April 29, 2017

पर्यटन का मौसम : 50 प्रतिशत कम हो सकता है सैर का खर्च

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सचिन श्रीवास्तव
गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है और इसी के साथ सैर का सिलसिला भी जोर पकडऩे लगा है। बीते एक दशक में पर्यटन उद्योग तेजी से बदला है और भारतीय पर्यटकों का इस साल का विदेशी खर्च तो चौंकाने वाला है। व्यक्तिगत विदेशी खर्च के मामले में भी यात्रा खर्च अब बढ़ गया है। एक वक्त में भारतीय विदेशों में रहने वाले अपने करीबियों और पढ़ाई पर सबसे ज्यादा खर्च करते थे, लेकिन अब व्यक्तिगत यात्राओं यानी सैर पर ज्यादा खर्च हो रहा है। ऐसे में जानते हैं मौजूदा खर्च के हालात और इसे कम करने के कुछ दिलचस्प, नए और अनूठे तरीकों के बारे में।

विदेश यात्रा पर सबसे ज्यादा व्यक्तिगत खर्च

इस साल भारतीयों ने व्यक्तिगत विदेश यात्रा पर सबसे ज्यादा खर्च किया है। इससे पहले तक विदेशों में रह रहे अपने करीबी परिजनों की देखभाल और पढ़ाई पर सबसे ज्यादा खर्च होता था। इस बदलाव की एक बड़ी वजह रिजर्व बैंक की रेमिटेंस

April 28, 2017

कम होती लागत : बुनियादी सेवाएं हो रही हैं सस्ती

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सचिन श्रीवास्तव
दुनिया भर में आज इस बात पर चिंता जाहिर की जा रही है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजैंस और रोबोटिक तकनीक कैसे हमारी नौकरियां छीन रहे हैं, हमारी आय के स्रोत खत्म कर रहे हैं, आमदानी के स्रोत कम कर रहे हैं और साथ-साथ पारंपरिक अर्थव्यवस्था को खत्म कर दे रहे हैं। इसके असर को फौरी तौर कम करने के लिए भारत समेत कनाडा और फिनलैंड जैसे देश सार्वभौमिक न्यूनतम आय यानी यूनिवर्सल बेसिक इनकम के विचार पर आगे बढ़ रहे हैं। इसमें हर नागरिक को बिना शर्त एक तय राशि देने के विकल्प पर बात की जा रही है। लेकिन इस आपधापी के बीच एक बात पर लोगों की नजर नहीं जा रही है, और वह है जीवनयापन की लागत में कमी। जी हां, यह सच है कि हमारा जीवन यापन सस्ता होता जा रहा है। तकनीक और विकास ने आवास, यातायात, खाना, स्वास्थ्य, मनोरंजन, कपड़े, शिक्षा जैसी बुनियादों जरूरत की लागत में कमी ला दी है। आप माने या न मानें लेकिन यह सच है।

मौजूदा दौर में कैसे खर्च करते हैं हम पैसा

दुनिया भर में इंसान का पैसा खर्च करने का तरीका तकरीबन एक जैसा है। बुनियादी जरूरतों और सेवाओं पर खर्च की यह एकरूपता दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इतनी समान है कि विकासशील

April 27, 2017

फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव : दक्षिण पंथी ली पेन और युवा मैक्रोन में सीधी टक्कर

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सचिन श्रीवास्तव
इस वक्त यूरोप समेत पूरी दुनिया की नजरें 7 मई को होने वाले फ्रांस के राष्ट्रपति चुनाव पर लगी हैं।  इस चुनाव का असर आने वाले कई दशकों तक दिखाई देगा यह तय है। फ्रांस के पांचवें गणराज्य में यह पहला मौका है, जब किसी राष्ट्रपति ने अगला चुनाव लडऩे से मना कर दिया था। फ्रास्वां ओलांद की अनिच्छा के बाद 11 उम्मीदवार पहले चरण में राष्ट्रपति भवन एलसी पैलेस जाने की दौड़ में शामिल थे। पहले चरण में किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट नहीं मिले हैं, इसलिए फैसला 7 मई को दूसरे चरण की वोटिंग से होगा। जिसमें घोर दक्षिणपंथी नेता मरीन ली पेन और एमैनुअल मैक्रोन में सीधी टक्कर है। दशकों बाद ऐसे हालात बने है कि स्थिति स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। इस बार के नतीजों को यूरोपीय संघ के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सोच का फासला
फ्रांस के राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल मरीन ली पेन और एमैनुएल मैक्रोन के बीच बहुत समानताएं हैं, तो सोच का फासला भी है। ली पेन अपने देश की सीमाओं को सुरक्षित करने और व्यापार को संरक्षण की नीति की पैरोकार हैं। वहीं मैक्रोन ग्लोबलाइजेशन के पक्षधर हैं और यूरोपीय यूनियन के साथ रहना चाहते हैं। विभिन्न मुद्दों पर दोनों प्रत्याशियों का

April 26, 2017

स्कूल फीस पर कानून : क्या गुजरात की राह पर चलेंगे बाकी राज्य?

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सचिन श्रीवास्तव
देश भर में इन दिनों स्कूलों की फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ प्रदर्शन, धरने और बयानों का दौर जारी है। गुजरात सरकार ने एक विधेयक बनाकर फीस पर लगाम की कोशिश की है। बीते साल एक केंद्रीय कानून की भी चर्चा थी, लेकिन हालात नहीं बदले। मनमानी फीस वसूली के मर्ज से देश के सभी अभिभावक परेशान हैं। ऐसे में फीस बढ़ोतरी का नियमन कैसे हो? क्या गुजरात के विधेयक से अभिभावकों को राहत मिल पाएगी? बाकी राज्य इस राह पर चलेंगे? जैसे कई सवाल हवा में हैं। चूंकि देश में सरकारी स्कूलों का हाल खराब है और वे ढांचागत सुविधाएं भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए मजबूरन अभिभावकों को निजी स्कूलों की राह पकडऩी पड़ती है। इन स्कूलों में वे काफी ज्यादा फीस चुकाने को बाध्य होते हैं।

April 25, 2017

कामकाजी बुजुर्ग : आराम की उम्र में काम की मजबूरी

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सचिन श्रीवास्तव
दुनियाभर की सरकारें विभिन्न कारणों से अपने बुजुर्गों को पेंशन देती हैं। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि एक निश्चित उम्र के बाद बुजुर्गों को सम्मानजक जीवन के लिए कोई काम न करना पड़े। भारत में मासिक पगार पर काम करने वालों के लिए तो यह ठीक है, लेकिन देश में बड़ी आबादी ऐसी भी है, जो रिटायरमेंट की उम्र में पहुंचने के बावजूद काम करने के लिए बाध्य है। तकलीफदेह यह भी है कि उम्र के आखिरी पड़ाव में इन बुजुर्ग को रोजगार की सामान्य शर्तों के बिना ही काम करना पड़ रहा है।


38 प्रतिशत बुजुर्ग कर रहे हैं काम

राष्ट्रीय सेंपल सर्वे (एनएसएस) के 68वें राउंड के मुताबिक, देश के एक तिहाई से ज्यादा बुजुर्ग लगातार कर रहे हैं काम

April 24, 2017

सस्ती दवा : मजबूरी से मिलता मुनाफा

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सचिन श्रीवास्तव
भारतीय दवा बाजार देश के उन चुनिंदा उद्योगों में शुमार है, जहां बेतहाशा मुनाफे पर लगाम की कोई प्रभावी नीति नहीं बनी है। इस बाजार में एक सिरे पर जानी-अनजानी बीमारियों से पीडि़त मरीजों के परिजन होते हैं, और दूसरे सिरे पर इस मजबूरी को मुनाफे में बदलने को बेताव दवा कारोबारी। अब केंद्र सरकार एक बार फिर ऐसे कानून पर विचार कर रही है, जब डॉक्टर किसी मरीज के लिए केवल जेनेरिक दवाएं ही लिखेंगे। यानी सामान्य दवाएं जो ब्रांडेड, बड़ी कंपनियों की दवाओं के मुकाबले काफी सस्ती होती हैं। लेकिन सस्ती दवाओं का दूसरा पक्ष यह है कि ये ग्राहक को मूल कीमत से हजार गुना ज्यादा दाम पर

April 21, 2017

दुनिया के सबसे खतरनाक कमांडो

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सचिन श्रीवास्तव
इन दिनों दुनिया का लगभग हर देश आतंकी हमलों और दूसरे कई अन्य खतरों से जूझ रहा है। देश की सीमाओं के भीतर इन विशेष किस्म से खतरों से निपटने के लिए सामान्य सैन्य बल या पुलिस कार्रवाई नाकाफी पड़ती है। ऐसे में जरूरत होती है, मुश्किल हालात में अपने काम को अंजाम देने में माहिर कमांडो की। हर देश के पास ऐसे कमांडो होते हैं। सभी अपने काम में सर्वश्रेष्ठ और अचूक हमले की योग्यता रखते हैं। इनमें से कुछ कमांडो फोर्स पूरी दुनिया में अपनी क्षमताओं के लिए चर्चित हैं। यह हैं दुनिया की बेहतरीन

April 20, 2017

माल्या की वापसी: नामुमकिन तो नहीं, लेकिन मुश्किल बहुत

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सचिन श्रीवास्तव
करीब एक साल से ब्रिटेन में रह रहे भारतीय कारोबारी विजय माल्या को भारत लाने की कोशिशों के बीच स्कॉटलैंड यार्ड ने उन्हें लंदन में गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के चंद घंटों बाद ही माल्या को जमानत मिल गई। इस कानूनी प्रक्रिया के बीच कहा जा रहा है कि माल्या को भारता लाना वैसे ही आसान नहीं था, और मौजूदा कार्रवाई से मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। इसकी वजह है भारत-ब्रिटेन के बीच प्रत्यर्पण संधि की जटिल प्रक्रिया और माल्या का अब ब्रिटिश के कानूनी दायरे में आना। विशेषज्ञों के मुताबिक

April 19, 2017

पैदाइश पर पाबंदी : समस्या के हल से उभरती समस्याएं

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सचिन श्रीवास्तव
असम सरकार की नई जनसंख्या नीति का जो मसौदा पेश किया है, वह चर्चा में है। इसके मुताबिक, दो से ज्यादा बच्चे होने पर माता-पिता सरकारी नौकरी नहीं कर सकेंगे। साथ ही उन्हें न तो आवास योजनाओं का लाभ मिलेगा और न ही वे स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ सकेंगे। जनसंख्या को काबू में करने के लिए ऐसे प्रतिबंधों का यह अनूठा मामला नहीं है। दुनिया के कई देश समय-समय पर ऐसी पांबदियां लगाते रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे मामलों की भी कमी नहीं है, जो ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए विभिन्न प्रलोभन देने की मिसालें बने हैं। दिक्कत यह है जनसंख्या जब समस्या बनती है, तो उसे हल करने के लिए उपाय सामने लाए जाते हैं, उनसे नई समस्याएं उभरती हैं, और सरकारों को फिर पुरानी नीतियां

April 18, 2017

भारतीय विज्ञान को मरम्मत की दरकार

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सचिन श्रीवास्तव
विज्ञान से संबंधित देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाइयों के शीर्ष अधिकारी-वैज्ञानिकों ने हाल ही में संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री से एक गुहार लगाई है। यह गुहार देश में विज्ञान क्षेत्र की आमूलचूल मरम्मत की है। इन शीर्ष अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने विज्ञान और तकनीक क्षेत्र में एक ऐसी ताकतवर संस्था के गठन का प्रस्ताव दिया है, जो शोध की जरूरत और जमीनी हालात पर नजर रखे। साथ ही यह संस्था सीधे प्रधानमंत्री

April 17, 2017

भयावह युद्ध के कगार पर दुनिया

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सचिन श्रीवास्तव
अमरीकी वायुसेना ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी शहर हिरोशिमा पर लिटिल बॉय गिराया था। इसके तीन दिन बाद बाद नागासाकी में फैट मैन के जरिये तबाही मचाई। यह अपनी तरह के अनूठे और भारी तबाही मचाने वाले बम थे। इसके बाद बीते 72 साल में अमरीका ने वियतनाम से ईराक और अफगानिस्तान तक सैकड़ों बम गिराये। इनमें 16 साल पहले ओसामा बिन लादेन के तोरा बोरा में होने की आशंका पर गिराया गया 15 हजार पौंड का "डेजी कटर" भी शामिल है। इसी क्रम में बीते सप्ताह मैसिव ऑर्डिनेंस एयर ब्लॉस्ट (एमओएबी) भी जुड़ गया है। इसे आम भाषा में मदर ऑफ ऑल बम्ब्स कहा जा रहा है। जानते हैं इसके असर और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में इस

April 15, 2017

दक्षिण एशिया का स्वास्थ्य : संक्रामक रोगों का आसान शिकार

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सचिन श्रीवास्तव
दक्षिण एशियाई देशों के स्वास्थ्य के हालात पर आई 12वीं वार्षिक रिपोर्ट चौंकाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत समेत दक्षिण एशियाई देश जीका और इबोला जैसे संक्रामक रोगों के आसान शिकार हैं। इसकी वजह है इन देशों का खस्ता हाल स्वास्थ्य सुरक्षा नेटवर्क। चूंकि यह देश पहले ही एचआईवी और मलेरिया जैसे अन्य रोगों से जूझ रहे हैं। साथ ही गैर-संक्रामक रोगों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। यह रिपोर्ट ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है।

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तिहाई संक्रामक बीमारियां इंसानों में जानवरों से आई हैं

डेंगू
1960
के दशक में डेंगू के छुटपुट मामले देखे गए दक्षिण एशिया में
1990 के बाद भारत और श्रीलंका में यह महामारी के रूप में आया सामने
90 प्रतिशत 40 साल के आसपास वाली उम्र के वयस्कों में देखा गया डेंगू वायरस
52.1 करोड़ डॉलर (करीब 34 अरब रुपए) की रकम हर साल खर्च करनी पड़ती है देश में डेंगू के इलाज पर
39 करोड़ लोग हर साल संक्रमित होते हैं डेंगू से विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्लूएचओ के

April 14, 2017

शिक्षकों की कमी से जूझ रहे उच्च शिक्षा संस्थान

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सचिन श्रीवास्तव
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने हाल ही में एक बयान देकर बरसों पुरानी बहस को छेड़ दिया है। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी संस्थानों में 40 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की मांग के बीच आधारभूत ढांचे की कमी पर हमेशा से हमला होता रहा है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उच्च शिक्षा तंत्र की यह ऐसी खामी है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है। बेहतर शिक्षक और पर्याप्त बजट के अभाव से जूझ रही भारतीय उच्च शिक्षा कब अपने स्वर्णिम युग को देखेगी, यह कोई नहीं जानता।
दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में नहीं कोई संस्थान

हाल ही में भारत सरकार की ओर से देश के उच्च शिक्षा संस्थानों की रेटिंग जारी की गई है। असल में 2015 के पहले देश का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों में शुमार नहीं था। 2015 में भी महज दो भारतीय संस्थान शीर्ष 200 में जगह बना सके। ऐसे में अपनी रेटिंग के जरिये केंद्र सरकार ने देश की उच्च शिक्षा में प्रतिस्पर्धा का भाव तो जगाने की कोशिश की है, लेकिन आधारभूत सुविधाओं का अभाव सभी

रोजगार के हालात: क्षमता से कम काम की मजबूरी

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सचिन श्रीवास्तव
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढिय़ा ने देश के रोजगार हालात पर बात करते हुए हाल ही में एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि हमारे देश में एम्प्लॉयमेंट के बजाय अंडर एम्प्लॉयमेंट की समस्या है, यानी काम की नहीं, बल्कि कम काम की दिक्कत। कम काम की समस्या से दुनिया का हर देश कभी न कभी पीडि़त रहा है। यह स्थिति किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं कही जा सकती। खासकर तेजी से आगे बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तो यह बड़ा खतरा है। दिलचस्प यह है कि अमरीका में भी अंडर एम्प्लॉयमेंट की बहस इन दिनों तेज है, जो विदेशियों को काम से हटाने के नतीजे के रूप में सामने आ रही है। तो क्या भारत में भी ऐसे हालात बनने वाले हैं?
क्या है अंडर एम्प्लॉयमेंट

अंडर एम्प्लॉयमेंट उस स्थिति को कहते हैं, जब एक व्यक्ति को उसकी क्षमता से कम स्तर का काम मिलता है। यानी ऊपरी तौर पर वह व्यक्ति रोजगार कर रहा होता है, लेकिन उसकी क्षमता से बेहद कम काम उससे लिया जा रहा होता है।

पार्ट टाइम जॉब की मजबूरी
अंडर एम्प्लॉयमेंट को मापने का

April 12, 2017

सख्त सरकारें: सोशल मीडिया की नफरत के खिलाफ बना पहला कानून

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सचिन श्रीवास्तव
सोशल नेटवर्किंग साइट पर अफवाहों और नफरत फैलाने वाली पोस्ट्स से पूरी दुनिया परेशान है। इसके खिलाफ सख्त कानून की मांग भी होती रही है। अब तक विभिन्न सरकारें पुराने और आम कानूनों के आधार पर ही ऐसे मामलों से निपट रही हैं, लेकिन वे नाकाफी साबित हो रहे हैं। जर्मनी ने नफरत फैलाने वाली पोस्ट के खिलाफ नया कानून लाकर एक पहल की है। इस कानून से जुड़े प्रस्ताव को सरकार ने मंजूरी दे दी है और अब संसद की मंजूरी मिलना बाकी है। जर्मनी में कानून प्रभावी होने के बाद दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसे कानून सामने आएंगे। इस बीच विभिन्न सोशल साइट्स ने हेट स्पीच के मामले में अपनी नीतियों को पहले ही सख्त करना शुरू कर दिया है।

शिकायतों पर कार्रवाई
39 फीसदी
शिकायतों पर आपत्तिजनक सामग्री हटाई फेसबुक ने जनवरी-फरवरी 2017 में
01 प्रतिशत पोस्ट डिलीट किए ट्विटर ने इस दौरान
90 प्रतिशत मामलों में कार्रवाई की यूट्यूब ने इस