January 24, 2010

ये वादा भी तोड देते हैं!

वादा भी अजीब चीज है। करते वक्त लगता है सचमुच जीने का मकसद मिल गया। अब इसे निबाहना ही आदमी होने की शर्त है। लेकिन फिर तोड देते हैं। तोडते वक्त सब कुछ पहले की तरह हो जाने का अहसास चेहरे पर नुमायां हो जाता है। दिल इस डर में घुलने लगता है कि कमीनगी थोडी और बडी। दिमाग और दिल की कशमकश में दिमाग जीत जाता है। लोग सुनते रहे दिमागों की हम चले दिल को रहनुमां करके, की आत्ममुग्ध ताल बैठ जाती है, दिल में ही। हम फिर दौड में शामिल हो जाते हैं। कुछ पाने या साबित करने नहीं, बस बचे रहने के लिए।

कितनी खामोशी से कह दिया था कि अब नहीं लिखूंगा। कुछ नहीं, कहीं नहीं। 13 जून की वह शाम थी। दिल्ली की शाम। महानगर के महाशोर में कहा गया एक वाक्य, किया गया एक वायदा, तोड दिया। जिस दोस्त की तमीज पर तरस खाते हुए जमीन से ढाई इंच ऊपर खडे होकर न लिखने की जिद का हाथ पकडा, उसके न रहने, चले जाने, छूट जाने पर लिखते हुए न उंगलियां कांप रही हैं। न ही मलाल चेहरे पर चस्पां है। उसका चेहरा भी याद नहीं आ रहा। हंसता हुआ चेहरा। दिल्ली की गुमनामी में कैद, कूची और कलम की जादूगरी में लिपटा एक बेहद मासूम चेहरा। अब याद नहीं। उसकी बातें भी भीड भरे शोर में सुनाई नहीं देतीं। हालांकि उन्हें न सुन सकने का अहसास इस जिद से बडा है कि सब कुछ सुनने लायक नहीं है। ईमानदार होने की मूर्खतापूर्ण कोशिश का नौसिखिया अंदाज तो कतई नहीं सुना जाना चाहिए।

न लिखने की कसम नहीं खाई थी, बस वादा किया था। एक तसल्ली है, जो कचोट को कम करती है। फिर भी खलिश है। खुद का लिखा पढने वाले अमूमन इस जिद में जीते हैं, कि यह सबसे बेहतर है, या इस मूर्खता में कि यह तो कुछ भी नहीं और भी बेहतर लिखा जा सकता है- कह नहीं सकता। कोई अनुभव नहीं। खुद का लिखा पढने लायक हौसला भी नहीं। खुद को देखना कायरता है, यह नहीं की जानी चाहिए। दूसरो को देखने में वक्त गुजर जाने दें वही अच्छा है।

आपसे भी कहा था कि अब नहीं लिखा जाता। पर करें क्या, कहां जाएं? न कुछ और सीखा, न निजाम ने वक्त दिया। बस पढना किसी तरह आ गया और लिखने को मरे जाते हैं सो अब लिखते रहेंगे। उदासी ज्यादा नहीं पर ये गाजियाबाद की ठंड बहुत प्यारी है। लिखने में अब और इसे बरबाद न किया जाए।
हां एक सूचना भी। इंदौर छोड दिया है। या यूं कहें कि साल भर का प्रवास, कई दोस्तियां, बेहतरीन शामें, धूल और मूर्खतापूर्ण खबरों को छोड दिया है। बस दोस्त साथ हैं, उन्हें छोडा नहीं जा सकता न। चिपके रहते हैं जोंक की तरह। अब गाजियाबाद में हूं। कुछ करने नहीं बस अखबारों के साथ कुछ और कदमताल करने के लिए।
तो शब्बा खैर। अब तो मिलते ही रहेंगे। बिना लिखे जीना भी कोई जीना है प्यारे।

11 comments:

Udai Singh said...

chalo.... achha hua likhne ki bat fir se soojhi

कुमार क्षितिज said...

सुभान अल्लाह। लिखते हैं और कहते हैं न लिखेंगे जी। आपके लिए मंटो साहब ने बडा सटीक शब्द लिखा है चुगद। बहुत बढिया प्यारे लिखते रहो कि लिखने की तमीज अब गायब है। फिर इस गलीज राह पर चलने के लिए मेरी शुभकामनाएं।

राहुल said...

waah waah, ajab waade ki gajab kahani

Dinesh Dard said...
This comment has been removed by the author.
Dinesh Dard said...

दोस्त,

वो कोई शरीर लम्हा होगा, जिसने किसी ज़िद के बहाने तुमसे बेवकूफाना वादा करवा लिया कि "अब नहीं लिखूंगा". मगर दोस्त अल्लाह-तआला की मर्ज़ी के आगे हम हक़ीरों की क्या बिसात ? उसने चंद मख्सूस लोगों को ही अपने जज़्बात काग़ज़ पर बा-असर उतार देने की सिफ़त अता की है. यक़ीनन तुम भी उनमे से एक हो.......लिहाज़ा, किसी ना किसी बहाने तुम्हे फ़िर अपने लाम पर लौटना ही था. और फ़िर कितने ही "दोस्त" तुम्हारी वापसी के मुन्तज़िर भी तो थे.......मुझे मुबराक़ हो, तुम लौट आये.

Kulwant Happy said...

एक शानदार पोस्ट।
बहुत जानदार पोस्ट।
अब जल्दी आना

वायदा करो

जल्दी आने का

न आने का

कोई तो करो

तीन महीनों बार आए हो


शानदार ला हो

Udan Tashtari said...

ये हुई न बात: बिना लिखे भी कोई जीना है प्यारे...क्रांतिकारी कब से मायूस होने लगा भई??

अब बढ़िया है गाजियाबाद...याने दिल्ली लेंडिग के साथ ही चीयर्द...वरना तो इन्दौर का अलग से प्रोग्राम बनाना पड़ता. :)

संदीप पाण्डेय said...

हम उनके वादे का जिक्र उनसे क्यों करें गालिब
ये क्या कि हम कहें और वो कहें कि याद नहीं

संदीप पाण्डेय said...

हम उनके वादे का जिक्र उनसे क्यों करें गालिब
ये क्या कि हम कहें और वो कहें कि याद नहीं

Dipti said...

अच्छा लगा आपको पढ़कर। उम्मीद है लिखते रहेंगे।

pratham said...

sir ye theek kiya aaj mujhe lag raha hai mai un shamo mai theek sochta tha