August 27, 2008

ये किसके पसीने की हरियाली है भेल में

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रॉय साहब ने भेल में पांच दशक गुजारे हैं। साकेत नगर से भेल कारखाने के बीच के हर हिस्से की बारीकियों को देखने वाली उनकी 75 वषीüय आंखें फिलवक्त नम हैं। उनके हाथों में खबरों का एक पुलंदा है, जिसमें जिक्र है कि दो तिमाहियों से बिक्री में लगातार दबाव झेल रही भेल की जून तिमाही में बिक्री 34 फीसदी ज्यादा रही। साथ ही वे पढ़ चुके हैं कि कंपनी की सालाना आधार पर बिक्री 4329 करोड़ रुपए के स्तर तक पहुंच गई है। ऑपरेटिंग प्रॉफिट में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी, शुद्ध लाभ में 30 फीसदी का इजाफा और ऑर्डर बुकिंग में 28 फीसदी की बढ़त की खबरें उनकी आंखों में छाई उदासी को कम नहीं कर पातीं और कंपनी का 95 हजार करोड़ का बैकलाग भी उनके चेहरे पर चमक के रूप में दिखाई नहीं देता।बता दूं कि अभी पांच बरस पहले तक वे इन्हीं खबरों को सुनाते हुए तन जाते थे। भोपाल की पहचान में शुमार भेल के बारे में एक अच्छी खबर उन्हें जवान कर देती थी और स्टील की बढ़ती कीमत या योजनाओं में चल रही देरी उनकी हंसी रोक देती थी। संभव था कि फिलवक्त भी योजनाओं में चल रही 15 महीने की देरी उन्हें परेशान किए हो, लेकिन ऐसा था नहीं- अब रॉय साहब को खबरें न तो तंग करती हैं, न उनका रंग बदलती हैं। अब वे पिछले दिनों को याद करते हैं। साकेत नगर 2-सी के आखिरी कोने पर गोपाल साहू के मकान के बाद फैले मैदान में घूमते हुए वे अपनी उम्र के साथियों से उस दौर की बात करते हैं, जब लालघाटी और करौंद से आनेवाली बड़ी-बड़ी मशीनों ने इस इलाके की रंगत बदली थी। नेहरू का समाजवादी स्वप्न पूरा किया जा रहा था। जो अब भी उस दौर की आखिरी हरियाली के तौर पर डटा है। वे बताते हैं, `यह जो भेल का हरापन है न, इसमें पसीना मिला है। जानते ही हैं किसका।´

August 23, 2008

पुरखों के घर, घरों के सपने और सपनों की लय

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वह नए साल के पहले महीने के आखिरी हफ्ते की एक सर्द शाम थी। सूरज ढलान पर था और उसे थोड़ी देर में सोने जाना था। इस वक्त हम बड़ी झील के किनारे की तरफ से श्यामला हिल की ऊंचाई नाप रहे थे। यह सोचते हुए कि दो सौ साल पहले यहां आकर रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोग हमारी आमद का बुरा न मान जाएं। हमारी दिलचस्पी पहाड़ी की उन गुफाओं में थी, जिनमें यहां के पहले बाशिंदों ने अपना जीवन शैलचित्र के रूप में पत्थरों पर उकेरा था। साथ ही हम देखना चाहते थे कि पुरखे किन घरों में सपने बुनते थे। अब इन शानदार कला नमूनों के हिस्सों को 30 वर्षीय मानव संग्रहालय बचा-बढ़ा रहा है। सो कह सकते हैं कि हम इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय जा रहे थे। श्यामला हिल की पहचान बन चुका मानव संग्रहालय अपनी पैदाइश के बारे में ज्यादा नहीं जानता, लेकिन 5 जून 1978 के बाद का एक-एक दिन उसकी हवा में तैर रहा है। सन् 1970 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस संघ और 1972 में मानव विज्ञान संघ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से वन्य संपदा, संस्कृति और मानव इतिहास को बचाने, बताने और बढ़ाने के लिए इस संग्रहालय की स्थापना की अपील की थी। सन् 1972 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर कई नई परियोजनाओं पर विचार किया जा रहा था और मामला आगे बढ़ा। शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय को श्यामला हिल्स का सवे की जिम्मेदारी दी गई। 1976 में सर्वे की रिपोर्ट आई और सन् 77 में 197 एकड़ क्षेत्र को मानव संग्रहालय बनाने के निर्देश दिए गए, जो पांच जून 1978 को अपनी समूची परिकल्पना के साथ सामने आया। इस वक्त हम तमिलनाडु से लेकर असोम तक के आदिवासी समुदायों की जीवनशैली को बताने वाले घरों के बीच थे। हवा में नमी थी और सर्द झोंके पूरी शरीर को कांटेदार बना रहे थे। टोडा समुदाय के घर में घुसने के लिए हम घुटनों के बल थे। इस घर के बाहर जूते उतारने के लिए कोई तख्ती नहीं लगी थी, इसके बावजूद हम नंगे पांव थे- आदिवासी परंपरा की दहलीज पर एक अंजान हाथ ने हमारे जूते उतार दिये थे। यह सुबूत था कि यहां आदिवासी जनजीवन को महसूस किया जा सकता है। पेड़, मिट्टी और घास के इस चमत्कृत कर देने वाले माहौल में एके तिवारी हमारी जिज्ञासाएं शांत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि यहां देश के हर हिस्से के आदिवासी समुदायों के घरों की देखभाल उन्हीं के वंशज करते हैं। इस वक्त हम बीथी संकुल की ओर बढ़ रहे थे। लाइब्रेरी और प्रशासनिक इमारत दायीं ओर पीछे छूट चुकी थीं और भरे पैरों से हम बीथी-मिथक संकुल के सहारे सैकड़ों साल पीछे लौट रहे थे।

August 22, 2008

न्यू मार्केट : एन ओल्ड सरप्राइज

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न्यू मार्केट के नाम से जुड़े पहले हिस्से से खासी गफलत हो जाती है। अव्वल तो यह उतना नया नहीं है, जितना दिखाई देता है। इसका चेहरा हर तरफ से देख लीजिए। रोशनपुरा से या रंगमहल से या फिर टीन शेड की तरफ से। इसकी गलियों में घूम लीजिए। मजाल है कि अपना पुराना चेहरा जरा भी नुमायां कर दे।
न्यू मार्केट के पुरानेपन को देखने के लिए जरा-सा पीछे चलना होगा। पांचवें दशक की शुरुआत तक। ये वो वक्त था जब रोशनपुरा चौराहा यानी तब का रोशनपुरा नाका भोपाल की आखिरी हद हुआ करता था। ठीक उसी तरह जैसे रायसेन नाका भोगदा पुल पर था और जिंसी चौराहा हुआ करता था औबेदुल्लागंज नाका। और इस तरफ आएं तो लालघाटी के बाद सीहोर-इंदौर नाका था और डीआईजी बंगले से पहले बैरसिया नाका। ये हदबंदी 47 के बाद की भोपाल कमिश्नरी की थी। तब रोशनपुरा नाके की ओर से जलाऊ लकडि़यों से भरी गाडि़यां आती थीं और इमारती लकड़ी के ट्रक- बढ़ते शहर की खुराक बनने के लिए। नाके के बाद ही जंगल शुरू हो जाता था, जिसमें शेर भी पाए जाते थे। नवाब यहां शिकार के लिए आते थे। माता मंदिर से आगे चले जाइये मौलाना आजाद इंजीनियरिंग कॉलेज के नीचे की तरफ जो मुर्गीखाना है उसके पास नवाबी शिकारगाह के कुछ हिस्से मिल जाएंगे। और अगर गौर से सुनेंगे तो `बोदा बंधे है हुजूर का.....´ गीत की कुछ पंक्तियां भी कानों में पड़ जाएंगी। शेर जंगल में बसे लोगों पर हमले करने लगे। इसी दौरान नवाब सिकंदर जहां बेगम को आदमखोर शेर मारने पर 5 रुपए ईनाम की घोषणा करनी पड़ी और बाद में शाहजहां बेगम के जमाने में ईनाम की रकम बढ़ाकर 20 रुपए कर दी गई। बाद में नवाबों ने शिकार बंद कर दिया. यह हमीदुल्ला खां के जमाने में हुआ.
भोपाल का मध्यप्रदेश की राजधानी बनना भी न्यू मार्केट के साथ जुड़ा अहम वाकया है। राजधानी की घोषणा होने के बाद पॉलिटेक्निक चौराहे से शहर ने बढ़ना शुरू किया। बंगले बने, कई भवन बने और बसने लगा टीटी नगर। बल्लभ भवन अरेरा हिल पर बनी पहली इमारत थी और इसके बाद बिड़ला मंदिर और उसका म्यूजियम भोपाल के हिस्से बने।
लब्बो-लुबाब यह कि मियां नाम की ताजगी से गाफिल न हो जाइयेगा। यहां का नयापन तो उस माहौल का है, जो हर रोज आपके पहुंचने से ताजा हुआ करता है।

August 19, 2008

गौर से देखोगे तो बोल उठेगा गौहर महल

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आज लिखा नहीं जा रहा। बुजुर्गों की डांट के बाद उंगलियां यूं भी कांपती ही हैं। हुआ यूं कि कल शाम बेसबब टहलते हुए वीआईपी रोड के सिरे पर माजी साहिबा की मस्जिद के पास चचा जान टकरा गए। मेरा हाथ आदाब के लिए उठा ही था कि वे फट पड़े- `अमां खां क्या अंट शंट लिखते रहते हो। न शऊर आया न तौफीक। कोई और काम-धाम क्यों नहीं करते? सुबेरे-सुबेरे मन खट्टा कर देते हो। मन करता है, तुमको दो सपाटे मारें, कि सारी अखबारनवीसी झटके में बाहर आ जाए।´ चचा के ऐसे मूड में उन्हें जवाब देना मुनासिब नहीं, सो मैंने चुप्पी ओढ़ ली। उनकी डांट का मतलब था कि आज इतिहास के किसी पन्ने से वे गर्द झाड़ेंगे और चमकाकर सामने रख देंगे। ताकि सब कुछ साफ-साफ नुमायां हो जाए। हम गौहर महल की ओर बढ़ गए।
मैंने बात वहीं से शुरू की। `चचा, ये गौहर महल बेगम कुदसिया ने बनवाया था।´ चचा ने तमतमाई नजरों से मेरी तरफ देखा और बोले, `पहले तो दिमाग का जाला साफ कर लो। बेगम कुदसिया का असली नाम था गौहर आरा बेगम उनके पिता गौस मोहम्मद खान ने कुदसिया खिताब दिया और नाम हो गया नवाब गौहर बेगम कुदसिया। और ये जो गौहर महल है, इसकी नींव डाली थी दोस्त मोहम्मद खान के बेटे यार मोहम्मद खान ने। दीगर वजुहात से उस वक्त इमारत न बन सकी और बाद में बेगम कुदसिया, जिनका तारीखी नाम मेहर-ए-तमसील था, ने इसे तामीर कराया।´
चचा अब रौ में थे। वे बोलते रहे। ` सन् 1819 में बेगम कुदसिया ने रियासत का कामकाज संभाला। उस दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी की ताकत बढ़ रही थी। बेगम ने जामा मस्जिद तामीर करवाई। इकबाल मैदान की कुदसिया मस्जिद भी इसी दौर में बनी और रेलवे स्टेशन बनवाने के लिए भी बेगम ने बड़ी राशि दान की। ज्यूडिशयल कोर्ट की स्थापना और पुलिस पोस्ट का निर्माण भी उसी तारीख के वाकये हैं।´
चचा एक जगह नहीं बैठते। वे चलते जा रहे थे और बोल रहे थे। अब हम गौहर महल की पहली मंजिल पर थे। मेरी जिज्ञासा यहां कमरे की छत में लगे कांच में थी। चचा समझ गए, बोले- कमरा ठंडा रखने के लिए ये कांच खासतौर पर बेल्जियम से मंगवाए गए थे। बेगम चाहती थीं कि सूरज की रोशनी तो कमरे में आए लेकिन गर्मी न आए। तब ये कांच की छत बनवाई गई।
कुछ देर चचा चुप रहे। खांसी का दौर था। वह गुजरा तो मेरी तरफ देखते हुए बोले-`यूं दीदे फाड़-फाड़ के न देखो। इतनी जल्दी नहीं मरेंगे।´ फिर बोले- `सोचते होगे कुदसिया बेगम का यही कारनामा सबसे बड़ा है। पढ़ना तो छोड़ ही दिए हो। अख्तर साहब की किताब `द रॉयल जर्नी ऑफ भोपाल´ ही देख लेते, तो पता चलता कि उन्होंने मक्का और मदीना में भोपाल के हाजियों के लिए दो इमारतें खरीदी थीं। किताब में `रूबात-ए-भोपाल´ के नाम से जानी जाने वाली इन इमारतों के फोटो भी हैं। जाने किस हिम्मत को दिल में भींचकर खींची होंगी उनने वो तस्वीरें।´ फिर चचा देर तक बोलते रहे। नवाबी दौर के कई राज खोलते रहे। हम बाबे सिकंदरी दरवाजे के पास थे। मोती महल, शौकत महल की तरफ सदर मंजिल दिखाई दे रही थी यहां से। हमारे पास से 1840 का दौर गुजर रहा था। दरवाजे से परी घाट की ओर ताकती औरतों की बतकही की आवाजें आ रही थीं। मैं चचा के साथ हमीदिया की तरफ बढ़ लिया।

August 18, 2008

लाल मिट्टी कहती है सतरंगा इतिहास

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छोटी झील से रोशनपुरा की ओर जाओ तो पुराना भोपाल अलविदा की शक्ल में हाथ हिलाने लगता है। पुराने भोपाल से लौटते हुए पीएचक्यू के बाद ये शहर सुस्ताता है। परेड ग्राउंड में, जिसकी मिट्टी में नवाबी दौर में हुई फौजी परेडों की खटखटाहट महसूस की जा सकती है। रियासतकालीन पल्टनों की की परेड के लिए तैयार किए गए इस ग्राउंड से नवाब जहांगीर मोहम्मद खान का रिश्ता रहा है। जब उन्होंने जहांगीराबाद बसाया, उसी समय अरेरा हिल के नीचे की तरफ पीएचक्यू की इमारत तामीर करवाई और पीएचक्यू के करीब यह मैदान। चूंकि मैदान में परेड होती थी, सो इसे परेड ग्राउंड कहा जाने लगा और मिट्टी की सुर्खी ने नाम के साथ लाल रंग को जोड़ दिया। नवाबी दौर से लेकर ब्रिटिश राज के खात्मे और उसके बाद भोपाल की तहजीब को करीब से देखने वाले लाल परेड ग्राउंड ने देश के कई रहनुमाओं, शायरों और अदीबों को सुना है, अपनी पूरी समझदारी के साथ। सन् 1952 में जवाहरलाल नेहरू भोपाल आए, तो उन्होंने यहीं से भोपाल से गुफ्तगू की और बाद में इंदिरा गांधी ने परेड ग्राउंड में ही कहा था कि, `पहले भोपाल में असली अंडा मिलता था, अब तो यहां के अंडे भी नकली हो गए हैं।´
लाल परेड ग्राउंड पर कई यादगार मुशायरे, जलसे और राजनीतिक सभाएं हुईं हैं। 1977 का मशहूर भारत-पाक मुशायरा इसी ग्राउंड पर हुआ, जिसमें दोनों देशों के नामचीन और पाये के शायरों ने शिरकत की। इनमें दो नामों का जिक्र खास तौर पर लोग करते हैं- अहमद फराज और सागर आजमी। उसी मुशायरे में सागर आजमी के एक शे´र के बारे में कहा जाता है कि सुनने वालों ने लगातार 45 मिनट तालियां बजायी थीं। शे´र था -
फूलों से बदन उनके, कांटे हैं जबानों में।
आहिस्ता जरा चलिए शीशे के मकानों में।
फिलहाल इस ग्राउंड की व्यवस्था का जिम्मा पुलिस प्रशासन के पास है, जो पीएचक्यू से ग्राउंड पर नजर रखता है। अब पता नहीं प्रशासन पीएचक्यू के पीछे ही सो रहे नवाब जहांगीर मोहम्मद खान से इस बारे कितनी सलाह लेता है।

August 14, 2008

जवां है बड़ी झील

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मिशन भोपाल- 3
बडी झील अंतिम किस्त
कमला पार्क से बड़ी झील की ओर जाओ, दस बार जाओ। हर बार बड़ी झील हमारी शक्ल भूल जाती है। तो क्या बड़ी झील बूढ़ी हो गई है और इसकी आंखों में मोतियाबिंद उतर आया है? बड़ी झील से पूछो तो वह उम्र नहीं बताती। इस गफलत में न रहिए कि सबेरे-सबेरे चलने वाली हवा इसके बदन पर झुर्रियां दे जाती है, इसलिए यह उम्रदराज हो गई— लहरों की शक्ल में। उम्रदराज तो अपनी बड़ी आपा भी हैं और वे कैसे गा-गाकर बताती हैं कि `मेरी उमर हो गई बचपन पार, लाड़ो ब्याह दो छोड़ घर चार...।´

बड़ी झील ने खुद को राजा भोज के भोजकुंड से जोड़कर अपनी उम्र में हजार साल यूं ही कम कर लिए। असल में राजा भोज का जो भोज कुंड है वह तो भीमबैठका से लेकर औबेदुल्लागंज और बरखेड़ी से लेकर मंडीदीप तक की पहाडि़यों तक फैला हुआ है। आप जानते ही हैं कि इन कस्बों के बीच की दूरी उतनी ही है जो राजा भोज के कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए बनवाए गए कुंड की थी- यानी 16.8 किलोमीटर। असल में राजा भोज को यह बताया गया था कि उन्हें जो कुष्ठ रोग हुआ था, वह 12 नदियों और 99 नालों के पानी से बनने वाले जलकुंड में नहाने के बाद ठीक होना था।
यह आपकी उस संन्यासी की कहानी से मेल नहीं खाता जिसमें 365 नाले हैं। लेकिन है सच यही कि राजा भोज का दायां हाथ सेनापति कल्याण सिंह 12 नदियों और 99 नालों का पानी जुटाने की टोह में था। यह वही कल्याण सिंह है, जिसे आप कालिया कहते हैं और जिसकी बनाई एक नहर को एक अरसे तक कालिया की सोत कहा जाता रहा। तो मसला कुछ यूं है मियां कि कल्याण सिंह ने भीमबैठका से लेकर औबेदुल्लागंज के बीच 11 नदियां तो खोज लीं, लेकिन जिंसी चौराहे पर, जो तब का औबेदुल्लागंज नाका हुआ करता था, बैठा वह सोच रहा था कि राजा की बीमारी ठीक कैसे हो। तब एक दरवेश ने उसे बताया कि अगर बड़ी झील से एक नाला बनाकर भोज कुंड में मिला दिया जाए तो भोज कुंड पूरा यानी 12 नदियों का हो जाएगा, और 99 नाले लाना तो कोई बड़ा काम है नहीं। सो बनी कलिया की सोत, जिसे भदभदा से होते हुए भोज कुंड से मिलाया गया। ये तो हुआ इतिहास। अब सुनिए असल बात। बड़ी झील का पानी था पुराना। यह आज से हजार साल पहले की बात है और तब बड़ी झील का पानी एक हजार साल का हुआ करता था। मगरमच्छ से लेकर तमाम तरह के घडि़याल यहां हुआ करते थे और वे इस सोच से बेजार थे कि उनका एक हिस्सा, यानी पानी, किसी राजा की बीमारी ठीक करने के लिए किसी दड़बेनुमा कुंड में मिलाया जा रहा है। उसी वक्त पानी ने जो बगावत की, वो है अपनी छोटी झील। बगावत का कुछ सिरा मोतिया तालाब से लेकर नूरमहल तक बिखरा और यह नाइंसाफी इतिहास में दर्ज हो गई। जिसे न कभी लिखा जा सका और न कभी महसूस किया जा सका।
हालांकि बाद में कुंड का पानी बांध तोड़कर बाहर निकला। तब नवाब साहब के कोई विदेशी दोस्त भोजकुंड में नाव चला रहे थे। लहरों ने अपना गुस्सा दिखाया और वह विदेशी मेहमान नाव समेत कुंड की चक्करदार गहराइयों में समा गया। नवाब साहब ने घोषणा की कि किसी भी तरह उनके दोस्त की लाश निकाली जाए। तब हजार फीट और तीन सौ फीट के बांधों को तोड़ा गया। इलाके में बिखरे अलंगे अपनी कहानी आप हैं। बांध टूटा तो पानी का एक रेला भी निकला, जिसने अपनी भीतर छुपाई हुई वनस्पति को भीमबैठका से लेकर औबेदुल्लागंज तक बिखेर दिया। सैकड़ों साल पानी में भीगती रही यह वनस्पति अब हकीमों के काम आती है।
बात यकीनन सच्ची है। जिन्हें शक-शुबहा रहा उन्होंने कई किस्म से ताकीद भी की। आपको यकीन न हो तो झील के बोट क्लब वाले हिस्से से तैरना शुरू कीजिए। ’यादा नहीं, बस गौहर महल के सामने जो परी घाट है न, जहां से बाबे सिकंदरी दिखाई देता है, वहां तक आइए। अगर आप अच्छे तैराक हैं, तो आपको कुल जमा 45 मिनट लगेंगे- अगस्त की हवाओं में। उस पर भी यह जून का झुलसाऊ गर्मी का दौर हुआ तो आप 35 मिनट में परी घाट पर होंगे। यहां थोड़ी-सी तकलीफ जरूर होगी। बस, आपको 1819 के उस दौर से गुजरना होगा जब कुदसिया बेगम ने गौहर महल को बनवाने का जिम्मा लिया था।
बाबे सिकंदरी, जो 1840 से लगातार बड़ी झील की तमतमाई लहरों को किनारों से टकराता देख रहा है, उससे भी पूछ सकते हैं। पहली बार बड़ी झील ने अपनी तकलीफ बाबे सिकंदरी से ही जाहिर की थी। इस जनाना दरवाजे ने अपने पड़ोसी शौकत महल और जरा-सी दूरी पर खड़े बुतनुमा सदर को भी इस हकीकत से अनजान रखा है। हकीकत यह कि बड़ी झील का घटता पानी उसकी खुशी है, क्योंकि बड़ी झील जब-जब अपने राजाई रोग को ठीक करने की कीमियागीरी पर रोई है, उसका पानी बढ़ता गया है- यह उसका खारा पानी था जो आंसुओं से बना था। आधे भोपाल की प्यास में पानी का लौंदा बनकर उतरी बड़ी झील यकीनन सूखे के दिनों में सबसे ज्यादा खुश होती है- उन दिनों इसकी आंखें सूखी होती हैं। आपको यकीन नहीं होगा, लेकिन है सौ फीसदी सच कि अपने भोजकुंडीय इस्तेमाल पर आंसू बहाती बड़ी झील इन दिनों भरी-भरी सी है- जरा चखिए इसका पानी। कही इसमें आंसुओं का नमक तो नहीं।

August 13, 2008

कितने बहाने आते हैं बड़ी झील को

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मिशन भोपाल- 2
बडी झील पार्ट एक
आज छुट्टी का दिन है, तो बड़ी झील चलते हैं। बाहर से कोई दोस्त आया है उसे बड़ी झील घुमा देते हैं। प्रेमिका के साथ वक्त गुजारना है तो बड़ी झील का एकांत, और दोस्तों से गप्पबाजी करनी हो तो सबसे मुफीद जगह ड़ी झील। तो कभी उदासी को पानी में बहाने और कभी मस्ती को बड़ाने के लिए बड़ी झील। कितनी-कितनी तरह से अपने पास बुलाती है यह झील। हर रोज अलग-अलग बहाने ओढ़कर बड़ी झील के किनारों पर टहलते भोपाली हों या किसी और शहर से आएखूबसूरती के मुरीद, सभी के लिए यह 31 वर्गमील में फैली सबसे बड़ी मानवनिमिüत झील एक बेहतरीन दोस्त साबित होती है। बीते एक हजार साल में जितने भी लोग बड़ी झील के पास पहुंचे हैं सबके कानों में इसने अपनी कुछ सच्चाइयां बहा दी हैं। असल में भोपाल की बतोलेबाजी में इस झील का भी बड़ा हिस्सा रहा है। भोपाली गप्पबाजी में झील की रंगत कई बार झलकती है। वैसे भी परमार वंश के राजा भोज का चर्म रोग तो इसमें एक बार नहाकर ही ठीक हो गया था। आपको याद ही होगा कि जब राजा भोज को चर्मरोग हुआ था तो कैसे सारे कामकाज ठप्प पड़ गए थे और पूरी रियासत का एकमात्र काम नए-नए वैद्यों को राजा की तीमारदारी में लगाना रह गया गया था। लेकिन हर कहानी की तरह हमारी कहानी के राजा की बीमार भी वैद्यों के सहारे न तो ठीक होनी थी और न हुई। हर बीमारी का इलाज चूंकि महात्माओं को ही पता होता है। सो राजा भोज को भी एक महात्मा जी ने इलाज बताया। इलाज था, राजा किसी ऐसी जगह नहाए जहां 365 नाले आकर मिलते हों, तो उनका रोग ठीक हो जाएगा। अब पता नहीं महात्मा जी ने जान छुड़ाने के लिए यह उपाय बताया था, या सचमुच उन्होंने साल के दिनों से मिलाकर ये आंकड़ा बताया। जो भी हो राजा को रोग से छुटकारा दिलाना ही था, सो गौंड कमांडर कालिया ने बेतवा नदी के पास झील का निर्माण शुरू कराया, इसमें आसपास की सभी बहती, सूखी और गुमनाम नदियों को मिलाया गया। कई नालों का मुंह झील की ओर मोड़ा गया और 365 की संख्या पूरी होते-होते यह रंग बदलने वाली झील तैयार हो गई। आप जानते ही हैं कि झील की रंगत कभी नीली होती है, तो कभी हरी हो जाती है और कभी यह भूरे रंग का मुलम्मा ओढ़ लेती है। 31 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील के बीच में एक टापू पर बाजार बसाया गया था, जो अब मंडीदीप हो गया है। बाद में इसके आसपास आबादी बसती गई, तो झील ने खुद को समेटना शुरू कर दिया, ताकि लोगों को रहने की जगह मिलती जाए।

August 9, 2008

वहां पत्थर भी गुनगुनाते हैं

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मिशन भोपाल- 1

लिखना अब और भी मुश्किल होता जा रहा है. न वह साफगोई रही और न इम्कानियत कि हर चीज को आंख भर देखकर जुबानभर कह सकूं. डीबी स्टार में मिशन भोपाल के लिए लिखने की बात आई तो हाथ फूल गए और जुबान चिपकने लगी. निजी लेखन तो रियायत के साथ किया जा सकता है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ लिखना मेरे बस का न था. अविनाश जी को कई बार कहा लेकिन जब लगा कि इस पचडे से नहीं बचा जा सकता तो लिखना शुरू किया. पहली किस्त ताजुल मस्जिद पर थी.. मित्रों की उत्साही प्रतिक्रियाओं और बुजुर्गों की तारीफी निगाहों ने हौसला बख्शा और सिलसिला शुरू हुआ. ये पोस्ट भोपाल की उन्हीं कतरनों का हिस्सा. पहला हिस्सा.


पत्थरों की भी जुबान होती है, लेकिन वे बोलते बहुत धीरे हैं। पहली बार हमने दोस्तों के साथ खाली शामों में पत्थरों की खनखनाती आवाज भरी थी, तो जाना था कि सुनने वाले कम होते जाते हैं, तो पत्थर भी चुप्पी ओढ़ लेते हैं। यकीन न आए तो रॉयल मार्केट से ताजमहल की ओर जाते हुए थोड़ा वक्त ताजुल मसाजिद के पत्थरों के साथ गुजार लें। वे खूब बोलते हैं, बस उनसे दोस्ती भर गांठ लें। आठ-दस साल पहले ताजुल मसाजिद के भीतर बायीं ओर फैले मैदान में हम दोस्तों की गप्पबाजी में शरीक हुए ये पत्थर सन् 1868 में सीहोर, रायसेन, विदिशा और मंदसौर के अलग-अलग हिस्से से आए थे। भोपाल की नवाब शाहजहां बेगम का ख्वाब पूरा करने। दुनिया की सबसे बड़ी मसजिद तामीर करने का ख्वाब पूरा करने। 1901 तक आते-आते पैसे की तंगी के कारण ताजुल मसाजिद का निर्माण रुक गया, लेकिन तब तक यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मसजिद का दर्जा पा चुकी थी। हालांकि मोतिया तालाब को भी मसाजिद का हिस्सा मान लो तब यह दुनिया की सबसे बडी मस्जिद है. आखिर वजू की जगह तो मस्जिद का हिस्सा ही हुई न. बीच का जो हिस्सा देख रहे हैं न. ये कभी तीस फीट गहरा हुआ करता था. आजादी के बाद किला टूटना शुरू हुआ तो उस मलबे को ताजुल के इसी हिस्से में भर दिया गया. संगमरमर से बनी अपनी तीन गुंबदों के साथ मुस्कुराते हुए आने वालों का इस्तकबाल करने वाली ताजुल के उत्तरी भाग में जनाना इबादतगाह है। यह बात बीती सदी की शुरुआत में तामीर की गई अन्य मसजिदों से ताजुल को अलग रंग देती है। ताजुल मसजिद के भीतर वक्त गुजार रहे कुछ पत्थरों के यार ढाई सीढ़ी की मसजिद में भी हैं, जो गांधी मेडिकल कॉलेज के कैंपस का हिस्सा हो गई है। दिलचस्प है कि ढाई सीढ़ी की मसजिद एशिया की सबसे छोटी मसजिदों में शुमार की जाती है, पर है ताजुल की बड़ी बहन। तोप लेकर बुर्ज पर किले की निगरानी करने वाले तोपचियों के लिए एक पल भी बुर्ज से कहीं जाने की इजाजत नहीं थी. सो उन्होंने वहीं इबादतगाह बनाना शुरू कर दिया. वे कोई कारीगर तो थे नहीं इसलिए तीन पाए में से दो तो पूरे बन गए लेकिन नाप जोख की कमी के कारण तीसरा पाया आधा ही बन पाया और मस्जिद का नाम हो गया- ढाई सीढी की मस्जिद. ढाई सीढ़ी की मसजिद को भोपाल की सबसे पुरानी यानी सबसे उम्रदराज मसजिद होने का रुतबा भी हासिल है। हालांकि ताजुल और ढाई सीढ़ी में कभी बड़प्पन-छुटपन जैसी बात नहीं रही। दोनों ही बहनों ने अपने अतीत से खुद कुछ यूं जोड़ रखा है कि ताजुल से मिलो और ढाई सीढ़ी के पास न जाओ तो ताजुल को खराब लगता है और ढाई सीढ़ी से ताजुल की बात न करो तो वह बुरा मान जाती हैं। अब ताजुल कुछ उदास भी रहती है। हर साल लगने वाले तीन दिनी इज्तिमा के दौरान यहां रौनक हुआ करती थी, लेकिन जगह की तंगी को देखते हुए अब इज्तिमा ने गाजीपुरा की ओर रुख कर लिया है। इसी बीच अब रहमान चचा, जो दायीं ओर तालाब के कनारे चाय की गुमठी लगाते थे, न जाने कहां चले गए, बस बचे हैं तो वे पत्थर जिन्होंने बोलना कुछ कम कर दिया है-सुनने वाले जो नहीं रहे।