January 12, 2012

कहानी से गायब होता किसान


वरिष्ठ कहानीकार महेश कटारे से सचिन श्रीवास्तव की बातचीत

वरिष्ठ कहानीकार महेश कटारे हमारे समय के सबसे देशज रचनाकारों में शामिल हैं। नाटक, काव्य, समाज और विश्व साहित्य पर उनका
ज्ञान जितना वृहद है, वे उसी अनुपात में बेहद संवेदनशील और बालसुलभ भी हैं। यही कारण है कि पूरे देश में महेश जी के युवा मित्रों की लंबी कतार है। 14 जनवरी 1948 को जन्मे महेश कटारे के रचना पात्र 5 कहानी संग्रह, 2 नाट्य संग्रह और एक यात्रा वृत्तांत में फैले हैं, जिन्होंने संवेदना के स्तर पर पाठकों को झकझोरा है, तो उनकी कहानियों के विषयों ने प्रेमचंद और रेणु की जमीन पर हस्तक्षेप किया है। कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके महेश जी ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान जनवाणी से लंबी बातचीत की। इस बातचीत की शुरूआत में ही उन्होंने चेता दिया था कि ''हम आने वाले समय की बातचीत करेंगे, जो हो चुका है, उससे सभी परिचित हैं''। यानी महेश जी भविष्य की कहानी को मुस्तैदी से देख रहे हैं। अपने कथ्य के साथ-साथ वे अपने लेखन में भी यह बात साबित करते रहे हैं। प्रस्तुत हैं, उसके अंश:
प्रश्न: दादा, क्या हमारे समय की कहानी के पात्र अपने समय का प्रतिनिधित्व करते हैं?
महेश कटारे:
आज की कहानी के पात्र अपने समय से आगे के पात्र हैं। आज की कहानी हमारी पीढ़ी की कहानी से बेहतर भाषा और वस्तु के साथ सामने आई है। यह एक अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ एक दिक्कत भी है, कि यह कहानियां हमारे समाज का चेहरा नहीं बना पा रही हैं। अगर आप कहानियों के सहारे समाज के वर्तमान हिस्से को देखें तो वे सही तस्वीर सामने नहीं लाती हैं। इसकी वजह है कि समाज का जो चेहरा बन गया है, वह बहुत ज्यादा उलझाने वाला है, और हमारा कहानीकार उसे पकड़ नहीं पा रहा है। आज की कहानी मैं, मेरा बाॅस, प्रेमिका, दोस्त आदि पात्रों में रची-बसी है। यह कहानी की सीमा है। नई कहानी की सीमा।

प्रश्न: नए रचनाकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

महेश जी:
आज की कहानी में रचनाकर जिम्मेदारी से बचता हुआ लगता है। उसने रचना से खुद को अलग रखा हुआ है। वह सिर्फ दृष्टा है। हस्तक्षेप नहीं कर रहा है वह कहानी में। यह पूरी तरह से जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति तो नहीं है, लेकिन हां, एक हद तक निरपेक्ष होने की कवायद जरूर है।

प्रश्न: नई सदी की कहानी का सकारात्मक पक्ष क्या देखते हैं?

महेश जी: कहानी की भाषा विभिन्न विकल्पों को खोल रही है। नई कहानी का यह सबसे मजबूत पक्ष है। इसकी भाषा में बने बनाए फार्मूले को तोड़ने की जिद है। इन बिंदुओं से कहानी में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। अब इससे आगे की जिम्मेदारी बड़ी है। इस भाषा के साथ युवा रचनाकार कहानी को कौन सी दिशा देते हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा।

प्रश्न: मैं फिर अपने पहले प्रश्न पर आता हूं। हमारे समय के रचना पात्र समाज का चेहरा नहीं बना पाते तो इसकी वजह क्या हैं?

महेश जी:
पहली बात तो हम किसान को भूल गए हैं अपने गांव को भूल गए हैं। यह बड़ा समाज है आज भी। यह भूल जाना प्रेमचंद और रेणु की परंपरा को भूलना है। एक उदाहरण लीजिए। बीते दौर में हमारे सामने एक नाम आया मिलान कुंदेरा का। मिलान कुंदेरा का जो किसान है, वह प्रेमचंद के किसान जैसा नहीं है, उसका दुख भी रेणु के ग्रामीण के दुख जैसा नहीं है। प्रेमचंद के दिमाग में भी यह विदेशी किसान था। उन्होंने इसके बरअक्स अपने किसान को परखा और दुख उपजा। आज के कहानीकार यह नहीं कर पा रहे हैं। या तो वे विदेशी कहानियों, पात्रों और शहरी पात्रों के साथ जी रहे हैं, या फिर ठेठ गंवई जीवन को सामने ला रहे हैं। दोनों जीवन को एक साथ रखिए, फिर दुख दिखाई देखा कि कहां है? लु-शुन के पात्र से संभव है, मेरी 10 प्रतिशत भी सहानुभूति न हो, लेकिन अपने पास के पात्र का दुख मुझे 10 गुना ज्यादा बड़ा दिखाई देगा। दोनों अतियों के बीच से सच्चा चेहरा निकलता है। यह हमारी कहानी को करना पड़ेगा, यदि उसे जीवित रहना है तो।
(युवा कवि हरिओम राजोरिया का हस्तक्षेप- पात्रों की विविधता हमारे समय में कम क्यों होती जा रही है। यह अजीब है कि समाज जितना वृहद और विस्तृत होता जा रहा है, कहानी से पात्रों की विविधता उसी तेजी से खत्म हो रही है।)
हरिओम, मैं यही कह रहा हूं कि सिर्फ एकांगी समाज को देखकर लिखी गई कहानी पूरे समाज को अपील नहीं कर पाएगी। आज जो जीवन है, वह रचनाकार को ज्यादा लोगों से बातचीत के अवसर नहीं दे रहा है। समाज में आइसोलेशन आ गया है। बातचीत खत्म होती जा रही है। बातचीत के विषयों में विविधता खत्म हो रही है। इन सबका असर कहानी पर पड़ रहा है। कहानी में से विविधता का कम होना बाई प्राॅडक्ट है, इसके पीछे समाज की चाल है। इसलिए आज के रचनाकार के सामने चुनौतियां ज्यादा हैं, उसे अपने समाज की रंगत को पहचानकर एक साझा चेहरा देखना है। यहां समाज के कई सारे वर्ग बन गए हैं, और उनके दुख -सुख भी अलग-अलग हैं। ऐसे में नए कहानीकार को यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि कहानी अपने समय का प्रतिनिधि बयान बने।

प्रश्न: कहानी हर समय की केंद्रीय विधा रही है, तो क्या कहानी आज पिछड़ रही है?

महेश जी:
मेरे कथन से कई लोग नाराज भी होंगे, लेकिन यह सच है कि साहित्य की केंद्रीय विधा हमेशा कविता रही है, लेकिन वह कविता जिसमें कहानी हो। भृतहरि ने कहा है- जिसके पास अच्छी कविता है, उसके लिए राज्य भी कुछ नहीं। तो यह कविता का विश्व है। केंद्र में कविता है, मानव इतिहास के।

प्रश्न: उपन्यास या कहें, बड़े कथ्य और विशाल रचना फ्रेम की कमी आप हिंदी में महसूस करते हैं क्या?

महेश जी:
यह सिर्फ हिंदी में ही नहीं है। मैं भारतीय भाषा के नजरिय से इसे देखता हूं। बांग्ला में भी यह संकट है। गुजराती, कन्नड़, असमिया, मराठी में बड़े उपन्यास आने की आवृति कम हुई है। हिंदी में इधर मैत्रीय पुष्पा, चित्रा मुद्गिल आदि के उपन्यास आए हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि नए रचनाकर वृहत समाज को सामने लाने वाले उपन्यासों को पाठकों के सामने लाएंगे। इसके आपके पिछले प्रश्न से जोड़कर देखें तो शायद तकनीक की जल्दबाजी में वह समय और धैर्य नया रचनाकार हासिल नहीं कर पा रहा है, जो उपन्यास के फलक के लिए जरूरी है।

प्रश्न: इधर के दिनों पर इंटरनेट पर रचनात्मक साहित्य नए ढंग से सामने आया है, आप इसे कैसे देखते हैं?

महेश जी:
साहित्य समाज के लिए जो काम करता है, उसका तुरंत परिणाम नहीं आता। कला की मुश्किल यही है, कि वह धीमे काम करती है। तकनीक के साथ जल्दबाज लोगों की संगत है, जो इंटरनेट से बैठती है। यहां तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है। यह संतुष्टि भी देता है, लेकिन बड़े साहित्यिक बदलाव की नींव इससे पड़ेगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

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