October 30, 2011

पाती : बिछुड़ चुके दोस्त के नाम

वे जिन्होंने दोस्त बनाए हैं, और दोस्तियों को जीया है, जानते हैं एक मुकम्मल दोस्ती के अंत के बाद भी अंतहीन विस्तार में दोस्त की हरकतें नमक की तरह सांस में घुली होती हैं। उम्र के मोड़ पर बहुत मासूम दोस्ती हम सभी ने खोई है। इसका एक किरदार ऑफिस में बेजान सीट पर बैठा है। इतना दूर, जितना की-बोर्ड, माउस या मोबाइल। अपनी-अपनी वजह और खामोशी में उसे खुशी का टुकड़ा नहीं चखा सके हैं। बरसों बीत गए, दर्द की मिठास ताजा है। वैसी ही जैसी युवा होती दोस्ती की शाम में कैद कॉफी शॉप की टेबिल पर बीते हंसी के कहकहों में थी। दोस्ती की खूबसूरत कारीगरी सबसे कमजोर क्षण में भी हंसी की पतली, महीन और बेहद मुलायम चादर से ढांप लेती है। उन्हीं पलों में रिसते लफ्जों की बुड़-बुड़ सुनती आंखों और बोलती पलकों की दास्तां, इस रोशन उम्मीद के साथ कि नाजुक मोड़ पर खड़ी कोई दोस्ती खुद को संभाल सके। वक्त की गर्द के नीचे पड़ी कराहती यारी के धूप और पसीने की गंध सचिन श्रीवास्तव के संग.. प्रिय दोस्त, तुम्हारा जन्मदिन फिर गुजर गया। दीवाली भी पूरी धमक के साथ लौट गई।
प्रिय दोस्त,
मोबाइल
पर थिरकते हाथ नंबर तलाशने के बावजूद एसएमएस नहीं कर सके। इनबॉक्स में डिलीट करने से बचे हुए दोस्ती के पहले ईमेल में वह पल दर्ज नहीं है, जब अपनी-अपनी कमअक्ली में दो शहरों से एक अदद चेहरा बाहर फेंक देने की शरारत को पहले घटनाओं और फिर लफ्जों में साबित किया गया था। ब्लॉक हो चुके एड्रेस, सर्च में कभी-कभी उठंगे से बैठ जाते हैं। अपनी पुरानी पहचान की सार्वजनिक घोषणा करते हुए। किसी गूगल, बिंग या बेबीलोन सर्च में वे पल दर्ज न होने थे, न हुए।

बाद के सालों में हर जन्मदिन की सुबह धूप का टुकड़ा अपनी जगह से घिसटता हुआ, शाम तक इस इंतजार में पूरा आंगन नापता है, कि अब दो पूरी परछाइयां उसे ढांप लेंगी। चार कदम फिर दो-दो की थाप पर चलेंगे। यह मुमकिन नहीं, क्योंकि दुनियादार हो चुके चेहरे चुप की शाख पर चलते हुए हरे पत्ते तोड़कर फेंक चुके हैं। ठंड फिर सिकुड़कर बैठा जाती है। अब दोस्ती का वह आलाव नहीं, जिस पर अतड़ियों में फंसी गुहार गर्म की जा सके। आंखों की कोरों से भीतर पिघलती बर्फ का आयतन कम होकर रिसने लगता है। हवा की तीखी लचक के बीच चादर से हाथ बाहर निकालकर जो ताजा बूंद उंगली के पोर पर खींची गई, उसके साथ हंसी के फव्वारों में नाचते दोस्ती के वर्षो की बातचीत का दूसरा सिरा ढूंढने की नाकामयाब हरकत दम तोड़ देती है। सड़क, ऑफिस और ऑटो के शोर में की गई ढेरों गप्पों और कहकहों की आवाज धीमी हो चुकी है। कान लगाकर सुनो तो लगता है, कल ही की बात थी। पुराने एसएमएस के बीच से झंकता चेहरा लगभग दुलारते हुए कहता है- स्टडी हार्ड टू वी एबल टू डोमिनेट द टेक्नीक्स देट परमिट द डोमिनेशन ऑफ नेचर।

एक चौराहे पर लाल-हरी होती बत्तियां हों, या उसी बिंब में जीमेल पर बुझती और फिर हरी होती बत्तियां। फर्क मुश्किल है कि इनके बीच से झंक रहे चेहरे में कितनी सच्चाई है। अतीत की नियोन लाइट का सिरा तह की जा चुकी चादर में समेट लिया गया है। दिन की शुरुआत में ऑफिस का वक्त बजने की जल्दबाजी के बीच गुजरते सालों में यह बात लगभग भुला दी गई है कि सुबह का पहला एसएमएस दोस्ती के नाम किया जाता है। दोपहर की चमकीली धूप के हर सिरे पर बैठे दिलचस्प किस्सों में तुम्हारा चेहरा न होने का पता तब चलता है, जब पेट की हूक भूख का बजर बजा देती है। तब याद आती है, वह सड़क जहां साथ-साथ दोहराते थे- एबोव ऑल, ट्राई आलवेज टू बी एबल टू फील डीपली एनी इनजस्टिस कमिटेड अगेन्स्ट एनी पर्सन इन एनी पार्ट ऑफ द वल्र्ड। उस प्रेमिका से रिश्ता तोड़ चुके हैं, जिसे प्रपोज करने से पहले दोस्ती की आहट के साथ वक्त का लंबा हिस्सा बातचीत में खपाया होता है। हम सभी ने अपने-अपने दोस्तों से प्रेमिकाओं के बारे में बातें की हैं। उम्र के दूसरे दशक को जी रहे लड़कों को यह बात नागवार गुजरेगी, लेकिन हकीकत यही है कि प्रेमिका को दिया गया वक्त दोस्तों से चुराया हुआ होता है और प्रेमिका और दोस्त के बीच की हर जंग में हार दोस्ती के हिस्से में आती है। चाहे, इश्क परवान चढ़े या उसमें जगजीत सिंह की बेबसी शामिल हो। जिंदगी के डिलीट बटन पर जब-जब हाथ जाता है, तो पाते हैं कि अभी-भी सुधार की गुंजाइश है और कर्सर फिर होम सिक्वेंस पर ले जाते हैं। यह अधूरापन है, जो हर शहर में शामिल होता है। दिल्ली, लुधियाना, मेरठ, भोपाल, बंगलूरू, अहमदाबाद और कोलकाता तक बिखरे शहरी हिस्सों में भी। पीवीएस में ‘जूनो’ देखने के बाद स्त्री कराह के नाजुक लम्हें को कोकाकोला और पॉपकॉर्न के साथ हवा में उड़ाते हुए वे जानते नहीं थे, लेकिन मानते थे कि दोस्ती हर मुश्किल का एकमात्र आसरा होती है।

हार चुके इश्क की वह दास्तान तुमने बोङिाल हिस्से में सुनी थी और दिलासाओं की नई खेप तैयार करते हुए जीते रहने का हौसला दिया था, जिसे जगजीत सिंह ने ढोलक की थाप से ढ़ाई घर पहले की आवाज में (जगजीत सिंह उन विरले गायकों में से हैं, जो ताल से ढ़ाई घर पहले गाते थे) नकारने की सलाह से बावस्ता कराया था। गुजर चुके हिस्से की हर लाइट इन दिनों धीमी हो चुकी है, और जो कुछ नजर आता है, वह सिर्फ दोस्ती का बोझ उठाने वाली बांह पर ही महसूस किया जा सकता है। उन्हीं कंधों पर जिन पर दोस्ती का भार उठाने की कामयाब घोषणा के बावजूद जिम्मेदारियों के दरख्त उगा रखे हैं। यह दरख्त जिन जड़ों पर टिके हुए हैं, वहां से दोस्ती की ओर जाती हर राह काट दी जाती है। बचे हुए हिस्से में ऑफिस और घर की सड़क की तीखी खड़खड़ तैरती है। दोस्ती के दिनों में चे और फिदेल को पुरअसर करने के लिए दुनिया का छौंक बातचीत को विस्तार देता था और मोटरसाइकिल डायरी की जेएनयू से चुराई गई प्रति को धीमे-धीरे, हौले-हल्के अपने हाथों में समेट लेते थे।

चे आज भी अपनी घोषणा पर कायम रहता है। इफ वन डे यू मस्ट रीड दिस लेटर, इट विल बी बिकॉज आई एम नो लांगर अमंग यू, को थोड़े बदलाव के साथ आज जब दो नए दोस्त जोर से उचारते हैं- ‘योर फ्रेंड हेज बीन अ मैन हू एक्टेड अकोडिर्ंग टू हिज बिलीफ्स एंड सर्टेनली हेज बीन फैथफुल टू हिज कन्विक्सन्स’, तो दोस्ती फिर जवान होकर भिगो जाती है। दोस्तों के बीच बोलने की कोई सीमा नहीं होती और शायद इसीलिए हम अपनी सारी कमजोरियों को उजागर करते हुए सीखी गई दुनियादारी को हर वक्त ताक पर रखने को तैयार होते हैं। यानी सात हजार नदियों और सात पहाड़ की दूरी, जो कमजोरियों से होनी चाहिए थी, वह हिदायतों से होती है। दोस्तों की बुराइयां बहुत करीब से दिखाई नहीं देती, लेकिन अब बताना चाहिए। दोस्त दूसरों की बातें जानने को बहुत उत्सुक होते हैं और अपने जीवन में किसी को झंकने भी नहीं देना चाहते। यह बात तुम्हीं को महसूस करते हुए जानी। हम कहें कि दोस्त को जानना चाहते हैं, तो एक सच्चा दोस्त लाख बहाने बनाकर उस दुख को दूर सरका देगा, जो जानने के दौरान सामने आ सकता था, और शातिर भोलेपन के साथ हमारे दुखों की थैली को संभालकर अपने कब्जे में ले जाता है। तुम ठीक वैसे ही निकले, दोस्तों की दुख चोरी करने की अदा से भरपूर। हमारी दोस्ती में शामिल भूपेन हजारिका भी अब आशा, उम्मीद, ऑप्टीमिज्म के गीतों के साथ जिंदगी की तेज रफ्तार में पीछे छूट चुके हैं और वह हरी कमीज भी दागों से गंदली होकर बॉर्डरोब से बाहर हो चुकी है, जैसे उस दौर की फिल्मों के गीत। असमिया में सुने हुए गीतों को बांग्ला में समझने की कोशिश करते कान अब नहीं समझ पाते कि एक विदेशी भाषा पर हमें इतना अधिक भरोसा क्यों हैं, जो यह भी नहीं जता सकती कि पाब्लो नेरूदा की कविताओं को सुनने से पहले मातिल्दा को पढ़ना क्यों जरूरी है।

हमारी दोस्ती के साथ को अगर बचपन का नाम दे दिया जाए तो आसानी से कहा जा सकता है कि लड़कपन की शिकायतों के सहारे उम्र का दरिया पार करने की हैसियत नहीं आती। यह वैशाख की ब्रrापुत्र और जून की गंगा का सा दृश्य है, जिसमें दोस्ती के दोनों सिरे तैरते हुए बीच में मिल जाते हैं। यूं तो वह एक ठीक-ठाक वक्त था, जिसमें दिल्ली जाने से पहले तुम्हारी अलविदा में सारी रात चांद रूठा रहता था। गर्दिश के आसमान पर टांकी गई स्याह सवालों की झड़ी में जवाब कम होते थे, इसलिए चुप्पी के बीच हाथों में चाबी की ऐंठन महसूस नहीं होती थी। इसी बीच मुर्दा सितारों की रोशनी में लगता था, कि किसी न किसी दिन एक दूसरे के आसपास ही पूरी बेईमान फितरत के बावजूद हम साथ-साथ खुश होने का सलीका ढूंढ लेंगे। वह सलीका खोजने निकले साथ-साथ थे। भीड़ बढ़ती गई और चेहरे देखना भी दूभर हो गया। कभी-कभी बीच में आवाज सुनाई देती थी, लेकिन जब उसका भी जवाब मिलना बंद हो गया तो मान लिया कि राहें अलग हो चुकी हैं। यह दोस्ती का खात्मा नहीं था, एक शुरूआत थी, बेचैनी की, जो बढ़ते हुए इस कदर तारी होने लगी है, कि फिराक से मजाज तक के मिसरों में तैरती उदासी के साथ इसका जिक्र भी बेमतलब है। सरदार संपूर्ण सिंह ने बोस्की को ब्याहने की घोषणा की थी, ठीक उसी वक्त जिस्म और रूह की डूबती हुई सुबह, या यूं की पौ फटती हुई लगी। ऐसे ही किसी मोड़ पर मिलने की उम्मीदों में जल्द से जल्द हर राह नाप लेने के लिए सूरज को समंदर में डुबो-डुबो कर देखा जाता रहा। बेंजामिन मेयेस को पढ़ते हुए दो दोस्त पाते हैं कि लक्ष्य को ना पाना जीवन की उतनी बड़ी त्रासदी नहीं है, जितनी की जीवन में किसी लक्ष्य का ना होना। वे ना तो सपनों को हकीकत में तब्दील करने का शऊर रखते हैं और ना ही इतने हिम्मती होते हैं कि आगे बढ़कर हकीकत की गर्दन घुमाकर उसकी आंखों में झंक सकें। इसीलिए वे धीरे-धीरे विपरीत दिशा में चले जाते हैं, इस उम्मीद की साथ की गोल पृथ्वी की वैज्ञानिकता एक मोड़ पर फिर साथ खड़ा कर देगी।
दोस्ती के नाजुक हिस्सों में पढ़ना शगल से जरूरत में तब्दील हो जाता है। किताबें बद लगती हैं, जैसे बाकी बचे अच्छे-प्यारे दोस्तों से भी कई बार बात करने का मन नहीं करता। ऐसे समय में हम मां के पास जाते हैं और वह खुशियों की कलाई थामकर हमारे पास बैठा देती है। ये खुशियां मां की चाबुक के कारण इनकार नहीं कर पाती, लेकिन बार-बार बिछुड़ चुके दोस्त का पसंदीदा स्टीरियो बजाकर यह जताने की कामयाब कोशिश करती हैं, कि यह खुशी तुम्हारे नसीब की नहीं है। उम्र के लंबे फासले के बावजूद दोस्त अपनी-अपनी जिदों में बैठे दूसरी तरफ से हरकत की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं, जैसे हम बैठे हुए हैं कि सामने वाला हिस्सा हिलेगा, तो झुकने का अहसास कुछ कम होगा, ठिनकने की जिद थोड़ी ज्यादा होगी। क्या सचमुच इस अकड़ के बावजूद दोस्ती का कोई अर्थ रह जाता है? बिछुड़ते वक्त की आखिरी ईबारत (आई स्टिल होप टू सी यू अगेन। अ रियली बिग किस एंड अ हग फ्राम मी) के बावजूद अकड़ बरकरार है। अगर नहीं तो इस बार की दीवाली में भी वह दीपक उदास क्यों था, जिसे दोस्ती के शफ्फाक मोम से बनाया गया था और दो दोस्तों को साथ-साथ जलाना था।
तुम्हारा दोस्त

7 comments:

take'a'leap said...

bahut achha hai...aisa laga padhkar jaise dil mein zabt jazbaaton ko bilkul sateek aur sahi sahi shabd mil gaye...

रंजीत/ Ranjit said...

Kamal. marmik aur arthwaan....

हिमानी said...

marvellous

pratham said...

well said himani

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी
सचिन जी, सच तो ये है कि शब्द ही नहीं मिल पा रहे हैं...
बस इसे पढ़ते हुए ये अहसास ज़रूर होता है कि जैसे अपने ही दिल की सदा को अल्फ़ाज़ में पेश किया गया है...
आपके लेखन को सलाम.

War On Dowry said...

nice one

vijay sharma said...

तुजसे बिछड़ के मैं ज़िंदा हूँ
ये कैसी गद्दारी है
तुझमें ही जीना है जीते जाना ही यारी है। बेहतरीन । सचिन भाई। hug u किश u lot