November 17, 2009

क्योंकि वक्त अभी बदला नहीं है

हम कहानी क्यों पढते हैं? यथार्थ को परखने के लिए? अपनी नजर साफ करने के लिए? खाली वक्त काटने के लिए या फिर परिचित कथाकार की मुग्ध शैली से रूबरू होने के लिए? सवाल और भी हो सकते हैं, जवाब अलग अलग होंगे। मैं अश्विनी पंकज की कहानी इनमें से किसी भी वजह से नहीं पढता। अश्विनी हमारे समय के सबसे विश्वसनीय कथाकार हैं, जो असल में अपने देखे, भोगे को रचते हैं। इस कहानी में मुझे ऐसा कुछ अनकहा नहीं मिला जो अश्विनी के मुंह से कई बार सुन चुका होऊं। ग्लोबल आंधी में पिसती आदिवासी संवेदना, अनसुना कर दिया गायन, संबंधों की तान, ढेर सारा जीवन और सबसे ज्यादा एक ईमानदार हौसला जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। यह अश्विनी की कहानियों के साथ नाभिनालबद्ध एक जरूरी ईकाई है, बिल्कुल ईकाई, क्योंकि यह एक दूसरे से जुडी हुई चीजें हैं जो अश्विनी पंकज की कहानियों के साथ चलती हैं।

इस वक्त झारखंड और पूरी दुनिया के आदिवासी जीवन पर एक सजग रचनाकर का जो बयान होना चाहिए वह अश्विनी की कहानियों में अपनी पूरी ताकत के साथ आता है। आज ही मेल पर मिली उनकी यह कहानी इस बयान को पुष्ट करता हुआ हालिया उदाहरण हैं। लीजिए।

भूत का बयान
- अश्विनी कुमार पंकज
सदिZयों की ठंढ को चीरती हुई धूप जैसे अचानक आ धमकती है, वैसे ही सामने वालों के मुरझाये चेहरों पर अब खुशी झलकने लगी थी। फूदन नाग समझ गया कि वह लड़ाई हार गया है। लड़ाई हारने का ख्याल आते ही उसकी धमनियों में बहता लहू ठहर-सा गया। नजर धुंधला उठी। लगा पूरी देह बेजान हो गई है और पहाड़ों से होड़ लेने वाली दोनों टाँगें भी शरीर का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं। वह सचमुच गिरने वाला ही था तभी सोमारी ने उसे थाम लिया।
निराशा के गहन अंधकार में डूबती फूदन की आँखों को सोमारी ने अपने चेहरे पर टिका लिया। लगभग साठ की उम्र में पहुँच चली उसकी पत्नी सोमारी के चेहरे पर भी हताशा थी, लेकिन आँखें किसी चोटिल नागिन की तरह फुफकार रही थी। बस इसी एक पल में वह नागिन उसके भीतर जा घुसी और उसकी देह भी नाग की तरह लहराने लगी। फिर वह फन काढ़कर खड़ा हो गया। उसने बेबसी और गुस्से से लपलपाती नजरों से सामने वालों पर एक नजर डाली और जोर से फुफकारा।
साहेब जी जोहार! मैं अनपढ़ फूदन नाग नइ जानता कि पिछले कई सालों से उनकी तरफ से का कहा जा रहा है। हमारी तरफ से का बोला जा रहा है। आप का कहते रहे हैं और आज आखिरी बार भी जाने का कहने वाले हैं। मैं तो ठीक से हिंदी भी नइ जानता। हिआँ की जो भासा है वह तो मेरे पुरखों की खातिर भी अबूझ थी। इसलिए मुझे जो भासा आती है उसी में आखिरी बार आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ। जानता हूं आप नइ बोलने देंगे। तब भी सुनाउंगा। मौसम कैसा होगा ई बात हम मुंडा आदिवासी लोग हवा से अंदाज लगा लेते हैं। दिकू दुश्मन लोग का चेहरा पर जो खुसी है उससे बूझना मोसकिल नइ है कि मैं यह लड़ाई हार चुका हूँ।
साहेब जी। यह कहानी मेरे मरांग आजा (पड़दादा) ने सुनायी थी। पहले हमारा जंगल बहुत घना था। इतना घना कि सूरज भी उसको भेद नहीं पाता था। मुंडा लोग भी अकेले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। झुंड बनाकर ही जंगल में ढुकते थे। यह गोरे-काले दिकुओं से आने के बहुत-बहुत पहले की बात है। आज तो उल्टा हो गया है हजूर। अब जंगल-पहाड़ ही आदमी से डरता है। आप कहिएगा क्यों, तो उ इसलिए साहेब जी कि जंगल अब पहले जैसा ताकतवर (घना) नइ रहा। दिकू लोग और जंगली बाबू सब उसे काट-कूट कर एकदम बाँस जैसा कमजोर कर दिये हैं।
तो, जंगल जब खूब घना था, उसमें एक बुढ़िया रहती थी। बुढ़िया के मरद को ढेर दिन पहले बाघ खा गया था। मरद के मरने के बाद फिर उसने सादी नहीं की थी। वह अकेले ही जँगल में अपने बेटे के साथ रह रही थी। उसका लड़का पहाड़ पर खेती करने जाता। घर-बाहर के सभी काम दोनों माँ-बेटे मिलजुल कर करते।
एक दिन हजूर, बुढ़िया का बेटा अपने संगी के साथ जंगल गया। गेठी-कांदा लाने। आप तो गेठी-कांदा नइ जानेंगे। कैसे जानेंगे हजूर। गेठी-कांदा तो हम आदिवासी लोग का खाना है। गेठी-कांदा एगो फल होता है साहेब जी, जो जंगल भीतरे जमीन नीचे पैदा होता है। जिस साल फसल बोंगा नाराज हो जाता है, सारे खेत सूखे रह जाते हैं, कोई अनाज नहीं होता है, कुछ भी नइ उगता है, न खेत में न जंगल में, उस समय में हमलोग जमीन का इसी फल को खा कर बचते हैं। हजूर उस साल भी ऐसने हुआ था। इसीलिए बुढ़िया का लड़का गेठी-कांदा लाने गया था। वह लड़का लेकिन गेठी-कांदा ढूंढने में कच्चा था। क्योंकि इससे पहले कभी भी उसके खेत नइ सूखे थे और उसको गेठी-कांदा ढूंढने की जरूरत नइ पड़ी थी। उसका संगी जबकि गेठी-कांदा ढूंढने में बेस सुपट था।
जंगल पहुंचकर दोनों ने गेठी-कांदा खोदना शुरू किया। देखते ही देखते संगी ने तो टोकरी भर गेठी-कांदा खोद लिया, पर बुढ़िया के बेटे को काफी खोदने के बाद भी कोई गेठी-कांदा नइ मिला। वह ऐसे ही ढेर देरी तक खोदता रहा, तो उसकी हालत देखकर उसके संगी ने कहा, `अरे भाई, तुमको तो इतना खोदने पर भी, कोई गेठी-कांदा नइ मिल रहा है, और साम होने जा रही है, इसलिए आओ मेरी टोकरी के गेठी-कांदे को ही दो हिस्से में बांटकर दोनों थोड़ा-थोड़ा गेठी-कांदा लेकर घर लौट चलते हैं।´ पर बुढ़िया के बेटे ने मना कर दिया और बोला, `अभी तो मैं तुम्हारा आधा गेठी-कांदा लेकर घर चला जाउंगा, पर तुम यदि यही बात गांव वालों से कह दोगे तो सभी मुझे नाकारा समझेंगे। इसलिए तुम जाओ। चाहे जितनी भी रात हो जाए, मैं गेठी-कांदा लेकर ही जाउंगा।´
साहेब, संगी ने उसको खूब समझाया। पर बुढ़िया का बेटा किसी बुरु-पहाड़ जैसा जरा भी नइ हिला। आखिर में थक-हार कर उसका संगी अपना गेठी-कांदा लेकर अकेले ही गांव लौट गया।
संगी के जाने के बाद बुढ़िया का बेटा फिर से गेठी-कांदा खोजने में लग गया। वह जहां भी खोदता पत्थर निकलता।
मरांग आजा बोलते थे हजूर वह लड़का पूरी रात मेहनत करता रहा। लेकिन गेठी-कांदा नइ ढूंढ पाया। इसी बीच उसका कूदाल टूट गया। कूदाल के टूट जाने से लड़का बहुते निरास हो गया और वहीं जमीन पर मारे थकान के लुढ़क गया।
वह इतना थक गया था कि उसे पता ही नइ चला कि वह जहां लेटा है, वहीं जहरीली चीटियां हैं। फिर का बताएँ साहेब जी। जब मरांग आजा हमको इ कहानी सुनाते थे तो यहां तक पहुंचते-पहुंचते मैं जोर-जोर से रोने लगता था।
सोचिए तो साहेब जी, कितना दरदनाक है न इतनी मेहनत के बाद भी एक ठो कांदा का नइ मिलना।
हजूर आगे हुआ इ कि जहरीली चीटियों के काटने से बुढ़िया का बेटा लेटे-लेटे हुँवे मर गया।
उधर जब फजिर होने को आयी और बेटा नइ लौटा तो बुढ़िया मारे फिकिर के उसके संगी के घर जा पहुंची। फजिरे-फजिर बुढ़िया को देख कर संगी समझ गया कि उसका बेटा अभी तक जंगल से नइ लौटा है। वह बोला, लगता है तेरा बेटा अभी तक जंगल में गेठी-कांदा ही खोज रहा है।´ बुढ़िया को उसकी बातों पर जरा भी भरोसा नइ हुआ।
क्योंकि वह जानती थी कि उसका बेटा बहुत मेहनती है। हजूर, कहते हैं बिना सांस लिए वह एक ही बार में पूरा पहाड़ जोत डालता था। नदी को अकेले बांध लेता था और तब तक खेत के मचान पर जगा रहता था जब तक कि फसल खलिहान में नइ आ जाती थी। हजूर इसीलिए बुढ़िया को उसके दोस्त पर बिसवास नइ हुआ। उसे लेकर वह बेटे को ढूंढने जंगल गयी। उसी जगह पर जहां दोनों यार गेठी-कांदा खोजने गए थे।
जादा टेम नइ लगा साहेब। लड़के की लास उन्हें जल्दी दिख गयी। जवान बेटे की मरी देह देखते ही बुढ़िया से रहा नइ गया। पछाड़ खाकर गिर पड़ी और दहाड़ मारकर रोने लगी। जवान बेटा-बेटी का मउवत, खेत का सूखना या छिन जाना किसी को बरदास्त नइ होता है साहेब। बड़ी मोसकिल से बेटे के संगी ने बुढ़िया को संभाला और फिर दोनों लास उठाकर गांव ले आए। रीत-रेवाज से बुढ़िया ने दाह-संस्कार कर दिया। करजा-फरजा लेके गांव वालों को भोज भी दिया।
बस अब और थोड़ा-सा ही बचा है साहेब जी। सुन लीजिए। इस समय मेरी भी हालत उस बुढ़िया जैसी ही है। कुछ भी अच्छा नइ लग रहा है। इ पूरी धरती घूम रही है। दिमाक खाली हो गया है और आगे की बची-खुची जिनगी अंधरा रात जइसा एकदम करिया बुझा रहा है। बुढ़िया की भी हजूर ऐसी ही हालत हो गयी थी बेटे के मरने के बाद।
उसे न तो भूख लगती थी और न पियास। कभी थोड़ा-बहुत खा लेती। लेकिन अक्सर भूखी ही रह जाती थी। ऐसी ही किसी भूखी रात को जब बुढ़िया सो रही थी, तभी उसके बेटे का भूत आकर बोला, `आइयो (माँ) मेरी कुल्हाड़ी, कुदाल, तीर-धनुष जो भी है, ला सब दे दे।´ आवाज सुनते ही बुढ़िया हड़बड़ा के नींद से उठ बैठी। चारों तरफ देखा। कोई नइ दिखा। वह जान गई कि जरूर यह उसके बेटे का भूत है।
दूसरे दिन बुढ़िया ने बेटे के संगी को जाकर सारी बात बतायी। संगी को बिसवास कहां से होता। पहले सोचा बुढ़िया पगला गयी है। फिर बोला कि वह रात में खुद बुढ़िया के घर जाकर सोएगा और सच का पता लगाएगा।
रात होते ही खा-पीकर वह बुढ़िया के घर सोने जा पहुंचा। आधी रात को जब भूत ने आकर उसे जगाया तो संगी को खूब जोरदार अचरज हुआ। संगी के भूत से मिलकर वह खुस भी हुआ और उसे डर भी लगा। उसने सोचा भूत तो भूत होता है। यह जरूर किसी दिन मुझे मार डालेगा। तब उसने मन में कुछ बिचार करके भूत से कहा, `तुम्हीं मेरे एकमात्रा संगी थे। तुम्हारे मरने से मैं बहुत दुखी रहता हूं। अब मैं हमेशा इसी घर में आकर सोउंगा। तुम भी रोज मिलने आना। हमलोग खूब सारी बातें करेंगे।´ भूत ने उसकी बात मान ली। दूसरे दिन उसके संगी ने भूत को मारने का उपाय किया और साम होते ही पूरी तैयारी करके भूत के आने का इंतजार करने लगा। आधी रात को ठीक टेम पर हजूर भूत फिर आ पहुंचा। उसके संगी ने तुरंत देवड़ा (ओझा) की दी हुई कुल्हाड़ी से भूत पर वार कर दिया। भूत का कुछ नइ बिगड़ा। दूर जाके संगी की नादानी पर हंसने लगा। हंसते-हंसते ही बोला, `अरे पागल, जो एक बार मर गया हो उसे दोबारा कौन मार सकता है।´
तो, साहेब जी, मेरी दो एकड़ बारह डिसमिल जमीन इस दिकू ने मुझे मरा हुआ बताकर हड़प लिया है। पिछले चौदह साल से मैं मरा हुआ फूदन नाग अपनी जमीन को पाने के लिए कोरट-कचहरी के चक्कर काट रहा हूं। उ जो काला कोट पहने मेरा उकिल बाबू है ना, कहा था कि फूदन मैं तुमको जिंदा कर दूंगा और तुम्हारी जमीन भी वापस दिलवा दूंगा। पर उकिल उकिल तो सब एके होता है हजूर। धरती आबा बिरसा मेरे मरांग आजा को बोले थे, `सब चरका-चरका (गोरे पादरी और अफसर) चमड़ी एक होता है।´ ई उकिल हमको नइ तो जिंदा कर सका और न हड़पा हुआ जमीने दिला पाया। और आज आपलोग का आखिरी गोइठ-बात सुन के हमको सफा बुझा रहा है कि जमीन का ई लड़ाई मैं हार गया हूं। अपना ई जमीन को बचाने के लिए साहेब जी, जो भी बचा हुआ खेत सब था, मुझे सब बेचना पड़ा।
का बोलेर्षोर्षो जिंदा होने का कागच रहने से मेरा दावा मान लिया जाता और ई झूठा जमीन बिकरी का कागच खारिज हो जाता
बस हियाँए तो आदिवासी लोग ठका जाता है हजूर। आजा ठीक ही बोलते थे कि कागच का कानून-नेयाय
में हमलोग कभी नहीं जीतने सकेंगे। मेरा बुढ़िया जितना दिसुम (देश) का भी उमिर हो गया है साहेब जी। सुनते थे कि आबुवा (लोगों का) राज आ गया है। पर हमको तो एहे बुझाता है कि उलगुलान का बेरा से भी खराब राज है आज का दिसुम में।
अब जिंदा होने का कागच भी कहां से लाएं। जब पहिला छउवा (बच्चा) जनमा था, उसी अकाल का दिन में हम पंजाब चल गये थे। कोड़ा (मजदूरी) कमाने। वहीं मालिक से पइसा मांगने पर झगड़ा हो गया। मालिक ने हमको फंसाने के लिए थाना-पुलिस कर दिया। हुआँ भी कोई हमारी भासा-बोली नइ बूझता था। आठ साल जेहल खटे। इधर गांव में सब कोई बुढ़िया को समझा दिया मैं मर गया हूं। बुढ़िया भी मान ली। अब अउरत जात का तो कोइ सुनता नइ है।
जब लौटा तो ऊ ... जो हुआँ बड़का तोंद लिये बैठा है, बतख जैसा, झूठा ठेपा-अंगूठा लगा कर हमारा दो एकड़ बारह डिसमिल जमीन कब्जा लिया था। बहुत रोए और बिनती किए साहेब जी। नइ माना। तब आपका सरन में आए।
सोचा था राज बदल गया है। नेयाय मिलेगा। लेकिन हमारा गवाही आपका कोरट-कचहरी नइ मानता है। काहे कि फूदन नाग तो मर गया है। आप ही ईश्वर का कसम खाके बोलो हजूर ... आपके सामने फूदन नाग खड़ा है या कि उसका भूत।
तो, साहेब जी हम नइ जानते हैं कि आप हमारा बात समझे-बूझे कि नइ। पर आखिरी बात बोल रहा हूं। जब जमीने नइ रहेगा हम कैसे जिएंगे। वइसे भी आपका कागच में तो हम मरे ही हुए हैं। आप फैसला सुनाइए। आपका फैसला सुन कर हिआँ से निकलेंगे और बाहर में ई लूटेरा दिकू का मुड़ी-पेट सब काट देंगे। मरा हुआ अदमी का आपका कोरट का कर लेगा साहेब जी।

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस जबरदस्त कहानी को पढ़वाने का!!

कुमार क्षितिज said...

jaruri kahani

Suman said...

nice