी राज में

यह 2010 है
जहां-जहां थी कंपनी वहां-वहां है केंद्र
बाकी सब जस का तस
और अपने ही खिलाफ हम
(नारायणपुर में माओवादी हमले में मारे गये जवानों और हर रोज मर रहे लाखों लोगों को समर्पित)