March 13, 2011

आवाम के शायर हबीब जालिब की याद में

यह पोस्ट कल डाली जानी थी, लेकिन वक्त की कमी और अखबारी मसरूफियत की वजह से यह हो न सका। कल हबीब जालिब की पुण्यतिथि थी। 12 मार्च 1993 को वे हमारे बीच नहीं रहे थे, लेकिन वे ऐसे शायर हैं, जिन्हें याद करने के लिए तारीखों की जरूरत नहीं। हबीब उन चंद नामों में से हैं कि कोई पूछे कि एक शायर, कवि, साहित्यिक या इंसान को कैसा होना चाहिए, तो हम बिना दिमाग पर जोर डाले जिन नामों को जवाब की शक्ल में उछाल सकते हैं, उनमें से एक नाम इस आवाम के शायर का भी है। जिन लोगों ने हबीब को पढा-सुना है वे मेरी बात से सहमत होंगे। हालांकि ऐसे लोग कम ही होंगे, जिन्होंने हबीब जालिब को नहीं पढा। फिर भी उन बदकिस्मत लोगों के लिए अफसोस के अलावा चंद बातें और कुछ नज्में।

पाकिस्तान में 24 मार्च 1928 को पैदा हुए जालिब उम्र भर अपनी कविताओं के माध्यम से पाकिस्तान के सैनिक कानून, तानाशाही और राज्य की हिंसा के खिलाफ लिखते, बोलते और तकरीरें करते रहे। उम्र भर सत्ता की आंख में चुभते रहे जालिब की कविताएं पाकिस्तान की सीमा पर कर दुनिया के हर संघर्ष और सत्ता की खिलाफत करने वाले इंसान की आवाज बन गई हैं।

अंग्रेजी राज में पैदा हुए जालिब का शुरुआती नाम हबीब अहमद था। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान का रुख कर गए और कराची से निकलने वाले डेली इमरोज में पूफ्ररीडर हो गए। प्रगतिशीलता के पक्षधर जालिब ने इसी दौरान कुछ अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद किया, जिनसे वे पाठकों की नजरों में आए। उस दौर के स्थापित नामों से अलग शैली अपनाते हुए उन्हें सपाट बयानी और पाठक को संबोधित करने वाली भाषा की बुनावट में जुल्म, ज्यादती, मुफलिसी और गैर बराबरी को अपनी कविताओं का हिस्सा बनाया। अपने समय की राजनीति पर लयबद्ध कविताओं के जरिए चोट करने वाले जालिब जल्द ही आवाम के शायर हो गए थे।

पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे जालिब मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित थे और अपनी कविताओं के विषय कम्यूनिज्म की बारीकियों से ही चुनते थे। पाकिस्तान में जब कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया गया था और इसके सदस्य राष्ट्रीय आवामी पार्टी के बैनर तले काम कर रहे थे, तब हबीब जालिब भी एनएपी के साथ जुड़ गए। इस दौरान भी हबीब जालिब के तेवर तीखे ही रहे और इसी कारण उन्हें अपना ज्यादातर समय जेल में बिताना पड़ा। वे पहली बार अय्यूब खान के सैनिक शासन में जेल गए। यह जेल अय्यूब खान की पूंजीवादी नीतियों के विरोध का सिला थी। इस दौरान जेल में उन्होंने अपनी मशहूर नज्म ‘दस्तूर’ लिखी। 1962 में जब अय्यूब खान के संविधान को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी मुहम्मद अली ने लायलपुर के क्लॉक टॉवर से सराहा, तो हबीब ने इसके जवाब में नज्म ‘मैं नहीं मानता’ लिखी। शासन के विरुध अपने तीखे तेवरों के कारण उस दौर के सरकारी मीडिया में जालिब को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन वे झुके नहीं और अन्य मोर्चों पर निरंकुश शासन की खिलाफत करते रहे। फातिमा जिन्ना ने जब अय्यूब खान के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी की, तो तमाम लोकतांत्रिक ताकतें उनके इर्दगिर्द इकट्ठा हो गर्इं और सरकारी प्रतिबंध के बावजूद जालिब ने पूरी पाकिस्तानी आवाम के दर्द को अपनी लेखनी में उतारते हुए बड़े जनसमूहों को उस दौर में अपनी शायरी के जरिए संबोधित किया। उस दौर में उन्होंने ‘मां के पांव तले जन्नत है, इधर आ जाओ’ जैसी कविताएं भी लिखीं, जो उनकी भावुकता का चरम मानी जाती है। यूं भी जालिब को अपनी कविताएं पूरी भावुकता के साथ पढ़ने के लिए भी याद किया जाता है।

घटनाएं जालिब को शायरी के लिए किस कदर प्रभावित करती थीं, इसका एक और बड़ा उदाहरण है। यह घटना पाकिस्तान की प्रतिरोधी संस्कृति की लोकगाथाओं में भी शुमार की जाती है। हुआ यूं कि एक बार पश्चिमी पाकिस्तान (तब बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था और मूल पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान कहा जाता था) के गर्वनर से मिलने ईरान के शाह रेजा पहलवी आए। उनके मनोरंजन के लिए गवर्नर ने फिल्म कलाकार नीलू को डांस करने के लिए बुलाया। नीलू ने इससे इंकार कर दिया, तो उसे लेने के लिए पुलिस भेजी गई। जिस पर नीलू ने आत्महत्या का प्रयास किया। इस घटना पर हबीब जालिब ने कविता लिखी, जो बाद में नीलू के पति रियाज शाहिद ने अपनी फिल्म ‘जर्का’ में इस्तेमाल की। ये कविता थी- ‘तू क्या नावाकिफ-ए-आदाब-ए-गुलामी है अभी/ रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है।’

1972 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो के शासन में आने के बाद जालिब के कई साहित्यिक और राजनीतिक साथी सत्ता का लुत्फ लेने लगे और भुट्टो के साथ हो लिए। जालिब ने इस दौरान विपक्ष की भूमिका को ही पसंद किया। बताया जाता है कि एक बार जालिब भुट्टो से मिलने उनके घर पहुंचे। भुट्टो ने अपनी पार्टी में आने का न्यौता देते हुए जालिब से पूछा- ‘कब शामिल हो रहे हो?’ जिस पर जालिब ने जवाब दिया-‘क्या कभी समुंदर भी नदियों में गिरा करते हैं?’ तब भुट्टो ने जवाब दिया- ‘कभी-कभी समुद्र नदियों की तरफ जाते हैं, लेकिन नदियां ही उन्हें पीछे धकेल देती हैं’। अपनी शासन विरोधी कार्रवाइयों के कारण जालिब को एक बार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, तब जुल्फिकार भुट्टो ने ही उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था।

इसके बाद जनरल जिया उल हक की तानाशाही के दौरान जालिब ने लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने अपनी मशहूर कविता ‘क्या लिखना’ लिखी। जिया का अर्थ होता है, प्रकाश और जालिब इसीलिए पूछते हैं, ‘जुल्मत को जिया क्या लिखना’। जिया उल हक के शासन में ज्यादातर वक्त जालिब जेल में रहे।

1988 में जनरल जिया उल हक की हवाई दुर्घटना में मौत के बाद हुए आम चुनाव जीतकर बेनजीर भुट्टो शासन में आर्इं, उन्होंने हबीब जालिब को जेल से रिहा कराया। तानाशाही के बाद आए लोकतंत्र में कुछ लोगों को राहत मिली, लेकिन आवाम के तरफदारों के लिए यह मुसीबत का दौर था। निरंकुश तानाशाही के बाद लोकतंत्र की बयार में पाकिस्तान के कई लेखकों-शायरों के लिए वैचारिक संकट था। अगर वे बेनजीर के लोकतंत्र की खिलाफत करते थे, तो उन्हें तानाशाही की याद दिलाई जाती थी, कि उस दौर से तो यह दौर बेहतर है। ऐसे में एक बार जालिब से पूछा गया कि वे इस लोकतंत्र में क्या बदलाव चाहते हें, तो उन्होंने अपनी एक नज्म के जरिए मुल्क पर चढ़े कर्ज और औरतों के हालात का जिक्र करते हुए जवाब दिया-
हाल अब तक वही हैं गरीबों के
दिन फिरे हैं फकत वजीरों के
हर ‘बिलावल’ है देश का मकरोज
पांव नंगे हैं ‘बेनजीरों’ के

जालिब की कविता में उनके दर्शन और जिंदगी की करीबी सच्चाइयों को साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। वे कभी अपने रास्ते से नहीं डिगे। वे इंसान से प्यार करते थे, मजलूमों के लिए उनके दिल में हमदर्दी थी और यह उनके हर एक लिखे, बोले हर्फ में दिखाई देती है। हबीब अपने समय के उन दुर्लभ कवियों में शामिल हैं, जिनका अन्याय और क्रूरता के खिलाफ गुस्सा ताजिंदगी रचनात्मक ऊर्जा के साथ एक राजनीतिक हस्तक्षेप भी मुहैया कराता रहा। जालिम हमारे दौर के क्रूर सामाजिक ढांचे के भुक्तभोगी भी हैं। उन्हें कई बार ऐसे अपराधों में फंसाकर जेल भेजा गया, जो उन्होंने किए ही नहीं थे।

अपने आखिरी वक्त तक जालिब पाकिस्तान की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। उनकी मौत के बाद 1994 में कम्यूनिस्ट पार्टी का मजदूर किसान पार्टी में विलय हो गया, अब इसे कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के नाम से जाना जाता है। कम्यूनिस्ट मजदूर किसान पार्टी के दो सदस्यों शहराम अजहर और तैमूर रहमान ने उनकी याद में एक म्यूजिक वीडियो लांच किया था। जालिब के संघर्ष के रूपक को इस्तेमाल करते पाकिस्तान बैंड ‘लाल’ ने भी काफी काम किया है। 2009 में इस बैंड ने ‘उम्मीद ए सहर’ नाम से भी एक अलबम निकाला। 2009 में 23 मार्च को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने हबीब जालिब को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिया।
जालिब के बारे में लिखने-पढ़ने-कहने-सुनने को इतना कुछ है कि उसे एक बार में याद नहीं किया जा सकता। फिलवक्त उनकी चंद नज्मों, गजलों का लुत्फ उठाएं। और इजाजत दें। फिर वक्त मिला तो किसी और फनकार के साथ हाजिर होउंगा। शब्बा खैर।

हबीब जालिब की कुछ गजलें

दीप जिसका महलात ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मस्लहत के पले
ऐसे दस्तूर को सुबह ए बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
मैं भी खाइफ नहीं तख्त ए दार से
मैं भी मंसूर हूं कह दो अग्यार से
क्यूं डराते हो जिंदां की दीवार से
जुल्म की बात को जेह्ल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
फूल शाखों पे खिलने लगे तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो
इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
तुमने लूटा है सदियों हमारा सुकूं
अब ना हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूं
चारागर में तुम्हें किस तरह से कहूं
तुम नहीं चारागर कोई माने मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
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बहुत मैंने सुनी है आपकी तकरीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तकदीर मौलाना

खुदारा शुक्र की तलकीन अपने पास ही रख्खें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिटाई से
ये है जुर्म मेरा और यही तासीर मौलाना

हकीकत का क्या है, ये तो आप जानें या खुदा जाने
सुना है जिम्मी कार्टर है आप का पीर मौलाना

जमीनें हों वडेरों की मशीनें हों लुटेरों की
खुदा ने लिख के दी है ये तुम्हें तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यूं नहीं मिल कर फलस्तीन के लिए लड़ते
दुआ ही से फकत कटती नहीं जंजीर मौलाना

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इक पटरी पर सर्दी में अपनी तकदीर को रोए
दूजा जुल्फों की छाओं में सुख की सेज पे सोए
राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास
भए कबीर उदास

ऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं
कदम कदम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं
धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास
भए कबीर उदास

गीत लिखाएं पैसे ना दे फिल्म नगर के लोग
उनके घर बाजे शहनाई लेखक के घर सोग
गायक सुर में क्योंकर गाए क्यों ना काटे घास
भए कबीर उदास

कल तक जो था हाल हमारा हाल वही हैं आज
‘जालिब’ अपने देस में सुख का काल वही है आज
फिर भी मोची गेट पे लीडर रोज करे बकवास
भए कबीर उदास

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तेरे लिए मैं क्या-क्या सदमे सहता हूँ
संगीनों के राज में भी सच कहता हूँ
मेरी राह में मस्लहतों के फूल भी हैं
तेरी खातिर कांटे चुनता रहता हूँ
तू आएगा इसी आस में झूम रहा है दिल
देख ऐ मुस्तकबिल

इक-इक करके सारे साथी छोड़ गए
मुझसे मेरे रहबर भी मुँह मोड़ गए
सोचता हूँ बेकार गिला है गैरों का
अपने ही जब प्यार का नाता तोड़ गए
तेरे दुश्मन हैं मेरे ख़्वाबों के कातिल
देख ऐ मुस्तकबिल

जेहल के आगे सर न झुकाया मैंने कभी
सिफ़्लों को अपना न बनाया मैंने कभी
दौलत और ओहदों के बल पर जो ऐंठें
उन लोगों को मुँह न लगाया मैंने कभी
मैंने चोर कहा चोरों को खुलके सरे महफिल
देख ऐ मुस्तकबिल

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मैंने उससे ये कहा
ये जो दस करोड़ हैं
जेहल का निचोड़ हैं
इनकी फिक्र सो गई
हर उम्मीद की किस
जुल्मतों में खो गई
ये खबर दुरुस्त है
इनकी मौत हो गई
बे शऊर लोग हैं
जिन्दगी का रोग हैं
और तेरे पास है
इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा
तू खुदा का नूर है
अक्ल है शऊर है
कौम तेरे साथ है
तेरे ही वजूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर पसंद हैं
इनकी खींच ले जबां
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा
जिनको था जबां पे नाज
चुप हैं वो जबां दराज
चैन है समाज में
वे मिसाल फर्क है
कल में और आज में
अपने खर्च पर हैं कैद
लोग तेरे राज में
आदमी है वो बड़ा
दर पे जो रहे पड़ा
जो पनाह मांग ले
उसकी बख़्श दे खता

मैंने उससे ये कहा
हर वजीर हर सफीर
बेनजीर है मुशीर
वाह क्या जवाब है
तेरे जेहन की कसम
खूब इंतेखाब है
जागती है अफसरी
कौम महवे खाब है
ये तेरा वजीर खाँ
दे रहा है जो बयाँ
पढ़ के इनको हर कोई
कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा
चीन अपना यार है
उस पे जाँ निसार है
पर वहाँ है जो निजाम
उस तरफ न जाइयो
उसको दूर से सलाम
दस करोड़ ये गधे
जिनका नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मराँ
तू चकीं ये गुमाँ
अपनी तो दुआ है ये
सद्र तू रहे सदा
मैंने उससे ये कहा

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फिरंगी का जो मैं दरबान होता
तो जीना किस कदर आसान होता

मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते
मैं हर गर्मी में इंग्लिस्तान होता

मेरी इंग्लिश बला की चुस्त होती
बला से जो न उर्दू दान होता

झुका के सर को हो जाता जो ‘सर’ मैं
तो लीडर भी अजीमुश्शान होता

जमीनें मेरी हर सूबें में होतीं
मैं वल्लह सदेर पाकिस्तान होता
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वतन को कुछ नहीं खतरा निजामेजर है खतरे में
हकीकत में जो रहजन है, वही रहबर है खतरे में

जो बैठा है सफे मातम बिछाए मर्गे जुल्मत पर
वो नौहागर है खतरे में, वो दानिशवर है खतरे में

अगर तश्वीश लाहक है तो सुल्तानों को लाहक है
न तेरा घर है खतरे में न मेरा घर है खतरे में

जो भड़काते हैं फिकार्वारियत की आग को पैहम
उन्हीं शैताँ सिफत मुल्लाओं का लश्कर है खतरे में

जहाँ ‘इकबाल’ भी नजरे खतेतंसीख हो ‘जालिब’
वहाँ तुझको शिकायत है, तेरा जौहर है खतरे में
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कहाँ कातिल बदलते हैं फकत चेहरे बदलते हैं
अजब अपना सफर है फासले भी साथ चलते हैं

बहुत कमजर्फ़ था जो महफिलों को कर गया वीराँ
न पूछो हाले चाराँ शाम को जब साये ढलते हैं

वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक भी पहुँचती है
न वो सूरज निकलता है, न अपने दिन बदलते हैं

कहाँ तक दोस्तों की बेदिली का हम करें मातम
चलो इस बार भी हम ही सरे मकतल निकलते हैं

हमेशा औज पर देखा मुकद्दर उन अदीबों का
जो इब्नुल वक्त होते हैं हवा के साथ चलते हैं

हम अहले दर्द ने ये राज आखिर पा लिया ‘जालिब’
कि दीप ऊँचे मकानों में हमारे खूँ से जलते हैं

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खतरा है जरदारों को/ गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को/ खतरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आखिर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेने वाले उल्फत से बेगाने क्यों

खतरा है खूंखारों को/ रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को/ खतरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लजी है बया ऐवानों में
बिक न सकेंगे हसरतों अमों ऊँची सजी दुकानों में

खतरा है बटमारों को/ मगरिब के बाजारों को
चोरों को मक्कारों को/ खतरे में इस्लाम नहीं

अम्न का परचम लेकर उठो हर इंसाँ से प्यार करो
अपना तो मंशूर है ‘जालिब’ सारे जहाँ से प्यार करो

खतरा है दरबारों को/ शाहों के गमखारों को
नव्वाबों गद्दारों को/ खतरे में इस्लाम नहीं
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नाम चले हरनामदास का काम चले अमरीका का
मूरख इस कोशिश में हैं सूरज न ढले अमरीका का

निर्धन की आंखों में आंसू आज भी है और कल भी थे
बिरला के घर दीवाली है तेल जले अमरीका का

दुनिया भर के मजलूमों ने भेद ये सारा जान लिया
आज है डेरा जरदारों के साए तले अमरीका का

काम है उसका सौदेबाजी सारा जमाना जाने है
इसीलिए तो मुझको प्यारे नाम खले अमरीका का

गैर के बलबूते पर जीना मर्दों वाली बात नहीं
बात तो जब है ऐ ‘जालिब’ एहसान टले अमरीका का
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हरियाली को आंखे तरसें बगिया लहू लुहान
प्यार के गीत सुनाऊँ किसको शहर हुए वीरान
बगिया लहू लुहान
डसती हैं सूरज की किरनें चांद जलाए जान
पग पग मौन के गहरे साये जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है लेकर तीर कमान
बगिया लहू लुहान
छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात
और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात
दुनियावालो कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात
खून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान
बगिया लहू लुहान
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(यह नज्म स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिए हैदराबाद सिंध जेल में लिखी गई)
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
तेरी अगर आवाज न होती
बुझ जाती जीवन की ज्योति
तेरे सच्चे सुर हैं ऐसे
जैसे सूरज चांद सितारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
क्या-क्या तूने गीत हैं गाए
सुर जब लागे मन झुक जाए
तुझको सुनकर जी उठते हैं
हम जैसे दुख दर्द के मारे
तेरे मधुर गीतों के सहारे
बीते हैं दिन रैन हमारे
मीरा तुझमें आन बसी है
अंग वही है रंग वही है
जग में तेरे दास है इतने
जितने हैं आकाश में तारे
तेरे मधुर गीतां के सहारे
कटते हैं दिन रैन हमारे
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बीस घराने हैं आबाद
और करोड़ों हैं नाशाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

आज भी हम पर जारी है
काली सदियों की बेदाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा
गौहर, सहगल, आदमजी
बने हैं बिरला और टाटा
मुल्क के दुश्मन कहलाते हैं
जब हम करते हैं फरियाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

लाइसेंसों का मौसम है
कंवेंशन को क्या गम है
आज हुकूमत के दर पर
हर शाही का सर खम है
दर्से खुदी देने वालों को
भूल गई इकबाल की याद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

आज हुई गुंडागर्दी
चुप हैं सिपाही बावर्दी
शम्मे नवाये अहले सुखन
काले बाग ने गुल कर दी
अहले कफस की कैद बढ़ाकर
कम कर ली अपनी मीयाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

ये मुश्ताके इसतम्बूल
क्या खोलूं मैं इनका पोल
बजता रहेगा महलों में
कब तक ये बेहंगम ढोल
सारे अरब नाराज हुए हैं
सीटो और सेंटों हैं शाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद

गली गली में जंग हुई
खिल्कत देख के दंग हुई
अहले नजर की हर बस्ती
जेहल के हाथों तंग हुई
वो दस्तूर हमें बख़्शा है
नफरत है जिसकी बुनियाद
सद्र अय्यूब जिन्दाबाद
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इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे
जिंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे

ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पा_इन्दा हैं जर्रों के सहारे

हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे

हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे

कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
कब तक कोई उलझी हुई जुल्फों को सँवारे
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दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं

बीत गया सावन का महीना मौसम ने नजरें बदली,
लेकिन इन प्यासी आँखों में अब तक आँसू बहते हैं

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं

जिस की खातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए,
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं

वो जो अभी रहगुजर से, चाक-ए-गरेबाँ गुजरा था,
उस आवारा दीवाने को 'जलिब'-'जलिब' कहते हैं
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ये और बात तेरी गली में ना आएं हम
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम

मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गए
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं

हम शायद बाकैद-ए-जीस्त ये साअत ना आ सके
तुम दास्ताँ-ए-शौक सुनो और सुनाएं हम

बेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजा
तारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हम

उस के बगैर आज बहुत जी उदास है
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हम
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कौम की बेहतरी का छोड़ ख़्याल
फिक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल
तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल
बेजमीरी का और क्या हो मआल
अब कलम से इजारबंद ही डाल

तंग कर दे गरीब पे ये जमीन
खम ही रख आस्तान-ए-जर पे जबीं
ऐब का दौर है हुनर का नहीं
आज हुस्न-ए-कमाल को है जवाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल

क्यों यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात बात चले
क्यों सितम की सियाह रात ढले
सब बराबर हैं आसमान के तले
सबको रजाअत पसंद कह के टाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
नाम से पेश्तर लगाके अमीर
हर मुसलमान को बना के फकीर
कस्र-ओ-दीवान हो कयाम कयाम पजीर
और खुत्बों में दे उमर की मिसाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
आमीयत की हम नवाई में
तेरा हम्सर नहीं खुदाई में
बादशाहों की रहनुमाई में
रोज इस्लाम का जुलूस निकाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल
लाख होंठों पे दम हमारा हो
और दिल सुबह का सितारा हो
सामने मौत का नजारा हो
लिख यही ठीक है मरीज का हाल
अब कलम से इजारबंद ही डाल

4 comments:

साहिल said...

हुकूमत की ख़िलाफत में आम आदमी की आवाज़, आम आदमी की ज़ुबान में बुलंद करने वाले इस तरक्कीपसंद शायर को यूं याद करना और याद बनाए रखना फिलवक्त दुनिया के निजाम को देखते हुए निहायत ज़रूरी कोशिशों में से एक है, जो बड़े ही उम्दा तरीके से बयां होती नज़र आई।
फैज़, नासिर, हबीब ज़ालिब और इसी फेहरिस्त के तमाम शायरों की दुनियावी सोच और साफगोई के बारे में एक शैर कहा जा सकता है-

'उनके क़ायदे, रवायत-ओ-अदा और
अपना शऊर-ए-ज़िंदगी उनसे जुदा और'

second opinion said...

आपके ब्लॉग का नाम नयी इबारत बिलकुल सही ही है.... हबीब जालिब को पढवाने का बहुत शुक्रिया.लेख में जानकारियाँ बेहतरीन हैं.और बहुत ही सुन्दर नज्में ... बहुत दिनों से जो पढ़ना चाह रही थी अनायास ही मिल गया .

Arun Dixit said...
This comment has been removed by the author.
Arun Dixit said...

हबीब जालिब अवाम के शायर थे। उनकी शायरी सियासत, सरमाया, हुकूमत और निजाम के दकियानूसी और मक्कारी से भरे दस्तूरों के खिलाफ मुसलसल जंगजू रही है। पाकिस्तान में मार्शल ला के जमाने में भी उन्होंने अपनी तर्ज नहीं बदली और हुकूमत के जुल्मों का शिकार भी हुए। उनकी जिन्दगी का छोटा सा ब्योरा है और उनकी कुछ शानदार कतिताएं भी।

बाजारू संस्कृति ने उनके बरअक्स कुमार विश्वास जैसे कवियों की फौज खडी की है और अफ़सोस कि अवाम भी बाजारू होती जाती है।