June 25, 2011

उम्मीद के मुहाने पर मुश्किलों से घिरी जिला पत्रकारिता

दोस्तो,
इससे पहले कि मैं अपने पत्रकारीय अनुभवों और उनसे बनी स्थापनाओं को आपके सामने रखूं, उसके पहले मुझे साफ कर देना चाहिए कि मैं कोई विशेष, उल्लेखनीय, अलग या चैंका देने वाली बात नहीं कहने जा रहा। शायद कोई अच्छी और आपके विचारों को बेहतर दिशा देने वाली बात भी नहीं करूंगा। जो लोग वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि तरतीब की मुझमें कमी है, सो कुछ बेतरतीब बातें।
जिला पत्रकारिता पर बात करते हुए हम मानकर चलते हैं कि दुनिया खराब है, बद से बदतर होती चली जा रही है। इंसान में से इंसानियत का हिस्सा या तो कम हो रहा है, और वह ज्यादा से ज्यादा हिंसक, उजड्ड और प्रतिक्रियावादी होता जा रहा है। यह दुनिया हमें मिली है, और इसी में हमें रहना है। इससे पहले यह कुछ बेहतर थी, आगे और बदतर होगी। ठीक पत्रकारिता की तरह। क्या पत्रकारिता, जिंदगी के मुहावरे के इतने ही नजदीक है। शायद हां। हमसे पहले कुछ ठीक दौर था, इससे पहले और भी अच्छा और शायद इसके बाद बेहद बुरा वक्त आने के लिए छटपटा रहा है।
मगर क्या सचमुच ऐसा ही है। मुझे इसके ठीक उलट भी उतना ही सच लगता है। यानी यह दुनिया और साथ साथ पत्रकारिता में हालात पहले बदतर थे, फिर बेहतर हुए और हसीन होने की तरफ जा रहे हैं। इस उलटे चश्मे से भी सच का एक हिस्सा ही नुमायां होता है। तब हमें कहना चाहिए कि पहले कुछ चीजें बदतर थी, कुछ बेहतर। अब बुरी स्थितियों का दौर बीता तो नई मुसीबतों ने हमें घेर लिया है। मैं निजी तौर पर मानता हूं कि यही सच है। अच्छे और बुरे के बीच ही हमें उस खरगोश की तलाश करनी है, जो हरी दूब पर खुशियों के साथ फुदकता है।
दोस्तोहम जो अपने समय के कमजोर और मतलबी इंसान हैं, बहुत ज्यादा चीजें ठीक नहीं कर सकते। जब मैं हम का इस्तेमाल कर रहा हूं, तो सामने बैठे आप सभी जहीन, ईमानदार और उर्जावान लोगों भी इसमें शामिल कर रहा हूं। हमसे पहले भी लोग ऐसे ही थी, यानी कमजोर और मतलबी। अगर ऐसा न होता तो हम पत्रकारिता की चुनौतियों पर बात न कर रहे होते, हम पत्रकारिता की संभावनाओं पर अपनी दिमागी खलल के बीच चैथे स्तंभ के रूपक की गरिमा को तलाश रहे होते। तब कौन ताकतवर है! इस आसान से सवाल का बेहद आसान जवाब हम सभी को पता है। वे कुछ संस्थान जो इस समय की भारतीय पत्रकारिता का चेहरा बना रहे हैं। इस हकीकत से कुछ देर के लिए हम आंख चुराते हैं, और बात करते हैं जिला पत्रकारिता की।
सूचना शिक्षा और मनोरंजन के पाए पर खड़ी हमारी पत्रकारिता ने मनोरंजन को तरजीह देना शुरू कर दिया है, सूचना उसका दूसरा काम है और शिक्षा से लगभग वह आंख चुराती हुई लगती है।
जिला पत्रकारिता की चुनौतियों बदलती रहती हैं। यहां मैं जिला पत्रकारों में एक खास फर्क करने की इजाजत चाहूंगा। मैं जिला पत्रकारों को दो हिस्सों में देखता हूं। एक हैं, मित्र पत्रकार। प्रशासन के मित्र, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों और उन लोगों के मित्र जो दुनिया को बदशक्ल करना चाहते हैं। दूसरे पत्रकार वे हैं, जो सचमुच एक बेहतर कल के सपने के साथ अखबारों की तरफ हसरत से देखते हैं। जिनके लिए खबरें रंगों में बहने वाला खून हैं, और जो किसी भी सरकारी संस्थान में आरामदायक पद पर हो सकते थे, किसी कंपनी के मुलाजिम हो सकते थे, या जो अपनी कुछ जमा पूंजी से कोई धंधा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। उनके भीतर के किसी अवयव ने उन्हें खबरों की दुनिया में धकेल दिया। अपराधियों, भ्रष्टाचारियों के निशाने पर रहने वाले ऐसे जिला पत्रकार आर्थिक रूप से विपन्न स्थिति में पाए जाएंगे। मैं इन्हीं की तकलीफों की तरफ ध्यान खींचना चाहूंगा। इस जिला पत्रकार की सुबह खबरों के छूटने से शुरू होती है। संपादक, ब्यूरो चीफ और डेस्क इंचार्ज के बीच यह पत्रकार सुबह से शाम तक अखबार के लिए सूचनाएं जुटाता है। इस बीच उसे घर में सब्जी का मेन्यू भी ठीक रखना है। गैस सिलिंडर का जुगाड़ भी करना है और बच्चों की कुछ मासूम इच्छाएं भी पूरी करना है। शाम तक खबरें भेजने के बाद उसे यह नहीं पता होता कि कौन सी खबर किस अंजाम को पाएगी।
जिला पत्रकार की मुश्किल यह है कि उसे जो करना है, खुद करना है। अपने ही खोदे गए कुएं से पानी निकालना है, और फिर उसे पर्याप्त सावधानी के साथ साफ पानी पीना है। चूक की गुंजाइश नहीं। यह जो अखबार की सबसे छोटी इकाई है। जिला पत्रकार उस घुटन से भी रूबरू होता है, जो टीवी पर दमकते चेहरों को देखकर आती है। यह अलग बात है कि टीवी के ग्लैमर की अपनी काली और अंधी दुनिया है।
दोस्तो, मैं निजी तौर पर मानता हूं कि जिला स्तर पर रिपोर्टिंग करना ज्यादा टेड़ी खीर है, बनिस्बत दिल्ली, लखनउ, पटना या भोपाल जैसे बड़े अखबारी संेटर्स के। महानगरों में आप बाहुवलियों, नेताओं, आपराधियों के खिलाफ लिखकर बच सकते हैं, लेकिन जिले वे यह मुमकिन नहीं। आप जिसके खिलाफ लिख रहे हैं वह ठीक आपके सिर पर खड़ा हो सकता है। कभी कभी तो आपकी खबर छपने के पहले ही। इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा। इंदौर मध्यप्रदेश का बड़ा अखबारी सेंटर है। इसके एक डाक एडीशन के प्रभारी से मैंने एक जिला पत्रकार का नंबर मांगा। सुबह की बात है। मैंने उन्हें फोन किया और एक सांसद के बारे में कुछ जानकारी चाही। उन्होंने मुझे इस संबंध में कोई भी जानकारी लिखकर देने से मना कर दिया। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि वे जो कुछ कहेंगे, आॅफ द रिकाॅर्ड कहेंगे। मेरे लिए यह अजीब अनुभव था। उन्होंने इसका जवाब दिया, बोले- भाई साहब आप तो ट्रांसफर होकर या फिर किसी और संस्थान में बेहतर पैकेज पर चले जाएंगे। यहां हमें झेलना पड़ेगा।
जिला पत्रकारिता की एक बड़ी दिक्कत यह है कि यहां पीर, भिश्ती, बाबर्ची एक ही आदमी होता है। आपको विज्ञापन के टारगेट पूरा करते हुए प्रसार संख्या बढ़ानी है और पूरी खबरें भी देनी हैं।
जिले में स्टाॅफर पत्रकार जितने होते हैं, उनसे कहीं बड़ी संख्या स्ट्रिंगर की होती है। हिंदी अखबारों के सूचना तंत्र के हालात तो और भी बदतर हैं। स्टिंगर को ज्यादातर अखबारी लोग उगाही करनेवाले की नजर से ही देखते हैं। हो सकता है, कि वे हों। वे शायद 50-100 रुपये की मामूली रकम के लिए खबरें इधर से उधर भी करते हों, लेकिन क्या इसके लिए हम सीधे तौर पर उसे ही जिम्मेदार मान सकते हैं। ऐसे कई उदाहरण मेरे अग्रजों के सामने भी आए होंगे और मेरे सामने भी आए हैं। जिला स्तर पर रिपोर्टिंग की चाहत रखने वाले कई लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो महज आईकार्ड के बदले खबरें देने को तैयार रहते हैं। पूरे विज्ञापन टारगेट के साथ। यानी जिला पत्रकारिता में भ्रष्टाचार की परंपरा नीचे से उपर नहीं बल्कि उपर से नीचे ही है। अगर कोई संपादक चाह ले, तो जिला पत्रकार उगाही तो नहीं कर सकता।
दोस्तो विकल्पों की कमी के इस दौर में पूंजी की हकीकत से हम सभी वाकिफ हैं। इसे हम जिला पत्रकारिता के उदाहरण के साथ समझ सकते हैं।
जैसा कि आप सभी जानते हैं जिला संस्करण जिन्हें हम डाक एडीशन कहते हैं, को हिंदी पत्रकारिता में आज भी दोयम दर्जे का न्यूज रूम माना जाता है। जिला स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों के वेतन से लेकर उन्हें मिलने वाली सुविधाओं तक की तुलना में प्रिंटिंग सेंटर या महानगर के पत्रकार बेहतर स्थिति में हैं। यह तो बात हुई रिपोटर्स की। इसके अलावा सिटी एडीशन और डाक एडिशन के सब एडीटरों तक में आप फर्क देख सकते हैं। पेज को समय पर छोड़ने के दबाव के साथ एक बड़ा फर्क खबरों के चयन का है। सिटी एडीशन में खबरें पकने के बाद पूरी तैयारी से पाठक तक पहुंचायी जाती हैं, जबकि यह सुविधा डाक एडिशन में उपलब्ध नहीं हैं। ज्यादातर प्रिंटिंग सेंटर्स पर पहला डाक संस्करण साढ़े आठ या हद से हद नौ बजे छोड़ा जाता है। यानी करीब आठ बजे तक की खबरें ही इसमें स्थान पाती हैं। खबरों के मामले में जिला संस्करण अपने प्रिंटिंग सेंटर के सिटी संस्करण से करीब छह घंटे पीछे होता है। बदलती दुनिया और तेज होती सूचना की पहुंच पाठकों के साथ होने वाला यह धोखा साफ बताता है कि डाक संस्करण बाजार की प्राथमिकता में नहीं हैं।
रेवेन्यू कम होने के कारण पहली बात तो ज्यादातर संस्थान जिले के लिए ज्यादा अखबार छापना ही घाटे का सौदा मानते हैं। जिला संस्करणों से जो विज्ञापन 15 हजार प्रसार संख्या में मिलेगा। उतना ही 20 या 30 हजार की प्रसार संख्या में मिलेगा। ऐसे में प्रति काॅपी खर्च बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है।
एक दूसरा उदाहरण भी जिला संस्करणों से सौतेले व्यवहार को साफ कर देता है। दो बड़े अखबारों में मुझे जिला स्तर पर दो काॅलम शुरू करवाने थे। काॅलम की सिनाॅम्पसिस और उसके कंटेट के शुरुआती ड्राफट तैयार करने के बाद करीब दो महीने तक वे फाइलें पांच कंप्यूटरों की सैर करती रहीं। और अंततः काॅलम शुरू नहीं हुए। ध्यान दीजिए काॅलम क्या थे। एक काॅलम था- होनहार बच्चों पर। जिसमें बच्चे की उपलब्धि को फोटो के साथ प्रकाशित करने की योजना थी। दूसरा काॅलम था- पुरानी इमारतों पर। यह दोनों ही काॅलम किसी राजनीति का हिस्सा नहीं है। अर्थशास्त्र की नाजुक डोर को हम इसमें देख सकते हैं, लेकिन असल में यह काॅलम सौतेलेपन के सबूत हैं। ऐसा मुझे लगता है। जिले की प्रतिभाएं और जिले का इतिहास इसी वजह से खबर तो छोड़िए फीचर तक की श्रेणी में नहीं आता।
एक और उदाहरण देने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आप किसी भी राज्य के प्रमुख अखबारों को सामने रख लीजिए। उनके एक महीने के एडिट पेज की लिस्टिंग कीजिए। आपको जो नतीजे मिलेंगे वे चैंकाने वाले होंगे। एडिट पेज प्रकाशित होने वाले 80 प्रतिशत लेखकों के पते महानगरों के होंगे। पूरा देश जिस तरह दो हिस्सों में बंटा हुआ है, ठीक वही हकीकत महानगरों में बंटने वाले अखबारों और जिला स्तर पर बंटने वाले अखबारों की है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कम लोगों की बेहतरी के लिए ज्यादा लोगों को बदतर हालात में रहना होता है। हिंदी पत्रकारिता में यह विद्रूप थोड़े बेहतर हालात में हैं।
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। सातवें दशक तक जैसा कि हम सभी जानते हैं कि अंग्रेजी अखबार हिंदी अखबारों से बेहतर हालात में थे। हिंदी अखबारों ने प्रसार संख्या में अंग्रेजी अखबारों का जो मुकाबला शुरू किया वह जिला संस्करणों की बदौलत ही था। तीन दशक पहले जब हिंदी अखबार अंग्रेजी के मुकाबले सीना तानकर खड़े हो रहे थे, ठीक उसी समय जिला संस्करणों की खबरें हिंदी में सामने आ रही थीं। हिंदी के साथ मलयाली और तेलगु ने अंग्रेजी को चुनौती दी थी वह जिला संस्करणों के पसरने का दौर ही था।
जिला पत्रकारिता असल में भाषाई पत्रकारिता भी है। अंग्रेजी पत्रकारिता का टारगेट आॅडियन्स गांव देहात में बहुत कम है, जिसे नगण्य कहना ही ठीक होगा। साथ ही हिंदी अखबार भी ज्यादातर खबरों के लिए अंग्रेजी स्रोतों पर निर्भर होते हैं, ऐसे में जिला पत्रकारिता से ही भाषा की असली खबरें आती हैं। हिंदी पट्टी में अखबारों ने इस हकीकत को परखा और तेजी से जिला संस्करण शुरू हुए। बाद में यानी अभी पिछले 10 सालों में जिन जिलों में रेवेन्यू की बेहतर संभावनाएं थीं, उन्हें प्रिंटिंग सेंटर्स में बदला गया। और इन जिलों के पत्रकार भी कुछ बेहतर हालात में पहुंचे। बीते दस सालों के अखबारी कायाकल्प का अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन जब होगा, तो यह बात सामने आएगी कि कैसे 1997 के बाद हिंदी अखबारों ने तेजी से अपने जिला संस्करणों को प्रिंटिंग सेंटर्स में तब्दील कर दिया।
मांग और पूर्ति के नियमों से जुड़ी उत्पादक श्रेणी की पत्रकारिता में यह देखना दिलचस्प होगा कि पत्रकारिता के इन नए केंद्रों ने हमारे समय की राजनीति, समाज और संस्कृति पर क्या प्रभाव डाले।
प्रिंटिंग सेटर्स का बढ़ना किसी खास किस्म की पत्रकारीय परिस्थितियों की ओर इशारा नहीं करता। अमेरिका और यूरोप में हर शहर से अखबार निकलते हैं। हर शहर का अपना अखबार नंबर है। यह यूरोप में छठे दशक में हुआ, और अमेरिका ने इस जिला पत्रकारिता को सातवें दशक की शुरुआत में महसूस किया। क्या भारत में वह स्थिति आएगी। शायद हां। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे जिलों के बाजार किस तेजी से उभरते हैं।
हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर रहेगा कि इस बाजार का इस्तेमाल कौन किस तरह से कर रहा है। एक उदाहरण देखें। 1955 में न्यूयाॅर्क से शुरू हुआ अखबार द विलेज वाइस अमेरिका के प्रमुख अखबारों में शामिल है। ढाई लाख से ज्यादा के सर्कुलेशन के साथ यह एक बेहतर रेवेन्यू माॅडल का भी उदाहरण है। भारत में विभिन्न कंपनियां जिलों और गांवों की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख रही हैं। महानगरों के बाजारों में अपने माल की पहुंच बनाने के बाद वे जिलों गांवों की तरफ आ रही हैं। ये कंपनियां अपने साथ विज्ञापन का एक घटाटोप भी लेकर आती हैं। क्या हम जिला संस्करणों की बेहतरी का रास्ता इसमें खोज सकते हैं! क्योंकि अगर टीवी की तेजी से अखबारों को मुकाबला करना है, तो उन्हें जिलों की तरफ फिर जाना पड़ेगा। अपने लिए वह नई जमीन तलशनी पड़ेगी, जिस पर उन्होंने अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ा था। विस्तार के अलावा अखबार के पास कोई विकल्प नहीं हैं, फिलहाल।
इस बेहतरी की क्षीण उम्मीद के बीच हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय पाठक को खबरों की थाली पसंद आती है। वह सब कुछ चाहता है अपनी थाली में। जैसे हम खाने में रोटी, सब्जी, दाल, चावल, चटनी, सलाद, पापड़ से भरपूर थाली पसंद करते हैं, वैसे ही खबरों में सब कुछ पाने की प्रवृत्ति भी ठोस भारतीय प्रवृत्ति है। हम समोसा, या जूस पी लेने को आहार नहीं मानते। ठीक पत्रकारिता की तरह। यही वजह है कि हमारे अखबारों में एक-एक दो पन्ने हर चीज के होते हैं। यूरोपीय या अमेरिकी अखबारों की तरह नहीं, कि वे विशिष्ट पत्रकारिता पर फोकस्ड पेज निकालते हैं। जिला पत्रकारिता की बेहतरी के लिए जरूरी है कि फोकस्ड पत्रकारिता का दौर भी शुरू हो। अगर ऐसा संभव हो सका तो शायद दिन बहुरेंगे।
मैं एक और उदाहरण के साथ अपनी बात खत्म करूंगा। पांच साल पहले की बात है आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले की कुछ साक्षर खेतिहर महिलाओं ने नवोदयम नामक मासिक पत्रिका निकाली थी, उस वक्त वह खबर नहीं थी, आज पांच साल बाद वह खबर बनी है। उन्हें नोटिस किया गया है। तो पहली बात तो कि जिला पत्रकारिता या ग्रामीण पत्रकारिता जिसे हम असल में भाषाई पत्रकारिता ही कहें तो बेहतर होगा, धैर्य की मांग करती है। यह धैर्य कॅरियर रुझान वाली पत्रकारिता में नहीं हो सकता। इसलिए यदि जिला पत्रकारिता के हालात बेहतर करने हैं, तो उम्मीद की उस डोर को हमें थामना होगा, जिस पर प्रतिबद्धता लिखा होता है। यह प्रतिबद्धता अपने समय को खूबसूरत बनाने की है। मैं उम्मीद करता हूं जिला पत्रकार अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समझेंगे, और हम जो जिले में पत्रकारिता करने का हौसला नहीं जुटा पाए हैं, उन्हें माफ करेंगे।
शुक्रिया
(22 जून को पूर्णिया (बिहार) में पहली विनय तरूण स्मृति व्याख्यानमाला में दिए गए वक्तव्य के अंश)

June 10, 2011

एक ‘‘भारतीय कलाकार’’ के न रहने का सूनापन

भारतीय कला को विश्व पटल पर मजबूती देने वाले चित्रकार थे मकबूल फिदा हुसैन
हुसैन की याद आते ही उनके साथ जुड़े विवाद चले आते हैं। ये विवाद क्यों हुए! उनके पीछे कौन था! क्या हुसैन को विवादों के बीच रहना अच्छा लगता था! ऐसे सभी प्रश्नों पर यह एक तथ्य भारी पड़ता है कि मकबूल फिदा हुसैन ने भारतीय कला जगत को नया आयाम दिया। वे हमारे समय के ऐसे कलाकार थे, जिसकी दृष्टि बेहद साफ थी। कला और समाज के रिश्तों से बेहद गहराई से वाकिफ हुसैन की पेंटिंग, समझ और दृष्टि उन्हें दूसरे चित्रकारों से कतार में आगे खड़ा करती है।

युवा चित्रकार मुकेश बिजौले हुसैन के बारे में बात करते हुए भावुक हो जाते हैं। रुंधे गले से वे बताते हैं, ‘‘उनका रचना संसार इतना व्यापक था कि इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्य चीजें भी दिखाई देती हैं।’’ हुसैन की कई खासियतों का जिक्र करते हुए मुकेश कहते हैं, ‘‘वे कैनवास पर सबसे पहले एक ब्लैक बोल्ड लाइन खींचते थे, और उसके इर्द-गिर्द एक आकृति उकेरते थे। उनकी इसी ब्लैक लाइन में पूरी पेंटिंग का इतिहास छुपा होता था। इसे हम पेंटिंग की लाइफ लाइन भी कह सकते हैं।’’

पेंटिंग को जीवन देने का यह रहस्यलोक हुसैन के साथ ही विदा हो गया। असल में कला के क्षेत्र में जहां सब चूक जाते हैं, वहां से हुसैन शुरू होते हैं। इस बात को पुष्ट करते हुए वरिष्ठ चित्रकार और संस्कृतिकर्मी अशोक भौमिक मानते हैं कि हिंदुस्तान की चित्रकला को खास पहचान दिलाने वाले कलाकारों में मकबूल फिदा हुसैन सबसे महत्वपूर्ण हैं। वे कहते हैं, ‘‘जितनी संख्या में उन्होंने पेंटिंग बनाई वह खुद अपने आप में बड़ी बात है। उनकी आकृतिमूलक पेंटिंग्स में जड़ता नहीं है, जो यूरोपीयन पेंटिंग में आमतौर पर पाई जाती है। श्री भौमिक कहते हैं, ‘‘राजा रवि वर्मा से लेकर अन्य कोई भारतीय चित्रकार इस जड़ता को नहीं तोड़ पाया, हुसैन ने यह कारनामा कर दिखाया। उन्होंने अपने कैनवस पर एक आम भारतीय को केंद्रीय भूमिका में खड़ा किया।’’ अशौक भौमिक हुसैन के विवादों के संदर्भ में कहते हैं, ‘‘बाद के दौर में हुसैन के बारे में गलतफहमियां पैदा हुईं और चित्रकार बिरादरी ने इसका विरोध नहीं किया, इसका जवाब एक दिन भारतीय चित्रकारों को देना होगा।’’

अपनी पेंटिंग्स में जीवन के विस्तार के लिए जाने जाने वाले हुसैन ने कभी रंग संयोजन से चैंकाया नहीं, और न ही उन्होंने कभी छद्म बुद्धिवाद का सहारा लिया, जो इस दौर के अन्य चित्रकारों में आमतौर पर दिखाई देता है। पेंटिंग के माध्यम से बड़ी बात कह देने वाले हुसैन ने कई महत्वपूर्ण किताबों के मुखपृष्ठ भी बनाए। फैज अहमद फैज की किताब ‘‘सारे सुखन हमारे’’ के यादगार कवर के अलावा ‘‘कल्पना’’ पत्रिका के आवरण हुसैन नियमित तौर पर बनाते थे। धर्मयुग के लिए किया गया उनका काम भी उल्लेखनीय है। उनके पूरे काम को सामने रखने पर पता चलता है कि हुसैन न तो हिंदू चित्रकार थे और न ही मुसलमान, असल में वे भारतीय चित्रकार थे। जिसने भारतीयता की गहराई को आत्मसात किया हुआ था। आज जब हम चित्रकारों को बंगाली चित्रकार, गुजराती चित्रकार और मराठी चित्रकार के रूप में जानते हैं, तो याद पड़ता है कि कभी हुसैन को मुंबई या महाराष्ट्र के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं जाना गया। असल में वे हमारे दौर के एकमात्र ‘‘भारतीय चित्रकार’’ थे। उन्होंने महाराष्ट्र सीरीज की पेंटिग्स की हैं, तो बंगाल पर भी कलाकृतियां दी और केरल को भी कैनवास पर उतारा। हुसैन के चित्रों की बुनाबट एक आम भारतीय की बुनाबट के करीब है। इन चित्रों का प्रभाव देखने के लिए आपको अपने दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ता। हुसैन की खासियत यही है कि वे अपने चित्रों में स्पष्ट संदेश छोड़ते हैं। हुसैन की पूरी कला यात्रा एक नंगे पैर वाले कलाकार की यात्रा है, जिसने हर जगह अपने निशान छोड़े हैं।

हुसैन के प्रभाव के बारे में चित्रकार पंकज दीक्षित कहते हैं, ‘‘उनकी कई पेंटिंग्स में घोड़े आते हैं। यह विभिन्न मुद्राओं में हैं। यह प्रभावित करते हैं। हुसैन की पूरी चित्रकला में गति है, उत्साह है, लय है, जो इन घोड़ों के माध्यम से सामने आती है।’’ श्री दीक्षित बताते हैं कि उन्होंने कैनवास पर जो रंग बिखेरे हैं, वह अमूर्त होते हुए भी मूर्त हैं।
श्री दीक्षित मानते हैं कि ‘‘हुसैन हमारे समय के शीर्ष चित्रकार थे और सिर्फ यही बात उनके बारे में महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वे शीर्ष पर बने रहे यह जरूरी बात है। इसके पीछे उनकी मेहनत और वह जमीन है, जहां से वह चले थे।’’
(10 जून 2011 को जनवाणी मेरठ में प्रकाशित)