July 26, 2011

दो कविताएं, आपके लिए

अकेलेपन का खौफ उस वक्त ज्यादा तेजी से तारी होता है, जब हम भीड़ में होते हैं। चलती-फिरती आकृतियों के बीच अकेलापन अपनी खौफनाक शक्ल में दिखाई देता है। खामोश अकेलापन, किसी के न होने का अकेलापन, अपने काम से वापसी का अकेलापन इससे अलग है। पिछले दिनों सघन बीमारी के एकांत में इस अकेलेपन से दो-चार हुआ। इस दौरान खुद को बेहद हल्का, बेहद साफ देख पाने का अहसास भी भीतर से उभरने लगा। कुछ हद तक यह दवाओं का असर था, जो हहारते दिमाग को आराम देने के लिए ली थीं। और काफी हद तक यह लगातार उलझनों से दो-चार होते रहने का सुखद नतीजा। जब हम बहुत ज्यादा दिनों तक दुनियावी उलझनों में सिर खपाते हैं, तो नतीजे सुखद ही होते हैं। दुनिया की एक-एक चाल नुमायां होने लगती है। आहटें देती हुईं नई पगडंड़ियां पुकारने लगती हैं और फिर दौड़ पड़ने के लिए आवाज देते हुए भागने लगते हैं। दौड़ने और भागने का फर्क यहां साफ-साफ दिखाई देता है। बचपन में ट्रेन की सीटी सुनकर दौड़ना और शाम को खेल अधूरा छोड़कर घर की भागना।
यह अकेलेपन का ही जादू है कि हम अपने सबसे निजी क्षणों में कविता के पास जाते हैं। इस बीमारी ने फिर जब किताबों की ओर लौटाया, तो कविताओं से लंबे समय से टल रही मुलाकात भी हुई। लंबी मुलाकात। कई कविताओं से गुजरते हुए खुद के मनुष्य होने का ऐलान कुछ ज्यादा भरोसे से कर पाते हैं। गद्य और पद्य का यह फर्क है। गद्य हमें भरोसा का अहसास देता है, जबकि पद्य अगर वह सचमुच पद्य है, तो खांटी भरोसा देता है। यह कविताओं के बीच उतरना असल में सही और जरूरी कविताओं के बीच पहुंचना था। वैसे भी इंटरनेट पर आ रहीं, फूल, पेड़, पहाड़, नदी और तकरीबन जिंदगी के बारे में नारेबाजी करती बकवास को कविता कहने के चलन के बीच कुछ बेहतरीन कविताओं की संगत सांसों को और ज्यादा खोल देती है। ऐसी ही दो कविताएं, आपके लिए। इन कविताओं से गुजरना अपने वक्त के साथ कदम मिलाने जैसा है और ऊर्जा को फिर हासिल करना है, जिससे हमारे शरीर के अवयव मनुष्यता का उद्घोष करते हैं।


चंदूलाल कटनीवाले
हरिओम राजोरिया
इस कस्बे में उनका आखिरी पड़ाव था
वे सरकारी खर्च पर कबीर को गाने आए थे
सरकार की तरफ से थी व्यवस्था उनकी
एसडीएम ने तहसीलदार से कहा
तहसीलदार ने गिरदावर से
गिरदावर ने पटवारियों से
पटवारियों ने दिलवा दिया था उन्हें माइक
स्कूल के हॉल में कुर्सियां पहले से पड़ी थीं
तांगे में ऐलान हुआ था सरकारी ढंग का
जिसमें चंदूलाल कटनीवाले से ज्यादा
सरकार के संस्कृति विभाग का जिक्र हुआ
इतना सब होने के बाद चंदूलाल को सुनने
आए पचासेक लोग

आर्गन पर एक लड़का बैठा था
जिसका चेहरा बहुत सुंदर था
अपनी पोलियोग्रस्त टांगों को उसने
सफाई से छुपा लिया था आर्गन के उस तरफ
और बैसाखियां सरका दी थीं परेड के पीछे
तबलावादक ऐसा जान पड़ता था
जैसे किसी ध्वस्त मकान के मलबे में से
अभी निकलकर आया हो बाहर
उसे मुस्कराने का कोई अभ्यास नहीं था
पर वह मुस्कराए जा रहा था लगातार
चंदूलाल तनकर बैठे थे हारमोनियम लिए
आठ घड़ी किया शाल पड़ा था उनके कंधों पर

गाने को तत्पर थे चंदूलाल
पर जुट नहीं रहे थे उतने लोग
उनके झक सफेद कपड़ों में
चुपके से आकर दुबक गई थी उदासी
बेमन से गाने को हुए ही थे चंदूलाल
इतने में अचानक आ गए अपर साहब
अपर साहब को आता देख
खड़े हो गए श्रोता
खड़ा हो गया सरकारी तंत्र
चंदूलाल के गले में अटक गए कबीर भी
खड़े हो गए चंदूलाल के साथ।


कुछ सूचनाएं
‘‘धूमिल’’

सबसे अधिक हत्याएं
समन्वयवादियों ने कीं
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक जेवर खरीदा
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को
जिस का मुख ईसा से मिलता था

वह कोई और महीना था
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
किंतु इस बार तो
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूंद गिरी
फिर भी लोगों में टीबी के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए

कई बौखलाए हुए मेंढक
कुए की काई लगी दीवार पर
चढ़ गए,
और सूरज को धिक्कारने लगे
-व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज पर एक-सा चमकता है।

हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है-
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था,
और युवक मीठे जुलाब की गोलियां खा कर
शौचालयों के सामने
पंक्तिबद्ध खड़े हैं

आंखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाजों में
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं

सब के सब
रोशनी की आंच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से
रचते हैं

बुद्ध की आंख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चैरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएं पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएं
अध्यापिकाएं बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़कों पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)

संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियां
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।

1 comments:

हिमानी said...

सच ही मनुष्यता का उद्घोष !!!