October 17, 2018

30 बरस पहले लिखी गई थी आम आदमी पार्टी के लिए पहली गजल

सचिन श्रीवास्तव
वैसे तो आम आदमी पार्टी को बने हुए अभी महज 5 साल ही हुए हैं, लेकिन तथ्य बताते हैं कि आम आदमी पार्टी का पहला जिक्र साहित्य में करीब तीन दशक पहले मिलता है। जी हां, यह सच है। विश्वास (अरे वो वाला विश्वास नहीं, यकीन वाला विश्वास) नहीं होता तो सुनिये।

पयाम सईदी का नाम सुना है न। वही पयाम साहब जिनकी कई उम्दा नज्मों और गजलों के सहारे चंदन दास से लेकर जगजीत सिंह तक कई गायक युवाओं के बीच पैठ बनाते चले गए। नहीं जानते। अरे भाई
"हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए हैं..."
"काँटों से दामन उलझाना मेरी आदत है..."
"तेरा चेहरा है आईने जैसा...."
"इंतहा आज इश्क़ की कर दी....."
ये गजलें पयाम साहब की ही हैं। चंद हिंदी फिल्मों के लिए भी बीती सदी के आखिरी दशक में उन्होंने नगमे लिखे थे। तो पयाम साहब की एक गजल है, जिसमें पहली बार आम आदमी पार्टी का जिक्र आता है। इस गजल से ये बात भी साबित होती है कि साहित्यकार, शायर, ​कवि भविष्य दृष्टा होते हैं। तभी तो पयाम साहब ने भविष्य के गर्भ में रही एक पार्टी के लिए उस वक्त गजल लिख दी।

गजल कुछ यूं हैं---

साथ छूटेगा कैसे मेरा आप का
जब मेरा दिल ही घर बन गया आप का
(देखिए किस खूबसूरती से पयाम साहब कह रहे हैं कि जो आम आदमी पार्टी का हो गया वह हो गया, फिर उसके दिल में आप बस जाती है।)

लीजिए दूसरा मिसरा पढ़िए

आप आए बड़ी उम्र है आप की
बस अभी नाम मैंने लिया आप का
(आम आदमी पार्टी को बस लोगों तक जाने की जरूरत है। जहां भी आप कार्यकर्ता जाते हैं, उन्हें यही जिक्र मिलता है, कि साहब हम तो बस आपका ही इंतजार कर रहे थे।)

डर है मुझको न बदनाम कर दे कहीं
इस तरह प्यार से देखना आप का
(यह मिसरा पयाम साहब ने आज के हालात का अंदाजा लगाते हुए तीस बरस पहले लिख डाला था। यानी जिसको आप ज्यादा प्यार से दे​खेगी, उसे केंद्र सरकार के कोप का सामना करना पड़ेगा। शायर की सोच का जवाब नहीं, भविष्य को पहले ही देख लिया था।)

अगला शेर देखिए
आपकी इक नजर कर गई क्या असर
मेरा दिल था मेरा हो गया आपका
(यह भविष्य के भी भविष्य की सोच है। यानी एक बार आप ने जिसको अपना बना लिया, फिर उसका सब कुछ आप का।)

तो यह गीत आम आदमी पार्टी के लिए तीन दशक पहले लिखा गया था। चंदन दास के "तमन्ना" नामक एलबम में आपमें से जो मौसिकी के शौकीन हैं, उन्होंने सुना होगा। और जो उम्र के चौथे दशक में कुलांचे भर रहे हैं, वे तो गजल में आए आप के जिक्र को अपना मेहबूब ही मानते होंगे।
तो जरा अपना इतिहास ज्ञान दुरुस्त कीजिए और आज की एक पार्टी के लिए लिखी गई तीन दशक पहले की इस नज्म को सुनिये और दूसरों को भी सुनाइये।

October 1, 2018

यह संयोग नहीं, संयोगों का भ्रम है

सचिन श्रीवास्तव

तीन खबरों के शीर्षक देखिए और तारीखों पर नजर डालिये
29 सितंबर: आम आदमी पार्टी की युवा शक्ति के दो नेता छतरपुर में गिरफ्तार
30 सितंबर: आप के प्रदेश उपाध्यक्ष को शांति भंग की आशंका के तहत किया गिरफ्तार
1 अक्टूबर: ग्वालियर में आप के प्रदेश संगठन सचिव समेत 7 गिरफ्तार

क्या यह महज संयोग है कि तीन दिनों के भीतर एक प्रदेश जो चुनावी दौर में है, उसकी एक उभरती हुई ताकत के 30 से ज्यादा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जाए। या यह संयोगों का भ्रम है।

असल में भारतीय राजनीति इस वक्त जिस मोड़ पर खड़ी हैं, वहां से नैतिकता, मूल्य, वैचारिक निरपेक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया जैसी शब्दावली की बहुत जगह अब आगे दिखाई नहीं देती है। इसके बावजूद एक हल्की सी डोर, एक छीनी सी पर्देदारी महसूस की जाती है। इस पर्देदारी में नैतिकता को तिलांजलि देते हुए, मूल्यों का गला घोंटते हुए, वैचारिक निरपेक्षता को खूंटी पर टांगते हुए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रौंदते हुए भी सत्ता से यह उम्मीद की जाती है कि वह राजनीतिक विरोध के संवैधानिक अधिकार को अक्षुण्य नहीं बनाए रखेगी तो कम से कम भौथरा नहीं होने देगी। अफसोस आज मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं हो रहा है। 


30 सितंबर को मैं छतरपुर में था और वहां आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, लेकिन फिर भी चेहरे दृढ़ थे। उन्हें पता नहीं था कि वे कितनी देर खुली हवा में सांस ले रहे हैं। उनके घरों पर दबिश दी जा रही थी। कई कार्यकर्ताओं ने अपने फोन बंद कर रखे थे। खुद आप के प्रदेश उपाध्यक्ष अमित भटनागर से बातचीत के दौरान कई बार रुकना पड़ रहा था, क्योंकि उनके बोले गए वाक्य का एक हिस्सा पूरा होने से पहले ही एसडीएम, एसपी और अन्य अधिकारियों के फोन आ जाते थे। जैसे तैसे मैंने बतौर पत्रकार अपनी बातचीत पूरी की और अमित बिजावर की ओर निकल गए। दोपहर होते-होते खबर मिली कि उन्हें बिजावर में गिरफ्तार कर लिया गया है। साथ ही 14 अन्य साथियों को भी। उनसे पहले दो अन्य युवा नेताओं को 29 तारीख को गिरफ्तार किया गया था। 
वजह क्या थी: वह यह कि अमित और उनके साथी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के छतरपुर आगमन पर उनके सामने क्षेत्र के विकास से संबंधित कुछ मुद्दे रखना चाहते थे, और उसके लिए प्रदर्शन कर रहे थे। यानी एक लोकतांत्रिक समाज में शांति पूर्ण प्रदर्शन का हक एक नागरिक, एक राजनीतिक कार्यकर्ता को नहीं है। 

अब करते हैं आज की बात। अभी अभी ग्वालियर से खबर आई है कि आप के प्रदेश संगठन सचिव हिमांशु कुलश्रैष्ठ, जोन सचिव शुभम गुप्ता और ग्वालियर पूर्व की प्रत्याशी मनीक्षा तोमर और अन्य साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। ये तीनों अपने कुछ अन्य साथियों के साथ लाठीचार्ज से पीडि़त परिवारों को मिलने पहुंचे थे। ग्वालियर की फूटी कॉलोनी हुरावली में पिछले दिनों लाठीचार्ज हुआ था और यहां प्रशासन ने कई घर तोड़े थे। 
तो गिरफ्तारी की वजह: जिनके घर तोड़े गए, जिन पर लाठीचार्ज किया गया, उनसे मिलने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता क्यों पहुंचे। यह उनका अपराध था। 

तीनों घटनाओं में करीब 30 गिरफ्तारी हुईं। सवाल यह नहीं है कि यह गिरफ्तारी क्यों की गईं। राजनीतिक जमीन पर खड़ा हर व्यक्ति गिरफ्तारी के महत्व और उसके असर को जानता है। फिर भी क्या एक प्रदेश जो चुनाव के दौर में जा रहा है, वहां की उभरती हुई राजनीतिक पार्टी को, जो पिछले पांच साल में देश की सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ती हुई पार्टी है। उसे यह कहीं न कहीं दबाने, मुकदमों में उलझाने, चुनाव प्रचार को धीमा करने की कोशिश नहीं है! सवाल इससे भी बड़ा है कि क्या विधानसभा चुनावों की ओर तेजी से बढ़ रहे प्रदेश में राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए ही सही, अगर कोई प्रदर्शन, विरोध या पीडि़त परिवारों से मुलाकात करता है, तो क्या पुलिस के जरिये उन्हें तोडऩे, डराने, उलझाने की कोशिश की जानी चाहिए? 
क्या यह लोकतंत्र के लिए सही है? 

जवाब हम सभी जानते हैं। दिक्कत यह है कि किसी पार्टी, किसी विचार, किसी राजनीतिक आंदोलन की आड़ में हम सही जवाब से बचते हैं। यह बचना जारी रहा था तो वह दूर नहीं जब राजनीतिक दल सत्ता की ताकत के साथ बदलाव की हर उम्मीद को उसके शैशवकाल में ही कुचल देंगे। 

जय हिंद

September 27, 2018

जन्मदिन पर विशेष: ईलियट का नैराश्य और शोक 20वीं सदी का उत्सव है

टी. एस. एलियट: 26 सितंबर 1888 को जन्म। 1948 में नोबल 
(साहित्य) मिला। 20वीं सदी के महान कवि। 26 साल की उम्र 
में अपनी मातृभूमि अमरीका छोड़ दी। इंग्लैंड में बसे। 1927
में ब्रिटिश नागरिक बने। 
नाटक, कविता और आलोचना के
क्षेत्र में ठोस कार्य। 
अपने समय के सभी प्रख्यात लेखकों पर
असर डाला। 
खुद डन, एजरा पाउंड और लॉफोर्ज से सबसे ज्यादा
प्रभावित रहे।  
4 जनवरी 1965 को निधन। 
सचिन श्रीवास्तव
कल 20वीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में शुमार टीएस ईलियट का जन्मदिन था और सुबह से ही ईलियट की द वेस्ट लैंड मन में घुमड़ रही थी। इत्तेफाक से दोपहर के पहले हिस्से में पलाश जी से मिला, तो बात कविता से ही शुरू हुई। दोपहर ढलते-ढलते लव सॉन्ग ऑफ जे अल्फ्रेड प्रूफ्रोक के दो पाठ भी कर लिए थे। 

अगर आप अंग्रेजी साहित्य और खासकर कविता के पाठक हैं, तो द वेस्ट लैंड जरूर पढ़ी होगी। टी एस एलियट की 434 लाइनों की यह कविता बीते करीब 100 साल से कवियों, कविता, साहित्य को प्रभावित कर रही है। आप किसी कवि या पाठक से 20वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण कविताओं की बात करें तो इसका जिक्र जरूर आएगा। अपनी जटिलता के बावजूद द वेस्ट लैंड आकर्षित करती है। व्यंग्य और भविष्य को देखने की जिद के बीच की इस यात्रा में बहुत कुछ ऐसा है, जो चौंकाता है- बार बार। दुनिया का समय, उसके बदलाव, कल्चर, साहित्य का उद्घोष और इनके साथ शोक। एक तरल पदार्थ की तरह सभी तरफ बहता हुआ शोक। बहुत बड़ी रैंज की कविता है यह। एप्रिल इज द क्रूअलेस्ट मंथ, द वेस्ट लैंड की पहली पंक्ति। या फिर आई विल शो यू फियर इन अ हैण्डफुल ऑफ डस्ट। और आखिर में ओम शांति:, शांति:, शांति:। कभी न कभी हमारी बातचीत में यह वाक्य शामिल हो ही जाते हैं। लेकिन क्या सचमुच द वेस्ट लैंड ही ईलियट के कवित्त का शीर्ष है। नहीं। मुझे नहीं लगता। 

पता नहीं यह मेरे साथ ही है या आपके साथ भी ऐसा है कि ईलियट को पहचान मिली द वेस्ट लैंड से लेकिन मुझे लव सॉन्ग ऑफ जे अल्फ्रेड प्रूफ्रोक ज्यादा पसंद है। शायद मुझसे महज दो पसंदीदा कविताएं पूछी जाएं तो अंधेरे में के साथ मैं लव सॉन्ग ऑफ जे अल्फ्रेड प्रूफ्रोक का ही नाम लूंगा। संभवत: यह 20वीं सदी की सबसे ताकतवर कविता है। दुनिया के हजारों कवियों और कविताओं पर इसका असर निर्विवाद है। 

ईलियट का जो द्वंद्व है, उनका जो नैराश्य है, वह मुझे हमेशा आकर्षित करता है। वे अच्छे, खुशनुमां माहौल में भी सबसे बुरे को देखने के औजार देते हैं। पत्रकारिता में मुझे इससे बहुत मदद मिली। लेकिन इस नैराश्य की वजह क्या रही होगी ईलियट के पास? यह सवाल कई-कई तरह से कई-कई बार मेरे सामने आया है। दुनिया के साहित्य से मेरा पहला परिचय अशोकनगर में हुआ था और इस दौरान खुशकिस्मती से मेरी अंग्रेजी की शिक्षिका अर्चना प्रसाद मेरी तमाम अराजकताओं और जल्दबाजी के बीच भी कई बार मुझे विश्व साहित्य को समझने के कुछ सूत्र पकड़ाती रहीं। ईलियट के बारे में डॉ अर्चना से कल लंबी बातचीत हुई, उसके अहम हिस्से- 

इलियट की कविताओं के बिंब हर बार नए रूप में आते हैं सामने: अर्चना प्रसाद
"ईलियट जिस वक्त रचनाकर्म कर रहे थे वह इंडस्ट्रीयल रेवेल्यूशन का दौर था। इसीलिए उनकी प्रेम कविता में भी क्लास कॉन्फिलिक्ट (वर्ग संघर्ष) देखने को मिलता है। वहां प्यार करने में भी आदमी को सोचना पड़ रहा है। इलियट कहते हैं- बार बार मुझे अपना चेहरा सामने रखना पड़ रहा है प्रेम करते हुए। वह अपनी काबलियत को परखते हुए लगते हैं।"
"इलियट प्रपोज नहीं कर पा रहे हैं। पूरा माहौल ईथराइज्ड है। धुंध से ढंका हुआ है। वह मजदूर हैं और मजदूरों के बीच में रहते हैं। वहां जीवन के सबसे कठिनतम संघर्ष हैं, उस वर्ग के सामने कवि बैठा हुआ है और वे लड़कियां सामने से गुजर रही हैं, जिनसे उसे प्यार है।"
"इलियट की कविता में दो अलग-अलग क्लास एक साथ दिखाई दे रहे हैं। इन्टेक्लेचुअल भी हैं वहां मजदूरों के साथ। वह लड़कियां उन्हें देख रही हैं, लेकिन वह सो कॉल्ड, फैशनेबुल बुद्धिजीवी हैं। यहां इलियट के पास प्रपोज करने का डैलेमा है। यह द्वंद्व ही उन्हें मजदूर के जीवन में झांकने को ले जाता है। यहां पूरी इकॉनामिक्स सामने आती है।"
"आमतौर पर वेस्टलैंड को आलोचक हारे को हरिनाम जैसी रचना करार देते हैं, कुछ-कुछ दिनकर के करीब। लेकिन यह उथला कम्पैरिजन है। यह सतही तुलना है। जो लोग यह कहते हैं कि ईलियट पर भगवत गीता का प्रभाव था, वह भी मुझे लगता है उत्साही चूक कर रहे हैं। संस्कृत के बहुत बड़े अध्येता ईलियट नहीं थे। हां वेस्टलैंड में वे आखिर में संस्कृत का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उसकी वजह एजरा पाउंड का प्रभाव ज्यादा है, भगवत गीता से इसका कोई लेना-देना नहीं है।"
"ईलियट की एक और महत्वपूर्ण कविता है हॉलेमैन। यह बहुत छोटी कविता है। वैस्टलैंड और लव सॉन्ग की तुलना में तो और भी छोटी कविता, जिसमें वे बताते हैं कि आदमी खोखला हो गया है। जो हमें सफल दिख रहा है, वह भी सार्थक जीवन नहीं जी रहा है। जो होना चाहिए वह सफलता में नहीं है। वह इंसान जिंदगी की जद्दोजहद से बाहर नहीं आ पा रहा है। यह रचनात्मक प्रक्रिया का बेहद शानदार नमूना है।"
"असल में ईलियट को जितनी बार भी पढ़ो उनके पास कुछ नया मिलता है। मैं ईलियट पर काम करना चाहती थी, लेकिन डरकर मैंने काम नहीं किया। सचमुच ईलियट से डर लगता है। हम उन्हें एक वक्त में जैसा समझ रहे होते हैं, दूसरी बार पढ़ो तो वह बिल्कुल वैसे नहीं रह जाते हैं। बिल्कुल अलग दिखते हैं। यह बड़ी कविता के साथ होता है। हर बार उसका नया बिंब सामने आता है। हर बार बिल्कुल अलग और फिर हम डर जाते हैं कि कहीं हमारी समझ ही तो कमतर नहीं हैं इस कवि के करीब जाने के लिए। यह मुश्किल होता है कि जितनी बार पढ़ो, उतनी बार नया मिले। लेकिन यह अपना लगता है। ईलियट हर बार अपने लगते हैं। वह जो बिंब प्रस्तुत करते हैं, जो इमेजेज बनाते हैं, वह बिल्कुल अलग संसार में ले जाती हैं। जैसे लव सॉन्ग में वह कहते हैं- शीशे के ऊपर जो गली के ऊपर अंधियारा है, वह यूं लगता है कि बिल्ली ने खरोंच मारी हो। अब ब्रिटिश कल्चर में बिल्ली दुख का प्रतीक है, अंधेरे का गम्य। जो हमारे यहां उल्लू है, वह ब्रिटिश कल्चर में बिल्ली है। तो बिल्ली ने खरोंच मारी हो, वैसा अंधियारा।"
"ईलियट की कविता का आदमी ऐसा हो गया है, जैसे कोई मरीज ईथराइज्ड हो। जो बेहोशी की दवा के हल्के असर का वक्त होता है। उसे सामने लाते हैं ईलियट। हल्का होश और बेहोशी के बीच का हिस्सा। यह जो बिंब हैं, वह कविता को एक अलग ही ऊंचाई देते हैं।"
"इलियट अच्छे आलोचक भी हैं। ऑब्जेक्टिव कोर्रिलेटिव के सिद्धांत में वह कहते हैं कि कविता वह होती है, जहां कवि की मौजूदगी का पता नहीं चले। जहां एक बिंब के साथ दूसरा और फिर तीसरा बिंब जुड़ा हुआ हो और दिलचस्प यह है कि इन बिंब के बीच इतना स्पेस हो पाठक के पास कि वह उन्हें अपने आप समझ सके, यानी पाठक के सामने इन्हें जटिलता के साथ नहीं रखना है। ईलियट कवि की तुलना कैमिस्ट्री के कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक से करते हैं। जैसे कैटलिस्ट की भूमिका कैमिकल रिएक्शन को शुरू करने की होती है, ठीक वैसे ही। उत्प्रेरक की भूमिका में कवि उस कथ्य को प्रस्तुत कर रहा होता है, उसका अपना ऑब्जर्वेशन भी होता है, लेकिन उसकी सब्जेक्टिविटी नहीं होती है। कवि मौजूद नहीं होता है। पाठक कविता को अपने जीवन के हिसाब से समझता है।" 
अर्चना मैम की सलाह: ईलियट को जिसने भी नहीं पढ़ा है, तो उसे "द वेस्ट लैंड" तो पढऩा ही चाहिए, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि "लव सॉन्ग ऑफ जे अल्फ्रेड प्रूफ्रोक" और "हॉलमैन" को पढ़ा जाए और इन्हें पढऩे के बाद आप खुद को "फोर क्वार्टेट्स" पढऩे से भी नहीं रोक पाएंगे। 
----------------------

Adnow 1

loading...