October 27, 2011

स्त्री कराह को बोहेमियन पत्र


आदरणीय तस्लीमा,
तुमी केमोन आछो ‘‘Muslim women deserve to have sex with 72 virgin men on the earth as they won't get these things in heaven. #compensation’’
तस्लीमा ट्वीटर पर इस बयान के पहले आप गरीब और अमीर के बारे में बात कर रही थीं। 21 अक्टूबर को अपने ट्वीट में आपने गरीब और अमीर के बीच की खाई के खत्म होने की दिली इच्छा जाहिर की थी। इसके बाद पूंजीवादी पर प्रहार किया। इकॉनामिक ग्रोथ के बरअक्स इंटलेक्चुअल ग्रोथ न होने की हैरानी भी अपने पूरे आवेग के साथ जाहिर की। यूरोप-अमेरिका में उबलते युवाओं पर भी आपने कुछ दिलचस्प ट्वीट किए। और इसी के बाद आपका यह ट्वीट भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ दो लाइन में सिमटा हुआ बैठा है। आपके पूरे ट्वीट पर मुझे एक व्यक्ति के रूप में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसकी शुरुआत मुसलिम से और अंत कंपन्सेशन पर करने के क्या निहितार्थ हैं? यह कौन सा गुस्सा है तस्लीमा, जो रह रहकर निकल रहा है? शुरुआत और अंत के शब्द हटा भी दो तो आपकी बात का वजन कम तो नहीं होता। लेकिन इन दोनों शब्दों के आते ही मायने बदल गए हैं। तस्लीमा आप अच्छी तरह जानती हो कि वुमन यानी स्त्री न तो हिंदू होती है, न मुसलिम, ठीक वैसे ही जैसे वह जैन, बौद्ध और ईसाई भी नहीं होती। आप इतिहास से वाकिफ हो, राजनीति के शातिर रंग आपके पहचाने हुए हैं और अर्थशास्त्र के नियमों की बेदिली को आपने गहनता से भोगा है। फिर क्यों स्त्री को बांट रही हो? वह भी धर्म के आधार पर?

तस्लीमा, आपके हालिया विवाद पर कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। हां, ट्वीटर पर आपको सलाहों की लंबी श्रृंखला से गुजरना पड़ा। छुटपुट गुस्सैल आपको लताड़ भी रहे थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको इसकी अब आदत हो चली है। फिर भी यह सवाल खड़ा हो ही जाता है कि आखिर वे धर्म की नब्ज पर हाथ रखते ही बेचैन क्यों हो जाते हैं? तस्लीमा, हम एशियाइयों को यही नस, प्राणवायु मुहैया कराती है। आपने धर्म के बजाए, दर्शन और बेहतर भविष्य के सपने से प्राणवायु हासिल करना सीख लिया है, जबकि हमारी बेरोजगार, अनपढ़ और मुफलिस जनता ने अभी धर्म से पीछा नहीं छुड़ाया है। यह सत्ता ऐसा चाहती भी नहीं है; क्योंकि अगर आपकी तरह सभी भविष्य के सपने और सच्चाई से प्राणवायु लेने लगे, तो उन्हें (पुरुष जो सत्ता में शामिल हैं) ऐसी व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो जाएगा, जिसमें कुछ लोगों (एलीट्स) के सुख के लिए ज्यादा लोग (आवाम) गलीज स्थितियों में जिंदा रहें। इस बात को आप समझती हो, इसलिए आपसे उम्मीद है। यह उम्मीद इसी सिरे पर है कि आप आगे से स्त्री का बंटवारा नहीं करोगी, खासकर धर्म के आधार पर तो कतई नहीं, और उसे अन्य दबाए-सताए गए लोगों से भी जोड़ोगी। यह बंटवारा ही उन्हें खाद-पानी मुहैया कराता है। हालांकि यहीं उम्मीद का सूरज भी है, जब सारे दबाए-सताये, वॉल स्ट्रीटों, लंदन स्क्वायरों और जंतर-मंतरों पर एक साथ उठ खड़े होंगे।

तस्लीमा, आपके बारे में आने वाली हर खबर के साथ एक परिचय चस्पां किया जाता है। ‘चर्चित और विवादित लेखिका’। क्या सचमुच यह विशेषण हैं? तस्लीमा क्या आपको सिर्फ लेखिका नहीं कहा जाना चाहिए? चर्चित और विवादित बनाना आपकी धार और आपके विचार को कमजोर करने की साजिश है, इस पर ध्यान दो, तस्लीमा। तुम जो उस स्त्री की प्रतीक हो, जिससे दुनिया का राज्य छीनकर पुरुष ने उसे अपना गुलाम बनाया है। तुम पर जिम्मेदारी ज्यादा आयद है, और अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ एक बार फिर अपने पुराने बयान पर लौटो। तस्लीमा हमें अच्छा लगा था, जब आपने सलमान रश्दी और मकबूल फिदा हुसैन से अपनी तुलना को कुबूल नहीं किया। तुलना के लिए दो कदों का समान नहीं, तो करीब-करीब बराबर होना लाजिमी है। सलमान और मकबूल दुखों की ड्योढी पर बहुत नीचे रहे हैं। आपकी लेखिका का दुख भी, स्त्री के दुख से बहुत छोटा-हीन और नगण्य है। बतौर लेखिका शायद आपको दुख रहा भी नहीं है। किताबों के प्रतिबंध दुखों का समग्र नहीं हैं। आपका सारा दर्द, आपकी हर कराह, आपकी हर गुस्सैल छवि स्त्री के हिस्से की है। इसलिए आपका कद इन सबसे बड़ा हो जाता है।
‘लज्जा’, ‘अपरपक्ष’, ‘निमंत्रण’ या फिर ‘फेरा’ और ‘आमार मेयेबेला’ से लेकर ‘द्विखंडित’, ‘सेई सब अंधकार’ से लेकर ‘निर्बासितो बाहिरे ओन्तोरे’ तक के पन्नों में दर्ज आपका दर्द क्या सचमुच आपका ही था। यह दर्द न तो आपने अकेले भोगा है, और न ही इस पर आपका हक है, क्योंकि आप जो कुछ भी कहती हो, उसके गहरे मायने हैं। ठीक वैसे ही जैसे आपने अपने ताजा ट्वीट में कहा था कि आप जो कुछ कह रही हो, उसे समझने के लिए एक पुरुष को 500 साल का वक्त लगेगा। तस्लीमा, अगर सचमुच 500 साल में आपकी बातें सारी मर्द-जाति को समझ में आ जाती हैं, तो यह बहुत कम वक्त होगा। यह उस 4000 साल पुराने वक्त की भरपाई होगी, जब पुरुष ने आपको जेवर-श्रृंगार और खास कपड़ों में लपेटकर इच्छित वस्तु बनाया था।

तस्लीमा, आपको तो याद ही है हैदराबाद की वह दोपहर। जब प्रेस क्लब में आप पर गमले, फूलदान, किताबें और कुर्सियां फेंकी गई थीं। मौत आपके सामने थी। फिर हौसले की वह कौन सी राह थी, जिस पर चलकर आपने भारत की नागरिकता के लिए आवेदन दिया था? तस्लीमा मुझे पता है कि आने वाले सालों में आपको ‘खत्म’ कर दिया जाएगा। पुरुष सत्ता अपने खिलाफ उठी किसी भी आवाज को विभिन्न तरीकों से खत्म करने के लिए जानी जाती है। हो सकता है, आपकी सांसें चलती रहें, लेकिन असल में आप खत्म हो जाओगी। हालांकि आपने देखा होगा कि शुरुआत में आपके दिमाग पर हमले ज्यादा हुए थे। आपको इतिहास की दराजों में झांकने, दर्शन की तकनीक बताने और धर्म की व्याख्याओं से माथापच्ची करने की सलाहें मिली थीं। यह विरोधी दिमागों को उलझाने की आसान तरकीबें हैं, जब आप इनसे खत्म नहीं की जा सकीं, आपकी आवाज और मुखर हो गई, तो विरोध, प्रदर्शन और प्रतिबंध जैसी ‘न्यायिक’ हरकतों को अंजाम दिया गया। अब हमले की बारी है, इंतजार करो तस्लीमा। एक बड़ा पुरुषवादी हमला आपके सिर पर खड़ा है। उस हमले के वक्त आप बिल्कुल अकेले होओगी। जैसे दुनिया के तमाम घरों में स्त्रियां अकेली हैं, अपने ऊपर हो रहे हर हमले के खिलाफ।
(26 अक्टूबर को जनवाणी में प्रकाशित)

3 comments:

ashabd said...

बहुत ही उम्दा आलेख. मज़ा आ गया. थैंक्स. तसलीमा का बयान आने के बाद मैं सोच रहा था कि कोई इस पर लिख क्यों नहीं रहा. हालाँकि मैं खुद भी इस पर नहीं लिख पाया. और हाँ, कोई अगर लिखता भी तो सचिन की शैली कहाँ से लाता. कुल मिलाकर बहुत बढ़िया. बधाई सचिन.

Abhishek Srivastava said...

आप अच्‍छा लिखते हैं भाई... पहली बार पढा आपको... बस हिज्‍जे और हिंदुस्‍तानी जुमलों का प्रयोग दुरुस्‍त कर लीजिए...

ANAND said...

सर प्रणाम!!!
बड़े दिनों बाद ऐसा हुआ है कि कोई लेख पढ़ा तो आखिरी तक पढ़ने का लालच खत्म नहीं हुआ....
आपकी लेखिका का....कद बड़ा हो जाता है/ शानदार कही गई पंक्तियाँ हैं/ कुल मिलकर पूरा लेख लाजवाब करके पढ़ने को विवश कर देता है/