December 9, 2008

अजनबी शहर में पहला दिन : कुछ बेतरतीब जुमले

यह एक अलसाई शाम हैं
हल्की सर्दी और भारी गर्मी से भरी
जब मैं एक अजनबी शहर में खुद को शामिल कर रहा हूं
बिना इस शहर की इजाजत के

यह पहली बार है कि किसी शहर के अपनी तरह के अनूठे जीवन में प्रवेश करते हुए
मुझे ख्याल आया है कि जरूरी है शहरों से पूछना
क्या मैं आपको देख सकता हूं
या कि क्या मैं आपकी गलियों में घूम सकता हूं अपनी अजनबीयत के साथ

भीतर बैठा शातिर कहता है
अच्छा ही हुआ धडधडाते हुए चले आए
मना कर देता तो नाहक उल्टे पांव लौटना पडता
या फिर बेकार की बकझक करनी होती

अजीब है कि हम शहरों में घुसे चले जाते हैं बिना यह सोचे कि
वे उस समय उदास हैं, या किसी मौज में बहे जा रहे हैं या फिर अपने अकेलेपन में गुनगुना रहे हो कोई पुरानी लय
ठीक उसी वक्त को उस शहर का सबसे जरूरी चेहरा मानकर हम उसके बारे में राय बनाते हैं
जो अपने तमाम प्यारे प्यारे अनुभवों के बावजूद नहीं जाती
चिपककर बैठी रहती है हर देखे गए शहर के साथ

होने को क्या नहीं हो सकता
अब शहर हैं तो उसका दिल भी होगा जो कहीं न कहीं धडकता होगा
उदाहरण से बात करें तो मुंबई को ही देखो
जब धडकता है उसका दिल तो देश के किसी भी कोने में सुनी जा सकती हैं आवाज
हालांकि मुंबई ने अपने प्रिय दोस्त कोलकाता से चेन्नई के साथ एक रात गप्पबाजी में कहा था कि उसका दिल हमेशा दिल्ली के लिए धडकता है
इतना कहकर मुंबई के चेहरे पर उदासी छा गई. जिसमें अरब सागर का खारापन था. फिर उस रात तीनों दोस्त देर तक बातें करते रहे
आप माने या न मानें कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि उसी रात के बाद मुंबई के आंसू सूखे नहीं है अब उस रात बहे आंसुओं को हम अरब सागर कहते हैं और ठीक उसी वक्त ढांढस बंधाने के दौरान गीली हुई कोलकाता और चेन्नई की आंखें बंगाल की खाडी को भर गईं.
अपनी विदेशी सहेलियों और ताकतवर दोस्तों में उलझी दिल्ली तक यह बात न पहुंची न पहुंचाने की कोशिश की गई

अब बात निकल आई है तो जिक्र करना जरूरी है
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई एक जमाने में दोस्त थे
जैसे और दोस्त होते हैं एक दूसरे पर जान छिडकने वाले
धीरे धीरे सबके अपने अपने काम धंधे, व्यापार, रोजगार और जिम्मेदारियों के दरख्त बढते गए और सब एक दूसरे से मिलने जुलने भी कम ही आ पाते हैं
जरूरतें जरूर इन्हें मिलाती हैं लेकिन ये मिलना वैसा नहीं होता जब ये चारों दोस्त अपनी अपनी अलमस्त शरारतों के साथ धमाचौकडी मचाते थे
और इनकी आवाज चांद तक पर सुनी जाती थी

अब आप खुद ही जानते हैं दिल्ली को किस कदर चाहता है मुंबई
और खुद दिल्ली के बारे में कहते हैं उसे जानने वाले
कि दिल्ली के हर कदम में मुंबई की चाल का संगीत होता है

तो फिर ये दिल्ली का दिल पसीजता क्यों नहीं???
पर पसीज गया तो!!!
अरब सागर या बंगाल की खाडी
नहीं दिल्ली तुम दिल कडा किए रहना तुम रोईं तो सबको रुला दोगी!!!!

10 comments:

नीरज गोस्वामी said...

बहुत विलक्षण रचना है...सारे महानगरों का दुःख समेटती हुई...
नीरज

सारिका said...

oh!to janab kalpnaao to taak par rakh kar bhi kavitayen likhte hain.
bahut hi achhi likhi hai.baki ki kavitayen bhi padhna chahungi yadi aap gour farmaye to.....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

महानगरों की बातें करती सच्चाई बताती आपकी लिखी यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी ..

neelima sukhija arora said...

कैसे धड़कता होगा मुंबई का दिल, दिल्ली के लिए। यूं ही हर रात को रोता होगा किसी की चाहत में। चारों दोस्त क्या रात भर यूं ही बैठ कर बातें करते होंगे। क्या मुंबई के दुख में कोलकाता और चेन्नई ने इतने आंसू बहाए कि वहां भी आंसुओं ने दरिया का रूप ले लिया।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

कल ही फोन करता हूँ. :)

रंजीत said...

bahut khoob. Sachin bhai, sukra hai khudda ka ki mere Gawan se koi Gadee Dillee tak nahin jatee.
kahan aur kaise (ho)?
Ranjit

पटिये said...

शहर बोलते तो हमेशा से थे...पर आप जैसा...सुनने वाले नहीं मिला होगा...इससे बेहतर और क्यो होगी किसी शहर की शिनाख्त...लाजवाब लिखते हैं सचिन.....शिफाली

BrijmohanShrivastava said...

दिल्ली ,मुंबई , कोलकाता और चेन्नई किसी ज़माने में दोस्त थे या देल्ही ,बॉम्बे .कलकत्ता और मद्रास दोस्त थे

सचिन .......... said...

शुक्रिया ब्रजमोहन जी
असल में पहले एक लाइन लिखी थी कि
वक्त बीता वक्त के साथ उनका व्यवहार बदला और इसी बीच उनके नाम भी पहले से अलग मिजाज के हो गए, जो उनकी तासीर के कुछ ज्यादा करीब और कुछ बहुत दूर थे

बाद में इसका कोई और तुक नहीं मिला सो हटा दिया

सचिन .......... said...
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