September 27, 2010

पीपी सिंह दोषी हैं, तो सजा जरूर मिले, लेकिन...

(भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता यूनिवर्सिटी (संस्थान) में इन दिनों छात्र धरने पर हैं। पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष पुष्पेन्द्र पाल सिंह को पद से हटाने के बाद शुरू हुए बवाल ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। कुलपति श्री कुठियाला, पीपी सिंह, परीक्षाएं, व्यवस्था और शिक्षा संस्कृति से होते हुए बात उस माहौल की जो माखनलाल यूनिवर्सिटी की पहचान हुआ करता था। इस संबंध में विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अनुराग द्वारी का यह बयान)

साथियो

मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का छात्र हूं. यूनिवर्सिटी से छोड़े लगभग ९ साल हो गए लेकिन ताउम्र इस विश्वविद्यालय का छात्र रहूंगा, वजह ये नहीं है कि यहां से पढ़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला फिर नौकरी मिली। वजह ये है कि यहां से जीने और सवाल करने का सलीका, लोकतंत्र में आस्था और बहस तलब के लिए तैयार जमात का हिस्सा बना। उद्वेलित इसलिए नहीं हूं कि पीपी सिंह को यूनिवर्सिटी ने निलंबत किया है, वो मेरे शिक्षक थे, हैं और रहेंगे, लेकिन अगर अंश मात्र भी वो दोषी हैं तो उन्हें सज़ा मिलने का मैं पक्षधर हूं। जहां तक मेरी जानकारी है राज्य महिला आयोग उनके मामले की सुनवाई 28 सितंबर को करेगा। ऐसे में सुनवाई से पहले सज़ा सुनाना शायद थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। खैर इस मामले पर मैं और जानकारी लेने के बाद तफसील से चर्चा करूंगा।

फिलहाल दैनिक भास्कर के इंट्रो (पढ़ाई लिखाई छोड़ हंगामा, हड़ताल और प्रदर्शन के लिए पहचाने जाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय) और रविशंकर जी ने भड़ास पर जो लिखा है (20 वर्षों में विश्वविद्यालय के स्तर का कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं बन पाया था। इस कारण अकादमिक स्थिति काफी लचर बनी हुई थी। विश्वविद्यालय में अभी तक कोई रजिस्ट्रार नहीं था। ) इस पर कुछ बातें कह लूं, रवि जी यहां एक जानकारी मैं सबसे पहले दे देना चाहता हूं- विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार का पद कुछ सालों से रिक्त है, 2004 तक सच्चिदानंद जोशी रजिस्ट्रार थे। पहले विश्वविद्यालय में उपकुलपति नहीं डीजी और एक्जक्यूटिव डायरेक्टर की परंपरा थी। परामर्श के लिए विजन कमेटी थी। जिसकी अध्यक्षता प्रभाष जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार करते थे। डीजी शरत चंद्र बेहार थे और ईडी रामशरण जोशी, गेस्ट-फैक्लटी की लिस्ट बहुत लंबी थी। कई बड़े पत्रकार, साहित्यकार, फिल्म निर्माता-निर्देशक, इतिहासकार विश्वविद्यालय से जुड़े थे। अब आप अगर इसे प्रशासनिक ढांचा मानने से ही इनकार कर दें तो फिर शायद समझ को थोड़ा ठीक करने की ज़रूरत है।

रही बात अकादमिक ढांचे की तो सुनिए- जनसंपर्क के एचओडी डॉ शशिकांत शुक्ला, जनसंचार की दविन्द्र कौर उप्पल, पत्रकारिता के कमल दीक्षित, ब्रॉडकस्ट के डॉ श्रीकांत सिंह और लाइब्रेरी साइंस के डॉ. बीएस निगम, यहां ख़ासतौर से जिक्र करना चाहूंगा कि दविन्द्र मैडम को इसरो ने 2 साल के लिए बुलावा भेजा था। हमारे रजिस्ट्रार भी इतने गुणी थे कि उन्हें मराठी नाटकों के लिए सर्वेश्रेष्ठ रंगकर्मी का पुरस्कार मिल चुका था। इनके अधीनस्थ भी सारे शिक्षक बेहद गुणी और लोकतांत्रिक थे। इन्हीं की बदौलत कम से कम 2003 बैच तक के ढेर सारे लड़के आपको अलग-अलग चैनल, अख़बारों, पत्रिकाओं या दूसरे वैकल्पिक मीडियम में अच्छे ओहदों पर मिल जाएंगे।

बात निकली है तो कुछ और वाकये भी सुना दूं- गुजरात में आए भूकंप के वक्त कुछ छात्रों ने तय किया की हमें वहां जाकर पीड़ितों की मदद करनी है। बस यकायक हम तैयार हुए। 27 की रात थी। 29 जनवरी से परीक्षा शुरू होनी थी। हमने फैसला यूनिवर्सिटी को सुना दिया। शिक्षक परेशान, भुज में देखते गोली मारने के आदेश थे। उन्होंने हमें बहुत रोका, कहा हम खुद परीक्षा के बाद आपको वहां भेजने के इंतज़ाम कर देंगे, लेकिन हम नहीं माने। भोपाल स्टेशन से रात 11 बजे अहमदाबाद की विशेष ट्रेन थी। सारे शिक्षक हमें छोड़ने स्टेशन पहुंचे, वहां भी पिता की तरह हमें समझाने की कोशिश की। हम नहीं माने। 25 दिनों बाद जब हम लौटे तो लगा सेमेस्टर बर्बाद हो गया, लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब हमारे शिक्षकों ने ना सिर्फ हमारे लिए अलग से वक्त निकालकर हमें पढ़ाया, बल्कि अलग से परीक्षा भी आयोजित की।

गुजरात दंगों के वक्त हमने सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ नुक्‍कड़ नाटकों की एक सीरीज़ तैयार की। प्रशासन ने नाटक खेलने की इज़ाजत नहीं दी, लेकिन हमें कोना मिला विश्वविद्यालय में। उस वक्त "दस्तक" हम सभी की संस्था थी। हर उस दरवाजे पर दस्तक देने को एकत्र जो वैचारिक, सांस्कृतिक और सकारात्मक सोच रखते थे, अभिरूचि रखते थे, साथ ही हमारी दस्तक उन दरवाजों पर भी थी जो संवदेनशून्य ज़िंदगी जीते हैं। हमारा प्रयास था कि विश्वविद्यालय में ऐसी सांस्कृतिक धारा बहे जिसमें सभी अपनी अपनी भागीदारी सुनिश्चिचत कर सकें, अनुभव कर सकें। विश्वविद्यालय में कलात्मक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सूनेपन को पाटने के प्रयास से सहज ही दस्तक का जन्म हुआ था। संस्था ने कई नाटकों के अलावा अभिव्यक्ति और अनायास जैसी दो सशक्त सांस्कृतिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया था। संस्था को की बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने अधीन करने की मंशा जताई, लेकिन कभी जबरन नहीं।

2000 में हमें पता लगा कि यूजीसी ने कई पाठ्यक्रमों की मान्यता रद्द कर दी है। फिर क्या था हमने परिसर में ताला मार दिया। पढ़ाई बंद। हड़ताल। 6 दिनों तक हमारे कई साथी आमरण अनशन पर रहे। जिन अधिकारी-शिक्षकों के ख़िलाफ हम दिन में नारे लगाते थे, वही रात में हमारी देखभाल के लिए आते थे। घंटो तंबू में बैठकर हमें इमरजेंसी और आंदोलन के किस्से सुनाया करते थे। कहने की कोशिश यही है कि माहौल बहुत लोकतांत्रिक थे। शरत चंद्र बेहार सूबे के बहुत ताकतवर आईएएस अफसर थे। उनकी गाड़ी से हमने उन्हें उतार दिया। 6 दिनों तक चाबी अपने पास रखी, लेकिन ना पुलिस में कोई शिकायत ना कोई मामला। उल्‍टा वो रोज़ सुबह हमारा हाल-चाल पूछने आते थे। हमने ओपन बुक सिस्टम की वकालत की, वो हमें मिला। सीमित संसाधनों के बावजूद जो हमने मांगा, विश्वविद्यालय प्रशासन ने हमें दिया। एक और मज़ेदार वाकया है- कैंपस के बाहर एक चाय वाली चाची थीं। कुछ महीनों बाद नगर-निगम के दस्ते ने उनकी छोटे से ठेले को ज़ब्त कर लिया। भागे भागे हम जोशी साहब के पास पहुंचे। एक हुक्म और चाची गेट के अंदर स्टॉल लगाने लगीं।

यही नहीं, एक बार प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब का भाषण था। गांधीजी के बारे में उनकी कुछ टिप्पणी हममें से कई छात्रों को पसंद नहीं आई। हमने मध्यांतर में उनके खिलाफ पोस्टर लगाये। नारेबाज़ी की। आयोजन विश्वविद्यालय का था, बावजूद इसके प्रशासन के कई नुमाइंदे हमारे पास आए और हमें उनकी बातों के मायने समझाने की कोशिश की। कई बार विज़न कमेटी के दौरे-खर्चे पर हमने सवाल उठाये। आप ये जानकार हैरत में पड़ जाएंगे कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हमें हर खर्च का ब्यौरा तक दिया। लब्बेलुआब ये है कि पहले पढ़ाने के लिए भी हर विचारधारा के लोग आते हैं। छात्रों के एक अलग पर्सपेक्टिव बनता था, लेकिन आज लिस्ट उठाके देख लीजिए कि छात्रों को सिर्फ दक्षिणपंथ की घुट्टी पिलाई जा रही है, जो अलग सोचते हैं वो हाशिए पर हैं।

पढ़ाई का स्तर रवि जी, आप छात्रों के पास होने के प्रतिशत और इस बात से माप सकते हैं कि हमारे बैच की टॉपर वाई वंदना नायर की कॉपी आज भी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में पत्रकारिता के छात्रों के लिए रखी गई है। पत्रकारिता के कई नामचीन संस्थान आपको देशभर में मिल जाएंगे, लेकिन जो लोकतंत्र हमें माखनलाल में मिला वो कहीं नहीं दिखा। कहने की ज़रूरत नहीं है कि वो इसी विश्वविद्यालय की देन है। पहले भी यूनिवर्सिटी में कई छात्र वामपंथी थे, दक्षिणपंथी थे समाजवादी थे, न्यूट्रल थे। छात्रों में राजनीतिक झुकाव क्यों ना हो, ज़रूर होना चाहिए, लेकिन दिक्कत तब आती है जब कोई एक अपने डंडे से सबको हांकने की कोशिश करने लगता है। फासिसज्म वहीं से जड़े जमाने की कोशिश करने लगता है। आज यूनिवर्सिटी के साथ वही हो रहा है। हमारी गुजारिश है कि छात्रों को विचारधारा का वाहक ना बनाया जाए। उन्हें स्वच्छंद रहने दिया जाए। हर उदाहरण के पीछे आशय सिर्फ इतना था कि यूनिवर्सिटी पहले सांस्कृतिक, राजनीतिक और अकादमिक हर मोर्चे पर बहुत आगे थी।

मैंने जो लिखा है, वो मेरा एकालाप नहीं दस्तक की आवाज़ है। एक मुश्किल वक्त में गुस्से और करुणा का क्रंदन नहीं बल्कि विमर्श के लिए एक विषय देने की कोशिश। उम्मीद है पढ़ने वाले पत्रकारिता के इस इकलौते विश्वविद्यालय को इसके मेरिट्स पर तौलेंगे, सच और तर्क की कसौटी पर कसेंगे और फिर प्रतिक्रिया देंगे। हमारा मकसद कोई स्वार्थ सिद्ध करना नहीं है। हम अपनी अपनी दैन्दिनी में व्यस्त हैं, लेकिन जहां से इस व्यस्तता की नींव पड़ी। उसे इस हाल में नहीं छोड़ेंगे और ना किसी को उसे इस हाल में पहुंचाने देंगे। ये हमारा प्रण है। इसलिए ग़ुजारिश है आप किसी भी पंथ के प्रचारक हों, ये आपका निजी मामला है लेकिन जब पब्लिक फोरम पर बातें लिखें तो ज़रा तथ्यों के साथ।

(अनुराग द्वारी: माखनलाल चतुर्वेदी विश्‍वविद्यालय के पूर्व छात्र और फिलहाल एनडीटीवी की मुंबई टीम के सदस्य हैं )

September 24, 2010

ख्वाब मरते नहीं : जिंदा दिलों में जीते कॉमरेड लागू

(इंदौर में कम्यूनिस्ट आंदोलन की नींव रखने वाले दिवंगत कॉमरेड अनंत लागू का कल (23 सितंबर को) जन्मदिन था। इस मौके पर इंदौर में संदर्भ केंद्र की और से कॉमरेड लागू पर एक पुस्तिका प्रकाशित की गई है, जिसका लोकार्पण सीपीआई की राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड अमरजीत कौर ने किया। इसी पुस्तिका से लिया गया कॉमरेड लागू के प्रिय और करीबी रहे विनीत तिवारी का यह लंबा लेख।)



विनीत तिवारी
मरने का मतलब क्या होता है? कोई मर गया, माने क्या मर गया? क्या मेरे दिल में उसके लिए जो इज्जत थी, वो मर गई? क्या उसके लिए, मेरे कॉमरेड के लिए मेरा प्यार मर गया? क्या उसके शिद्दत से किए गए कामों की यादें मर गयीं? क्या उसकी मेहनत, उसका श्रम और उससे हुए कारनामे मर गए? एक नायक की तरह जी गयी जिंदगी की वो सारी छाप क्या बगैर निशान छोड़े मिट गयी? क्या ये सब खत्म हो गया? मैं जानता हूँ कि उसका जो बेहतरीन है, वो मेरे भीतर कभी नहीं मरेगा। मुझे लगता है कि हम ये मानने की हड़बड़ी में रहते हैं कि ‘वो नहीं रहा।’ इसी हड़बड़ाहट में हम ये भी जल्द भूल जाते हैं कि अगर हम एक इंसान की जिंदगी की जिंदादिली, सच्चाई की जीत के लिए उठायी गयीं उसकी बेतहाशा तकलीफों और उसकी खुशियों को स्मृति से ओझल न होने देना चाहें, तो वो कभी नहीं मरता। हम भूल जाते हैं कि हर चीज जिंदा दिलों में जिंदा रहती है।
मक्सिम गोर्की की ‘माँ’ से

क्सर जया अपने अज्जी-अब्बू को याद करते हुए एक अफ्रीकी कहावत का जिक्र करती है कि जब तक किसी को कोई न कोई याद करने वाला रहता है, तब तक उस इंसान की जिंदगी पूरी तरह खत्म नहीं होती। कॉमरेड अनंत लागू ने इन अर्थों में कई लोगों को उनके निधन के बाद भी जीवित रखा, उनकी यादों को जीवित रखकर। और जब वे खुद इस दुनिया से गये तो अपने आपको अनेक दिलों और जिंदगियों में थोड़ा-थोड़ा बाँट कर गये।

लागूजी के निधन के एक-दो महीने पहले ही प्रभु जोशीजी ने कहा था कि विनीत तुम कॉमरेड अनंत लागू का एक इंटरव्यू दूरदर्शन के लिए कर दो। मैं लागू जी से मिला तो उन्हें बताया कि प्रभु जोशी ऐसा चाहते हैं। मेरे ऐसा कहते ही उनकी मस्ती की जगह एक संकोच आ गया और वे अपने ही भीतर सिमट गये। कुछ बोले नहीं, बस मुस्कुरा दिये। उस मुस्कुराहट को मैं पहचानता हूँ। वैसी मुस्कान 87 बरस की उम्र में भी बच्चे सी ईमानदारी के साथ कॉमरेड अनंत लागू की और उनकी छः दशक पुरानी दोस्त पेरीन दाजी की पहचान रही है। ये लोग वैसे चहक-चहक कर किस्से दर किस्से सुनाते जाएँगे लेकिन जैसे ही आपने कहा कि काॅमरेड ये तो बहुत बड़ा कारनामा है, ये तो जरूरी इतिहास है, इन्हें तो रिकाॅर्ड करना चाहिए, वैसे ही वो अपने आप में एक संकोची और बेहद विनम्र मुस्कुराहट के पीछे छिप जाते हैं।

बहुत कम लोग ऐसे हैं जो किसी पद की वजह से विद्वान मान लिए जाते हैं और वाकई में भी वे विद्वान होते हों। उनमें भी लागूजी जैसे लोग तो और भी दुर्लभ जिन्होंने अपने भीतर तमाम ज्ञान होने के बावजूद अपने आपको कभी किसी के भी सामने महत्त्वपूर्ण जाहिर नहीं किया। न केवल जाहिर नहीं किया बल्कि सच में कभी माना भी नहीं। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ाव के समय से ही मैं उन्हें देखता आ रहा था, लेकिन उनसे नजदीक से मिलने और उन्हें नजदीक से जानने का अवसर संदर्भ केन्द्र की गतिविधियों की सक्रियता के साथ ही हुआ था।

जब तक वे स्वस्थ रहे तब तक पहले तो अपनी छोटी सी दुपहिया पर ही कार्यक्रमों में और मीटिंगों में पहुँचते रहे। बाद में भी संदर्भ की मीटिंगों में कभी शिन्त्रोजी तो कभी, श्रोत्रियजी या उनकी दिशा में रहने वाले किसी न किसी का साथ लेकर और अगर कोई साथ नहीं मिला तो ऑटो रिक्शा करके भी आते रहे। प्रगतिशील लेखक संघ की मीटिंगों में कभी देवतालेजी के घर, बाद में निलोसेजी के घर भी वे अनेक दफा आये। और ऐसा भी नहीं कि आकर उन्हें कुछ मशविरा देना या अपनी उपस्थिति का अहसास करवाना जरूरी ही हो, कई बार डेढ़-दो घंटे की पूरी मीटिंग में सिर्फ सुनकर, बगैर कुछ भी बोले वे वापस लौट जाते थे। जो पुराने लोग थे या जिन्हें लागूजी या देश, प्रदेश या शहर में कम्युनिस्टों के संघर्षों की कुछ जानकारी थी और मध्यवर्गीय साहित्य, कविता, कहानी के पार जमीनी लड़ाइयों के प्रति कुछ सम्मान था, वे ही लागूजी की सहज चुप्पी के पीछे छिपी गंभीरता का मर्म समझ पाते थे, बाकी तो अनेक के लिए वे सिर्फ एक बुजुर्ग उपस्थिति भर रहते थे और लागूजी को इससे कोई ऐतराज भी कभी नहीं रहा। उनका स्वभाव सहज स्वीकार का था। वे अपने आपको कभी किसी पर थोपते नहीं थे।

जब संदर्भ केन्द्र की गतिविधियाँ तेज हुईं तो वे अक्सर संदर्भ पर आया करते थे। तभी उनके घर मेरा भी जाना-आना शुरू हुआ। संदर्भ और नौजवान फेडरेशन के साथी आनंद शिन्त्रो के वो नाना भी थे और इप्टा व नाटकों में सक्रिय अजय के पिता भी, तो शुरू में उनसे सहज संकोच रहता था लेकिन इस संकोच को खुद कॉमरेड लागू ने और रहा-सहा आनंद व अजय ने भी तोड़ा। आनंद अक्सर उनसे कॉमरेड संबोधन से ही बात करता था। उनकी उपस्थिति में एक वरिष्ठ की गरिमा रहती थी लेकिन भारीपन हर्गिज नहीं।

तमाम दफा उन्होंने मुँहजबानी कुसुमाग्रज की कविताएँ, शंकराचार्य के श्लोक और लोक शाहीर अमर शेख के पोवाड़ा, अन्ना भाऊ साठे के किस्से सुनाये। मुझे साहित्य से राजनीति में दाखिला पाने वाला समझकर वो सोचते थे कि मैं ने तो इन सब के बारे में, और इनका लिखा हुआ पढ़ा ही होगा जबकि मेरे लिए बस इन सबके नाम ही जाने पहचाने थे। कॉमरेड लागू सब सुना कर फिर जैसे चैतन्य होते हुए कहते थे कि तुम्हें तो ये सब मालूम ही होगा, और मैं संकोच में हाँ-हूँ कर देता था। पहली दफा जब मैंने उन्हें किसी मसले पर गंभीरता से लंबी व्याख्या में दाखिल होते देखा, वो वक्त था संदर्भ केन्द्र की एक गोष्ठी का जिसमें लागूजी ने मुंबई की कपड़ा मिल मजदूरों की यूनियन व कम्युनिस्ट पार्टी में 1920 के दशक की हड़ताल के दौरान अम्बेडकर व कॉमरेड डाँगे के मतभेदों की वजहों पर रोशनी डाली थी।

जया को तो वे बहुत प्यार से हमेशा ही ये बताते थे कि तुम्हारी माँ को 1 मई 1975 को मैंने ही पार्टी का मेंबर बनवाया था। तुम्हारी माँ बहुत जबर्दस्त महिला थीं........... और फिर उनके किस्से शुरू हो जाते थे कि कैसे 40 के दशक में होलकर कॉलेज के भीतर स्टूडेंट फेडरेशन में वे इन्दु मेहता, जो तब इन्दु पाटकर थीं, और जया के पिता आनंदसिंह मेहता के संपर्क में आये और फिर वो संबंध लगातार बना रहा। हर बार जया उनसे मिलकर कहती कि कॉमरेड लागू से मिलकर लगता है कि मेरे अज्जी और अब्बू यहीं नजदीक ही हैं।

उनके जन्मदिन पर एक बार जया ने उन्हें एक शर्ट उपहार में दी तो बहुत खुश हुए। उसके चंद रोज बाद ही कपड़ा मिल मजदूरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाने के सिलसिले में हम उनका इंटरव्यू करने गये। तस्लीम और मैं कैमरा संभाल रहे थे और जया उनसे सवाल कर रही थी। चलते इंटरव्यू के बीच अचानक याद आयी बात से बीच में ही बोले, देखो मैंने तुम्हारी गिफ्ट की हुई शर्ट पहनी है। दो पल तो हमें लगा कि शायद इंटरव्यू से संबंधित ही कोई बात है। जब हम समझे और हमने कैमरा रोका तब तक वे वापस अपनी याददाश्त के रास्ते पर सधे कदमों से बढ़ चले। उस दिन उन्होंने पार्टी का इंदौर में बनना और रानीपुरा में 1946 में मजदूरों के जुलूस पर गोली चलना, मौशीबाई का मजदूरों की लड़ाई को समर्थन देना, भगवानभाई बागी का लाल झण्डे का गाना और भी तमाम 60-65 बरस पुरानी बातें इतनी साफ याददाश्त के साथ बतायीं कि सन ही नहीं तारीखें भी उन्हें याद थीं। तब भी उनकी उम्र 83-84 की तो रही ही होगी, लेकिन याददाश्त ऐसी कि मानो कल की ही बात सुना रहे हों। तभी उनसे ये सुनकर मुझे रोमांच हो आया था कि कम्युनिस्ट पार्टी का जब मध्य प्रदेश (तत्कालीन मध्य भारत) में गठन हुआ तो इंदौर में बाकायदा पार्टी की सदस्यता के लिए इंटरव्यू लिये गये थे।

याददाश्त उनकी आखिर तक बिलकुल दुरुस्त थी। इसी बरस की होली के दिन शाम को जया ने कहा कि चलो कॉमरेड लागू से होली मिलने चलते हैं। तब दाजी काकी (पेरीन दाजी) भी जया के घर पर ही थीं। वो बोलीं कि मैं जो किताब दाजी पर लिख रही हूँ, उसमें मुझे कुछ तारीखें और बातें धुंधली सी ही याद आ रही हैं, उनके बारे में सही-सही लागू साहब ही बता सकते हैं, तो मैं भी चलती हूँ। हमारी साथी सारिका भी तैयार हो गयी और मेरी पत्नी अनु और बेटा कार्तिक भी। कॉमरेड दशरथ को भी फोन करके बुला लिया। सब लोग बगैर किसी पूर्व सूचना के जा धमके लागू जी के घर। उनकी बहू सुलभा घर पर ही थी, लागूजी भी थे और इत्तफाक से भोपाल जा बसे सुलभा के पिता और पुराने कॉमरेड श्रोत्रियजी भी आये हुए थे। हम सब को आया देखकर कॉमरेड लागू बहुत खुश हुए। फिर चलीं आजादी के पहले की, आजादी के बाद की, हड़तालों, गिरफ्तारियों, संघर्षों, कामयाबियों और नाकामियों की बातें। उनसे बातें करना किसी एन्साइक्लोपीडिया को कहीं से भी पढ़ने जैसा आनंद और ज्ञान देता था।

लागू जी की जबर्दस्त याददाश्त के किस्से अनेक हैं। कपड़ा मिलों या मजदूर राजनीति से संबंधित इंदौर की कोई पुरानी जानकारी की तस्दीक करनी हो तो नईदुनिया से भी लागूजी को फोन किया जाता था। उनकी याददाश्त का आलम ये था कि जब 2005-2006 में प्रलेसं के संस्थापक बन्ने भाई उर्फ सज्जाद जहीर का जन्म शताब्दी वर्ष हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मनाया जा रहा था तो उसी कड़ी में इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में उनकी बेटी नूर जहीर को हमने बुलाया था। कार्यक्रम में लागूजी भी आये थे। कार्यक्रम के दौरान हमने नूर जहीर से लागूजी का परिचय करवाया तो अपनी बेटी की तरह आशीर्वाद और प्यार देने के बाद लागूजी ने बन्ने भाई की एक नज्म नूर जहीर को सुनाते हुए कहा कि ये बन्ने भाई ने (मुझे याद नहीं कि उन्होंने कौन सा सन् बताया था लेकिन मेरे ख्याल से पचास के दशक का कोई सन था) किसी सभा में सुनायी थी जिसमें लागूजी भी शरीक हुए थे। नूर के चेहरे पर हैरत, ताज्जुब और खुशी के मिले-जुले जज्बात थे। वो बोलीं कि इस नज्म का ये हिस्सा कहीं मिल नहीं रहा था और इन बुजुर्गवार को पचास-साठ बरस पहले की मुँहजबानी सुनी नज्म अब तक याद है। ये सुनकर लागूजी हमेशा की तरह संकोची मुस्कुराहट के पीछे सिकुड़ गये।

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23 सितम्बर 1922 को महाराष्ट्र के सांगली जिले में जन्मे श्री अनंत लागू अध्ययन के लिए 1937 में अपनी मौसी के पास ग्वालियर आ गये थे। गुलामी के हालात और अंग्रेजों की हुकूमत उनकी बेचैनी और कुछ कर गुजरने का शुरुआती सबब बने। देश की आजादी के लिए उनका युवा खून खौलने लगा। जोश और जज्बातों के साथ जो उनके पारंपरिक पारिवारिक संस्कारों को आकर्षित करने वाला संगठन लगा, वो था उस वक्त ग्वालियर में सक्रिय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। वहाँ उनके साथी थे श्री गोरे, जो बाद में मेजर गोरे के नाम से जाने गए और कुशाभाऊ ठाकरे।

वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर दरअसल देश की आजादी के संघर्ष का हिस्सा बनना चाहते थे लेकिन जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का देश सिर्फ हिंदुओं का देश है। एक दफा मैंने उनसे पूछा कि फिर आप आर.एस.एस. से अलग क्यों हुए, तो बोले कि उनके पास मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि इंसान इंसान का शोषण क्यों करता है?

ग्वालियर का एक किस्सा लागू साहब बहुत उत्साह से सुनाते थे। सन 1940 की घटना थी। वे वहाँ कॉलेज में पढ़ते थे और जैसा कि वो दौर था, आजादी के आंदोलन में कुछ कर गुजरने का जोश उनमें भी उछालें मारता था। शायद दूसरों से थोड़ा ज्यादा ही, क्योंकि वे पहलवानी भी करते थे। तो एक दिन अंग्रेज सरकार की तरफ से कॉलेज में कुछ ऐसे कार्यक्रम का फरमान आ गया जिससे देश की इज्जत की परवाह करने वाले इन नौजवानों को अपमान महसूस हुआ। उन नौजवानों ने तय किया कि कार्यक्रम के पहले की रात में कॉलेज के अंदर विरोध के तौर पर परचे-पोस्टर तो चिपकाये ही जाएँ, साथ ही कॉलेज के भीतर फहराने वाले दासता के प्रतीक यूनियन जैक को भी उतार लिया जाए और कॉलेज प्रांगण में लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति को भी कुछ सबक सिखाया जाए। मौके के इंतजार में ये लोग कॉलेज बंद होने के पहले कॉलेज में ही छिप गये। रात में पोस्टर वगैरह चिपकाने के बाद जब खम्भे पर से यूनियन जैक उतार लिया तो लागूजी और उनके साथियों ने उसे फाड़कर उसकी लंगोट बनायी और उसे पहनकर झंडे के खंभे पर मलखम्भ किया। जॉर्ज पंचम की मूर्ति के नाक-कान भी तोड़ लिये गए।

किसी भेदिये की करतूत से लागूजी और उनके साथियों का नाम कॉलेज के प्रिंसिपल के पास तक पहुँच गया। लागूजी को जानने वाले जानते हैं कि उन्हें गुस्से में या आपा खोते शायद ही कभी किसी ने देखा हो। वो अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए भी लहजे में सख्त या अभद्र कभी नहीं होते थे।...तो उनके अंग्रेज प्रिंसिपल मिस्टर एम. ए. इंगिलश ने (प्रिंसिपल का नाम वो खासतौर पर याद करके दो बार बताते थे) ने उनके विनम्र लहजे से धोखा खाते हुए उन्हें लालच दिया कि तुम तो बहुत सभ्य और शरीफ हो, अगर तुम बाकी लोगों के खिलाफ गवाही दे दो और बाकियों के नाम बता दो तो तुम्हें कोई सजा नहीं दी जाएगी। उस पर लागूजी ने जो जवाब उस अंग्रेज प्रिंसिपल को दिया, वो न मुझे भूलता है और न उस अंग्रेज प्रिंसिपल मिस्टर एम. ए. इंगिलश को कभी भूला होगा। उन्होंने कहा - Shall I be rude to you to get the punishment? (क्या बगैर बदतमीजी किये आप मुझे सजा नहीं देंगे?)
नतीजा ये हुआ कि वो कॉलेज से बर्खास्त हुए। ग्वालियर में तो कहीं पढ़ सकना मुमकिन नहीं रहा था। अंग्रेजी राज विरोधी गतिविधियों में उनकी संलग्नता के चलते पुलिस उनके पीछे पड़ी थी और वे पुलिस से बचते हुए ग्वालियर से किसी और रिश्तेदार के यहाँ उज्जैन पहुँच गए।

इस बीच उनका परिचय कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ हुआ जो तर्कप्रिय लागूजी को अपने सवालों का सही जवाब सुझाती महसूस हुई। लगातार अध्ययन, मनन और गहन विचार-विमर्श से तथा अंततः साने गुरूजी की सलाह से प्रेरित होकर उन्होंने आर.एस.एस. को पूरी तरह त्याग कर वामपंथ की राह अपनायी और अंत तक इस पर एक मजबूत साधक और सिपाही की भाँति डटे रहे। लागूजी जो बने, उसमें उनके दोस्तों, सही मशविरा देने वाले परिजनों और साथी काॅमरेडों की भूमिका निस्संदेह महत्त्वपूर्ण थी। ग्वालियर से उज्जैन आने पर लागूजी कॉमरेड दिवाकर के संपर्क में आए। वैचारिक तौर पर तो उनका मन व मस्तिष्क माक्र्सवाद से प्रभावित हो रहा था लेकिन तब तक व्यावहारिक माक्र्सवाद से उनका साबका नहीं हुआ था। ये मौका दिया उन्हें कॉमरेड दिवाकर ने जो उस वक्त उज्जैन में ही स्टेट पीपुल्स काँग्रेस के नाम पर कम्युनिस्ट संगठन बनाने का काम कर थे। कॉमरेड दिवाकर ने ही बाद में लागूजी की क्षमता को भाँपकर उन्हें इन्दौर भेजा ताकि कपड़ा मिल मजदूरों के बीच कम्युनिस्ट संगठन को मजबूत बनाया जा सके।

जनवरी 1940 से इंदौर से बना उनका रिश्ता फिर कभी टूटा नहीं। इंदौर में ही चालीस के दशक में कॉमरेड अनंत लागू को होलकरों के बोराडे़ सरदार घराने की लड़की मालती से प्रेम हुआ और 1943 में मुंबई जाकर उन्होंने शादी कर ली। राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाली उनकी जीवनसंगिनी ने अपने पति को देश और दुनिया की बड़ी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए मुक्त किया और खुद पूरी उम्र नौकरी करके बच्चों, परिवार और पति की भी जिम्मेदारी संभाली। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी वे मजदूर आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए कई बार जेल गये व पुलिस की ज्यादतियाँ सहीं, पर अपने दृढ़ कम्युनिस्ट विश्वासों से कभी डिगे नहीं। उनके अध्ययन और संगठन की क्षमता को देखते हुए जब तत्कालीन मध्य भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो 1943 में कॉमरेड लागू सहित काॅमरेड दिवाकर, कॉमरेड लक्ष्मण खंडकर, कॉमरेड टेम्बे, कॉमरेड उर्ध्वरेषे और कॉमरेड वैद्य; सिर्फ इन 6 लोगों को ही तमाम साक्षात्कारों के बाद पार्टी की सदस्यता दी गयी थी।

आजादी के ठीक पहले द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कपड़ा मिल मजदूरों की तनख्वाहों में कटौती, बोनस और ओवरटाइम न देने संबंधी मसले, और विश्वयुद्ध खत्म होने मजदूरों की छँटनियों के खिलाफ इंदौर में कम्युनिस्ट जोरदार आंदोलन कर रहे थे। सन् 1946 में 12 दिन लंबी चली एक ऐसी ही हड़ताल से परेशान होकर होलकर सरकार ने दमन का शिकंजा तेजी से कसा। तमाम कम्युनिस्ट नेताओं की धरपकड़ का दौर चला और नतीजा ये हुआ कि लगभग सभी वरिष्ठ नेता पकड़कर जेल में डाल दिये गये। सन 1946 में ही होमी दाजी भी कम्युनिस्ट पार्टी के मेम्बर बने थे, उसके पहले तक वो छात्रा संगठन में सक्रिय थे। दाजी साहब के बारे में लागूजी अक्सर बताते थे कि दाजी के पढ़े-लिखे होने, उनके लंबे कद और आकर्षक व्यक्तित्व, आक्रामक, चुटीली किन्तु तर्कसंगत वक्तृत्व कला और शोषण के खिलाफ जमीनी कार्रवाइयों की वजह से दाजी मजदूर वर्ग व मध्यम वर्ग दोनों में समान रूप से जल्द लोकप्रिय हो गए। इसलिए 1946 में जब पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता गिरफ्तार कर लिए गए तो अपेक्षाकृत युवा होमी दाजी को पार्टी और एटक की कमान सौंपी गयी जिसे आगे उन्होंने और बुलंदियाँ दीं।

कॉमरेड दाजी छात्र संगठन ए.आई.एस.एफ. में थे। उन्हें मजदूर संगठन एटक से जोड़ने और कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाने वाले कॉमरेड लागू ही थे। पेरीन काकी ने लागूजी के निधन पर कहा था, ‘अगर लागू न होते तो दाजी भी न होते।’ बाद में कॉमरेड लागू ने ही कॉमरेड दलाल, कॉमरेड सरमंडल, कॉमरेड भगवान भाई बागी, कॉमरेड इंदु मेहता आदि विलक्षण प्रतिभा और प्रतिबद्धता वाले लोगों को संगठन से जोड़ा। आजादी के बाद भी कम्युनिस्टों के लिए न संघर्ष खत्म हुआ था और न ही संकट। नेहरूजी अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद कम्युनिस्टों को और उनकी धारदार ट्रेड यूनियनों को न दबा पाये थे और न ही उन्हें मिश्रित अर्थव्यवस्था के लुभावने नारे से बहला पाये थे।

आजादी के बाद सारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी पर लगे प्रतिबंध हटा लिए गए थे लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की कलकत्ता काँफ्रेंस (28 फरवरी से 6 मार्च 1948) में पार्टी ने आजाद भारत की बुर्जुआ सरकार के खिलाफ आक्रामक संघर्ष की लाइन अपनायी थी। इस वजह से देश के कई हिस्सों में कम्युनिस्ट पार्टी व एटक प्रतिबंधित थी। इन्दौर में भी ये प्रतिबंध लागू थे। ये प्रतिबंध इन्दौर में भारतीय गणतंत्र की घोषणा के साथ 26 जनवरी 1950 को खत्म हुए। इस दौरान लागूजी सहित सभी कम्युनिस्ट नेता लगातार जेल के अंदर-बाहर होते रहे। लागूजी बताते थे कि अनेक पुलिसवाले और जेलवाले तो उनके साथ बहुत सम्मान से पेश आते थे।

आजादी के पहले और आजादी के बाद कई बार लागूजी गिरफ्तार हुए और कई बार पुलिस को उन्होंने चकमा दिया। एक किस्सा वो सुनाते थे कि जब उन्हें गिरफ्तार करने घर पर पुलिस आयी तो वो पीछे की खिड़की से कूदकाद कर पड़ोस के घर में जा पहुँचे जो किसी वोहरा महानुभाव का घर था। पुलिस तलाश करते-करते उन वोहरा सज्जन के घर तक जा पहुँची। उन वोहरा सज्जन ने लागूजी को बुर्का पहनाकर घर की महिलाओं के साथ रसोई में अंदर कर दिया और पर्दा डाल दिया। पुलिस बाकी घर की तलाशी लेकर जब रसोई की तलाशी लेने आगे बढ़ी तो उन सज्जन ने एतराज किया कि हमारे घर की महिलाएँ पर्दे में रहती हैं और आप भीतर दाखिल होकर उनकी बेइज्जती नहीं कर सकते। तब भी पुलिस न मानी तो उन्होंने इसरार किया कि अच्छा, वो बुर्का नहीं हटाएँगी, आप दूर से ही देख लीजिए। पुलिसवाले मान गये और बुर्कानशीं लागूजी गिरफ्तार होने से बच गए। अनेक मुस्लिमों और वोहरा समुदाय के लोगों से उनके नजदीकी संबंध आखिर तक बने रहे। स्वयं डॉ. असगर अली इंजीनीयर जब भी इन्दौर आते तो संदर्भ केन्द्र पर कॉमरेड लागू, कॉमरेड दलाल, कॉमरेड शिन्त्रो, कॉमरेड श्रोत्रिय, श्री जसबीर चावला आदि जरूर इकट्ठे होते। लागूजी के निधन की सूचना जब मैंने डॉ. असगर अली इंजीनीयर को मैसेज के जरिये दी तो तत्काल ही उनका फोन आया। उनकी आवाज एक मजबूत और इतने पुराने साथी के जाने के रंज से भीगी हुई थी।

इंदौर में छात्र आंदोलन को संगठित करने से लेकर शुरू हुई 1940 से उनकी यात्रा लगातार संघर्षों के नये-नये दस्तावेज रचती रही। कपड़ा मिलों के मजदूरों का आंदोलन हो या बैंक, एल.आई.सी., कारखाना कर्मचारियों के मसले, कॉमरेड लागू एक कुशल संगठक की तरह मजदूरों-कर्मचारियों को एकजुट करते गये।

जैसी आजादी आयी थी, उसमें जाहिर था कि अंग्रेजों से अपना मुल्क भले हमें मिल गया हो लेकिन गरीबों के हक की लड़ाई अभी दूर तक लड़ी जानी थी। इंदौर में सबसे बड़ी तादाद कपड़ा मिल मजदूरों की थी और अनेक मजदूरों की तो तीसरी पीढ़ी कपड़ा मिलों में काम कर रही थी। उनकी आबादी बढ़ चुकी थी और उनके रहन-सहन का कोई पर्याप्त बंदोबस्त न मिल मालिकों ने किया था, न सरकार ने। इसके साथ ही और उद्योग-धंधों में लगे मजदूरों की छत का भी सवाल था। इन मसलों को लेकर इंदौर के कम्युनिस्टों ने न केवल लड़ाई लड़ी, बल्कि ऐसे उदाहरण कायम किये कि सरकारी अधिकारियों को भी उनकी प्रशंसा पर मजबूर होना पड़ा। कॉमरेड लक्ष्मण खंडकर के नेतृत्व में कॉमरेडों ने इंदौर के मिल मजदूरों को साथ लेकर पूरी तरह कानूनी तौर पर सहकारी संस्था से मिल मजदूरों के लिए सुव्यवस्थित आवास बनवाये। लेकिन हर जगह कानून और सरकार साथ नहीं देने वाले थे, इसलिए मेहनतकश गरीबों-मजदूरों को साथ लेकर अनेक जगह सरकारी जमीनों पर गरीबों के आवास के लिए जमीन पर कब्जा किया गया। लागूजी वैसे तो हर संघर्ष का अहम हिस्सा थे लेकिन सर्वहारा नगर के मामले में कई बार उनकी पुलिस से भी झड़पें हुईं। आखिरकार जब तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी श्री एम.एन. बुच ने सर्वहारा नगर की योजना को लागूजी के साथ देखा-समझा तो उन्होंने न केवल उसे कानूनी हैसियत दिलाने में भूमिका निभायी बल्कि लागूजी की कॉलोनी की योजना और व्यवस्था से प्रभावित होकर प्रशंसा भी की।

आजाद भारत में जनतांत्रिक तरीकों से संघर्ष में विश्वास रखते हुए वे नगर निगम और विधान सभा का चुनाव भी लड़े। चुनावों में हार के बावजूद उनके प्रतिद्वंद्वी उनका सम्मान करते थे और उनकी प्रतिष्ठा को किसी चुनावी हार ने कभी धूमिल नहीं किया। जो काम उन्होंने अपने लिए चुना उसमें कामयाबी-नाकामी से ज्यादा उस काम को ठीक से करना अहम था जिस पर उनका विश्वास था।

जानने वाले बताते हैं कि जवानी के दिनों में लागूजी को उन्होंने साइकल पर पार्टी का साहित्य, अखबार व पुस्तिकाएँ चैराहों पर बेचते देखा था। तब आम मजदूर भी और आम मध्यवर्गीय भी पार्टी का साहित्य गंभीरता से पढ़ा करता था। बाद में भी इंदौर की भीड़भाड़ भरी सड़कों पर 80 बरस के लागूजी अपने स्कूटर से पार्टी के अखबार ‘मुक्ति संघर्ष’, 'New Age’ और पार्टी की मराठी पत्रिका ‘युगांतर’ आदि के स्थायी सदस्यों को खुद अखबार और पत्रिका पहुँचाया करते थे। इसके पीछे उनका फलसफा ये था कि इस बहाने से पार्टी के कॉमरेडों व हमदर्दों से व्यक्तिगत संपर्क बना रहता है। शायद सन 2004 के आसपास उनका एक्सीडेंट हुआ था जिसके बाद उन्होंने अपना स्कूटर चलाना बंद कर दिया था। लेकिन अक्सर वे फोन पर अखबार की पहुँच की पूछताछ और उसके सुविधानुसार भुगतान की याद दिलाते रहते थे। सुनने में ये काम छोटा लगता है लेकिन यही उस वक्त के कॉमरेड्स की खासियत थी कि उन्होंने जो काम लिया, वो उसे पूरी शिद्दत और जिम्मेदारी से करते थे।

सत्तर वर्षों तक मजदूरों के अधिकारों और इस दुनिया को शोषणविहीन समाज में बदलने के अनथक संघर्ष में लगी रही कॉमरेड अनंत लागू की महायात्रा 3 अप्रैल 2010 को थम गयी। अंग्रेजों के दमन के खिलाफ 1940 से आरंभ किये अपने आंदोलन को आजादी के बाद भी कॉमरेड अनंत लागू ने देश के भीतर मजदूरों व शोषितों के अधिकारों के लिए जारी रखा। इंदौर, अविभाजित मध्य प्रदेश, मध्य भारत में लगातार सक्रिय रहकर उन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन का मजबूत आधार तैयार किया व आखिरी वक्त तक देश के, समाज के आखिरी इंसान की फिक्र करते हुए 87 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कहा। उनकी देह, उनके दोस्त कॉमरेड होमी दाजी की ही भाँति कपड़ा मिल श्रमिक क्षेत्रा के श्मशान में अग्नि को समर्पित की गयी। दोनों कॉमरेड्स ने अपने जीवन को ही नहीं, अपनी मृत्यु को भी कई मायनों में अनुकरणीय बनाया। आडम्बरों से जीवन भर दूर रहे कॉमरेड लागू ने इसकी हिदायत जीते जी ही दे दी थी कि मेरी मृत्यु के बाद कोई शोकसभा न की जाए। वे शब्दों की जुगाली में नहीं, असल में लोगों को उस रास्ते पर चलते देखना चाहते थे जहाँ उस व्यवस्था का अंत हो जिसमें इंसान ही इंसान का शोषण करता है।
ईमानदारी, प्रतिबद्धता और शोषणविहीन दुनिया का ख्वाब उन्होंने प्रदेश में अनेक युवाओं को विरासत में दिया। उनके शांत व्यक्तित्व के भीतर गहन ज्ञान का सोता बहता था और वे प्रगतिशील लेखक संघ व इप्टा जैसे संगठनों से भी एक दिग्दर्शक की तरह सतत जुड़े रहे थे। कॉमरेड लागू ने अपनी देह त्याग दी, लेकिन उनकी सतत संघर्ष की कहानियाँ व लगातार जिंदादिल रहने की उनकी ताकत हमें याद दिलाती रहेगी कि ख्वाब मरते नहीं। ..... कॉमरेड लागू को हम सभी का लाल सलाम।

September 22, 2010

एक अकेला दिन और चंद चालू खबरें

अभी-अभी टीवी ऑन किया है। पता चला यमुना अपने हिंसक रूप में घरों की और बढ़ रही है। एक टीवी रिपोर्टर तिब्बती मार्केट की बस्ती में छतों में सांस लेती जिंदगी को पकडऩे की कोशिश कर रहा है। एंकर उसे भयावहता की तस्वीरें और तीखी खींचने के लिए उकसाती है। जब वह रिपोर्टर बहुत ज्यादा नहीं चीख पाता तो एंकर दूसरी खबर की ओर बढ़ जाती है, जिसमें लारा दत्ता और महेश भूपति के सहारे बांधने की कोशिश की जाती है। चैनल चेंज किया तो कश्मीर गये प्रतिनिधिमंडल की आकृतियां नुमायां हुईं। 39 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल, सुनने में अच्छा लगता है। नाम और चेहरे सामने आते हैं, तो यकीन डिगने लगा कि कोई हल निकलेगा। कश्मीर की पूरी समस्या के बीच यह चंद लाइनों का क्षेपक सा है। सरकारों को गंभीर दिखाने की कोशिश में इस तरह के प्रतिनिधिमंडलों की लंबी श्रृंखला हम देख चुके हैं। फिर चैनल बदलता हूं, गणपति बप्पा, 20 हजारी सेंसेक्स, अयोध्या, चैंपियंस लीग के बीच पता चला कि भारत दुनिया की तीसरी बड़ी ताकत बना गया है। ताकत में भारत का शेयर आठ फीसदी है, जो अमेरिका की 22 फीसदी और चीन की 12 फीसदी के बाद सबसे ज्यादा है। यूरोपीय यूनियन की संयुक्त ताकत 16 फीसदी को भी देखें तो चौथी सबसे बड़ी ताकत! गरीबों की सबसे बड़ी तादाद, शिक्षा में सबसे पिछड़े और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे देश के लिए यह मजाकिया खबरें जब तक राहत पहुंचाती हैं। गर्व करने के लिए जब कुछ नहीं होता तो ऐसे ही तमगों को हासिल किया जाता है। इससे पहले भी हम कनाडा में भारतीय ने फहराया परचम और फिजी में भारतीय की कामयाबी पर निहाल हुए हैं।

बुखार बढऩे लगा है और मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करना चाहता हूं। खबरें एक ऊब पैदा कर रही हैं और कोफ्त भी। मातिल्दा की 'माई लाईफ विद पाब्लो नेरूदा' उठाता हूं, दो पन्ने भी नहीं पढ़े गये और अब सिगरेट सुलगाये सड़क का जीवन देखने की गरज से बालकनी में आ गया। आती-जाती गाडिय़ों और सामने स्कूल की छुट्टी के बाद गुजरते कुछ समय के लिए ध्यान खींचते हैं, फिर यह भी किसी बेरंग चित्र की तरह हिलती-डुलती आकृतियों में तब्दील हो गये।

हवा के थपेड़े तेज होने लगे तो भीतर आता हूं, कल रात की जो शराब बची थी उसे हलक से उतारते हुए उस घड़ी को कोसता हूं जब इतवार में कविता सुनने गया था। देर रात करीब 3 बजे लौटने तक बुखार साथ हो लिया था। फायदे और नुकसान के तराजू में तौलता हूं तो नुकसान हिस्से आता है। काव्य पाठ में मंगलेश जी बुझे-बुझे लगे। विनीत कहते हैं, कि यह बीते दो सालों से उनके भीतर की उथल-पुथल से निर्मित उदासी है, जो कविताओं में भी पसरी हुई थी। हालांकि उन्होंने नई कविताएं सुनाने का जोखिम उठाया था। खुद विनीत ने पहले से सुनी हुई कविताएं ही सुनाई थीं। विनीत भाई की चार कविताएं, रंजीत वर्मा जी दो कविताएं, मिथलेश जी की पांच कविताएं और मंगलेश जी की पांच कविताओं के बाद वीरेन दा ने 11 कविताएं सुनाई थीं। कोई नई कविता नहीं मिली। मोहन दा ने वहां भीमसेन त्यागी की डायरी के हिस्से सुनाये थे। जिनमें अज्ञेय के बारे में गंभीर टिप्पणी थी। मदन कश्यप जी का सुझाव था कि इसे पुन: प्रकाशित करना चाहिए। अज्ञेय को प्रशंसा के पीछे भागते व्यक्ति के रूप में जानना कभी मेरे लिए तकलीफदेह नहीं रहा। उनकी बुनावट में यह एक सामान्य बात है। वे जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे वहां प्रशंसा पाने के लिए कोई भी काम छोटा नहीं होगा।

इसके बाद जया जी ने गोर्की की 'मां' से मृत्यु संबंधी पंक्तियां सुनाईं। मौत के बाद दिलों में जिंदा रहने वाले लोगों के लिए थी यह पंक्तियां। हाल ही में कॉमरेड अनंत लागू पर संदर्भ, इंदौर की ओर से प्रकाशित पुस्तिका के कवर पर छपी पंक्तियां। पर एक टायर फटा और मैं इस याद से बाहर आ गया। यह सब सोचते हुए लग रहा था, वहीं संजीव के घर में हूं। झटके से यहां बिस्तर पर पहुंच गया। नींद भी नहीं आ रही है। मैं आंख बंद करके किताबों की तरफ हाथ बढ़ाता हूं। पूरनचंद्र जोशी की 'परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम' हाथ आती है। मैं क्या पढऩा चाहता हूं यह पता नहीं है, इसलिए जो सामने आ जाये उसी को पढऩा ठीक रहेगा, इस गरज से अंदाज से पेज खोलता हूं। 31वां पन्ना सामने आया। मैं इससे तारतम्य बैठाने के लिए 30वें पन्ने पर नजर डालता हूं। जोशी जी माक्र्सवादी विश्लेषणों को वास्तविकता मानने वालों पर खफा हो रहे हैं। आर्थिक विश्लेषण करते हुए वे विचारों के भौतिक आधार से अलग स्वतंत्र दृष्टियों से फिसलते हुए स्थापित करते हैं कि क्लासिकल माक्र्सवाद के बजाय भारत में स्तालिन का उग्र माक्र्सवाद ज्यादा पनपा और माक्र्सवादी यह भूलने लगे कि भौतिक आधार परिवर्तन की सीमाएं ही डिटरमिन यानी निर्धारित करता है, लेकिन इन सीमाओं के अंतर्गत परिवर्तन लाने में तो मनुष्य यानी मनुष्य की वैचारिक अथवा मानसिक प्रक्रियाओं की ही प्रधान भूमिका होती है। 'मैन मेक हिस्ट्री, बट नॉट ऐज दे विल' में मनुष्य को ही भौतिक आधार की सीमाओं के अंतर्गत परिवर्तन की सक्रिय शक्ति बताया गया है। यह भी मानना पड़ेगा कि माक्र्सवादियों ने माक्र्स की उन अंतर्दृष्टियों को वैज्ञानिक विश्लेषण का आधार बहुत कम बनाया जो विचार, मूल्य या मानसिक प्रक्रियाओं की सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर प्रकाश डालती हैं।

वे आगे लिखते हैं, 'स्तालिनवाद ने अनेक प्रकार से विचार और व्यवहार दोंनों में उग्र भौतिकवादी रुझान को ही माक्र्सवाद के रूप में प्रतिष्ठित किया, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य या मानवीय चेतना को उचित प्रतिष्ठा न देने की इस स्तालिनवादी परंपरा के भयंकर परिणाम हुए। उग्र भौतिकवादी रुझान की चरम परिणति ऐसे 'अवतारवाद' में हुई जिसे रूसियों ने 'व्यक्तिपूजा' (cult of personality) की संज्ञा दी। व्यक्ति पूजा ने सर्वहारा के अधिनायकत्व के संदर्भ में स्तालिन के पितृ-संरक्षक और कठोर तथा नृशंस-उत्पीड़क, द्विमुखी रूप में मध्ययुगी अवतारवाद की मूल परंपराओं और संस्कारों को पुनर्जीवित कर दिया। दूसरी ओर उग्र भौतिकवाद के संदर्भ में आर्थिक संकट या वर्ग संघर्ष द्वारा स्वमेव होने वाले समाज-परिवर्तनों की धारणा ने एक प्राकृतिक नियम का ही रूप ले लिया। भौतिकवाद की इन दोनों विकृतियों ने ऐसे भागयवाद को जन्म दिया, जिसमें एक व्यक्ति-विशेष (जैसे स्तालिन) समष्टि की जाग्रत शक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि समष्टि के अनुशासन से स्वतंत्र, निरंकुश रूप से समाज का नियंता या भाग्यविधाता बन बैठा।'

मैं नतीजे निकालने की जल्दबाजी में नहीं हूं। फिलवक्त दिमाग भी साथ नहीं दे रहा है, लेकिन फिर भी जोशी जी के निशाने पर कौन है यह साफ दिख रहा है। मैं अपने निशाने को दुरुस्त करता हूं और नेट की दुनिया में चला आता हूं।

September 8, 2010

हर कालखंड को चौंकाता रहा अपने समय का हरफनमौला रचनाकार

9 सितंबर को जन्मदिन पर विशेष
भारतेन्दु हरिश्चंद्र। नाटककार, कवि, पत्रकार, निबंधकार, व्यंग्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार और भी कई रूप, यानी संपूर्ण लेखक। यात्रा-प्रेमी, शिक्षा-प्रेमी और लेखन-प्रेमी इस अद्भुत शख्सियत को याद करने की यूं तो कोई तारीख नहीं, वे हमेशा याद आते हैं। उन्हें याद करना अपने समय को परखने की तरह ही है। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता जब आखिरी सांसें ले रही हो, तो आधुनिक हिंदी के जन्मदाता के जन्मदिन के बहाने उनके समय पर गौर करना चाहिए। 1850 में 9 सितंबर को काशी के एक धनी वैश्य परिवार में जन्में भारतेंदु हरिश्चंद्र के पिता गोपाल चंद्र खुद भी एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविताएं लिखा करते थे। मूल नाम हरिश्चन्द्र था, भारतेन्दु उनकी उपाधि थी, जो काशी के विद्वानों ने सन् 1980 में दी थी। किसी जीवन का सही उपयोग क्या होता है, यह हिंदी नाटकों का सूत्रपात करने वाले भारतेंदु जी के जीवन पर नजर डालकर समझा जा सकता है। 35 साल की छोटी उम्र पाने वाले भारतेन्दु ने हिंदी साहित्य में जो जोड़ा है वह बेजोड़ है। शुरुआत से देखें तो, उन्हें स्कूली शिक्षा नहीं मिली। घर में ही भारतेन्दु ने हिंदी, मराठी, बंगला, उर्दू और अंग्रेजी सीखी। पांच साल की नन्हीं उम्र में बालक हरिश्चंद्र ने एक दोहा लिखा-
लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुध्द सुजान।
वाणा सुर की सेन को हनन लगे भगवान।।
इसे हिंदी साहित्य के पितामह के रचनाकर्म की शुरुआत माना जा सकता है। ध्यान रखिए कि इसी उम्र में भारतेन्दु ने अपनी मां को खोया था। 10 साल की उम्र में पिता का साया भी भारतेन्दु के ऊपर नहीं था। 15 साल की उम्र में भारतेंदु ने विधिवत साहित्य सृजन शुरू कर दिया था और 18 की उम्र में उन्होंने 'कवि वचन-सुधा' नामक साहित्यिक पत्र निकाला, जिसमें अपने समय के शीर्ष विद्वानों की रचनाएं प्रकाशित हुईं। वे 20 वर्ष की उम्र में साहित्यिक सभा के ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। इसके तीन साल बाद 1873 में उनकी पहली गद्य कृति 'वैदिक हिंसा हिंसा न भवति' आई। इससे पहले 71 में उनकी कविता पुस्तिका 'प्रेममालिका' आ चुकी थी। इसी समय भारतेन्दु ने विशाखदत्त के मशहूर नाटक 'मुद्राराक्षस' का संस्कृत से हिंदी में अनुवाद किया। उनके बाद कुछ अन्य लेखकों ने भी इस नाटक का अनुवाद किया, लेकिन जो ख्याति भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुवाद को मिली, वह किसी और को नहीं मिल सकी। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'सत्य हरिश्चन्द्रं' (1875), 'श्री चन्द्रावली' (1876), 'भारत दुर्दशा' (1876-1880 के बीच), 'नीलदेवी' (1881) जैसे मौलिक नाटक भी लिखे।

साहित्य सेवा और समाज सेवा भारतेंदु जी के लिए अलग-अलग काम नहीं थे, बल्कि वे एक ही गाड़ी के दो पहिए थे। परेशानहाल जनता, साहित्यिक दोस्तों और आसपास के लोगों की निजी सहायता करते-करते भारतेंदु खुद कर्ज में डूब गये। तंगहाल भारतेंन्दु बीमार भी रहने लगे और आखिरकार 6 जनवरी 1885 को सतत् रचनाकर्म में लगा एक गंभीर नाटककार, राष्ट्रप्रेमी कवि और कुरीतियों के खिलाफ लिखने वाला व्यंग्यकार व सच्चा साहित्यिक नेता हमेशा के लिए चुप हो गया। उनका मूलमंत्र था-
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे हिय को शूल।।
और सारी उम्र उन्होंने यह अपने जीवन से साबित किया। महज 18 सालों के रचनाकर्म के आधार पर हिंदी साहित्य में उनका जीवन काल उनके युग के नाम से जाना जाता है। इससे समझा जा सकता है कि अपने समय के साहित्य पर भारतेन्दु का प्रभाव किस हद तक होगा। भारतेन्दु जिस कालखंड में लिख रहे थे, अपने समाज से बातचीत कर रहे थे वह सन्धिकाल है। रीतिकाल की विकृत सामन्ती सोच को सींचने वाली परंपरायें पूरी तरह मिटी नहीं थीं और कुछ रचनाकार उन्हें जीवित रखना चाहते थे। ऐसे में भारतेन्दु ने स्वस्थ्य परम्परा की जमीन पर अपनी लेखनी चलाई और आधुनिकता के बीज बोए। आधुनिक काल की शुरुआत करते हुए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र नवजागरण के अग्रदूत के रूप में देश की गरीबी, पराधीनता, अंग्रेजों के अमानवीय शोषण की कलई खोलने निकले थे। वे कभी कविता लिखते, उससे बात पूरी न होती तो नाटक की ओर मुड़ जाते। साथ ही व्यंग्य और निबंध भी चलते रहे। यानी विधाएं भारतेन्दु के लिए महत्वपूर्ण नहीं थीं। वह कथ्य जरूरी था, जो वे जनता तक पहुंचाना चाहते थे। इसमें वे भाषा भी बदलते रहे। कभी ब्रज, तो कभी उर्दू, और वक्त पड़ा तो बांग्ला और अंग्रेजी भी।

असल में बहुमुखी प्रतिभा जैसे पद भारतेन्दु जैसे रचनाकारों के लिए ही बने हैं। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध सभी विधाओं में उनका योगदान अमूल्य है। हिन्दी-साहित्य के आधुनिक युग के प्रतिनिधि भारतेन्दु की संपादकीय-पत्रकारीय प्रतिभा का नमूना 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चन्द्र मैगजीन', 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' और 'स्त्री बाला बोधिनी' जैसी पत्रिकाओं में मिलता है, जो उन्होंने अपने समय में निकालीं। 'स्त्री बाला बोधिनी' की ओर से अंग्रेजी पढऩे वाली महिलाओं को साड़ी भेंट दी जाती थी। यह पत्रिका उन दिनों महिलाओं की सखी के रूप में पेश की गई थी। पहले अंक में ही पत्रिका की ओर से घोषणा की गई कि- 'मैं तुम लोगों से हाथ जोड़कर और आंचल खोलकर यही मांगती हूं कि जो कभी कोई भली-बुरी, कड़ी-नरम, कहनी-अनकहनी कहूं उसे मुझे अपनी समझकर क्षमा करना, क्योंकि मैं जो कुछ कहूंगी सो तुम्हारे हित की कहूंगी।'

दिलचस्प है कि भारतेन्दु युग के लेखकों बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा चरण गोस्वामी, उपाध्याय बदरीनाथ चौधरी प्रेमघन, लाला श्रीनिवास दास, बाबू देवकी नंदन खत्री और किशोरी लाल गोस्वामी में से ज्यादातर पत्रकार भी थे। इस तरह भारतेन्दु युग को साहित्यिक पत्रकारिता का युग भी कहा जा सकता है। इस दौर में हिंदी का पहला उपन्यास 'परीक्षा गुरु' लिखा गया, जिसके लेखक श्रीनिवासदास थे। हालांकि कुछ आलोचक श्रद्धाराम फुल्लौरी के उपन्यास 'भाग्यवती' को हिन्दी का पहला उपन्यास मानते हैं। इसी दौर में बाबू देवकीनंदन खत्री का 'चंद्रकांता' तथा 'चंद्रकांता संतति' पाठकों के सामने आये। शिवप्रसाद सितारे हिन्द जैसे कहानीकार इसी युग में थे, जिनकी कहानी 'राजा भोज का सपना' आज भी महत्वपूर्ण है। भारतेन्दु उनके पास अंग्रेजी सीखने जाते थे। बाद में स्वाध्याय से भारतेन्दु ने संस्कृत, मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी और उर्दू सीखीं।

भारतेंदु की विचारधारा पर भक्त कवियों का गहरा असर था। इन रचनाओं में जो जनपक्ष था उसे भारतेन्दु ने संवारा और नई परिस्थितियों में उसे विकसित किया। उनकी समाज सुधार संबंधी रचनाओं में भी भक्त कवियों की स्थापनाएं दिखाई देती हैं। भारतेन्दु ने जहां श्रृंगारिक कविताओं के लिए रीतिकालीन रसपूर्ण अलंकार शैली का इस्तेमाल किया तो वहीं भक्ति पदों में भावात्मक हो गये। अपनी समाज-सुधार संबंधी रचनाओं में वे व्यंग्य की शरण में गये तो देश-प्रेम की कविताओं में उद्बोधन का इस्तेमाल किया। इस तरह भारतेंन्दु अपने समय के इकलौते हरफनमौला रचनाकार थे।

कवि भारतेन्दु को हम 'दान-लीला', 'प्रेम तरंग', 'प्रेम प्रलाप', 'कृष्ण चरित्र' जैसे भक्ति काव्यों से जानते हैं। वहीं 'सतसई श्रृंगार', 'होली मधु मुकुल' में श्रृंगारिक काव्य का लुत्फ मिलता है। 'भारत वीरत्व', 'विजय-बैजयंती' और 'सुमनांजलि' में राष्ट्रप्रेमी भारतेन्दु को देखा जा सकता है। भारतीय नाट्य इतिहास में भारतेन्दु का नाम हमेशा आदर से लिया जाता रहेगा। उनके नाटक 'बंदर-सभा', 'बकरी का विलाप' और 'अंधेर नगरी चौपट राजा' हास्य-व्यंग्य और कटाक्ष का बेजोड़ नमूना हैं। नाटकीयता भारतेन्दु के जीवन में रची बसी विशेषता थी। तकरीबन 18 साल के अपने सार्वजनिक जीवन में भारतेंदु ने लगातार चौंकाया है। इस नाटकीयता को उनकी कृष्ण भक्ति से भी जोड़ा जा सकता है। कृष्ण के जीवन से प्रभावित भारतेंदु जीवन और छद्म के दर्शन के साथ लगातार खेलते रहे। यह उनके रचनाकर्म में भी दिखाई देता है। ब्रज भाषा में रचनाकर्म के दौरान भारतेंदु जी पर दोहरी जिम्मेदारी थी। उन्हें लोक के बीच काव्य-नाट्य की पैठ भी बनानी थी और भाषा के संस्कार भी विकसित करने थे। इसीलिए भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुद्धियां भी को मिलती हैं। हालांकि मुहावरों के सटीक प्रयोग और सरल व व्यवहारिक शैली इस कमी को खलने नहीं देती।

भारतेंदु के रचनाकर्म को समझने के लिए उनके विन्यास को भी देखना चाहिए। वे एक साथ कई भाषाओं में विचर रहे थे। हिदी के छंदों के अलावा उन्होंने उर्दू, संस्कृत, बंगला के पदों का भी भरपूर इस्तेमाल किया है। संस्कृत के बसंत तिलका, शार्दूल, विक्रीडि़त, शालिनी और हिंदी के चौपाई, छप्पय, रोला, सोरठा, कुंडलियां, सवैया भारतेन्दु के काव्य में बिखरे पड़े हैं। बंगला के पयार और रेखता की गजल भी भारतेन्दु के रचनालोक में मिलती है, तो कजली, ठुमरी, लावनी, मल्हार, चैती जैसे लोक-छंदों को भी उन्होंने बखूबी साधा।

अलंकारों के प्रयोग में भारतेंदु ने अपने युग में जो नजीर कायम की है, वह आने वाले कई दशकों तक परंपरा बनी रही। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक और संदेह अलंकारों के प्रति भारतेंदु के लगाव के बारे में तो सभी जानते हैं। भारतेंन्दु ने शब्दालंकारों को भी अपने काव्य में भरपूर जगह दी है। साथ ही दो अलंकारों को साथ-साथ साधने में उनका कोई सानी दिखाई नहीं देता। उत्प्रेक्षा और अनुप्रास की ही योजना देखिये: -
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहु सुहाए।।
हैरत की बात यह है कि जिस 'कवि वचन सुधा' को आठ वर्ष तक भारतेन्दु ने अपना खून-पसीना दिया, 1885 में जब भारतेन्दु का निधन हुआ तब उनमें ना तो कोई शोक समाचार था और न ही श्रद्धांजलि की दो पंक्तियां। कह सकते हैं कि भारतेन्दु अपने आसपास के लोगों से ही छले गये, लेकिन उन्होंने कभी विश्वास करना नहीं छोड़ा। आखिर नवजागरण के अग्रदूत को ऐसा ही होना था।

लगे हाथ भारतेन्दु जी की रचनाओं का आस्वाद भी लिया जाये। कविता के बिंबों, नाटकों के मारक व्यंग्य और गद्य के उत्कृष्ट नमूनों से तो हिंदी समाज परिचित ही है। भारतेन्दु ने कुछ मुकरियां भी लिखी है। मुकरियों से हिंदी समाज को पहले पहल खडी बोली के पहले कवि अमीर खुसरो ने परिचित कराया। अमीर खुसरो की मुकरियों (जिसमें पहले कही बात का अंत में खंडन सा करके उत्तर दिया जाता है) की परंपरा को आगे बढाते हुए भारतेन्दु जी ने अपने समय पर तीखे व्यंग्य किये। कुछ विद्वान कबीर की उलटबांसियों को भी मुकरी की श्रेणी में रखते हैं, जबकि पहेली व बूझ अबूझ शैली भी कविता की इसी शैली से मिलती जुलती है। बहरकैफ अभी हम इनके भेदों में न जाते हुए भारतेन्दु जी की मुकरियों को देखते हैं।

सब गुरुजन को बुरो बतावै ।
अपनी खिचड़ी अलग पकावै ।
भीतर तत्व न झूठी तेजी ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी ।


तीन बुलाए तेरह आवैं ।
निज निज बिपता रोइ सुनावैं ।
आँखौ फूटे भरा न पेट ।
क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रैजुएट ।


सुंदर बानी कहि समुझावै ।
बिधवागन सों नेह बढ़ावै ।
दयानिधान परम गुन-आगर ।
सखि सज्जन नहिं विद्यासागर ।


सीटी देकर पास बुलावै ।
रुपया ले तो निकट बिठावै ।
ले भागै मोहिं खेलहिं खेल ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि रेल ।


धन लेकर कछु काम न आव ।
ऊँची नीची राह दिखाव ।
समय पड़े पर सीधै गुंगी ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी ।


मतलब ही की बोलै बात ।
राखै सदा काम की घात ।
डोले पहिने सुंदर समला ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सिख[1] अमला ।
↑ 'भारतेन्दु समग्र' में सिख लिखा है, लेकिन हो सकता है यह प्रूफ़ की ग़लती हो और शब्द सखि ही हो ।

रूप दिखावत सरबस लूटै ।
फंदे मैं जो पड़ै न छूटै ।
कपट कटारी जिय मैं हुलिस ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस ।


भीतर भीतर सब रस चूसै ।
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै ।
जाहिर बातन मैं अति तेज ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।


सतएँ अठएँ मों घर आवै ।
तरह तरह की बात सुनाव ।
घर बैठा ही जोड़ै तार ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अखबार ।


एक गरभ मैं सौ सौ पूत ।
जनमावै ऐसा मजबूत ।
करै खटाखट काम सयाना ।
सखि सज्जन नहिं छापाखाना ।


नई नई नित तान सुनावै ।
अपने जाल मैं जगत फँसावै ।
नित नित हमैं करै बल-सून ।
क्यों सखि सज्जन नहिं कानून ।


इनकी उनकी खिदमत करो ।
रुपया देते देते मरो ।
तब आवै मोहिं करन खराब ।
क्यों सखि सज्जन नहिं खिताब ।


लंगर छोड़ि खड़ा हो झूमै ।
उलटी गति प्रति कूलहि चूमै ।
देस देस डोलै सजि साज ।
क्यों सखि सज्जन नहीं जहाज ।


मुँह जब लागै तब नहिं छूटै ।
जाति मान धन सब कुछ लूटै ।
पागल करि मोहिं करे खराब ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सराब ।

September 5, 2010

बाबरी विवाद: एक ही आंख से देखता मीडिया और झूठ की छपाई


(अयोध्या का जिन्न फिर बाहर आने को बेताब है। दो दशक पहले हम देख चुके हैं कि हिंदू धर्मान्धता की सीढी पर चढकर भाजपा विहिप ने जो गुल खिलाये थे वे अब कमोबेश बासी पड चुके हैं और नये सिरे से वही गंध फिर फैलाने की तैयारी तेज हो गई है। ऐसे में एक पत्रकार का रुख क्या हो? 92 में हिंदू उन्माद में रंगे अखबारी पन्नों की गलीज रिपोर्टिंग भारतीय पत्रकारिता के नाम पर जो धब्बा लगा चुकी है, उसे दोहराते हुए देखें या फिर जरूरी पहल में हिस्सेदारी कर सच को सच की तरह सामने लायें? जिम्मेदारी बडी है, जिसके लिए तर्क की पारंपरिक शैली में सवालों को टटोलने और रंग, संप्रदाय, जाति व प्रादेशिक सीमाओं से बाहर आकर सोचने की दरकार है। सूचनाओं के संजाल में सच को लाशने की बेचैनी के बीच; पत्रकारीय उसूलों की मिसाल के रूप में, अभी अभी मेल बॉक्स आया फैजाबाद से निकलने वाले जनमोर्चा के पत्रकार रहे कृष्ण प्रताप सिंह का लेख यहां दिया जा रहा है। अयोध्या के मुद्दे पर नई पीढी के माध्यम से जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) और मीडिया स्टडीज सेंटर सच की परतें तलाश रहे हैं। इस सीरीज के अन्य लेख नई पीढी पर देखे जा सकते हैं।- मॉडरेटर)


दास्तान-ए-हिन्दू पत्रकारिता
कृष्ण प्रताप सिंह
एक संयोग (कायदे से दुर्योग) ही था कि उधर विश्वहिन्दू परिषद ने अयोध्या को रणक्षेत्रा में बदलने के लिए दाँत किटकिटाए और इधर मेरे भीतर सोये नन्हं पत्राकार ने आँखें मलनी शुरू कीं. जिस फैजाबाद जिले में अयोध्या स्थित है उसके पूर्वांचल के एक अत्यन्त पिछड़े हुए गाँव से बेहद गरीब बाप के दिये नैतिक व सामाजिक मूल्यों की गठरी सिर पर धरकर यह पत्राकार चला तो उसका सामना विश्वहिन्दू परिषद द्वारा दाऊ दयाल खन्ना के नेतृत्त्व में सीतामढ़ी से निकाली जा रही रथयात्रा से हुआ ‘आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्म भूमि का ताला खोलो’ जैसे नारे लगाती आती यह यात्रा अन्ततः, आम लोगों द्वारा अनसुनी के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्राी श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या से उफना उठे सहानुभूति के समन्दर में डूब गयी थी. और डूबती भी क्यों नहीं, श्रीमती गाँधी ने अपने प्रधानमंत्री रहते इसकी बाबत कोई टिप्पणी तक नहीं की. उन्हें मालूम था कि उनकी टिप्पणी से व्यर्थ ही इस यात्रा का भाव बढ़ जायेगा. संघ परिवार इससे अति की हदतक निराश हुआ.

फिर तो इस परिवार की राजनीतिक फ्रंट भाजपा भी ‘गाँधीवादी समाजवाद’ के घाट पर आत्महत्या करते-करते बची. लेकिन राजीव गाँधी के प्रधानमंत्राी काल में इन दोनों ने ‘नया जीवन’ प्राप्त करने के लिए नये स्वांगों की शरण ली तो असुरक्षा के शिकार प्रधानमंत्राी और उनके दून स्कूल के सलाहकार ऐसे आतंकित हो गये कि उनको इन्हें मात देने का सिर्फ एक तरीका दिखा. वह यह कि अपनी ओर से ताले खोलने का इंतजाम करके तथाकथित हिन्दू कार्ड छीनकर इन्हें ‘निरस्त्रा’ कर दिया जाये. फिर क्या था, मुख्यमंत्राी वीर बहादुर सिंह ने इसके लिए अपनी सेवाएं प्रस्तुत कर दीं और इस बात को सिरे से भुला दिया गया कि यों ताले खुलना विवाद का अन्त नहीं, नये सिरे से उनका प्रारम्भ होगा. फिर तो उनमें से ऐसे-ऐसे जिन्न निकलने शुरू होंगे जिन्हें किसी भी बोतल में बन्द करना सम्भव नहीं होगा.

विहिप और भाजपा को तो यों भी ताले खुलने से तुष्ट नहीं होना था. इसलिए इन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था. जैसे-जैसे राजीव गाँधी को मिले जनादेश की चमक फीकी पड़ती गयी और वे राजनीतिक चक्रव्यूहों में घिरते गये, ये रामजन्मभूमि पर भव्य मन्दिर के तथाकथित निर्माण के लिए अपनी कवायदें तेज करती गयीं. यहाँ रुककर ‘रामजन्मभूमि’ का अयोध्या-फैजाबाद में प्रचलित अर्थ जान लेना चाहिएः बाबरी नाम से जानी जानेवाली कई सौ साल पुरानी एक मस्जिद, जिसमें (पुलिस में दर्ज रिर्पाट के अनुसार) 22/23 दिसम्बर 1949 की रात फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधीश के के. नैयर और हिन्दू सम्प्रदायिकतावादियों की मिलीभगत से जबर्दस्ती मूर्तियाँ स्थापित कर दी गयी थीं और कह दिया गया था कि भगवान राम का प्राकट्य हो गया है. फिर यह तर्क भी दिया जाने लगा था कि ऐसा करना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है क्योंकि यह मस्जिद एक वक्त मन्दिर को तोड़कर निर्मित की गयी और गुलामी की प्रतीक थी. बिना इस अर्थ को समझे पत्राकारों के वे विचलन दिखेंगे ही नहीं जो ऐसे तर्कशास्त्रिायों की संगति ने उनमें पैदा किये. इस अर्थ की कसौटी पर तो उनमें विचलन ही विचलन दिखायी देते हैं.

किस्सा कोताह, 1986 में ताले खुले और 1989 में राजीव गाँधी ने फिर हिन्दूकार्ड छीनने की कोशिश में ‘वहीं’ यानी गुलामी की प्रतीक उसी मस्जिद की जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए शिलान्यास करा दिया. उनकी और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की समझ यह बनी कि शिलान्यास से हिन्दू फिर खुश होकर कांग्रेस के खेमे में आ जायेंगे. फिर ‘निर्माण’ रोक देने से मुसलमान भी तुष्ट ही रहेंगे और कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू हो जायेंगे. तब शाहबानो और बोफोर्स मामलों में फसंत के बावजूद चुनाव वैतरणी पार होने में दिक्कत नहीं होगी. मगर हुआ इसका ठीक उलटा. विहिप भाजपा ने शिलान्यास को अपनी बढ़ती हुई ताकत से डरकर सरकार द्वारा मोर्चा छोड़ देने के रूम में देखा और हर्षातिरेक में नये-नये दाँव पेचों की झड़ी लगा दी. फिर तो लोकसभा चुनाव में राजीवगाँधी का अयोध्या आकर प्रचार शुरू करने व रामराज्य लाने का वादा भी कुछ काम नहीं आया. 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस फैजाबाद लोकसभा सीट भी नहीं जीत सकी. आगे चलकर विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव और पी.वी. नरसिंहराव/ कल्याण सिंह के राज में 1990-92 में कैसे ‘अयोध्या खून से नहायी’, ‘सरयू का पानी लाल हुआ’ और बाबरी मस्जिद इतिहास में समायी, यह अभी ताजा-ताजा इतिहास है.

हिन्दू कार्ड की छीना झपटी वाले इस इतिहास को वर्तमान के रूप में झेलना और पत्राकारीय जीवन का अब तक का सबसे त्रासद अनुभव था. मोहभंग के कगार तक ले जाने वाला. हालांकि इसके लिए मेरी नासमझी ही ज्यादा जिम्मेदार थी जिसके झाँसे में आकर मैं मान बैठा था कि पत्राकार होना सचमुच वाच डाग आफ पीपुल होना है. सच को सच की तरह समझने, कहने और पेश करने का हिमायती होना, मोह लोभ राग-द्वेष और छल प्रपंच से दूर होना, देश व दुनिया की बेहतरी के लिए बेड रूम से लेकर बाथरूम तक में सचेत रहना और जीवन में नैतिक, व प्रगतिशील मूल्यों का आदती होना भी. मुझे तो यह सोचने मे भी असुविधा होती थी कि कोई पत्राकार लोगों को स्थितियों और घटनाओं की यथातथ्य जानकारी देने के बजाय किसी संकीर्ण साम्प्रदायिक या धार्मिक जमात के हित में उन्हें गढ़ने व उनके उपकरण के रूप में काम करने की हद तक जा सकता है. मुझे तो पत्राकारिता की दुनिया भली ही सिर्फ इसलिए लगती थी कि यहाँ रहकर मैं जीवन के तमाम विद्रूपों का सार्थक प्रतिवाद कर सकता था. पूछ सकता था कि दुनिया इतनी बेदिल है तो क्यों है, लाख कोशिशें करने पर भी सँवरती क्यों नहीं है और कौन लोग हैं जो उसकी टेढ़ी चाल को सीधी नहीं होने दे रहे हैं?

इसलिए विहिप भाजपा की कवायदों में धार्मिक साम्प्रदायिक, व्यावसायिक और दूसरे न्यस्त स्वार्थों से पीड़ित पत्राकारों को लिप्त होते, उनके हिस्से का आधा-अधूरा और असत्य से भी ज्यादा खतरनाक ‘सच’ बोलते-लिखते पाता तो जैसे खुद से ही (उनसे पूछते का कोई अधिकार ही कहां था मेरे पास) पूछने लगता: भारत जैसे बहुलवादी देश में कुछ लोग धर्म का नाम लेकर युयुत्सु जमावड़े खड़े करने और लोकतंत्रा में प्राप्त सहूलियतों का इस्तेमाल उसे ही ढहाने, बदनाम करने में करने लगे हों, न संविधान को बक्श रहे हों न ही उसके मूल्यों को, दुर्भावनाओं को भावनाएं और असहिष्णुता को जीवन मूल्य बनाकर पेश कर रहे हों तो क्या पत्राकारों को उनके प्रति सारी सीमाएं तोड़कर सहिष्णु होना, उनकी पीठ ठोंकना, समर्थन व प्रोत्साहन करना चाहिए? क्या ऐसा करना खुद पत्राकारों का दुर्भावना के खेल में शामिल होना नहीं है?

दुख की बात है कि प्रतिरोध की शानदार परम्पराओं वाली हिन्दी पत्राकारिता के अनेक ‘वारिस अयोध्या में दुर्भावनाओं के खेल में लगातार शामिल रहे हैं? सो भी बिना किसी अपराधबोध के. उनकी ‘मुख्य धारा’ तो शुरुआती दिनांे से ही इस आन्दोलन का अपने व्यावसायिक हितों के लिए इस्तेमाल करती और उसके हाथों खुद भी इस्तेमाल होती रही है. 1990-92 में तो इन दोनों की परस्पर निर्भरता इतनी बढ़ गयी थी कि लोग हिन्दी पत्राकारिता हिन्दू पत्राकारिता कहने लगे थे. भय, भ्रम, दहशत, अफवाहों और अविश्वासों के प्रसार में अपने ‘हिन्दू भाइयों’ को कदम से कदम मिलाकर चलने वाले हिन्दू पत्राकारिता के अलमबरदार चार अखबारोंµआज अमर उजाला, दैनिक जागरण और स्वतंत्रा भारत-की तो भारतीय प्रेस परिषद ने इसके लिए कड़े शब्दों में निन्दा भी की मगर उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसा नहीं है कि प्रतिरोध के स्वर थे ही नहीं? मगर वे नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गये थे. एक वाकया याद आता है: 1990 में विश्वनाथ प्रताप मुलायम के राज में दो नवम्बर को अयोध्या खून से नहायी (जैसा कि हिन्दू पत्राकारिता ने लिखा) तो मैं फैजाबाद से ही प्रकाशित दैनिक जनमोर्चा के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत था जिसके चैक, फैजाबाद स्थित कार्यालय में ही संवाद समितियों ने अपने कार्यालय बना रखे थे. एक संवाद समिति ने कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग होते ही मृतकों की संख्या बढ़ा चढ़ाकर देनी शुरू कर दी तो दूसरी के मुख्यालय में ‘दौड़ में पिछड़ जाने’ की आशंका व्याप्त हो गयी. वहाँ से उसके संवाददता को फोन पर बुलाकर कैफियत तलब की गयी तो उसने चुटकी लेते हुए कहा ‘देखिए, फायरिंग में जितने कारसेवक मारे गये हैं, उनकी ठीक-ठीक संख्या मैंने लिख दी है. बाकी की को उस संवाद समिति ने कब और कैसे मार डाला, आप को भी पता है. लेकिन कहें तो इसका मैं फिर से पता लगाऊँ. वैसे मृतकों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं तो प्लीज, एक काम कीजिए. बन्दूकें वगैरह भिजवा दीजिए. कुछ और को मारकर मैं यह संख्या प्रतिद्वन्द्वी संवाद समिति से भी आगे कर दूँ. लेकिन कार सेवक पाँच भरें और मैं पन्द्रह लिख दूँ, यह मुझसे नहीं होने वाला’

दूसरी ओर से बिना कोई जवाब दिये फोन काट दिया गया. लेकिन आत्मसंयम का यह बाँध ज्यादा देर तक नहीं टिका. मारे गये कारसेवकों की संख्या को बढ़ा चढ़ाकर छापने की प्रतिद्वन्द्विता में पत्राकारों व अखबारों ने क्या-क्या गुल खिलाये, इसे आज प्रायः सभी जानते हैं. आमलोगों में परम्परा से विश्वास चला आता था कि अखबारों में आमतौर पर पन्द्रह मौतें हों तो पाँच ही छपती हैं. कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग ने इस भोले विश्वास को भी तोड़कर रख दिया. पत्राकार खुद मौतें पैदा करने में लग गये. सच्ची नहीं तो झूठी ही सही.

लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक ने तो, जो अब खुद को विश्व का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार बताता है, गजब ही कर दिया. दो नवम्बर को अपराह्न उसने अपने पाठकों के लिए जो स्पेशल सल्पिमेन्ट छापा उसमें मृत कारसेवकों की संख्या कई गुनी कर दी और लाउडस्पीकरों से सजे वाहनों में लादकर चिल्ला चिल्लाकर बेचा. मगर सुबह उसका जो संस्करण अयोध्या फैजाबाद आया उसमें मृतक संख्या घटकर बत्तीस रह गयी थी. जानकार लोग मजाक में पूछते थे कि क्या शेष मृतक रात को जिन्दा हो गये? बेचारे अखबार के पास यह तर्क भी नहीं था कि अयोध्या बहुत दूर थी और हड़बड़ी में उसे गलत सूचनाओं पर भरोसा कर लेना पड़ा. गोरखपुर से छप रहे एक मसाला व्यवसायी के दैनिक ने भी कुछ कम गजब नहीं ढाया. उपसम्पादकों ने पहले पेज की फिल्म बनवायी तो पहली हेडिंग में 150 कारसेवकों के मारे जाने की खबर थी. सम्पादक जी ने उसमें एक और शून्य बढ़वाकर 1500 करा दिया ताकि सबसे मसालेदार दिखें. वाराणसी के एक दैनिक से इन पंक्तियों के लेखक की बात हुई. पूछा गयाµसच बताइए, कितने मरे होंगे. मैंने बतायाµ30 अक्टूबर और दो नवम्बर दोनों दिनों के हड़बोंग में सोलह जानें गयी हैं और यह बहुत दुखदायी है. उधर से कहा गया छोड़िए भी. हम तो छाप रहे हैं सरयू लाल हो गयी खून से हजारों मरे. नहीं मरे तो हमारी बला से! मैं फोन करने वाले को यह समझाने में विफल रहा कि सरकार को ठीक से कटघरे में खड़ी करने के लिए फायरिंग में हुई जनहानि की वस्तुनिष्ठता व सच्ची खबरें ज्यादा जरूरी हैं अफवाहें नहीं.

मारे गये कारसेवकों की वास्तविक संख्या का पता करने का फर्ज तो जैसे पत्राकारों को याद ही नहीं रह गया था. कोई पूछेµकितने मरे? तो वे प्रतिप्रश्न करते थेµहिन्दुओं की तरह जानना चाहते हैं कि मुसलमानों की या फिर... और जो लोग ‘हिन्दुओं की तरह’ जानना चाहते थे, उनके लिए पत्राकारों के पास ‘अतिरिक्त जानकारीयाँ भी थीं.µ ‘पुलिस ही गोलियाँ चलाती तो इतने कारसेवक थोड़े मरते! पुलिस तो अन्दर-अन्दर अपने साथ ही थी. वह तो पुलिस की वर्दी में मुन्नन खाँ के आदमियों ने फायरिंग की और जमकर की. फिर लाशों को ट्रकों में भरकर सरयू में बहा दिया. मुसलमान पुलिस अफसरों व जवानों ने इसमें उनका सहयोग किया.’ मुन्नन खाँ उन दिनों पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादियों के मुलायम गुट के उभरते हुए नेता थे और उनकी बंग छवि के नाते विहिप-भाजपा ने उनमें भी एक ‘मुस्लिम खलनायक’ ढूँढ़ निकाला था और हिन्दू पत्राकार इसमें जी-जान लगाकर सहयोग कर रहे थे. उनको इस सच्चाई से कोई मतलब नहीं था कि अयोध्या में उस दिन किसी मुस्लिम पुलिस अधिकारी की तैनाती ही नहीं थी. फिर वह मुन्नन खाँ के कथित आदमियों को सहयोग क्या करता? लेकिन कहा जाता है न कि झूठ के पाँव नहीं होते लेकिन पंख होते हैं. इसीलिए तो कारसेवा समिति के प्रवक्ता वामदेव कह रहे थे कि दो नवम्बर की फायरिंग में उनके बारह कारसेवक मारे गये हंै. और अखबार... कैसा विडम्बना थी कि आन्दोलन का नेतृत्व करनेवाली संस्था अपनी जनहानि को ‘कम करके’ बता रही थी. अखबारों की ‘सच्चाई’ पर भरोसा करने पर यही निष्कर्ष तो निकलेगा. कोई चाहे तो यह निष्कर्ष भी निकाल ही सकता है कि ‘हिन्दू’ मानसिकता वाले जिस पुलिस प्रशासन ने प्रदेश सरकार द्वारा आरोपित यातायात प्रतिबन्धों को धता बताकर लाखों कारसेवकों को 30 अक्टूबर को शौर्य प्रदर्शन के लिए अयोध्या में ‘प्रगट’ हो जाने दिया था, उसी ने मौका मिलते ही उन्हें बेरहमी से भून डाला. पुलिस है न, उसने भून देने के लिए ही उन्हें वहाँ इकट्ठा होने दिया था. लेकिन तब भारत तिब्बत सीमा पुलिस का ‘वह’ अधिकारी सिर्फ इतनी-बात के लिए अखबारों के स्थानीय कार्यालयों का चक्कर क्यों काट रहा था कि कहीं दो लाइन छप जाए कि उसकी कम्पनी गोली चलाने वालों में शामिल नहीं थी, जिससे वह ‘लांछित’ होने से बच सके. पता नहीं वह बचा या नहीं लेकिन ‘जो भी सच बोलेंगे मारे जायेंगे’ की इस स्थिति की सबसे ज्यादा कीमत एकमात्रा दैनिक जनमोर्चा ने ही चुकायी. उसने मारे गये कारसवकों की वास्तविक संख्या छाप दी. तो उग्र कारसेवक इतने नाराज हुए कि सम्पादक और कार्यालय को निशाना बनाने के फेर में रहने लगे. इससे और तो और कई ‘हिन्दू’ पत्राकार भी खुश थे. वे कहते थे, ‘ये साले (जनमोर्चा वाले) पिट जाएं तो ठीक ही है. हम सबको झूठा सिद्ध करने में लगे हैं. मुश्किल है कि ये सब भी ससुरे हिन्दू ही हैं. वरना...और सारे प्रतिबन्धों को धता बताकर, यथास्थिति बनाये रखने के अदालती आदेश के विरुद्ध, कारसेवा करने लाखों कारसेवक उस दिन अचानक अयोध्या की धरती फोड़कर निकल आए तो इस ‘चमत्कार’ में भी हिन्दू पत्राकारों का कुछ कम चमत्कार नहीं था. पत्राकार के तौर पर मिले व्यक्तिगत और वाहन पासों को मनमाने तौर पर दुरुपयोग के लिए इन्होंने कारसेवकों को सौंप दिया. कड़ी चैकसी के बीच जब अशोक सिंघल का अयोध्या पहुँचना एक तरह से असम्भव हो गया तो दैनिक ‘स्वतंत्रा भारत’ (लखनऊ) के सम्पादक राजनाथ सिंह उन्हें ‘प्रेस’ लिखी अपनी कार में छिपाकर ले आये. उन दिनों पत्राकारों में ‘कारसेवक पत्राकारों’ की एक नयी श्रेणी ‘विकसित’ हो गयी थी जो कारसवेक पहले थी और पत्राकार बाद में. ‘जनसत्ता’ के सलाहकार सम्पादक प्रभाष जोशी तो बहुत दिनों तक अपने लखनऊ संवाददाता के लिए ‘जनसत्ता’ के ही अपने ‘कागदकारे’ में ‘कारसेवक पत्राकार’ शब्द इस्तेमाल करते और इसकी पुष्टि करते रहे. जैसे कारसेवक पत्राकार थे वैसे ही कारसेवक अफसर व कर्मचारी भी और ‘रामविरोधी’ पत्राकारों व नेताओं से निपटने को लेकर इनमें अभूत पूर्व तालमेल था. बहुत कम लोगों को मालूम है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रखी जाने की तिथि पर जो ‘प्राकट्योत्सव’ होता है, उसकी बुनियाद भी स्थानीय दैनिक ‘नये लोग’ के दो सम्पादकोंµ राधेश्याम शुक्ल और दिनेश माहेश्वरी ने रखी थी. राधेश्याम शुक्ल अब हैदराबाद से प्रकाशित ‘स्वतंत्रा वार्ता’ दैनिक के सम्पादक हैं. ज्ञातव्य है कि मन्दिर निर्माण के आन्दोलन की बुनियाद मोटे तौर पर यह हिन्दू पत्राकारों द्वारा प्रायोजित प्राकट्योत्सव ही बना था.

लेकिन यह समझना नादानी के सिवाय कुछ नहीं होगा कि कारसेवक पत्राकारों की जमात अचानक 90-92 में कहीं से आकर ठसक के साथ बैठ गयी और अपना ‘दायित्व’ निभाने लगी थी. कहते हैं कि 1977 में लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रधानमंत्राी बने तो उन्होंने अपने दैनिक कृपापात्रों को विभिन्न अखबारों में उपकृत करा दिया था ताकि वक्त जरूरत वे काम आ सकें. बाबरी मस्जिद के पक्षकारों को तो हमेशा ही शिकायत रही है कि विहिप से दोस्ताना रवैया रखने वाले हिन्दी मीडिया ने भी उनको इन्साफ मिलने की राह रोक रखी है. वे कहते हैं: (1) इस मामले में हिन्दी मीडिया ने पीड़ित पक्ष से सहानुभूति की अपनी परम्परा 22/23 दिंसम्बर 1949 से ही छोड़ रखी है जब मस्जिद में जबरन मूर्तियाँ रखी गयीं. पीड़ित हम हैं और यह मीडिया पीड़कों के साथ है. (2) 1984 में विहिप ने सरकार पर मस्जिद के ताले खोलने का दबाव बढ़ाने के लिए रथयात्रा शुरू की तो इस मीडिया ने उसे किसी जनाधिकार के लिए ‘जेनुइन’ यात्रा जैसा दर्जा दिया. हर चंन्द कोशिश की कि लोगों में यह बात न जाए कि यह एक द्विपक्षी मामले को जो अदालत में विचारधीन है, और गैर वाजिब तरीके से प्रभावित करने की कोशिश है. (3) एक फरवरी 1986 को ताले खोले गये तो भी इस मीडिया ने यह कहकर भ्रम फैलाया कि राम जन्मभूमि में लगे ताले खोल दिये गये. ताले तो विवादित मस्जिद में लगाये गये थे. जिसको मीडिया बाद में शरारत ‘विवादित रामजन्मभूमिµ बाबरी मस्जिद’ कहने लगा और अब सीधे ‘जन्मभूमि’ ही कहता है. (4) ताले खोलने के पीछे की साजिश कभी भी इस मीडिया की दिलचस्पी का विषय नहीं रही. ताले दूसरे पक्ष को सुने बिना हाईकोर्ट के आदेश की अवज्ञा करके खोले गये, मगर यह तथ्य मीडिया ने या तो बताया नहीं या अनुकूलित करके बताया. (5) भूमि के एक टुकड़े पर स्वामित्व के एक छोटे से मामले को विहिप ने धार्मिक आस्था के टकराव का मामला बनाना शुरू किया तो भी इस मीडिया ने तनिक भी चिन्तित होने की जरूरत नहीं समझी. (6) 1989 में विवादित भूमि पर राममन्दिर के शिलान्यास और 1990 में कारसेवा का आन्दोलन विहिप भाजपा से ज्यादा इस मीडिया ने ही चलाया. इससे पहले विहिप की ‘जनशक्ति’ का हाल यह था कि लोग उसके आयोजनों को कान ही नहीं देते थे और उसे अयोध्या में लगनेवाले मेलों की भीड़ का इस्तेमाल करना पड़ता था. (7) 1990 में इस मीडिया ने लोगों में खूब गुस्सा भड़काया कि मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या के परिक्रमा और कार्तिक पूर्णिमा के मेलों पर रोक लगा दी. मगर विहिप यों बरी कर दिया कि पूछा तक नहीं कि क्यों उसने अपने संविधान व कानून विरोधी दुस्साहस के लिए इन मेलों का वक्त ही बारम्बार चुना? (8) मुुख्यमंत्राी मुलायम सिंह यादव के इस बयान का भी मीडिया ने जानबूझकर लोगों को भड़काने के लिए अनर्थकारी प्रचार किया कि वे अदालती आदेश की अवज्ञा करके ‘बाबरी मस्जिद में परिन्दे को पर भी नहीं मारने देंगे.’ जब 30 अक्टूबर 90 को कारसेवक मस्जिद के गुम्बदों पर चढ़कर भगवा झंडा फहराने में सफल हो गये तो एक कार सेवक सम्पादक, (राजनाथ सिंह, स्वतंत्रा भारत) आह्लादित होकर बोले ‘परिन्दा पर मार गया. परिन्दा पर मार गया.’ (9) कई अखबारों ने जानबूझकर नवम्बर की फायरिंग में मृतकों की संख्या बढ़ाकर छापने में एक दूजे से प्रतिद्वन्द्विता बरती. बाद में गलत सिद्ध हुए तो मृतकों के फर्जी नाम पते भी छाप डाले. ऐसे लोगों को भी फायरिंग में मरा हुआ बता दिया जो कभी अयोध्या गये नहीं और अभी भी जिन्दा हैं. इनके लिए विहिप की प्रेस विज्ञप्तियाँ ही खबरें होती हैं जिसके बदले में ये भाजपा द्वारा उपकृत होने की आशा रखते हैं. ऐसे कोई उपकृत चेहरे राज्यसभा में भी दिखते हैं. (10) 1992 में जब कल्याण सिंह सरकार ने विहिप और कारसेवकों को पूरी तरह अभय कर दिया कि उनके खिलाफ गोली नहीं चलायी जायेगी तो उन्होंने सिर्फ बाबरी मस्जिद का ही ध्वंस नहीं किया. उन्होंने 23 अविवादित मस्जिदों को नुकसान पहुँचाया, कब्रें तोड़ीं और मुस्लमानों के 267 घर व दुकानें जला दीं. इतना ही नहीं, उन्होंने सत्राह लोगों की जानें भी ले लीं. कजियाना मुहल्ले में एक बीमार मुस्लिम स्त्री को उन्होंने उसकी रजाई समेत बाँधकर जला दिया और उसके उस विश्वास की भी रक्षा नहीं की जो उसने उनमें जताया था. जब अन्य मुस्लमान अयोध्या से भाग रहे थे तो उसने जाने से मना कर दिया और कहा था कि भला वे मुझको मारने क्यों आयेंगे. तब कहर ऐसा बरपा हुआ था कि कोई छः हजार मुस्लमानों में से साढ़े चार हजार अयोध्या छोड़कर भाग गये थे. अपवादों को छोड़कर किसी भी हिन्दी अखबार को कारसेवकों के ये कुकृत्य नहीं दिखे . इनके लिए आज तक किसी को भी कोई सजा नहीं मिली क्योंकि सरकार ने मुकदमा चलाने की ही जरूरत नहीं समझी. आज की तारीख में कोई हिन्दी पत्राकार या अखबार इसे अपनी चिन्ताओं में शामिल नहीं करता. (11) हिन्दी मीडिया इस मामले में मुस्लिमों को खलनायक बनाने का एक भी मौका नहीं चूकता और इस तथ्य को कभी रेखांकित नहीं करता कि इस विवाद के शुरू होने से लेकर अब तक मुस्लिम पक्ष की ओ से गैर कानूनी उपचार की एक भी कोशिश नहीं की गयी है.

कई लोगों को उम्मीद थी कि छः दिसम्बर 1992 को कारसेवकों के हाथों अपने कैमरे और हाथ पैर तुड़वा लेने के बाद ये पत्राकार खुद को थोड़ा बहुत अपराधी महसूस करेंगे और आगे की रिपोर्टिंग में थोड़ा वस्तुनिष्ठ रवैया अपनायेंगे. मगर अटल बिहारी वाजपेयी के राज में मार्च, 2002 में हुए विहिप के शिलादान कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ने इस उम्मीद को भी तोड़ दिया. विहिप भले ही इस कार्यक्रम में 90-92 जैसी स्थितियाँ नहीं दोहरा सकी मगर मीडिया में 90-92 जैसी स्थिति पैदा ही हो गयी गयी. प्रामाणिक खबरें देने के बजाय यह मीडिया फिर विहिप का काम आसान बनाने वाली कहानियाँ गढ़ने और प्रचारित प्रसारित करने में एक दूजे से आगे बढ़ने के प्रयत्नों में लग गया. पत्राकारीय मानदंडों को पहले जैसा ही रोंदते हुए. इस बार कारसेवक ‘रामसेवकों’ में बदल गये थे. वे आने लगे तो रेलों में डिब्बों पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर यात्रियों को साम्प्रदायिक आधार पर तंग करने उनसे जबरिया जय श्रीराम के नारे लगवाने और लगाने की स्थिति में मारपीटकर ट्रेन से नीचे फेंक देने जैसी घटनाएं (जिनमें मौते भी हुईं) रुटीन हो गयीं. उन्होंने जगह-जगह महिलाओं से बदलसलूकी भी की. लेकिन आम यात्रियों के तौर पर ये घटनाएं खबरों का हिस्सा नहीं बनीं. जिस साबरमती ट्रेन के दो कोच गोधरा में जल गये और उनमें सवार रामसेवकों की जानें गयी. वह फैजाबाद जिले के रुदौली रेलवे स्टेशन से ही रामसेवकों की उद्दन्डता और उत्पात की गवाह बनी थी. लेकिन गोधरा को ‘मुस्लिम प्रतिक्रिया’ बता देने में पल भर भी न लगाने वाले मीडिया न उनके उत्पातों पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज रखा. दैनिक जनमोर्चा को छोड़ कहीं भी इनकी खबरें नहीं छपीं. इससे गुजरात में हिन्दू प्रतिक्रिया’ के सरदारों को कितनी सुविधा हुई, कौन नहीं जानता? वे न्यूटन तक को बीच में ले आए और खूँरेजी का औचित्य सिद्ध करने लगे.

सरकार ने रेलें बसें रोककर और जाँच पड़ताल का शिंकजा कसकर रामसेवकों के आने की गति धीमी कर दी तो भी अखबार और चैनल भी अब तो चैनल भी मैदान में थे, ‘टकराव बढ़ने के आसार और ‘रामसेवकों का आना जारी’ जैसे शीर्षक ही देते रहे. विडम्बना यह कि वे सूने रामसेवक या कारसेवकपुरम की तस्वीरें छापते थे, वहाँ खौफनाक सन्नाटे की बात करते थे लेकिन उन हजारों कारसेवकों का उनके पास एक भी चित्रा नहीं होता था जिनका आना वे जोर-शोर से बता रहे थे. यह बेईमानी’ इसलिए थी ताकि कम से कम इतनी भी भीड़ तो जुट ही जाए कि विहिप अपनी ‘जनशक्ति’ जता सके. एक दैनिक ने तो लिखा भी ‘विहिप की जनशक्ति को लेकर किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए.’

दूसरी ओर अयोध्या, फैजाबाद के नागरिक कफ्र्यू से भी बुरी हालात में विहिप के रामसेवकों और सरकारी सेवकों के पाटों के बीच पिस रहे थे मगर उनके लिए मीडिया के पास समय नहीं था. कुछ पत्राकार नागरिकों की प्रतिबन्धों से आजादी के पक्ष में थे भी तो इस चालाकी में कि इसकी आड़ में रामसेवककों की घुसपैठ हो सके. हैरत की बात थी कि 2002 में भी पत्राकार विहिप को हिन्दुओं के ‘विधिमान्य’ वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में ही प्रचारित कर रहे थे. उन्हें यह बताना गवारा नहीं था कि विहिप का समझौते कर लेने और मुकरकर समस्याएं खड़ी करने का इतिहास रहा है. कई पत्राकार विहिप के जटाजूटधारियों और साधुवेशियों को अनिवार्य रूप से सन्त बनाये हुए थे. लेकिन इन सन्तों की इस असलियत से उन्हें कोई मतलब नहीं था कि उनमें से कई बेपेंदी के लोटे हैं. उनकी बातें गाड़ी के पहिये की तरह चलती रहती हैं और आज कहकर कल मुकर जाने और कुछ और कहने लग जाने में वे अपना सानी नहीं रखते. ‘शिला दानी’ रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष रामचन्द दास पर महंत ने एलान किया हुआ था कि पन्द्रह मार्च को वे लाठी गोली की परवाह न करते हुए विहिप की कार्यशाला से तराशे गये पत्थर लेकर अधिग्रहीत परिसर जायेंगे. बाद में उन्होंने कह दिया कि वे वहाँ जायेंगे ही नहीं. एक बार एक पत्राकार ने उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने रुष्ट होकर जान देने की घोषणा क्यों की. उनका जवाब था ऐसा न करता तो क्या तुम लोग मुझे घेरकर बैठते? किसी भी पत्राकार ने उनकी इस ‘प्रचार प्रियता’ का नोटिस नहीं लिया. विहिप के नेता इस पल अदालत का फैसला मानते थे और उस पल मानने से इनकार कर देते थे मगर कहीं भी पत्राकार इसके प्रति आलोचनात्मक नहीं थे.

2002 में विश्व हिन्दू परिषद के तमाशों से आजिज अयोध्यावासियों में गुस्सा भड़का हुआ था और वे उसे छिपा भी नहीं रहे थे पर मीडिया ने इसे भरपूर छिपाया. नागरिकों के स्वतःस्फूर्त और अराजनीतिक शांतिमार्च की खबर देने के लिए भी उसके पास शब्द नहीं थे. उसने फिर खुद को विहिप के साथ नत्थी कर लिया था हालांकि विहिप अपने शुभचिन्तक मीडिया के प्रति अभी भी सहिष्णु नहीं थी. एसोसिएटेड प्रेस के एक संवाददाता को तो विहिपवालों ने पीटा भी. फिर भी साम्प्रदायिक कारणों से विहिप के साथ नत्थी पत्राकार ऐसी खबरें गढ़ते रहे जिनसे अपने अयोध्या में बने रहने का औचित्य सिद्ध कर सकें. ऐसा ही उन्होंने 1990-92 में भी किया था.

इस सिलसिले में उनकी भाषा पर गौर किये बिना बात अधूरी रहेगी. विश्वहिन्दू परिषद देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेशों की अवज्ञा और ‘हर हाल में मनमानी’ पर अड़ी हुई थी तो इसे उसका ‘अडिग रहना’ कहकर ग्लैमराइज किया जाता था. जैसे उसकी जिद किसी प्रशंसनीय उद्देश्य से जुड़ी हुई हो और उसके पूरी हो जाने से इस देश के लोगों में कम से कम हिन्दुओं की तमाम चिन्ताओं का एकमुश्त समाधान हो जाने वाला हो. विहिप अपनी बात से मुकर जाती तो मीडिया इसे उसका रणनीति बदलना कहता और विहिप के विरोधी यानी (रामविरोधी) अपनी बात की दोहराते तो कहा जाताµ वे अपनी हठधर्मी पर कायम हैं. मुलायम सिंह यादव के पिछले मुख्यमंत्रित्व काल में जब विहिप ने उनसे ‘मिलकर’ अयोध्या कूच का नारा दिया तो भी मीडिया अपने पुराने रंग में ही दिखा. अभी हाल में अलकायदा की ओर से अयोध्या के सन्तों को धमकी भरे पत्रों के कथित मामले को साम्प्रदायिक रंग देने में जुटे हिन्दू पत्राकारों को तब साँप सूँघ गया जब पता चला कि वे पत्रा तो महन्त नृत्य गोपाल दास के एक नाराज शिष्य का खेल था.

यह ‘परम्परा’ अभी भी अटूट है. इसीलिए कहा जाता है कि अयोध्या फैजाबाद में विहिप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार उसकी समर्थक है अथवा विरोधी क्योंकि प्रशासन और पत्राकार प्रायः उसी के हाथ में खेलते रहते हैं. प्रतिगामिता की हद यह कि ऐसे में वे तनिक भी तार्किक नहीं होते. विहिप द्वारा प्रायोजित फासीवाद भी, कहीं आया हो या नहीं, और चाहे ‘फैसला कुछ भी हो मन्दिर तो वहीं बनना चाहिए’ कहने वालों पर भी कम व्यापा हो, इन पत्राकारों पर तो इस तरह नशा बनकर छाया है कि उतर ही नहीं रहा. उतर जाता तो वे समझ जाते कि साम्प्रदायिकता तो किसी भी समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक तनावों का बाई प्रोडक्ट होती है और उसका कोई भविष्य नहीं होता. तब वे खुद (साम्प्रदायिक) हिन्दू होने के लिए प्रगतिशीलता और प्रतिरोध की गौरवशाली विरासत की धनी हिन्दी पत्राकारिता को शर्मसार करने पर न उतरे रहते. मरने वाले का धर्म पूछकर खुश या नाखुश नहीं होते. तब झूठ और फरेब मिलकर भी किसी अखबार में यह ‘खबर’ नहीं छपवा पाते कि 90 में कारसेवकों के ‘दमन’ करनेवाले एक पुलिस अधिकारी की ईश्वर के कोप से आँख ही बह गयी. तब दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला राम मन्दिर निर्माण का घोटाला इतना अचर्चित नहीं रहता. कोई न कोई शिलापूजन के दौरान देश-विदेश से प्राप्त हुई रत्नजटिता शिलाओं का अता-पता भी पूछता ही. मगर आज तो कोई उस ‘हुतात्माकोष’ के बारे में भी कोई सवाल नहीं उठया जाता जिसे विहिप ने फायरिंग में मारे गये कारसेवकों के परिजनों की मदद के लिए बनाया था. और जिसमें आयी धनराशि का ब्यौरा आज तक किसी को ज्ञात नहीं है. उससे किस कारसेवक के किस परिजन को कितनी मदद दी गयी. यह भी कोई नहीं जानता.

निष्कर्ष साफ है: हिन्दी पत्राकारिता इस तरह हिन्दू पत्राकारिता में ढलकर हिन्दी की लाज तो गँवायेगी ही गँवायेगी हिन्दुत्व की लाज भी नहीं बचा पायेगी. झुनझुना बनकर रह जायेगी, बस और लोग उस पर एतबार करना छोड़ देंगे. तब ‘हिन्दुत्व’ के अलमबरदारों के लिए भी ‘हिन्दू पत्राकारों’ का कोई इस्तेमाल नहीं रह जायेगा.

September 3, 2010

एक मर चुके दोस्त के लिए

विनय तरुण की मौत 22 जून को हुई। 28 अगस्त को उनके गृह नगर पूर्णिया में एक कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व होने पर साथियों में रोष है। जिस मैं अखबारी संवेदनहीनता से ऊपर सवालों से बचने की कोशिश मानता हूं। सत्ता संचालित मीडिया सवाल पसंद नहीं करता। बडे अखबार तो बिल्कुल नहीं। ऐसे समय में हमें हरिवंश जी जैसे संपादक भी याद आते हैं, जो साथियों की निजी समस्याओं के व्यावहारिक हल सुझाते हैं और मौके बेमौके निजी परेशानियों को व्यक्तिगत स्तर पर हल भी करते हैं। बहरकैफ यह बहस का मुद्दा है कि क्यों संपादक हृदयहीन होते जा रहें हैं, और क्यों हम गधा पचीसी करते हुए घोडे होने का भ्रम पाले हुए हैं? मुझे लगता है अब बातचीत कार्यक्रम में उठाये गये बिंदुओं पर करनी चाहिए। क्षेत्रीय पत्रकारिता के जिस मर्ज पर हम बात कर रहे थे, कार्यक्रम में आना उसका बेहद छोटा हिस्सा है। सो बात आगे बढे। मैं कार्यक्रम में नहीं था, सो अभी महज विनय को ही याद कर लूं। विनय को याद करते हुए यह कुछ शब्द जो स्मारिका के लिए लिखे थे।


होने और न होने का अफसोस
(विनय तरुण को समर्पित)

जरा-सा फासला होता है
जिंदगी और मौत के बीच
एक सूत भर
एक सांस भर
एक फैसले का वक्त
जिस वक्त तुमने एक जरूरी फैसले की जल्दबाजी की
ठीक उसी वक्त की बेचैनी में
हम सब अपनी-अपनी मांदों में पुरसुकून थे
तुम्हारी आखिरी सांस के साथ मुंदती आंखों में जो सपना था
वह भी बुझ गया है
अपनी पर्यटनशील रचनाधर्मिता के तले
जो बोये थे बीज तुमने
उन्हें जमीन का सीना फाड़ते नहीं देख पाओगे
अफसोस, विनय! अफसोस

हम अब भी देखते रहेंगे एक झिलमिलाती झील
जिसे निहारते थे तुम
वीआईपी रोड1 से
पानी की सफेद, फिर पीली और फिर हरी होती सतह
अपनी शरारती आंखों से
झांसा देते रहे तुम झील को
जो किस्से सुनती थी हमारे गौहर महल2 के साथ
पानी को बहलाने में माहिर थे तुम
काश, मौत को भी बहला लेते
तो यह सूनापन भरने की तरकीबें न खोजते हम
अफसोस, विनय! अफसोस

तुमने जो जिंदगी पहनी थी
उसे दिल से जीया
पत्थर-सा दिल किये रहे
भूकंप से ठही इमारतों के साये में
कराहों की टोह लेते भी
जिंदगी की बेबस हो चुकी सांसों को तुमने थाम लिया था
सामाख्याली3 के जंगलों में
कांपते नहीं थे तुम्हारे हाथ
जमीन के भीतर होती हलचलों के बीच कुंडी खोलने से
तुम जो खुले आसमान के नीचे बिछाते थे
महफिल दोस्तों की
और कहते थे- 'दोस्ती एक मशविरा है
जो दिल को दिया जाता है'
कितना खुश होते थे
जिस्म पर
देखकर धूल-मिट्टी और मेहनत कीकीरें
बहते खून के बीच आखिरी वक्त में तुम कैसे धोखा खा गये
यह तथ्य तुम्हारे जाने के साथ
हमेशा के लिए बन गया रहस्य
अफसोस, विनय! अफसोस


जब तुम खामोश हुए
उस वक्त भी बहुत शोर था
तुम्हारे भीतर तो यकीनन
और बाहर बची दुनिया में भी
शर्मनार्क शर्तों को तुमने हमेशा अंगूठा दिखाया
इनकार के यकीन को तुमने बख्शी इज्जत
में दिया फक्र अपना दोस्त होने का
देखो तो कैसा तना है सीना
अखलाक, रंजीत, पुष्य, प्रवीण, पशुपति4 का
तुम देख पाते तो यकीनन हंसते
हम तुम्हारी हंसी के साथ हंसते
अफसोस, विनय! अफसोस

कोई नहीं सोचता
मौत के बारे में
तुमने भी नहीं सोचा था
इस तरह मरने के बारे में
तुम जो लकीरों में ढूंढते थे आने वाले वक्त की चाबी
जानते थे कि किस्मत जैसा कुछ नहीं होता
रेत के टीले से विश्वास को तुम
बना देते थे आस्था की मजबूत इमारत
और ईश्वरीय धाक को काटकर
अपनी कमजोरियों के कालेपन
से उजागर कर देते थे खूंखार सच्चाइयां
तुम जो मनोविज्ञान के आसान नियमों से
पढ़ते थे भीतर की उथल-पुथल
बेबुनियाद बातों को देते थे बुनियाद
कमजोर होते इरादों को कर देते थे मुकम्मल सफलता में तब्दील
कैसे नहीं लगा पाये गति के आसान नियम का अंदाजा
कदम कैसे भटक गये तुम्हारे
अफसोस, विनय! अफसोस


जो कराह निकली थी
भागलपुर से उसमें भीग गये
भोपाल, हैदराबाद, रांची, पटना, दिल्ली और न जाने कितने शहर
भरे-पूरे न्यूजरूमों में
खबरें कतरने में माहिर दाढ़ीदार हाथों को
लकवा मारा था तजुर्बेकार जबड़ों को, सहमे से हाथों ने अगले ही पल
भरोसा दिलाया
कि खबरें झूठी भी होती हैं
तुमने कभी झूठी खबर से नहीं किया समझौता
मौत से कैसे करते?
अफसोस, विनय! अफसोस

अंधेरे और सीलन भरे कमरों में गुजारते वक्त
बेमालूम सी गलियों में भटकते
सुनहरे दिनों की आस में
हार को धकेलते पीछे
तुम जानते थे कि हम एक दिन भूल जायेंगे
तुम्हारी मौत के साथ कुछ भी नहीं बचा है तुम्हारा
सिवाये यादों के
हमारे दिलों में कितने दिन जिंदा रहोगे
जिंदगी के कारोबार कहां याद रखने देंगे तुम्हारी मासूम हंसी
अफसोस, विनय! अफसोस

संदर्भ :
1. भोपाल की झील के साथ सटी वीआईपी रोड, जहां विनय तरुण के साथ हमने कुछ शामें बिताई हैं।
2. गौहर महल भोपाल के नबाबी दौर की एक इमारत है।
3. भुज भूकंप के दौरान विनय तरुण अन्य साथी सामाख्याली कैंप में दो दिन रहे थे।
4. विनय तरुण के कुछ मित्रों के नाम