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Showing posts from July, 2010

दुबे जी, हम करेंगे आपके सपने पूरे

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(दुबे जी को प्यार करने वालों का दायरा बेहद बडा था। जिन जिन को सूचना मिली उन्होंने एक साथी का जाना बताया। वे एक बार जिससे मिलते थे उसे अपना मुरीद बना लेते थे। दुबे जी की उम्र के बारे में उनसे मिलकर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था था। अभी अभी आनंद जी ने बताया कि उनकी जन्मतिथि 7 अक्टूबर 1931 है। इस अक्टूबर में दुबे जी का 79वां जन्मदिन होगा। आप कुछ सोच रहे हैं क्या? खैर। भाई राकेश मालवीय की यादों से भी दुबे जी का मजबूत इरादों वाला चेहरा झांकता है।)

- राकेश मालवीय
दुबे जी ने कहा था आप लोग शुरू करो, दिल्ली से हर संभव मदद दिलाने का मैं वायदा करता हूं। अफसोस उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते इससे पहले ही वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात, हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह, और सम्मान को समझा जा सकता था। आज सुबह यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था। हम सभी के लिए यह एक गहरा आघात था। केवल एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, मीडिया के बदलते परिवेश में वह उन चंद लोगों में थे जो अब भी अखबारनवीसों की ताकत को एकजुट होने की बात कहते थे, मीडिया में बदलाव की बात क…

"महानता" के बीच इंसानी हुनर की अनदेखी

क्रिकेट। क्रिकेट। क्रिकेट। और क्रिकेट। ये पहला शतक, वो 48वां, अब सौ पूरे होंगे। फिर कौन तोड़ेगा रिर्काड। खबरों की भरमार। जब तक क्रिकेट जीवित है। भारतीय चैनलों और अखबारी दुनिया में न खबरों की कमी है। न खबर के एंगल की। भारतीय खेलों का पर्याय बन चुके इस एक खेल ने जहां रगों में उत्तेजना भरने और सांस रोक देने वाले क्षण मुहैया कराये हैं, वहीं बाकी खेलों के लिए अंधेरे की एक सुरंग बना दी है। जहां से जब तब निकलकर कुछ नाम तो सामने आते हैं, लेकिन खेलों का वह जादू नहीं दिखता, जहां सब बराबर हो। पैसे और शोहरत के बीच जीते क्रिकेटरों की कामयाबी रोमांच पैदा करती है, लेकिन अन्य खेलों के आला दर्जे के खिलाड़ी बदहाल और गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं।

एकरसता और अति हर चीज की बुरी होती है और भारतीय खेलों के साथ इन दिनों यह अति बेहद तीखे अंदाज में हो रही है। बीती सदी के आखिरी दशक में जब सब कुछ बिकने लगा तो भारत खेलों के खरीदार भी सामने आये। हॉकी की दुर्दशा और अन्य खेलों में कोई बड़ी उपलब्धि न होने के कारण बाजार की नजर क्रिकेट पर पड़ी। कपिल देव की जांबाज टीम ने कैरबियन तूफान को थामकर उम्मीदों को आसमान…

एक इंसान का जाना उर्फ दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे

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मौतहमारेलिएखबरहोतीहै।कईबारतोमौतहीहमारेलिएखबरहोतीहै।दुबेजीकेसाथभीयहीहुआ। कृष्णन दुबे जीकेसाथ।दुबेजीअबनहींरहे।इसकेपहलेकेकुछदिनोंमेंवेक्यासोचरहेथे? दुनियाकोकिसढंगसेदेखरहेथे? कितनेउदासथेऔरकितनेऊर्जावानइसकीकोईखबरनहींहै।बीतेपांचसालोंमेंउनसेकमहीमुलाकातेंहुई, लेकिनवेहरबारऊर्जाऔरअपनत्वसेभरेहुएमिले।उनकानरहनाअपूरणीयक्षतिनहींहै, क्योंकिवेमहाननहींथे।इंसानथे।गलतियोंसेसीखनेवालेऔरहरसमयनयेनयेसपनोंमेंरंगभरनेवालेइंसान।वेकहतेथे- हरकोईपत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियरहोनाचाहताहै, लेकिनइसकेलिएजरूरीशर्तइंसानहोनाहै।यहशर्तदुबेजीपूरीकरतेथे।वेभरपूरइंसानथे।सुखमेंहंसनेऔरदुखमेंरोनेवालेइंसान।

पहली मुलाकात रांची में हुई थी। पब्लिक एजेंडा मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीन स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप…

समानता

वह 47 के पहले था
कि दूर देश से आये दुर्दांत हत्यारों ने
कंपनी में भरती किये जवान
इसी देश के
और थमा दिये उन्हें कारतूस बंदूकों समेत, जिनमें थीं संगीनें
बंदूकों के निशाने पर थे
इसी देश के आमजन
जो कराह रहे थे कंपनी राज में

यह 2010 है
जहां-जहां थी कंपनी वहां-वहां है केंद्र
बाकी सब जस का तस
और अपने ही खिलाफ हम
(नारायणपुर में माओवादी हमले में मारे गये जवानों और हर रोज मर रहे लाखों लोगों को समर्पित)