December 3, 2007

एक शख्सियत जिसका नया पहलू नुमांया हुआ


कुछ लोग समय के बाद पैदा होते हैं, कुछ लोग समय के पहले पैदा हो जाते हैं. समय पर जन्म लेने वाले कम ही होते हैं. यह सफल लोग होते हैं. राजू नीरा अपने समय के पहले पैदा हुए हैं और उन्होंने अपने समय के बहुत बाद जन्म लिया है. यह दोनों ही तथ्य सही हैं. राजू की व्यावहारिकता अपने समय से पीछे की है इसलिए वे देर से दुनिया में आए यह सच लगता है. नीरा अपने समय की सीमाओं को लांघकर सपने देखने की जिद्दी हरकत करते हैं, इसलिए वे अपने समय से पहले के इंसान हैं. उनकी आंखों की चमक धुंधलके में से भी आशा खोज लेती है. यारबाज, फक्कड, आवारा, हिम्मती, बेपरवाह और कुछ कुछ लापरवाह भी जैसे लफ्ज राजू के नाम के पहले लगाए जा सकते हैं. भोपाल में मेरी उनसे मुलाकातें बहुत औपचारिक हुआ करती थी. सीनियर का सम्मान करने का दुर्गुण उन दिनों मुझमें कूट कूटकर ठुंसा था. इधर के दिनों में उनसे सघन बातचीत हुई. हमने एकालाप किया. हमने अपने फस्ट्रेशन निकाले. बडी झील के जलकुंभी से लेकर कोलार डेम की हहारती गहराई तक जाते हमारे विषयों में राजनीति, साहित्य, क्रिकेट, पाकिस्तान, मुसलमान, बिहार, लडकियां, गांव, पेड, पहाड, नदियां और बहुत कुछ ऐसा रहा है जो जीवन को खूबसूरत बनाता है. उनके ब्लॉग सूरत-ए-हाल पर एक कविता देखी. इसे देखकर अंदाजा नहीं पहली बार में कि यह खयालात उसी शख्सियत के हैं जो हर वक्त किताबों से नैन मट्टका करता है. मुलाहिजा फरमाएं


खूबसूरत लड़कियां

खूबसूरत लड़कियां

नहीं मिलती आसानी से

होती हैं कई प्रतियोगिताएं

मिस सिटी से मिस यूनिवर्स तक

अब मिसेज भी होने लगी

इसके बावजूद नहीं मिलती

उनके चेहरे पर लीपी होती है

प्रायोजकों के लेप

हर अंग पर लिपटी होती है

फिर भी नहीं होती वे खूबसूरत

उनके चेहरे पर चमकता है बाजार

अंतत: खारिज हो जाती हैं अगले साल

खूबसूरत लड़कियां नहीं मिलती प्रतियोगिताओं से

खूबसूरत लड़कियां जूझती हैं जीवन से

उनके चेहरे पर चमकती हैं पसीने की बूंदे

उनके दिल में होती हैं निश्‍च्‍छलता

नहीं जानती वे बाजार भाव

वे बिकाऊ नहीं होती

(राजू नीरा इन दिनों भोपाल की एक संस्था विकास संवाद से जुडे हैं और विकास पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं)

2 comments:

Raju Neera said...

कई बार जो हम देखते हैं, उसका बयान जल्‍दीबाजी में कर देते हैं, मामला स्‍कूप का ही होता हैं पर जब विश्‍लेषण करते हैं तो उसकी गहराई तक जाते हैं फिर बाद में उसमें सुधार करते हैं, डर कुछ ऐसा ही हैं, देखना यह है कि सुधार किस दिशा में होता है। देखे, होने, लगने, सुनने में तालमेल जरूरी होता है, सभी को एक खाका में बैठा पाना मुश्किल होता है। खाका मेरे अनुरूप है या मैं खाके के अनुरूप, सोचना पडेगा, तुमने मुझे सोच में डाल, सफलता पा ली है।

सचिन लुधियानवी said...

राजू भाई हमने जो देखा अपनी छोटी समझ से जितना आपको देखा वह सामने रख दिया. सलाह नहीं एक कम उम्र दोस्त की इल्तिजा मानें इसे कि आप खाके के अनुसार न डलिए उन्हें हम फिर फिर नया करते रहेंगे. बस अपना यही रूप बनाए रखिए जो हमें सबसे प्यारा है - इंसानी चेहरा. इस पर कभी सलवटें न पडने दीजिए.