November 18, 2010

मां को याद करते हुए

भाई अरविंद शेष के लिए
मैं अमूमन मां को याद नहीं करता। भावुक हो जाना यूं भी कोई बहुत अच्छी बात नहीं हैं। राजेश जोशी अपनी प्लम्बर वाली कविता में जिन 'जानकारी वाली खूबियों' की बात करते हैं, उन्हें मैंने इसी अंदाज में सीखा था कि हमें बुरे लोगों को ज्यादा याद करना चाहिए। ताकि खुद के भले होने का भ्रम बड़ा होता रहे। हम मध्यवर्गीय 'कमाऊ लोग' शायद इसीलिए प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, गैस वाले, रिक्शेवाले, ऑटो वाले, धोबी, गार्ड, फुटपाथी दुकानदार और ऑफिस में एक आवाज पर पानी लाने वालों को अपनी दोस्ती की लिस्ट में शामिल नहीं करते।
मां को याद करने में अच्छेपन का भ्रम और बेहद छोटे होने की सचाई जिस शक्ल में आती है, वह बहुत कुछ तोड़ भी देती है। हमारी मांएं जितनी मजबूत हैं, हम उतने मजबूत कभी नहीं होंगे। जिन तीन स्त्री-खंबों (मां, बहन, पत्नी) से हमारी अच्छाइयां बनी होती हैं, वहां ज्यादा नहीं जाना चाहिए। दरकने का डर बना रहता है। फिलवक्त कुछ मजबूती के साथ ये दरकती हुई पंक्तियां।


मांएं एक जैसी होती हैं
भीतर से
और बेटे....
बाहर से
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मां ने आवाज दी
चूल्हे से उठती भाप में खांसते हुए
हम दौड़ पड़े बिन चप्पलों के
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हाथ धोना सिखाया मां ने
आटा गूंधते दुलारा
तो हाथ झटक दिया मां का
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बच्चों को देखकर
याद आई मां
मां को बच्चा बनते देर नहीं लगती
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उम्र पर पत्नी में देखते रहे
मां का अक्स
मां तकती रही हमारी आवाज में
पिता की धमक
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मुश्किल वक्त में
मां याद आई
सिर पर हाथ फेरती
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बहनों से छुपाकर रख्खे थे जो
लड्डू, आम और केले
मां अपने हाथों से खिलाती रही
हम बहनों को चिड़ाते रहे
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गीली जमीन पर सोना
और जरा-सी आहट में जागना
खामियां ही लगीं मां की
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पिता की डांट
बेटे की झिड़की
और बहनों की शिकायत
सब देहरी से सुना मां ने
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मायके को याद करती है मां
बेटियों के लिए
और बेटे से बांटती है
ससुराल के सुख
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पिता की डांट
मां का दुलार
पीछा नहीं छोडते आखिरी वक्त तक
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मां की मां को याद करो
तो मां खुश हो जाती है
पिता की मां को याद करते हुए
चुप्पी साध लेती है मां
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एक स्त्री बदलती रही चोला
बेटी, बहन, पत्नी और मां का
दादी-नानी के किरदार तक आते-आते

November 17, 2010

तकते रहें बारिश को, जज्ब हो जाने तक

बारिश किसी के भी लिए एक रोमांटिक याद हो सकती है। बारिश के साथ कई अनुभव जुड़े होते हैं। अच्छे और बुरे। यकीनन हम दोनों ही यादों पर मुस्कुराते हैं और अपने भीतर कुछ नमी महसूस कते हैं। मैं जब अभी खिड़की से इस ठंड की पहली बारिश को देख रहा हूं तो बचपन की बारिश भी याद कर रहा हूं। बचपन की बारिश में मिट्टी की सोंधी महक भी होती है। घरवालों से नजर बचाकर गली में बारिश के पानी में पैर पटकने के दौरान कीचड़ से सने हुए शरीर बारिश के शो केस का सबसे रंगीन चित्र है। उसी जगह जहां हम कीचड़ से सने खड़े हुए हैं, जाना एक यादगार अनुभव होगा। हो सकता है हम ज्यादा ही संवेदनशील हों तो उस गली में, जो अब तक कांक्रीट की मजबूती हासिल कर चुकी होगी, काफी देर तक खंभे से टिके हुए खड़े रहें। और दिलचस्प यह भी कि उसी समय बारिश जाए और हम भींगकर छप्पर की ओट ले लें। इतने में ही कोई बच्चा कूदता हुआ गली के मुहाने से निकले और सर्र से गायब हो जाए। होने को कुछ भी हो सकता है, लेकिन किसी पुरानी जगह की याद भले ताजा हो, वह जगह हमें नहीं मिलेगी। गुजरते वक्त में हर जगह बदलती है। लोग भी और उनके साथ वहां की हवा और बारिश भी।
यानी जो इस वक्त घट रहा है वह इसके बाद कभी वापस नहीं आयेगा। यह जो गुजर जाएगा, वह किसी ब्लैक होल में जमा होगा। हमारा दिमाग में इसकी एक याद तो रहेगी, लेकिन वह भी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की पुरानी रील की तरह। जिसमें कई जगहों पर धब्बे होंगे।

जैसे अब जब बारिश को सोचते हैं तो यह भी याद आता है कि इन दिनों बारिश तेज नहीं होती बस जैसे एक काम है यह भी मौसम का। वह बरस जाता है। अक्सर देर सबेर और बेहद कम। कुछ लोग इसके लिए हमें ही जिम्मेदार ठहराते हैं। यहां में पर्यावरण की पेचीदा बहस में नहीं पडूंगा। क्योंकि यादों में ढूंढे जाने वाले पेड़ भी हम काट चुके हैं, जिनसे पहले जैसी बारिश होती। तेज बारिश के लिए जो घने पेड़ चाहिए उन्हें बचाने वाले लोग नहीं रहे तो बारिश भी अब धीमी रफ्तार से गिरती है। और शायद इसीलिए बूंदे मिट्टी में धंसती नहीं हैं, बस फैल जाती है। वगरना बूंदें, जब मिट्टी पर पड़ती थीं, तो धूल का एक बेहद छोटा गुबार उठता था और बूंद एक गड्डा बना देती थी। जहां सख्त जमीन के नीचे से पत्थर झांकने लगते थे। घरों की मुंडेर से टपकते उरवाती के रेले ऐसा तेजी से करते थे और उन जगहों पर सफेद चुन-कंकड़ों का अच्छा-खासा अंबार लग जाता था। लंबी रिमझिम के बीच जब खेत-खलिहान के काम ठप होते थे, गोटी खेलने वालों के लिए ये पत्थर जरूरी थे। प्रकृति और इंसान का रिश्ता पहली बार बेहद साफ-साफ शक्ल में यहीं देखा था। बारिश काम पर नहीं जाने देती और बारिश ही खेलने के लिए गोटियां उपलब्ध कराती है। अब बारिश में भी काम पर जाने वालों की संख्या अच्छी खासी है और उसी अनुपात में बारिश में बाहर आने वाले कंकड़ कम हो गये हैं।

मौसम विभाग के अनुसार भी बारिश में बदलाव आया है। हालांकि इस विभाग की रपटें उस बदलाव को देखने की अभ्यस्त नहीं हैं, जो हर जगह की बारिशों में देखा गया है। अब जबकि स्थायी सिर्फ ई-मेल, फेसबुक और ऑरकुट के अकाउंट माने जाने लगे हैं, तो बारिश से अपने दो दशक पुराने रूप में लौटने की जिद एक मासूम इच्छा भर हो सकती है। जिसे कभी पूरा नहीं होना है।

November 16, 2010

क्यों लिखें हम सकारात्मक खबरें?

बराक ओबामा चले गये हैं। दो दिन तक हम पागलों की तरह उनकी एक-एक हरकत पर डोलते रहे। कैमरे के फ्लैश और न्यूज रूम के दिमाग तेजी से चलते रहे। ऊपरी तौर पर देखें तो हर एंगल से खबरें परोसी गईं। ओबामा की ताकत से लेकर कार और उनके दल में आये लोगों की खासियतों से लेकर वे कहां कहां गये, जायेंगे और यहां तक की मिशेल की खरीदारी भी बच न सकी, 'खोजी' नजरों से।

सुर्खियों में राखी सावंत आईं, इधर सुदर्शन ने भी अपने विवादास्पद बयान से पहले पेज पर जगह पाई और उधर महाराष्ट्र में पृथ्वीराज की ताजपोशी भी कई जगह ब्रेकिंग रही। इसी बीच सचिन के 50वें टेस्ट शतक का इंतजार भी होता रहा। हैदराबाद पर निगाहें जमी थीं लेकिन हरभजन लीड ले उडे। अब राजा सुर्खियों में हैं। यह मसला कुछ दिन खिंचेगा। इधर कल लक्ष्मी नगर में बिल्डिंग गिरी। दिल्ली का मलबा सब पर भारी होता है। सो बस यही चला।

मगर मैं दूसरी जगह अटका हूं। दीवाली बीत चुकी है और इस दीवाली पर 'सकारात्मक खबर' का भूत फिर न्यूजरूमों में फैला रहा। अभी कल राखी सावंत के इंसाफ को कठघरे में रखने वाले वक्ता भी सकारात्मक खबरों की वकालत करते रहे थे। आखिर हमसे सकारात्मक खबरों की अपेक्षा क्यों की जाती है? जबकि यह तय है कि हमें हमेशा विपक्ष की बैंच पर बैठना होता है। अगर चौथी खंबे की बुनियाद में सकारात्मकता खबरें डाल दी जायें तब सोचिए खबरिया दुनिया का क्या हाल होगा?

मुझे
लगता है कि एक पत्रकार को अपनी नजर बुरे पर ही रखनी चाहिए। गड़बडिय़ों पर। जो अच्छा है उसके लिए पीठ ठोकना काफी है लेकिन असली बात है कि आप किन बुराइयों, खामियों को सामने ला रहे हैं। जब हम अपने आदर्श पत्रकारों की बात करते हैं या उनकी खबरों का जिक्र करते हैं, तो यह बात और साफ हो जाती है। जो घोटाले सामने ला सके, जिन्होंने समाज की कालिख को दिखाया, जिन्होंने दुनिया को बदशक्ल बनाने वाले काले चेहरों को बेनकाब किया, हम उन्हें ही याद करते हैं। गुडी-गुडी लिखने का अपना मजा है और इससे परहेज नहीं किया जा सकता लेकिन यह पत्रकारिता का एक अंश ही हो सकता है। मनोरंजन की खबरों से अलग किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों पर हम खबरें परोसते ही हैं।

जब हम पर यानी मीडिया पर आरोप लगता है कि हम सिर्फ नकारात्मक खबरें दिखाते हैं, तो यकीन जानिये मुझे अच्छा लगता है। हमें नकारात्मक खबरें ही दिखानी चाहिए। हकीकतन चौथे खंबे के पहरेदारों को तो विपक्ष की बैंच पर ही बैठना है।

अभी कल एक मित्र से बात हो रही थी। उनसे पूछा कि भारतीय मध्यवर्ग का आकार कितना होगा? उन्होंने जवाब के बजाय उच्च और निम्न की कैटेगरी थमा दी। इधर में वर्ल्ड बैंक, एनएसएस और ईपीडब्ल्यू के साथ राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के आंकडे देखता रहा। ऊपरी तौर पर देखें तो देश में 35 करोड गरीब, जिन्हें दो जून का खाना भी बमुश्किल नसीब है और 30 करोड निम्न मध्यवर्ग रहता है, जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए हाड तोड मेहनत करता है। यही वह भारत है, जिसके लिए हजारों योजनाएं और करोडों की सरकारी मदद नाकाफी साबित होती है। दूसरी तरफ 30 करोड की जनसंख्या वाला उच्च मध्यवर्ग है, जो मॉल्स में बर्गर पिज्जा खा रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार का बडा हिस्सा है। इसी के आसपास हमारा मीडिया, सरकार और व्यवस्था है। यह भारत के उन 35 शहरों में बसता है, जो दुनिया के ग्लोबल विलेज के मुहावरे को मजबूत करते हैं। इसकी चकाचौंध के आगे कोई भी नकारात्मक आंकडा और खबर दबाई जा सकती है और साथ ही वह दर्द भी जो 75 करोड भारतीयों का है। इनके अलावा इसी देश में 12 करोड वे इंडियन भी रहते हैं जिनके सपने भी आम हिंदुस्तानी की जान से ज्यादा कीमती हैं। जो हर वक्त आसमान में रहता है और जिसकी जेब में इस देश की खुशहाली और भविष्य की योजनाओं की चाबी है।

इसे एक उदाहरण के साथ साफ करते हैं। आज ही हम न्यूज रूम में सपनों पर बात कर रहे थे। एक साथी ने कहा कि ओबामा, बिल क्लिंटन के समय में देखे गये सपने में रंग भर गये। यह खबर है। लेकिन इससे बड़ी खबर यह है कि हमारे देश के 35 करोड़ लोगों के लिए दिन में एक बार अच्छा भोजन करना भी सपना है। हम किस पक्ष में खड़े होना चाहते हैं, यह हमें ही तय करना है। किसके सपने को खबर बनाना चाहते हैं। ओबामा के दुनिया जीतने के सपने को, पबों और मॉल में ब्लैकबेरी फोन के खरीदारों को या देहात में रोजाना दुश्वारियों से दो-चार होते लोगों को या उस शख्स को जो फुटपाथ पर लेटा हिंदुस्तान की दूसरी तस्वीर दिखा रहा है?

फैसला करना ज्यादा मुश्किल कभी नहीं रहा।