February 25, 2019

दस्तक संवाद : सोशल मीडिया आभासी दुनिया का एक वास्तविक चेहरा

नवनीत पांडे

"अगर फेसबुक का सबसे अच्छा और सार्थक इस्तेमाल अरुण देव समालोचन के जरिये कर रहे हैं तो व्हाट्सअप्प का बढ़िया इस्तेमाल भोपाल के अनिल करमेले अमिताभ मिश्र अंजू शर्मा और अनामिका चक्रवर्ती कर रही है दस्तक ग्रुप के जरिये।जब व्हाटसअप यूनिवर्सिटी झूठ नफरत फैलाने में लगी है दस्तक साहित्य के प्रचार प्रसार में लगा है प्रेम मोहब्बत सद्भाव मित्रता को फैलाने में लगा है रचनात्मकता को बढ़ाने में लगा है।बिना किसी सरकारी या संस्थागत मदद के।आपसी सहयोग से।वार्षिक आयोजन भी करता है।लोग आते है अपनी रचना पढ़ते है।साहित्य पर बातचीत करते हैं।दस्तक बधाई का पात्र है।" सोशल मीडिया और बाहर की साहित्यिक- सामयिक दुनिया में भी पूर्ण सक्रिय हस्तक्षेप रखनेवाले हमारे समय के महत्त्वपूर्ण मुखर कवि, पत्रकार, समीक्षक बड़े भाई विमल कुमार की उक्त टिप्पणी बताती है कि सोशल मीडिया का भी हम अपने क्षेत्र में कैसे सार्थक उपयोग ले सकते हैं. 

यह सच है कि दस्तक एक व्हाट्स अप समूह है लेकिन यह अन्य सोशल मीडिया व्हाट्स अप, फेसबुक ग्रुपों से इस मायने भिन्न है कि यह उनकी तरह आभासी नहीं है, दस्तक से जुड़े मित्र वास्तविक अर्थ में एक साहित्यिक संस्था मानिंद पिछले पांच सालों से हमारे मोबाइल में हैं और यह सब हो पाया इसके रचयिता और कठोर अनुशासन से चलानेवाले प्रशासक रचनात्मक सोचवाले लेखक मित्रगण कवि अनिल करमेले, कवि- कथाकार अमिताभ मिश्र और कवयित्री- कथाकार अंजू शर्मा जैसे कर्मठ प्रशासकों की वजह से. तीनों अपनी- अपनी क्षमता के अनुरूप अलग- अलग प्रशासन कमान संभाले हैं, तीनों की सहमति से ही इस समूह में सक्रिय व सकारात्मक सोचवाले अनुशासित लेखक मित्र जोड़ते हैं जैसे ही पता चलता है कि कोई इस कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा, विनम्रता से क्षमा सहित ससम्मान उन्हें बाहर कर दिया जाता है, समूह का उद्देश्य है रचनात्मक रचाव के साथ- साथ पाठकीय, कहने के साथ- साथ, सुनने का  भी सन्देश. 

हर दिन की गतिविधि तय है, पोस्ट का अधिकार प्रशासकों को ही है जिसकी वजह से अवांछित, अंधाधुंद कुछ भी लिखना, कॉपी- पेस्ट करने प्रवृत्ति यहां नहीं है. प्रशासकगण सदस्यों से स्वयं पत्रिका सम्पादकों की तरह रचनाएं लेके पोस्ट करते हैं और पोस्ट पर सदस्यों की प्रतिक्रिया का आग्रह भी करते रहते हैं, भले कितने नवोदित सदस्य की रचना हो, साफगोई से टीका- टिप्पणी होती है, सही आलोचना न सह पाने की  वजह से कई बार कई सदस्य बाहर भी हुए हैं, एक और खास बात समय- समय पर अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की महत्त्वपूर्ण रचनाओं का आस्वादन भी यहां होता रहता है.

यह एक ऎसा प्रांगण है जिस में हर शब्दकार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना चाहेगा. आभारी हूं कवयित्री मित्र अंजू शर्मा का जिन्होंने मुझे इस समूह से जोड़ा और  इस समूह के माध्यम से मुझे अनिल करमेले, अमिताभ मिश्र, नवल शुक्ल, देवीला पाटीदार जैसे महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों से सम्पर्क- संवाद,  आत्मीय सानिध्य के साथ ही उनके साथ- साथ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण रचनाकर्म से साक्षात होने के साथ ही दस्तक संवाद के आयोजन में उन से रुबरु होने का अवसर मिला.

हर साल की तरह 9- 10 फरवरी को  इस बार भी दस्तक का वार्षिक संवाद कई मायनों में अनूठा रहा. इस बार के आयोजन में हमारे समय के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, मदन कश्यप और विमल कुमार के  गरिमापूर्ण सानिध्य में आयोजन में शिरकत करनेवाले समूह साथियों अमिताभ मिश्र, अनिल करमेले, प्रज्ञा रावत, स्मिता राजन,  नीलेश रघुवंशी, रक्षा दुबे, अनघा शर्मा, नवल शुक्ल, देवीलाल पाटीदार, सचिन श्रीवास्तव, नीतू दुबे, पूजा सिंह, जया करमेले, मुकेश वर्मा,  संदीप कुमार,  आरती, ईश्वर सिंह दोस्त, पलाश सुरजन, उदिता मिश्र (भोपाल) के अलावा रजनीश साहिल (दिल्ली), पूर्णिमा साहू, (रायपुर) अनीता दुबे,(पुणे) अनामिका चक्रवर्ती, (मनेन्द्रगढ़) रश्मि मालवीय,. राजनारायण बोहरे, रोशनी वर्मा,  आभा निवसरकर, ( इंदौर) बुद्धिलाल पाल,( दुर्ग)  अंजू शर्मा, (दिल्ली)  विभा रानी, (मुंबई)  नेहा नरूका, (ग्वालियर), अमृता जोशी, (जयपुर) आदि को  रचना- पाठ का अवसर तो मिला ही, साथ ही रचना पाठ पर कवि अग्रज राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, मदन कश्यप, विमल कुमार से महत्त्वपूर्ण बेबाक टिप्पणियों के साथ- साथ सुझावों के साथ- साथ कविता- कहानी लिखने से पहले एक कवि- कथाकार अपने समय से मुठभेड़ करते हुए वर्तमान के साथ-साथ अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों, परम्पराओं, मुहावरों  को जानना- समझना  ज़रूरी है, साथ ही भाषा- वर्तनी, शिल्प बरतने में सचेत रहना चाहिए. 

इस संवाद की उपलब्धियों में बाल कथाकार उदिता मिश्र की बाल कहानियों के अलावा नेहा नरूका, आरती, पूर्णिमा साहू की कविताओं के साथ अमिताभ मिश्र, राज बोहरे, अंजू शर्मा, अनीता दुबे, संदीप कुमार व विभारानी आदि  की कहानियों ने सबका ध्यान खींचा.

February 18, 2019

युद्ध से ज्यादा जरूरी है युद्ध का माहौल

सचिन श्रीवास्तव
फर्ज कीजिए कि आप जिस गांव-मोहल्ले में रहते हैं, वहां के किसी अड़ोसी-पड़ोसी या दूर के ही घर से आप लगातार कोई ऐसी चीज खरीदते हैं, जो आपके लिए बेहद जरूरी है, और जिसमें उसे यानी बेचने वाले को खासा मुनाफा होता है। इतना कि उसका परिवार ही उससे चलता है। मान लीजिए दूध ही। 
फिर एक दिन अचानक आप कहते हैं कि आगे से आपसे दूध नहीं लेंगे। अब हम खुद गाय पालेंगे। ऐसे में आमतौर पर क्या होगा? जो आपको दूध बेच रहा है, वह गाय पालने की मुश्किलें बताएगा, कहेगा कि हम हैं न आप तो लीजिए। कुछ सस्ता कर देते हैं। फिर भी आप नहीं मानेंगे तो हो सकता है कि वह कहे कि ले लीजिए गाय। चलिए हम ही बता देते हैं। कोई दिक्कत आएगी तो हम बताएंगे कैसे पालना है। कब उसका इलाज कराना है, कैसे सानी देनी है, कब गाय को चारा देना है। 

इस कहानी को कुछ देर के लिए रोकते हैं और कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं। 

पूरी दुनिया में रक्षा पर खर्च के मामले में भारत पांचवें स्थान पर है। हम अमरीका, चीन, रूस और सऊदी अरब के बाद सबसे बड़ा रक्षा बजट खर्च करते हैं। अभी हालिया बजट की बात की जाए तो भारत का रक्षा बजट 3.18 लाख करोड़ रुपए का है। नहीं समझे, 3.18 लाख करोड़ रुपए यानी 318 के आगे 10 शून्य - 3180000000000 रुपए। इसमें 1.08 लाख करोड़ रुपए रक्षा पेंशन का अलग है। 

चलिये इस बात को दूसरे तरह से देखते हैं। असल में, 2008 से 2012 के पांच साल और फिर 2013 से 2017 के बीच के पांच सालों की तुलना करें तो इस दौरान भारत का हथियारों का आयात 24 प्रतिशत बढ़ गया है। 

इसमें एक तथ्य और जोड़ लीजिए। यह कि- भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियारों का आयातक देश है। इसके बाद सऊदी अरब, मिश्र, यूएई, चीन, ऑस्ट्रेलिया, अल्जीरिया, ईराक, पाकिस्तान और इंडोनेशिया का नंबर आता है।

एक और बात। बीते पांच सालों मे भारत ने जो हथियार खरीदे हैं, उनमें से 62 प्रतिशत हथियार रूस से, 15 प्रतिशत अमेरिका से और 12 प्रतिशत इजराइल से खरीदे हैं। 

अब इसमें कुछ बातें ठहरकर सोचिए। भारत रक्षा उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहता है। बीते 4 साल से इसमें राजनीति हुई है और कोशिशें बेहद धीमी हैं, लेकिन फिर भी बात आगे बढ़ाना शुरू हुई है। 

अब हम जो हथियार रूस, अमेरिका, इजराइल और ऐसे ही बड़े हथियार निर्यातकों से खरीद रहे हैं, उसमें अगर हम कटौती करते हैं, तो लाजिमी है कि इन बड़े देशों को यह नागवार गुजरेगा। गुजर रहा है। असल में हथियारों के विक्रेताओं के लिए युद्ध से ज्यादा जरूरी युद्ध का माहौल है। माहौल बना रहेगा तो बिक्री होती रहेगी। डर के इस खेल में देश महज एक ईकाई है। जिसकी जितनी खरीद की क्षमता है, उसे डर उतना ही बड़ा बताया जाता है। इस बार इस डर को जमीन पर लाया जा रहा है। 

तो अब जब चार दिन से 42 जांबाज जवानों की शहादत के बाद बने माहौल में जुबानी जंग काफी तीखी रही है और हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, उसमें कोई बड़ी बात नहीं कि जल्द ही हम एक जमीनी युद्ध के भी गवाह बनें। 
यह जरूरी है या नहीं?
युद्ध में जानें दोनों तरफ से जाती हैं?
युद्ध के बाद सूनी मांगें और यतीम बच्चों के सवालों का कोई जवाब नहीं होता?

या फिर 
जैसे को तैसा ही असली जवाब होता है?
आखिर एक बार में यह किस्सा खत्म हो ही जाना चाहिए?
42 जवानों की शहादत को बेकार नहीं जाने दिया जाएगा?
बदला जरूरी है, चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो?

इन सवालों के जवाब आप सभी अपने-अपने ढंग से दे सकते हैं, लेकिन फिलहाल एक बड़ा सवाल यह है कि इस दौर में फायदा किसका होगा?

मोदी सरकार का?
जो पहले ही तमाम तरह की उलझनों में घिरी हुई थी और राष्ट्रहित के नाम पर अब उसे कई सवालों से मुंह चुराने का मौका मिल जाएगा और यह भी संभव है कि इस हल्ले में वह अगले चुनाव में भाजपा के पक्ष में हालात बन जाएं। 

या कांग्रेस का?
जिसके लिए राष्ट्रहित में सरकार का समर्थन मजबूरी है और गाहे बगाहे वह भाजपा राष्ट्रहित को राजनीति से दूर करने की नसीहत के बीच अपने लिए जमीन तलाशेगी। 

क्षेत्रीय दलों का?
जो भाजपा-कांग्रेस की अब तक की कारगुजारियों के बलबूते अपने लिए बेहतर हालात बनने की राह देख रहे हैं। 

या अफसरशाही का?
जिसके लिए बाढ़, तूफान से लेकर किसी भी तरह की राष्ट्रीय आपदा या फिर युद्ध महज जेब भरने का एक और तरीका होता है। 

या मीडिया का?
जो बड़ी खबर और भावुक भारतीय जनमानस को बरगलाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है

या देशविरोधी तत्वों का?
जो देश के भीतर बढ़ते खेमों का इस्तेमाल करने के लिए किसी भी छोटे मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते?

या फिर
उस हथियार लॉबी का जो पिछले एक साल से संकट के दौर से गुजर रही है और 1990 के बाद लगातार इस कोशिश में लगी हुई है कि दुनिया में एक बड़े युद्ध का माहौल तैयार हो। 

मेरा मानना है कि हथियार के सौदागर पाकिस्तान की माली हालत को देखते हुए कुछ हथियार मुफ्त मुहैया कराएंगे और अगर भारत के साथ युद्ध में वह कमजोर पड़ेगा तो युद्ध को लंबा खींचने के लिए और ज्यादा इमदाद भी कर सकते हैं। जबकि दोनों तरफ के हथियारों की कीमत को वसूला भारतीय पक्ष से ही जाएगा। 

इसके खिलाफ हम लिखें, बोलें, बात करें, एक दूसरे से झगड़ें, लेकिन यह सच्चाई है कि हम महज दर्शक हैं और असली खेल कहीं और से खेला जा रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर महज इन हालात का फायदा अपने-अपने ढंग से उठाये जाने की कोशिशें भर हो रही हैं। 

अब फिर उसी गाय की कहानी पर... 
असल में तो हमारे घर की जरूरत को वह विक्रेता ही तय कर रहा है और हमारी आत्मनिर्भरता उसके धंधे में आड़े आती है।
इस पर फिर कभी कि क्यों अमरीका और रूस के बीच भारत को हथियार बेचने की होड़ है और दोनों चाहते हैं कि भारत उन्हीं से अपने हथियार खरीदे!
शुभ रात्रि

February 1, 2019

मौजूदा समय की दो हिंसक प्रतिनिधि तस्वीरें

सचिन श्रीवास्तव

बीते दो दिनों से इंटरनेट पर दो तस्वीरें बेहद तेजी से प्रसारित हुई हैं। पहली तस्वीर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर की है, जिसमें वे नाक में नली लगाए हुए विधानसभा पहुंचे हैं। बजट पेश करने के लिए। दूसरी तस्वीर कल तक नामालूम रही एक महिला की है, जिसने बीती सदी के सर्वश्रेष्ठ इंसानों में से एक को गोली मारने के दृश्य की नकल की है। यह दोनों ही तस्वीरें हमारे समय की बड़ी तस्वीर का मुकम्मल तो नहीं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा तैयार करती हैं। 

राजनीति से बिछुड़ न पाने का संत्रास
पहले बात गोवा के मुख्यमंत्री की तस्वीर की। मनोहर पर्रिकर के राजनीतिक दोस्तों की संख्या उनके दुश्मनों से कहीं ज्यादा है। वे पार्टी के बाहर भी खासे लोकप्रिय रहे हैं और विभिन्न दलों, विचारों के बीच उनकी एक पॉजिटिव छवि बनी है। ऐसे समय में जब मुख्यमंत्रियों की अय्याशियों, अहंकार और वैभव के किस्से आम हों, तब भाजपा में उनका होना उम्मीद और उदाहरण की बात है। वाम दलों के मुख्यमंत्रियों के बरअक्स उनकी सादगी को खड़ा भी किया गया है।

पर्रिकर की कैंसर से जूझती छवि के बीच यह जो तस्वीर हाल ही में प्रसारित हुई है, इसे समझिये? क्या उदाहरण पेश करती है। काम करने का। जिंदगी की आखिरी सांस तक काम करते रहे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में शायद हम पर्रिकर जी को याद रखेंगे जिन्होंने अपने आखिरी समय में अस्पताल के बजाय काम करने को तरजीह दी। लेकिन ठहरिये, यहां दूसरा पहलू यह है कि जब आखिरी वक्त आ ही गया है, तो क्यों एक व्यक्ति मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर है? क्यों किसी और को कमान नहीं सौंप देता? राज्य के नागरिकों को कुछ जरूरी निर्णयों की दरकार होगी, क्या एक बीमार व्यक्ति जिसके प्रति पूरी संवेदना है, लेकिन क्या उसका दिमाग एक राज्य के नागरिकों के भविष्य को सुनिश्चित करने के फैसले करने के लिए स्वस्थ्य है और दुनिया की उलझनों से मुक्त होकर क्यों नहीं अपने आखिरी सफर के पहले वह खुद को वक्त देता है?

पूंजीवाद के लिए जरूरी है अतिरिक्त श्रम
हम नहीं जानते कि आने वाले वक्त में इन दोनों ही अतिरंजित संभावनाओं में से कौन सी इतिहास में दर्ज होगी? संभव है खुद पर्रिकर के दिमाग में ऐसा कुछ न हो, और वे बस अपने काम को अंजाम दे रहे हैं, लेकिन पूंजीवाद के इस भ्रष्टतम दौर में ऐसी तस्वीरें बेहद जरूरी हो जाती हैं। अपने आसपास नजर दौड़ाइये। कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होगा। आपके ऑफिस में, मोहल्ले में, आस-पड़ोस में, मिलने-जुलने वालों में, जिसका काम के प्रति समर्पण आपको और ज्यादा काम करने के लिए प्रेरित करता होगा। क्या यह वह समय नहीं है, जिसमें बहुत ज्यादा काम करने को दुनिया के सबसे महान गुणों में से एक माना जा रहा है। मैं हमेशा इस अत्याधिक काम करने की प्रवृत्ति के खिलाफ लिखता-बोलता-समझता रहा हूं। क्या सच में इंसान काम करने की मशीन भर है और काम भी जिसमें पूंजीवादी संस्थानों में महज एक उत्पादक प्रक्रिया का हिस्सा बना रहा जाए। उत्पादन प्रक्रिया में जब एक व्यक्ति अपने मूल क्षमता या तयशुदा घंटों से ज्यादा काम करता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि वह एक बेरोजगार को अंधेरे में धकेल रहा है। दिलचस्प यह है कि ऐसे व्यक्तियों के उदाहरण के जरिये हर एक को ऐसा करने की हिदायत धमकी भरे पुट में दी जाती है। धीरे—धीरे जब ऐसे लोगों की संख्या संस्थान में बढ़ जाती है, तब उस अतिरिक्त काम को ही सामान्य काम के घंटे मान लिया जाता है। मीडिया संस्थानों में काम करने के वाले युवा इस बात को अच्छी तरह महसूस करते होंगे। आठ घंटे की शिफ्ट कब 10 और 12 घंटों में तब्दील हो जाती है, उन्हें पता नहीं चलता है। यही हाल लगभग हर सेक्टर का है। काम के प्रति समर्पण और काम के बोझ में व्यक्ति को झौंकने का यह पूंजीवादी षडयंत्र पर्रिकर की हालिया तस्वीर से बल पाता है। विभिन्न आईटी समूहों में काम करते युवा हों या फिर गली-मोहल्लों में काम करने वाले असंगठित मजदूर सभी काम के तय घंटों से अधिक श्रम कर रहे हैं- हंसते-हंसते। और यही पूंजीवाद की बड़ी खूबी है। वह शोषण को उत्सव में तब्दील कर चुका है। जिसमें अतिरिक्त श्रम के कारण कम हुई नौकरियों को पाने वाले संभावित युवा सड़कों पर हैं।

अंहिसक विचार पर हावी होती हिंसा
दूसरी तस्वीर हमारे समय की हिंसा का बड़ा रूपक है। 20वीं सदी में जब हमने पूरी दुनिया को हिटलर की हिंसा से त्रस्त दुनिया को अंहिसा से हासिल आजादी का नायाब विचार दिया था तो यह उम्मीद भी की गई थी कि बुद्ध और गांधी के देश में यह विचार तेजी से फलेगा-फूलेगा। बीती सदी के सातवें और आठवें दशक में फले-फूले नक्सलवाद को भी दो दशकों में समेट दिया और हिंसा को जमीन के भीतर गाढ़ दिया था, ऐसे में एक बार फिर जो हिंसक उन्माद फैल रहा है, वह डराता है। दिलचस्प है कि एक तरफ 90 के दशक में भारतीय युवाओं ने नक्सलवाद की हिंसा से मुंह मोड़ा था, और उसी दौर में हम फासीवादी हिंसा की जकड़ में आ रहे थे। आज कुछ ज्यादा ही। गांधी की तस्वीर को गोली मारने वाली सोच को तस्वीरों से बाहर हम हर रोज चौक चौराहों पर देख रहे हैं। यह भयावह है कि हत्या को सनसनीखेज बनाने के फिल्मी-खबरिया प्रयास अब आसानी से अभिनीत भी किए जाने लगे हैं।

अत्याधिक काम के जरिये किसी दूसरे के श्रम के महत्व को कम करने की पूंजीवादी हिंसा और मारे जा चुके व्यक्ति को फिर से मारने की निर्लज्ज उन्मादी हिंसा के इस घटाटोप में उम्मीद की किरणें बहुत धुंधली हैं, लेकिन वे हैं। उनकी पहचान जल्द करना जरूरी है। 

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