September 21, 2018

दिल्ली—मप्र की सरकारों के बीच के फर्क को बताएगी आम आदमी पार्टी, मुश्किलों पर जनता बोलेगी अब बस


आमतौर पर विरोधी दल जो कैंपेन चला रहा होता है, उससे राजनीतिक पार्टियां दूर रहती हैं, लेकिन विरोधी के ग्राउंड में घुसकर, यानी उसकी जमीन पर ही जाकर उसे पटखनी देना हिम्मत का काम है, और आप की सोशल मीडिया टीम अगर ऐसा कर पाती है, तो यह बधाई के लिए पर्याप्त वजह होगी।
सचिन श्रीवास्तव

सोशल मीडिया कैंपेन की लॉन्चिंग के मौके पर प्रेस को संबोधित करते आप के
प्रदेश अध्यक्ष आलोक अग्रवाल और राष्ट्रीय सोशल मीडिया हेड अरविंद झा।
मध्य प्रदेश के लोकतांत्रिक परिदृश्य में तेजी से अपनी जगह पुख्ता कर रही आम आदमी पार्टी ने शुक्रवार को भाजपा-कांग्रेस से एक कदम आगे निकलते हुए अपने सोशल मीडिया कैंपेन को लॉन्च कर दिया है। इससे पहले प्रत्याशी चयन में भी आम आदमी पार्टी अपने विरोधियों से काफी आगे निकल चुकी है। असल में शुक्रवार को लॉन्च किए गए दो कैंपेन आम आदमी पार्टी की उस छवि को ही पुख्ता करते हैं, जो उसने दिल्ली की ऐतिहासिक जीत और पंजाब में अपने मजबूत प्रदर्शन के जरिये तैयार की है। ध्यान दीजिए कि इन दोनों ही प्रदेशों के चुनाव में सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी ने चुनावी रणनीति को बेहतर ढंग से अंजाम दिया था। मध्य प्रदेश में सरकार सरकार में फर्क होता है और अब बस कैंपेन की लॉन्चिंग के मौके पर राष्ट्रीय आईटी एवं सोशल मीडिया प्रमुख अरविंद झा की मौजूदगी भी गहरे संकेत देती है। यह संकेत मध्य प्रदेश के आगामी दो महीने के राजनीतिक दशा और दिशा को बदलने वाले हो सकते हैं। इसके पीछे एक धारणा तो यही है कि आम आदमी पार्टी जितना जमीन पर चुनाव लड़ती है, उसी अनुपात में सोशल वर्ल्ड में भी अपनी उपस्थिति जताती है। दूसरे, गाहे-बगाहे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आलोक अग्रवाल यह कहते रहे हैं कि पारंपरिक मीडिया से हमें ज्यादा सहयोग की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, और सोशल मीडिया का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना ही होगा। यह कैंपेन इस सोच को जमीन पर उतारने की रणनीति को भी बताते हैं।


पहले से ही मध्य प्रदेश में सोशल मीडिया पर मजबूत है आप
देखा जाए तो आम आदमी पार्टी की यह सोशल मीडिया में रणनीतिक कामयाबी किसी से छुपी नहीं है। मध्य प्रदेश के आधिकारिक पेज पर आप के करीब 2.50 लाख लाइक हैं, जो भाजपा के आसपास और कांग्रेस के एमपी पेज से कोसों आगे हैं। यही नहीं प्रदेश में आप ने इंदौर, भोपाल, जबलपुर आदि महानगरों के अलग-अलग पेज बना रखे हैं, जिन पर 2 से 3 लाख लाइक्स हैं। सीधे तौर पर ही सोशल मीडिया पर पार्टी की आधिकारिक पहुंच 10 लाख से ऊपर है। इसके अलावा हर जिले, विधानसभा और प्रत्याशी के पेजों के समेत यह पहुंच 30 लाख के पार पहुंचती है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के लिए यह खतरे की घंटी साबित हो सकती है। 

आप के कैंपेन में क्या है खास
आम आदमी पार्टी के दोनों हालिया कैंपेन सोशल मीडिया के साथ-साथ जमीन पर डोर-टू-डोर कैंपेन के दौरान जनता तक ले जाए जाएंगे। इस डोर-टू-डोर कैंपेन की शुरुआत 25 सितंबर से होनी है, जिसके लिए खास तौर पर प्रदेश प्रभारी और दिग्गज नेता गोपाल राय दो दिन के लिए भोपाल आए थे। उन्होंने दो दिवसीय प्रत्याशी प्रशिक्षण शिविर में सबसे ज्यादा जोर डोर-टू-डोर कैंपेन पर दिया है। सोशल मीडिया कैंपेन के बारे में आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय आईटी एवं सोशल मीडिया टीम के प्रमुख अरविंद झा कहते हैं कि भाजपा मध्य प्रदेश में बता रही है कि सरकार-सरकार में फर्क होता है, और इसके लिए वह 2003 की कांग्रेस सरकार से अपने 15 साल के कामकाज की तुलना कर रही है। हम भी मानते हैं कि सरकार-सरकार में फर्क होता है, लेकिन असली फर्क क्या होता है, यह हम इस कैंपेन के जरिये बताएंगे और दिल्ली सरकार के महज तीन साल के कामकाज की तुलना शिवराज सरकार के 15 साल से करेंगे। वे आगे कहते हैं- दिलचस्प यह है कि दिल्ली में महज 3 साल में जो काम हुए हैं, वह भाजपा की 15 साल की सरकार पर भारी हैं। 

आप के सोशल मीडिया कैंपेन और मध्य प्रदेश के हालात
असल में आप के यह कैंपेन मध्य प्रदेश के हालात को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं। चूंकि भाजपा खुद सरकार के फर्क पर कैंपेन चला रही है, उसी तर्ज पर आप ने अपना कैंपेन तैयार किया है। आमतौर पर विरोधी दल जो कैंपेन चला रहा होता है, उससे राजनीतिक पार्टियां दूर रहती हैं, लेकिन विरोधी के ग्राउंड में घुसकर, यानी उसकी जमीन पर ही जाकर उसे पटखनी देना हिम्मत का काम है, और आप की सोशल मीडिया टीम अगर ऐसा कर पाती है, तो यह बधाई के लिए पर्याप्त वजह होगी। सरकार-सरकार के फर्क को बताते हुए आम आदमी पार्टी मध्य प्रदेश के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पेंशन, किसानी, बिजली, सुरक्षा आदि 18 मुद्दों पर भाजपा की प्रदेश सरकार को घेरेगी और बदहाली को बताएगी। इसी के दूसरे हिस्से के तौर पर कहा जाएगा कि अब बस, यानी यह सब अब नहीं चलेगा। अब बहुत हुआ- अब बस।

क्या कहते हैं आप नेतामध्य प्रदेश में भाजपा सरकार ने 15 साल में कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे जनता को असल में कोई लाभ हुआ हो। ऐसे में प्रदेश में चारों ओर बदहाली और भ्रष्टाचार और लूट का राज है। इस स्थिति से मध्य प्रदेश की जनता अब निजात चाहती है। इसी भावना को अब बस कैंपेन में बल दिया गया है कि अब ये सब कुछ नहीं चलेगा।
अरविंद झा, राष्ट्रीय आईटी एवं सोशल मीडिया हेड

क्या है सरकार-सरकार में फर्क होता है कैंपेन
इस कैंपेन के तहत 6 वीडियो जारी किए गए हैं। हर वीडियो में तीन मुद्दों को सामने रखा गया है और दिल्ली सरकार के तीन साल के उस क्षेत्र में काम की तुलना मध्य प्रदेश के 15 साल के भाजपा राज से की गई है। वीडियो में ग्राफिक्स, खबरों और फोटोज के साथ तथ्यों को उनके स्रोत के साथ दर्शाया गया है। करीब एक-एक मिनट के यह वीडियो आई कैची हैं और बेहद खूबसूरती से ड्राफ्ट किए गए हैं। 

अब बस कैंपेन में कैसे कर सकते हैं हिस्सेदारी
आम जनता को अब बस का लोगो लगाकर जो भी गलत काम प्रदेश में हो रहा है, जैसे टूटी सड़कें, परेशान किसान, फसल की बर्बादी, बेरोजगारी, कुपोषण, स्वास्थ्य शिक्षा की बदहाली इनकी तस्वीरें खींचकर इन पर आलोक अग्रवाल जी की तस्वीर वाले अब बस के लोगो लगाकर अपने फेसबुक, ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट करना हैं और आम आदमी पार्टी के व्हाट्सएप नंबर 9522919790  पर भेजना है। यह लोगो तीन कलर में आम आदमी पार्टी की वेबसाइट http://ab-bas.aamaadmiparty.org पर उपलब्ध हैं। जनता द्वारा जारी की गई पोस्ट को आम आदमी पार्टी अपने राष्ट्रीय और प्रदेश स्तरीय फेसबुक, ट्विटर, आदि सोशल प्लेटफार्म पर चलाएगी।  पोस्ट शेयर करने वालों को क्षेत्र में सभा के दौरान प्रदेश अध्यक्ष आलोक अग्रवाल से मुलाकात का मौका मिलेगा। अब बस के स्टॉम्प को वेबसाइट की लिंक http://ab-bas.aamaadmiparty.org से डाउनलोड किया जा सकता है। इस संबंध में किसी भी जानकारी के लिए व्हाट्सएप नंबर 9522919790 पर मैसेज भेजकर जानकारी हासिल की जा सकती है।

और अंत में... 
सोशल मीडिया पर बने माहौल को अगर आम आदमी पार्टी जमीन पर उतारकर वोट में तब्दील कर पाती है, तो मध्य प्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन का सपना पूरा हो सकता है। इस काम में पार्टी कितना तेजी से आगे बढ़ती है, और किस हद तक कामयाब हो पाती है, यह अगले दो महीने में सामने आ जाएगा। 

September 13, 2018

गणेश चतुर्थी: प्रतीक और उनसे मिलने वाली अनूठी शिक्षाएं

सचिन श्रीवास्तव 

आज गणेश चतुर्थी भी मनाई जा रही है। भारतीय परंपरा में दुखों का निवारण करने वाले गणेश प्रथम पूज्य हैं। श्रद्धा, भक्ति, सम्मान के पहले पायदान पर खड़े गणेश को याद करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यह है कि हम गणेश जी के प्रतीकों से मिलने वाली सीखों को समझें. अमूमन मिथकीय चरित्रों की कहानियां, उनके विचार, घटनाएं शिक्षा देती हैं, जिन्हें हम जानते ही हैं। दिलचस्प है कि गणेश अपने स्वरूप में भी विशिष्ट शिक्षाएं देते हैं। उन्हीं पर एक नजर....


छोटी आंखें 
गणेश जी की तस्वीरों, मूर्तियों को देखिए, उनकी आंखें बेहद छोटी हैं। खूबसूरत। सीधी लकीर में देखती। विश्वास से भरीं। हमेशा सामने की ओर।
शिक्षा: हमेशा केंद्रित रहें। कोई बात नहीं अगर जीवन में बाधाएं हैं। लक्ष्य से ध्यान नहीं भटकना चाहिए। विश्वास रखें, खुद पर, अपने सपनों पर।
उदाहरण: लक्ष्य पर केंद्रित होने का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं कपिल देव। भारत में स्पिन गेंदबाजी के माहौल के बीच उन्होंने अपने लिए अलग राह चुनी। नतीजा सब जानते हैं।

लंबे कान
हाथी के कान है ये। भक्त मानते हैं कि गणेश आपकी बात सुनते हैं। मिथकीय कहानी तो सभी जानते हैं इन बड़े कानों की। लेकिन ये हमें क्या बताते और जताते हैं?
शिक्षा: जीवन की वास्तविक आहटों और भीतर की आवाज सुनें। जीवन की सच्चाई समझकर ही आप बेहतरी और लक्ष्य की ओर जा सकते हैं। खुद को सुनने का आशय कि क्षमताओं को पहचानें। फिर लक्ष्य तय करें।
उदाहरण: रजनीकांत अपने शुरुआती दिनों में एक बस कंडक्टर थे। उन्होंने अपनी क्षमताओं को पहचाना और मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया। इसके बाद की कहानी आप जानते ही हैं।

बड़ा सिर, हाथ में कलम
गणेश जी की विशेषताओं में उनका बड़ा सिर और हर वक्त एक हाथ में कलम शुमार है। मिथकीय कथा के अनुसार, महाभारत का लेखन उन्होंने ही किया, क्योंकि उनकी लिखने की गति बेहद तेज मानी जाती है।
शिक्षा: ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। हर वक्त ज्ञान के लिए तैयार रहो।
उदाहरण: डॉ. एपीजे कलाम आधुनिक भारत में इस ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक हैं। पम्बन द्वीप के एक गरीब मुस्लिम परिवार से दिल्ली के राष्ट्रपति भवन तक का सफर डॉ कलाम ने अपने ज्ञान के सहारे ही तय किया।

बड़ा मुंह और अंतर्मुखी
गणेश जी का उदर यानी पेट बड़ा है और उसी अनुपात में मुंह भी, लेकिन वे कम बोलने वाले माने जाते हैं।
शिक्षा: ग्रहण ज्यादा कीजिए, लेकिन बोलिए कम। जब आप चुप होते हैं, तभी सच्चाई के करीब पहुंच पाते हैं।
उदाहरण: कन्फ्यूशियस ने कहा है, चुप्पी एक बेहतरीन दोस्त है, जिससे कभी धोखा नहीं मिलता। महान चित्रकार वॉन गाग के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत कम बोलते थे। लेकिन उनकी पेंटिंग जीवन की सच्ची तस्वीर हैं।

चूहा जैसी सवारी
भारतीय मिथकीय चरित्रों में गणेश जी की सवारी सबसे छोटी है। तस्वीरों में गणेश जी के आसपास लड्डुओं को कुतरता चूहा अपने आप में एक शिक्षा है।
शिक्षा: यह चूहा बताता है कि हमें जमीन से जुड़ा रहना है। चूहा जमीन की भीतरी परतों से गुजरकर कहीं भी पहुंच जाता है। हमें अपनी राह इसी तरह बननी चाहिए।
उदाहरण: लाल बहादुर शास्त्री जी की सादगी का कौन कायल न होगा। छोटे कद के इस महान राजनेता के जमीन से जुड़ाव के कायल उनके समकालीन व्यक्तित्व भी थे। उस दौर में ज्यादातर भारतीय राजनेता सादगी पसंद थे, लेकिन शास्त्री जी उनके भी नेता थे।

माना जाता है कि गणेश बुद्धि (ज्ञान), सिद्धि (अध्यात्मिक ऊर्जा) और रिद्धि (वैभव) के देवता हैं। इन तीनों को एक साथ देने वाले वे एकमात्र देवता हैं। वरना भारतीय परंपरा में ज्ञान और वैभव को नदी के दो किनारे माना गया है।

इंटरनेट पर लोकप्रिय गणेश
विभिन्न वेबसाइट पर गणेश संबंधी किताबों की बिक्री खूब होती है। इनमें से पांच प्रमुख किताबें ये हैं।
1- सतगुरु सुब्रमणियमस्वामी की लविंग गणेशा
2- जगन्नाथन और कृष्णा की गणेशा: द ऑस्पिसियस...
3- उमा कृष्णस्वामी, मणियम सेल्वन की द ब्रोकेन टस्क
4- मेलुएला डन मास्केटी की गणेशा: रिमूवर ऑफ ऑब्सटेकल्स
5- एमी नोवेस्की की द एलीफेंट प्रिंस: द स्टोरी ऑफ गणेश
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स्रोत: ओनस ऑफ कर्मा (रुद कृष्णा),  महाभारत (वेद व्यास), शिव पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और गणपत्यर्थवशीर्ष
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September 7, 2018

रक्षा समझौते से राजनीतिक हितों को साधने की कोशिश


सचिन श्रीवास्तव

एससी—एसटी एक्ट पर भारत बंद और सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिक संबंधों पर ऐतिहासिक फैसले के बीच भारत और अमरीका के बीच आखिरकार कॉमकासा रक्षा समझौता हो गया है। आखिरकार इसलिए कि यह समझौता इससे पहले दो बार रद्द हो चुका था। दिलचस्प यह है कि समझौता रद्द होने की वजहों पर फिलहाल कोई ठोस सहमति नहीं बनी है। समझौते के प्रारूप को पूरी तरह देखने के बाद ही इस पर कुछ कहा जा सकता है, लेकिन अभी तक की सूचनाओं में खरीद की प्रक्रिया और तकनीक के विवरण पर भी कोई बहुत ज्यादा प्रकाश नहीं डाला गया है। 
इसके बावजूद आज यानी 6 सितंबर को यह समझौता महत्वपूण है। हालांकि उन वजहों से नहीं जो जाहिर तौर पर बताई जा रही हैं, बल्कि दक्षिण एशिया के मौजूदा शक्ति संतुलन और भारत के पड़ोसियों के साथ रिश्तों के लिए यह ज्यादा अहम है। 
इन समझौतों के बारे में कोई निष्कर्ष निकालने से पहले हमें इसकी ऐतिहासिक पृ​ष्ठभूमि को भी टटोलना चाहिए। Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA) को पहले Communication and Information on Security Memorandum of Agreement (CISMOA) कहा जाता था। इसे भारतीय जरूरतों के मुताबिक ढालकर कॉमकासा किया गया है। यह उन तीन उच्चस्तरीय समझौते में से पहला है, जो अब भारत को अमरीका के साथ करना है। यह समझौते अमरीका पहले भी अन्य देशों के साथ करता रहा है। आने वाले दिनों में इसी कड़ी में Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA) और Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA) समझौते भी देर—सबेर दोनों देशों के बीच होना तय है। 
उपरी तौर पर इन समझौतों का उद्देश्य दोनों देश के बीच आपसी सैन्य सहयोग बढ़ाना है, लेकिन दरअसल इसमें अमरीका विक्रेता और भारत खरीदार की भूमिका में है। यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीते चार साल से चलाए जा रहे रक्षा क्षेत्र में देशज उत्पादन के कार्यक्रमों का क्या हुआ। दूसरी बात, एक और जाहिर उद्देश्य जो बताया जा रहा है वह है दक्षिण एशिया में चीनी हस्तक्षेप को कम करना। अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस और विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से हुई 2+2 बातचीत में भी यह एक अहम मसला रहा है। लेकिन यह साफ नहीं हो पाया है कि आखिर चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते आपसी सहयोग का जवाब भारत—अमरीका का रक्षा समझौता किस तरह से है। यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन ढांचागत सुविधाओं का लाभ देकर पाकिस्तान को अपने खेमे में ला रहा है। इसमें चीन—पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर सबसे प्रमुख है। तो क्या उसके जवाब में अमरीका अपने हथियार मुहैया कराकर हमें मजबूत कर रहा है। सवाल और चिंता की बात यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन और पाकिस्तान के बीच मजबूत होते संबंधों का डर दिखाकर अमरीका हमें अपने हथियार बेच रहा है।
बहरहाल, यह बहुप्रतीक्षित 2+2 बातचीत पहले 2 बार रद्द हो चुकी थी। याद ​कीजिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीते साल जून की अमेरिकी यात्रा, तब दोनों पक्षों ने संवाद के इस नए प्रारूप पर सहमति जताई थी। जिसमें दो उच्चस्तरीय मंत्री रक्षा संबंधों पर बातचीत करने वाले थे। यह बातचीत रक्षा समझौते से इतर दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। अमरीका की नई वीजा नीति के जरिये बाहरी कामगारों की छंटाई से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स में उपजी कुशंकाओं और दोनों देशों के मनमुटाव चर्चा में रहे हैं। साथ ही भारत के रूस और ईरान से संबंधों पर अमरीका गाहे—बगाहे अपनी नाराजगी खुले तौर पर जाहिर करता रहा है। 
असल में, जिन मुद्दों पर कम बातचीत हुई है, वह यह हैं कि अमरीका एक तरफ भारत पर यह दबाव बना रहा है कि वह ईरान और रूस पर लगे प्रतिबंधों को लागू करे और अपने आपको पूरी तरह से अमरीकी पाले में दिखाए। दूसरे, भारत ने हाल ही में रूस के सर्फेस टू एयर मिसाइल S-400 की जो खरीद की है। उधर, अमेरिका ने रूस से पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इनके साथ ही रूस के रक्षा और खुफिया विभागों से किसी भी देश के अगर संबंध हैं, तो वह भी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकता है। आने वाले दिनों में भारत और रूस के बीच अन्य रक्षा सौदे भी जमीन पर उतर सकते हैं। यह सभी मामले अमरीका के लिए चिंतित करने वाले हैं।
वहीं ईरान की बात करें तो अमेरिका दूसरे देशों को वहां से तेल न खरीदने की बात कहता रहा है। अमरीका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का नया सिलसिला आगामी 4 नवंबर से फिर शुरू होने वाला है। अब दिक्कत यह है कि चीन के बाद भारत ईरान के तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत की मौजूदा तेल की जरूरतों के देखते हुए यह संभव नहीं है कि भारत कहीं ओर से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, क्योंकि ईरान की ओर से भारत को कच्चा तेल अपेक्षाकृत कम दाम पर उपलब्ध कराया जाता है।

इस बीच हालिया बातचीत और समझौते के बाद जो हालात बनते हैं, वह आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया के विदेशी राजनीतिक गठजोड़ और खासकर भारतीय प्रायद्वीप में सैन्य गतिविधियों के लिए जो आहट दे रहे हैं, वह अमरीका के इस इलाके में बढ़ते कदमों की बानगी हैं। पिछले दिनों अमरीका के सैन्य अफसर जनरल जेसेफ डेनफोर्ड ने कहा था कि दोनों देशों की सहभागिता और रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने में गहरी रुचि जाहिर की थी। फिलहाल अमरीका की हिंद महासागर में दखलंदाजी सीमित है, लेकिन हालिया कॉमकासा समझौते के बाद भारत के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की सुविधा अमरीका के पास होगी। ऐसे में वह आसानी से अपनी भूमिका को यहां बढ़ा पाएगा। बदले में भारत को अमरीकी हथियार मिलेंगे, लेकिन उसके लिए भारत को अलग से खरीद करनी होगी। जहां तक चीन के दक्षिण एशिया में रक्षा और आर्थिक समझौतों के खतरे की बात है, तो यह अभी कम नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में भारत—अमरीका की सेना के तीनों अंगों के संयुक्त सैन्य अभ्यास देखने को मिल सकते हैं। इन अभ्यासों का असर भारत के पड़ोसियों पर भी होगा और ताजा हालात में पड़ोसियों की किसी भी नाराजगी को दूर करने की रणनीति भारतीय जमीन पर दिखाई नहीं पड़ती है। 

कुल मिलाकर मौजूदा समझौता भारत—अमरीका के बीच रक्षा सहयोग के बहाने अन्य अहम मुद्दों पर बातचीत की शुरुआत भर है। इनमें अमरीकी नजरिये से ईरान और रूस से भारत के संबंध, चीन की दक्षिण एशिया में बढ़ती दादागीरी से लेकर इस प्रायद्वीप में अमरीका के लिए जरूरी सैन्य अड्डे की खोज प्रमुख हैं, तो भारत के लिए आर्थिक मदद के साथ अमरीका वीजा पॉलिसी में बदलाव और रक्षा तकनीक तक पहुंच जरूरी है। इन हालात में भारत के अपने हितों और अमरीकी मंशाओं के बीच की खींचतान में कौन कितना लाभ ले पाता है, वह आने वाले दिनों में दिखाई देगा। ऐसे में कहा जा सकता है कि कॉमकासा समझौता भारत—अमरीका संबंधों की बेहतरी की दिशा में उठा जरूरी, छोटा और अहम कदम है।