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Showing posts from November, 2010

मां को याद करते हुए

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भाई अरविंद शेषके लिए
मैंअमूमनमांकोयादनहींकरता।भावुकहोजानायूंभीकोईबहुतअच्छीबातनहींहैं।राजेशजोशीअपनीप्लम्बरवालीकवितामेंजिन 'जानकारीवालीखूबियों' कीबातकरतेहैं, उन्हेंमैंनेइसीअंदाजमेंसीखाथाकिहमेंबुरेलोगोंकोज्यादायादकरनाचाहिए।ताकिखुदकेभलेहोनेकाभ्रमबड़ाहोतारहे।हममध्यवर्गीय 'कमाऊलोग' शायदइसीलिएप्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, गैसवाले, रिक्शेवाले, ऑटोवाले, धोबी, गार्ड, फुटपाथीदुकानदारऔरऑफिसमेंएकआवाजपरपानीलानेवालोंकोअपनीदोस्तीकीलिस्टमेंशामिलनहींकरते।
मां को याद करने में अच्छेपन का भ्रम और बेहद छोटे होने की सचाई जिस शक्ल में आती है, वह बहुत कुछ तोड़ भी देती है। हमारी मांएं जितनी मजबूत हैं, हम उतने मजबूत कभी नहीं होंगे। जिन तीन स्त्री-खंबों (मां, बहन, पत्नी) से हमारी अच्छाइयां बनी होती हैं, वहां ज्यादा नहीं जाना चाहिए। दरकने का डर बना रहता है। फिलवक्त कुछ मजबूती के साथ ये दरकती हुई पंक्तियां।


मांएंएकजैसीहोतीहैं
भीतरसे
औरबेटे....
बाहरसे
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मांनेआवाजदी
चूल्हेसेउठतीभापमेंखांसतेहुए
हमदौड़पड़ेबिनचप्पलोंके
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हाथधोनासिखायामांने
आटागूंधतेदुलारा
तोहाथझटकदियामांका
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बच्चोंको…

तकते रहें बारिश को, जज्ब हो जाने तक

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बारिशकिसीकेभीलिएएकरोमांटिकयादहोसकतीहै।बारिशकेसाथकईअनुभवजुड़ेहोतेहैं।अच्छेऔरबुरे।यकीननहमदोनोंहीयादोंपरमुस्कुरातेहैंऔरअपनेभीतरकुछनमीमहसूसकतेहैं।मैंजबअभीखिड़कीसेइसठंडकीपहलीबारिशकोदेखरहाहूंतोबचपनकीबारिशभीयादकररहाहूं।बचपनकीबारिशमेंमिट्टीकीसोंधीमहकभीहोतीहै।घरवालोंसेनजरबचाकरगलीमेंबारिशकेपानीमेंपैरपटकनेकेदौरानकीचड़सेसनेहुएशरीरबारिशकेशोकेसकासबसेरंगीनचित्रहै।उसीजगहजहांहमकीचड़सेसनेखड़ेहुएहैं, जानाएकयादगारअनुभवहोगा।होसकताहैहमज्यादाहीसंवेदनशीलहोंतोउसगलीमें, जोअबतककांक्रीटकीमजबूतीहासिलकरचुकीहोगी, काफीदेरतकखंभेसेटिकेहुएखड़ेरहें।औरदिलचस्पयहभीकिउसीसमयबारिशआजाएऔरहमभींगकरछप्परकीओटलेलें।इतनेमेंहीकोईबच्चाकूदताहुआगलीकेमुहानेसेनिकलेऔरसर्रसेगायबहोजाए।होनेकोकुछभीहोसकताहै, लेकिनकिसीपुरानीजगहकीयादभलेताजाहो, वहजगहहमेंनहींमिलेगी।गुजरतेवक्तमेंहरजगहबदलतीहै।लोगभीऔरउनकेसाथवहांकीहवाऔरबारिशभी।यानी जो इस वक्त घट रहा है वह इसके बाद कभी वापस नहीं आयेगा। यह जो गुजर जाएगा, वह किसी ब्लैक होल में जमा होगा। हमारा दिमाग में इसकी एक याद तो रहेगी, लेकिन वह भी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की पुरानी रील की तरह। जिसमें कई जगहों पर धब्बे ह…

क्यों लिखें हम सकारात्मक खबरें?

बराक ओबामा चले गये हैं। दो दिन तक हम पागलों की तरह उनकी एक-एक हरकत पर डोलते रहे। कैमरे के फ्लैश और न्यूज रूम के दिमाग तेजी से चलते रहे। ऊपरी तौर पर देखें तो हर एंगल से खबरें परोसी गईं। ओबामा की ताकत से लेकर कार और उनके दल में आये लोगों की खासियतों से लेकर वे कहां कहां गये, जायेंगे और यहां तक की मिशेल की खरीदारी भी बच न सकी, 'खोजी' नजरों से।

सुर्खियों में राखी सावंत आईं, इधर सुदर्शन ने भी अपने विवादास्पद बयान से पहले पेज पर जगह पाई और उधर महाराष्ट्र में पृथ्वीराज की ताजपोशी भी कई जगह ब्रेकिंग रही। इसी बीच सचिन के 50वें टेस्ट शतक का इंतजार भी होता रहा। हैदराबाद पर निगाहें जमी थीं लेकिन हरभजन लीड ले उडे। अब राजा सुर्खियों में हैं। यह मसला कुछ दिन खिंचेगा। इधर कल लक्ष्मी नगर में बिल्डिंग गिरी। दिल्ली का मलबा सब पर भारी होता है। सो बस यही चला।

मगर मैं दूसरी जगह अटका हूं। दीवाली बीत चुकी है और इस दीवाली पर 'सकारात्मक खबर' का भूत फिर न्यूजरूमों में फैला रहा। अभी कल राखी सावंत के इंसाफ को कठघरे में रखने वाले वक्ता भी सकारात्मक खबरों की वकालत करते रहे थे। आखिर हमसे सका…