आमद का शुक्रिया


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17 November 2009

क्योंकि वक्त अभी बदला नहीं है

हम कहानी क्यों पढते हैं? यथार्थ को परखने के लिए? अपनी नजर साफ करने के लिए? खाली वक्त काटने के लिए या फिर परिचित कथाकार की मुग्ध शैली से रूबरू होने के लिए? सवाल और भी हो सकते हैं, जवाब अलग अलग होंगे। मैं अश्विनी पंकज की कहानी इनमें से किसी भी वजह से नहीं पढता। अश्विनी हमारे समय के सबसे विश्वसनीय कथाकार हैं, जो असल में अपने देखे, भोगे को रचते हैं। इस कहानी में मुझे ऐसा कुछ अनकहा नहीं मिला जो अश्विनी के मुंह से कई बार सुन चुका होऊं। ग्लोबल आंधी में पिसती आदिवासी संवेदना, अनसुना कर दिया गायन, संबंधों की तान, ढेर सारा जीवन और सबसे ज्यादा एक ईमानदार हौसला जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। यह अश्विनी की कहानियों के साथ नाभिनालबद्ध एक जरूरी ईकाई है, बिल्कुल ईकाई, क्योंकि यह एक दूसरे से जुडी हुई चीजें हैं जो अश्विनी पंकज की कहानियों के साथ चलती हैं।

इस वक्त झारखंड और पूरी दुनिया के आदिवासी जीवन पर एक सजग रचनाकर का जो बयान होना चाहिए वह अश्विनी की कहानियों में अपनी पूरी ताकत के साथ आता है। आज ही मेल पर मिली उनकी यह कहानी इस बयान को पुष्ट करता हुआ हालिया उदाहरण हैं। लीजिए।

भूत का बयान
- अश्विनी कुमार पंकज
सदिZयों की ठंढ को चीरती हुई धूप जैसे अचानक आ धमकती है, वैसे ही सामने वालों के मुरझाये चेहरों पर अब खुशी झलकने लगी थी। फूदन नाग समझ गया कि वह लड़ाई हार गया है। लड़ाई हारने का ख्याल आते ही उसकी धमनियों में बहता लहू ठहर-सा गया। नजर धुंधला उठी। लगा पूरी देह बेजान हो गई है और पहाड़ों से होड़ लेने वाली दोनों टाँगें भी शरीर का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं। वह सचमुच गिरने वाला ही था तभी सोमारी ने उसे थाम लिया।
निराशा के गहन अंधकार में डूबती फूदन की आँखों को सोमारी ने अपने चेहरे पर टिका लिया। लगभग साठ की उम्र में पहुँच चली उसकी पत्नी सोमारी के चेहरे पर भी हताशा थी, लेकिन आँखें किसी चोटिल नागिन की तरह फुफकार रही थी। बस इसी एक पल में वह नागिन उसके भीतर जा घुसी और उसकी देह भी नाग की तरह लहराने लगी। फिर वह फन काढ़कर खड़ा हो गया। उसने बेबसी और गुस्से से लपलपाती नजरों से सामने वालों पर एक नजर डाली और जोर से फुफकारा।
साहेब जी जोहार! मैं अनपढ़ फूदन नाग नइ जानता कि पिछले कई सालों से उनकी तरफ से का कहा जा रहा है। हमारी तरफ से का बोला जा रहा है। आप का कहते रहे हैं और आज आखिरी बार भी जाने का कहने वाले हैं। मैं तो ठीक से हिंदी भी नइ जानता। हिआँ की जो भासा है वह तो मेरे पुरखों की खातिर भी अबूझ थी। इसलिए मुझे जो भासा आती है उसी में आखिरी बार आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ। जानता हूं आप नइ बोलने देंगे। तब भी सुनाउंगा। मौसम कैसा होगा ई बात हम मुंडा आदिवासी लोग हवा से अंदाज लगा लेते हैं। दिकू दुश्मन लोग का चेहरा पर जो खुसी है उससे बूझना मोसकिल नइ है कि मैं यह लड़ाई हार चुका हूँ।
साहेब जी। यह कहानी मेरे मरांग आजा (पड़दादा) ने सुनायी थी। पहले हमारा जंगल बहुत घना था। इतना घना कि सूरज भी उसको भेद नहीं पाता था। मुंडा लोग भी अकेले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। झुंड बनाकर ही जंगल में ढुकते थे। यह गोरे-काले दिकुओं से आने के बहुत-बहुत पहले की बात है। आज तो उल्टा हो गया है हजूर। अब जंगल-पहाड़ ही आदमी से डरता है। आप कहिएगा क्यों, तो उ इसलिए साहेब जी कि जंगल अब पहले जैसा ताकतवर (घना) नइ रहा। दिकू लोग और जंगली बाबू सब उसे काट-कूट कर एकदम बाँस जैसा कमजोर कर दिये हैं।
तो, जंगल जब खूब घना था, उसमें एक बुढ़िया रहती थी। बुढ़िया के मरद को ढेर दिन पहले बाघ खा गया था। मरद के मरने के बाद फिर उसने सादी नहीं की थी। वह अकेले ही जँगल में अपने बेटे के साथ रह रही थी। उसका लड़का पहाड़ पर खेती करने जाता। घर-बाहर के सभी काम दोनों माँ-बेटे मिलजुल कर करते।
एक दिन हजूर, बुढ़िया का बेटा अपने संगी के साथ जंगल गया। गेठी-कांदा लाने। आप तो गेठी-कांदा नइ जानेंगे। कैसे जानेंगे हजूर। गेठी-कांदा तो हम आदिवासी लोग का खाना है। गेठी-कांदा एगो फल होता है साहेब जी, जो जंगल भीतरे जमीन नीचे पैदा होता है। जिस साल फसल बोंगा नाराज हो जाता है, सारे खेत सूखे रह जाते हैं, कोई अनाज नहीं होता है, कुछ भी नइ उगता है, न खेत में न जंगल में, उस समय में हमलोग जमीन का इसी फल को खा कर बचते हैं। हजूर उस साल भी ऐसने हुआ था। इसीलिए बुढ़िया का लड़का गेठी-कांदा लाने गया था। वह लड़का लेकिन गेठी-कांदा ढूंढने में कच्चा था। क्योंकि इससे पहले कभी भी उसके खेत नइ सूखे थे और उसको गेठी-कांदा ढूंढने की जरूरत नइ पड़ी थी। उसका संगी जबकि गेठी-कांदा ढूंढने में बेस सुपट था।
जंगल पहुंचकर दोनों ने गेठी-कांदा खोदना शुरू किया। देखते ही देखते संगी ने तो टोकरी भर गेठी-कांदा खोद लिया, पर बुढ़िया के बेटे को काफी खोदने के बाद भी कोई गेठी-कांदा नइ मिला। वह ऐसे ही ढेर देरी तक खोदता रहा, तो उसकी हालत देखकर उसके संगी ने कहा, `अरे भाई, तुमको तो इतना खोदने पर भी, कोई गेठी-कांदा नइ मिल रहा है, और साम होने जा रही है, इसलिए आओ मेरी टोकरी के गेठी-कांदे को ही दो हिस्से में बांटकर दोनों थोड़ा-थोड़ा गेठी-कांदा लेकर घर लौट चलते हैं।´ पर बुढ़िया के बेटे ने मना कर दिया और बोला, `अभी तो मैं तुम्हारा आधा गेठी-कांदा लेकर घर चला जाउंगा, पर तुम यदि यही बात गांव वालों से कह दोगे तो सभी मुझे नाकारा समझेंगे। इसलिए तुम जाओ। चाहे जितनी भी रात हो जाए, मैं गेठी-कांदा लेकर ही जाउंगा।´
साहेब, संगी ने उसको खूब समझाया। पर बुढ़िया का बेटा किसी बुरु-पहाड़ जैसा जरा भी नइ हिला। आखिर में थक-हार कर उसका संगी अपना गेठी-कांदा लेकर अकेले ही गांव लौट गया।
संगी के जाने के बाद बुढ़िया का बेटा फिर से गेठी-कांदा खोजने में लग गया। वह जहां भी खोदता पत्थर निकलता।
मरांग आजा बोलते थे हजूर वह लड़का पूरी रात मेहनत करता रहा। लेकिन गेठी-कांदा नइ ढूंढ पाया। इसी बीच उसका कूदाल टूट गया। कूदाल के टूट जाने से लड़का बहुते निरास हो गया और वहीं जमीन पर मारे थकान के लुढ़क गया।
वह इतना थक गया था कि उसे पता ही नइ चला कि वह जहां लेटा है, वहीं जहरीली चीटियां हैं। फिर का बताएँ साहेब जी। जब मरांग आजा हमको इ कहानी सुनाते थे तो यहां तक पहुंचते-पहुंचते मैं जोर-जोर से रोने लगता था।
सोचिए तो साहेब जी, कितना दरदनाक है न इतनी मेहनत के बाद भी एक ठो कांदा का नइ मिलना।
हजूर आगे हुआ इ कि जहरीली चीटियों के काटने से बुढ़िया का बेटा लेटे-लेटे हुँवे मर गया।
उधर जब फजिर होने को आयी और बेटा नइ लौटा तो बुढ़िया मारे फिकिर के उसके संगी के घर जा पहुंची। फजिरे-फजिर बुढ़िया को देख कर संगी समझ गया कि उसका बेटा अभी तक जंगल से नइ लौटा है। वह बोला, लगता है तेरा बेटा अभी तक जंगल में गेठी-कांदा ही खोज रहा है।´ बुढ़िया को उसकी बातों पर जरा भी भरोसा नइ हुआ।
क्योंकि वह जानती थी कि उसका बेटा बहुत मेहनती है। हजूर, कहते हैं बिना सांस लिए वह एक ही बार में पूरा पहाड़ जोत डालता था। नदी को अकेले बांध लेता था और तब तक खेत के मचान पर जगा रहता था जब तक कि फसल खलिहान में नइ आ जाती थी। हजूर इसीलिए बुढ़िया को उसके दोस्त पर बिसवास नइ हुआ। उसे लेकर वह बेटे को ढूंढने जंगल गयी। उसी जगह पर जहां दोनों यार गेठी-कांदा खोजने गए थे।
जादा टेम नइ लगा साहेब। लड़के की लास उन्हें जल्दी दिख गयी। जवान बेटे की मरी देह देखते ही बुढ़िया से रहा नइ गया। पछाड़ खाकर गिर पड़ी और दहाड़ मारकर रोने लगी। जवान बेटा-बेटी का मउवत, खेत का सूखना या छिन जाना किसी को बरदास्त नइ होता है साहेब। बड़ी मोसकिल से बेटे के संगी ने बुढ़िया को संभाला और फिर दोनों लास उठाकर गांव ले आए। रीत-रेवाज से बुढ़िया ने दाह-संस्कार कर दिया। करजा-फरजा लेके गांव वालों को भोज भी दिया।
बस अब और थोड़ा-सा ही बचा है साहेब जी। सुन लीजिए। इस समय मेरी भी हालत उस बुढ़िया जैसी ही है। कुछ भी अच्छा नइ लग रहा है। इ पूरी धरती घूम रही है। दिमाक खाली हो गया है और आगे की बची-खुची जिनगी अंधरा रात जइसा एकदम करिया बुझा रहा है। बुढ़िया की भी हजूर ऐसी ही हालत हो गयी थी बेटे के मरने के बाद।
उसे न तो भूख लगती थी और न पियास। कभी थोड़ा-बहुत खा लेती। लेकिन अक्सर भूखी ही रह जाती थी। ऐसी ही किसी भूखी रात को जब बुढ़िया सो रही थी, तभी उसके बेटे का भूत आकर बोला, `आइयो (माँ) मेरी कुल्हाड़ी, कुदाल, तीर-धनुष जो भी है, ला सब दे दे।´ आवाज सुनते ही बुढ़िया हड़बड़ा के नींद से उठ बैठी। चारों तरफ देखा। कोई नइ दिखा। वह जान गई कि जरूर यह उसके बेटे का भूत है।
दूसरे दिन बुढ़िया ने बेटे के संगी को जाकर सारी बात बतायी। संगी को बिसवास कहां से होता। पहले सोचा बुढ़िया पगला गयी है। फिर बोला कि वह रात में खुद बुढ़िया के घर जाकर सोएगा और सच का पता लगाएगा।
रात होते ही खा-पीकर वह बुढ़िया के घर सोने जा पहुंचा। आधी रात को जब भूत ने आकर उसे जगाया तो संगी को खूब जोरदार अचरज हुआ। संगी के भूत से मिलकर वह खुस भी हुआ और उसे डर भी लगा। उसने सोचा भूत तो भूत होता है। यह जरूर किसी दिन मुझे मार डालेगा। तब उसने मन में कुछ बिचार करके भूत से कहा, `तुम्हीं मेरे एकमात्रा संगी थे। तुम्हारे मरने से मैं बहुत दुखी रहता हूं। अब मैं हमेशा इसी घर में आकर सोउंगा। तुम भी रोज मिलने आना। हमलोग खूब सारी बातें करेंगे।´ भूत ने उसकी बात मान ली। दूसरे दिन उसके संगी ने भूत को मारने का उपाय किया और साम होते ही पूरी तैयारी करके भूत के आने का इंतजार करने लगा। आधी रात को ठीक टेम पर हजूर भूत फिर आ पहुंचा। उसके संगी ने तुरंत देवड़ा (ओझा) की दी हुई कुल्हाड़ी से भूत पर वार कर दिया। भूत का कुछ नइ बिगड़ा। दूर जाके संगी की नादानी पर हंसने लगा। हंसते-हंसते ही बोला, `अरे पागल, जो एक बार मर गया हो उसे दोबारा कौन मार सकता है।´
तो, साहेब जी, मेरी दो एकड़ बारह डिसमिल जमीन इस दिकू ने मुझे मरा हुआ बताकर हड़प लिया है। पिछले चौदह साल से मैं मरा हुआ फूदन नाग अपनी जमीन को पाने के लिए कोरट-कचहरी के चक्कर काट रहा हूं। उ जो काला कोट पहने मेरा उकिल बाबू है ना, कहा था कि फूदन मैं तुमको जिंदा कर दूंगा और तुम्हारी जमीन भी वापस दिलवा दूंगा। पर उकिल उकिल तो सब एके होता है हजूर। धरती आबा बिरसा मेरे मरांग आजा को बोले थे, `सब चरका-चरका (गोरे पादरी और अफसर) चमड़ी एक होता है।´ ई उकिल हमको नइ तो जिंदा कर सका और न हड़पा हुआ जमीने दिला पाया। और आज आपलोग का आखिरी गोइठ-बात सुन के हमको सफा बुझा रहा है कि जमीन का ई लड़ाई मैं हार गया हूं। अपना ई जमीन को बचाने के लिए साहेब जी, जो भी बचा हुआ खेत सब था, मुझे सब बेचना पड़ा।
का बोलेर्षोर्षो जिंदा होने का कागच रहने से मेरा दावा मान लिया जाता और ई झूठा जमीन बिकरी का कागच खारिज हो जाता
बस हियाँए तो आदिवासी लोग ठका जाता है हजूर। आजा ठीक ही बोलते थे कि कागच का कानून-नेयाय
में हमलोग कभी नहीं जीतने सकेंगे। मेरा बुढ़िया जितना दिसुम (देश) का भी उमिर हो गया है साहेब जी। सुनते थे कि आबुवा (लोगों का) राज आ गया है। पर हमको तो एहे बुझाता है कि उलगुलान का बेरा से भी खराब राज है आज का दिसुम में।
अब जिंदा होने का कागच भी कहां से लाएं। जब पहिला छउवा (बच्चा) जनमा था, उसी अकाल का दिन में हम पंजाब चल गये थे। कोड़ा (मजदूरी) कमाने। वहीं मालिक से पइसा मांगने पर झगड़ा हो गया। मालिक ने हमको फंसाने के लिए थाना-पुलिस कर दिया। हुआँ भी कोई हमारी भासा-बोली नइ बूझता था। आठ साल जेहल खटे। इधर गांव में सब कोई बुढ़िया को समझा दिया मैं मर गया हूं। बुढ़िया भी मान ली। अब अउरत जात का तो कोइ सुनता नइ है।
जब लौटा तो ऊ ... जो हुआँ बड़का तोंद लिये बैठा है, बतख जैसा, झूठा ठेपा-अंगूठा लगा कर हमारा दो एकड़ बारह डिसमिल जमीन कब्जा लिया था। बहुत रोए और बिनती किए साहेब जी। नइ माना। तब आपका सरन में आए।
सोचा था राज बदल गया है। नेयाय मिलेगा। लेकिन हमारा गवाही आपका कोरट-कचहरी नइ मानता है। काहे कि फूदन नाग तो मर गया है। आप ही ईश्वर का कसम खाके बोलो हजूर ... आपके सामने फूदन नाग खड़ा है या कि उसका भूत।
तो, साहेब जी हम नइ जानते हैं कि आप हमारा बात समझे-बूझे कि नइ। पर आखिरी बात बोल रहा हूं। जब जमीने नइ रहेगा हम कैसे जिएंगे। वइसे भी आपका कागच में तो हम मरे ही हुए हैं। आप फैसला सुनाइए। आपका फैसला सुन कर हिआँ से निकलेंगे और बाहर में ई लूटेरा दिकू का मुड़ी-पेट सब काट देंगे। मरा हुआ अदमी का आपका कोरट का कर लेगा साहेब जी।

12 November 2009

रूढ़िग्रस्त लेखक के लालित्यपूर्ण लेखन पर एक नजर

एक पत्रकार के बारे में अपनी राय कायम करने का एक आसान तरीका तो यह है कि उसके लेखन को तत्कालीन परिस्थितियों, राजनीति और माहौल के सापेक्ष रखा जाए। तात्कालिक मसलों पर जनपक्षीय राजनीतिक समझ के साथ लिखा गया पत्रकार के लिए एक बेहतर कसौटी हो सकता है। अफसोस प्रभाष जोशी जी पर इस तरह का लेखन उनकी मौत के एक हफ्ते बाद भी नहीं आया है। स्तुतिगान के भारतीय ठोंग में पत्रकार प्रभाष जोशी पीछे बहुत पीछे छूट गये। आलोक श्रीवास्तव जी ने कथादेश के स्तंभ अखबारनामा में प्रभाष जोशी पर मुस्तैद और बिना चश्मे की निगाह डाली है। आखिरकार आज नहीं तो कल प्रभाष जी को इसी नजर से देखा जाएगा।
रूढ़िग्रस्त लेखक के लालित्यपूर्ण लेखन पर एक नजर
आलोक श्रीवास्तव
प्रभाष जी हिंदी के शक्तिशाली और प्रमुख संपादक रहे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्हें एक्सप्रेस समूह के मालिक का पूर्ण विश्वास प्राप्त था। वे उनके एक तरह के पुत्र या मानस पुत्र जैसे थे, ऐसा प्रभाष जी स्वयं ही कहते थे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उनके लिखे का व्यापक पाठक वर्ग और उसका हिंदी के पढ़े-लिखे मध्यवर्ग पर थोड़ा बहुत ही सही पर असर था, जो कि विगत वर्षों में हिंदी के किसी भी संपादक का नहीं रहा। शक्तिशाली इस अर्थ में कि समाज के सत्ताशाली वर्ग, राजनेता, प्रशासक, राजनीतिक संगठनों तक उनकी पहुंच और उनका सम्मान था और इसका उन्होंने कभी बेजा इस्तेमाल नहीं किया। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्होंने कभी छुद्र निजी लाभों के लिए अपनी स्थिति को नहीं भुनाया। सचमुच हिंदी में पत्रकारिता की जो गत हो चुकी है और संपादकों का जो चरित्र और व्यक्तित्व है, उनमें प्रभाष जी का एक अलग आभामंडल था। उनके निधन पर मुझे शोक है। ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दो दशकों में दिवंगत हुए हिंदी के अन्य संपादकों रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, गणेश मंत्री आदि के निधन पर हुआ था। पर एक फर्क देख रहा हूं, उपरोक्त संपादकों में से कौन कद में और योगदान में प्रभाष जोशी से कमतर था? पर किसी का वैसा स्तुतिगान नहीं हुआ, जैसा प्रभाष जी का हो रहा है। बल्कि ये लोग ठीक से समाचार भी नहीं बन पाये। मुझे लग रहा है कि यह ग़लत हो रहा है। प्रभाष जी की तमाम विशेषताओं को मैं स्वीकार करता हूं। परंतु सार्वजनिक व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उन पैमानों पर नहीं किया जाता, जिन पर प्रभाष जी का किया जा रहा है। उनके मूल्यांकन का निकष उनके विचारों में अंतर्निहित तत्व और उनके कार्यों की दिशा ही होती है। मैंने प्रभाष जी पर आज नहीं, आठ-नौ साल पहले कथादेश पत्रिका में अपने स्तंभ अखबारनामा में दो-तीन लेख लिखे थे, उन्हें भेज रहा हूं। आज फिर से प्रभाष जी पर उन बहुत सी बातों को लिखने का मन है, जिनसे सत्य प्रकट हो। पर शायद इसमें कुछ समय लगेगा। कोई भी शोक इतना बड़ा नहीं होता कि उसकी छाया में सत्य को दबा दिया जाए। मेरा न तो प्रभाष जी से व्यक्तिगत संपर्क था, न कोई व्यक्तिगत अनुभव, न ही कोई व्यक्तिगत राग-द्वेष। मैं उन्हें, उनके सार्वजनिक वक्तव्यों, उनके कॉलम कागद कारे और उनके तमाम लेखन, भाषण और कार्यों को बहुत गौर से निरखता रहा हूं। आरंभ के लगभग दस वर्षों तक तो मैंने उनके कॉलम कागद कारे की एक-एक किस्त गौर से पढ़ी है। उनकी संप्रेषण क्षमता पर मुग्ध हुआ, उसे सराहा, पर उसकी अंतर्वस्तु और उसमें निहित विचारों में मुझे हमेशा क्षुब्ध किया। प्रभाष जी हिंदी के सबसे बड़े विचारहीन, कुतर्की, और रूढ़िग्रस्त लेखक थे और अपने लालित्यपूर्ण लेखन से उन्होंने प्रतिक्रियावादी विचारों को हिंदी के एक तबके का संस्कार बनाने में सफलता भी पायी। बहुत कुछ है लिखने को। मैं जानता हूं कि भक्त लोग विक्षुब्ध हो उठेंगे – पर पाश की यह पंक्ति ही दोहराऊंगा कि यदि सारा देश उसके शोक में शामिल है, तो उस देश से मेरा नाम खारिज़ कर दो। यद्यपि मुझे उनके न होने का शोक है। पत्रकारिता में अब ऐसे लोग भी कहां बचे? अब तो अपराधी और दलाल संपादकों के रूप में सभी नहीं तो कई जगह ज़रूर विराजमान हैं, पर यह इस बात का तर्क बिल्कुल नहीं बनना चाहिए कि हम व्यक्ति का झूठा महिमामंडन करें :

कथादेश के स्तंभ अखबारनामा में प्रकाशित

कहां हैं कारे काग़दों के इतिहास-निर्माता?

30 सितंबर, 2000 को मुंबई से प्रकाशित होने वाले सांझ जनसत्ता का जब आखि़री अंक निकला, तो शायद वहां के पत्रकारों के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल था कि उनका अख़बार बंद किया जा चुका है। अमूमन यह हमेशा होता है, अख़बार बंद होने के बाद वहां कार्यरत पत्रकारों को यथार्थ की भूमि पर आने में थोड़ा समय लगता है। यह यथार्थ की भूमि यह जानना है कि वे हिंदुस्तान के उस मामूली कामगार-वर्ग के हिस्से हैं, जो हिंदुस्तान की निष्पक्ष और महान न्यायपालिका और राष्ट्रभक्त पूंजीवादी घरानों के सहअस्तित्व के ठीकरे पर दशकों से जिबह किया जा रहा है। पत्रकार अख़बारों में नौकरी करने के दौरान खुद को प्रेस-मालिकों, उनकी विचारधारा और उनके एजेंडे से इतना ज़्यादा आइडेंटीफाइ करने लगते हैं कि उन्हें प्रेस की शक्ति और प्रेस की महिमा अपनी ही शक्ति और महिमा प्रतीत होने लगती है। वे एक श्रमिक के रूप में खु़द को नहीं देखते, समाज के एक विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति की तरह वे अपनी आत्म-छवि गढ़ते हैं। यथार्थ की भूमि पर आने पर पता चलता है कि ज़मीन तो ख‍िसक चुकी है।

30 सितंबर को सांझ जनसत्ता बंद हुआ। उसके कुछ पहले मराठी का सायंकालीन अख़बार सांझ लोकसत्ता बंद हुआ। बंद होने के समय सांझ जनसत्ता की प्रसार-संख्या लगभग 25 हज़ार रोज़ाना थी। लगभग दर्जन भर उपसंपादक/रिपोर्टर तथा क़रीब इतने ही प्रूफ रीडर तथा अन्य कर्मचारी इसमें कार्यरत थे। प्रबंधन ने एक माह तक इंतज़ार किया कि इनमें से कुछ लोग भविष्य की असुरक्षा से तंग आकर कहीं कुछ जुगाड़ खोज कर चले जाएंगे और उनकी बला टलेगी। पर ऐसा हुआ नहीं, मुंबई में हिंदी पत्रकारिता में नौकरियों के अवसर न के बराबर हैं। जब श्रम मंत्री ने यह कह दिया कि मानसून सत्र तक वे वेतन-आयोग लागू कर देंगे, तब प्रबंधन ने जल्दी मामला निपटाने का मन बनाया। 31 अक्तूबर को प्रबंधन ने सांझ जनसत्ता के पत्रकारों को कहा कि वे एक साल का वेतन लें और दफ़ा हों। एक साल के वेतन का मतलब था अधिकतम एक लाख रुपये। वेतन-आयोग लागू हो जाने के बाद यह राशि बढ़ जाएगी, इसके अलावा प्रबंधन को वेज बोर्ड द्वारा निर्धारित पिछले दो या तीन वर्षों का बढ़ा हुआ वेतन भी देना पड़ेगा। अतः प्रबंधन ने 15 दिन का समय दिया कि इसके भीतर वे मामला आपसी-समझ से निपटा लें। इस आपसी-समझ का एकमात्र मतलब प्रबंधन द्वारा एकतरफ़ा ढंग से दी गयी भीख लेकर बेरोज़गार हो जाना है। अब यह आपसी समझ न बनी तो अदालत का रास्ता ही आख़िरी विकल्प है।

जनसत्ता का मुंबई और चंडीगढ़ संस्करण इसी वर्ष फरवरी में बंद हुआ है। दिल्ली संस्करण भी बंद होने की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है। वैसे यह सूचना काफी ज़ोरों से है कि इसे बंद करने से पहले एक साप्ताहिक अख़बार के रूप में निकाला जाएगा।

जनसत्ता का 17 वर्षों का जीवन और इतिहास, वहां के संपादकों और पत्रकारों की कार्य-शैली, विचारधारा और उसकी अनंत बारीकियां हिंदी पत्रकारिता को जानने के लिहाज़ से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। एक धमाकेदार और गौरवशाली साथ ही बड़बोली शुरुआत के बाद से पतन की यात्रा में अनेक मोड़ हैं, जिसके अनेक पाठ और अनेक भाष्य हैं। जनसत्ता पिछले डेढ़ दशक की हिंदी पत्रकारिता की एकमात्र कार्यशाला रहा है, जहां वामपंथ और दक्षिणपंथ के सामंजस्य और संघर्ष से एक ऐसी पत्रकारिता जन्मी, जिसने अपने लक्ष्य और स्वरूप की अस्पष्टता के बावजूद हिंदी पाठकों के एक वर्ग में अपनी पैठ बनानी शुरू की ही थी, पर प्रबंधन साथ ही संपादकों एवं संपादकीय-नीतियों की भेंट चढ़ गया। सत्ता के प्रतिपक्ष का आभास देने वाली हिंदी पत्रकारिता का यह आख़िरी प्रहसन था, जो समाप्त हुआ – पर पुराने देशज नाटकों की तरह यवनिका-पतन के पूर्व कई मंचीय कर्मकांड अभी बाकी हैं।

जनसत्ता जब शुरू हुआ तो शायद इसी गुमान में कि पार्टी आधारित और नेता आधारित राजनीति में उसका भी कोई महत्त्व होगा। पर हुआ यह कि नयी आर्थिक नीतियों, संचार-क्रांति, वैश्वीकरण और इनके माध्यम से भारत पर कसते साम्राज्यवादी शिकंजे ने पार्टियों और नेताओं वाली उस राजनीति को ही एक औपचारिकता में बदल दिया। कुछ अख़बारों का रातों-रात 10 लाख प्रसार-संख्या छूने लगना, कुछ का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना बड़ा रहस्यमय लगता है। पर इस सारे रहस्य की कुंजी बहुराष्ट्रीय निगमों के उस बाज़ार में है, जो भारत की गांव-गलियों में पसरता जा रहा है। जिन अख़बारों ने उससे तालमेल बिठा लिया और उसके अनुरूप अपना गठन किया, वे बढ़ रहे हैं। ये अख़बार मुद्रित सामग्री के रूप में भारत की गुलाम अर्थव्यवस्था और परजीवी संस्कृति के दस्तावेज हैं। जनसत्ता किसी आदर्शवाद या इस स्थिति के प्रति प्रतिकार के कारण अप्रासंगिक नहीं हुआ, बल्कि मालिकों के अंतर्कलह, प्रबंधन की नासमझी व संपादकीय स्तर पर दिशाहीनता और विभ्रम के नतीजे में अंत को पहुंचा है। यदि वह बना भी रहता, तो एक मुनाफ़ा केंद्रित पूंजीवादी घराने के उत्पाद के तौर पर उसकी नियति थी – हिंदी के अन्य रंगीन अख़बारों की तरह अपने आपको ढालना और वैचारिकता, साहित्य-संस्कृति और सत्ता के प्रतिपक्ष आदि की भंगिमाएं छोड़ना। या तो जनसत्ता हिंदी के लगभग दर्जन भर अख़बारों की ही एक और शक्ल बनकर ज़िंदा रह सकता था। जनसत्ता जिस सामाजिक तेवर को लेकर 1983 से 1990 तक परवान चढ़ा था, उस तेवर का ज़माना बीत गया था। दो ही रास्ते बचे थे – सचमुच में जनता का अख़बार बनना, सचमुच में एक प्रतिपक्ष बनना, जिसका उसने अपनी शुरुआत से ही दावा किया था और दूसरा रास्ता था – उत्तरप्रदेश के सफल बाज़ारू अख़बारों के दिखाये रास्ते पर चलना। पहले रास्ते का मतलब होता एक पूंजीवादी संस्थान का वास्तव में एक मिशन बन जाना। जिसका कि उसने बारंबार दावा किया था, पर जो वह था नहीं। दूसरे का मतलब एक ख़ास क़िस्म की नयी पूंजीवादी दक्षता, आधुनिकीकरण व और भी बड़ा निवेश। लिहाज़ा जनसत्ता का बंद होना, वह जिस रास्ते पर था, उसकी अनिवार्य परिणति है।

पर विरोध का मुद्दा है – और वह एकमात्र मुद्दा है – प्रबंधन का कर्मचारियों के प्रति बेईमानी और लंपटता से भरा आपराधिक रवैया। उनके आर्थिक हितों को उठाईगीरों और ठगों की तरह हड़पने की कोशिशें। एक्सप्रेस जिस समय इन उत्पादों को बंद कर रहा है, उस वक्त भी उसके पास अरबों रुपये की चल-अचल संपत्ति है, जिसमें से बहुत बड़ा हिस्सा लोकतंत्र के चौथे खंभे के नाम पर उन्हीं सरकारों से वसूला गया है, जिसके प्रतिपक्षी की भूमिका में उसने अपनी आत्मछवि जनता के सामने रखी थी। कर्मचारियों के न्यायपूर्ण ढंग से बनने वाले भुगतान इन संपत्तियों का तिनका भी नहीं हैं, पर इसके लिए हर पूंजीवादी समूह ठगी और ब्लैकमेलिंग की हर कारगर तकनीक अपनाता है। उससे भी दुखद है, वहां कार्यरत कर्मचारियों की स्वाभिमान तथा अधिकारों के प्रति उदासीनता, यथास्थितिवाद और दैन्यभाव। यदि कोई भी कंपनी बंद हो रही है तो जिन कर्मचारियों ने अपने जीवन के बेहतर वर्ष वहां दिये हैं, जिन्हें अब नये सिरे से अपनी जीविका का साधन ढूंढ़ना होगा, उन्हें एकतरफ़ा तौर से साल भर का वेतन देकर निकालना ग़लत है। साल भर का वेतन भी इसलिए कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 1948 के तहत ये सभी कर्मचारी स्थायी कर्मचारियों की श्रेणी में आते हैं और अख़बार बंद होने का मतलब उनकी नौकरियां ख़त्म होना नहीं है। प्रबंधन उन्हें दूसरे विभागों में कार्य देने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य है। यह एक लाख रुपये देना एक तरह की ब्लैकमेलिंग है कि अभी तो हम तुम्हें एक लाख दे भी रहे हैं। लेकर नौकरी छोड़ो, नहीं तो नौकरी से तो हम किसी-न-किसी बहाने निकाल ही देंगे, एक लाख रुपये भी गंवाओगे। मध्यमवर्गीय डर और असुरक्षा तथा निहित स्वार्थों के चलते कर्मचारियों पर प्रबंधन की ब्लैकमेलिंग का यह अस्त्र आसानी से कामयाब हो जाता है। फरवरी में मुंबई के जनसत्ता के बंद होने के बाद यही हुआ था। कर्मचारी अपनी रीढ़ें सीधी करके लड़ नहीं पाते, इसका एक कारण पत्रकारों के राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यूनियन नेताओं की घोर अवसरवादिता और प्रबंधन से मिली-भगत और भ्रष्टाचार का हाल के वर्षों का एक अद्भुत इतिहास भी है – इन पत्रकार-संगठनों के शीर्ष नेताओं की कीर्ति-गाथा का ताज़ा उदाहरण मणिसाना वेतन-आयोग की पक्षपात से भरी पूंजीवादी अख़बार-घरानों की जी-हुजूरी के शिल्प वाली रिपोर्ट है।

सांझ जनसत्ता 6 फरवरी, 1992 को मुंबई से शुरू हुआ था। थोड़े ही समय में इस सायंकालीन अख़बार ने अपनी अच्छी पैठ बना ली थी। वस्तुतः मुंबई शहर का चरित्र और जीवन इस प्रकार का है कि यहां सायंकालीन अख़बारों की अपनी ख़ास जगह है। हिंदीभाषियों की विशाल आबादी के कारण शाम के अख़बार का जल्द ही अपनी जगह बना लेना स्वाभाविक ही था। इसके संपादक सतीश पेंडढेकर बताते हैं कि अपने शुरुआती साल में यह 1 लाख की प्रसार-संख्या के आसपास रहा, जो कि शाम के अख़बार के लिए काफी थी।

जनसत्ता व सांझ जनसत्ता के विभिन्न कर्मचारियों से बातचीत के बाद जो तथ्य सामने आये वे इस प्रकार थे :

- प्रबंधन ने पिछले कई महीनों से यह आदेश दिया हुआ था कि सांझ जनसत्ता की डेडलाइन रात में 11 बजे रहेगी यानी जो अख़बार शाम का है, उसकी ख़बरें एक दिन पहले ही तय हो जाएंगी। अमूमन जिस दिन का अख़बार है, उसी दिन 10 बजे सुबह के आसपास उसका संपादकीय काम समाप्त होता है और 12 बजे तक छप कर वह बाज़ार में पहुंचता है और शाम तक बिकता है। शाम के अख़बार की डेडलाइन उसके प्रकाशन के एक दिन पहले ही रखने का सीधा मतलब है कि उस अख़बार में उस दिन की किसी भी महत्त्वपूर्ण ख़बर को कोई स्थान नहीं मिलेगा। उसमें और सुबह के दैनिक में एक ही जैसे समाचार होंगे। यह एक ही कारण अख़बार को ख़त्म करने के लिए पर्याप्त था।

- जब मुंबई से मध्यप्रदेश के दैनिक नवभारत ने अपनी शुरुआत की तो जनसत्ता के लोगों ने प्रबंधन से जानना चाहा कि उसकी क्या रणनीति रहेगी तो प्रबंधन के ज़िम्मेदार अधिकरी ने कहा, ‘कोई रणनीति नहीं रहेगी। जैसे चल रहा है, वैसे ही चलेगा।’ नवभारत का मूल्य डेढ़ रुपये था। जनसत्ता ने उसके आने के बाद अपने मूल्य को ढाई से बढ़ाकर तीन रुपये कर दिया। परिशिष्ट पहले ही ख़त्म कर दिया गया था। पृष्ठों का आकार छोटा कर दिया गया था। अख़बार का स्तर गिर गया था और मूल्य दूसरे प्रतियोगी अख़बारों से दोगुना। मुंबई भौगोलिक दृष्टि से 60 और 70 किलोमीटर लंबी मध्य व पश्चिम तथा लगभग 30 किलोमीटर लंबी हार्बर उपनगरीय रेलवे लाइनों के दोनों तरफ़ बसा है। यानी शहर कुल 150 किलोमीटर की लंबाई के दोनों ओर बसता है। स्टेशनों पर 200 से ज़्यादा बुक स्‍टॉलों के अलावा पूरे शहर भर के चप्पे-चप्पे पर कई हज़ार अख़बारों के स्‍टॉल आदि हैं। मुंबई में अख़बारों की बिक्री का एक बड़ा ज़रिया ये स्‍टॉल हैं। जनसत्ता इन स्‍टॉलों पर पहुंचता ही नहीं था। अलग से जनसत्ता का प्रसार और विज्ञापन विभाग नहीं था।

- अख़बार को पाठकों तक पहुंचना है, यह न तो प्रबंधन ने कभी सोचा, न ही सामग्री और स्वरूप तय करते संपादकों ने। संपादकों के विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं ने अख़बार का सबसे ज़्यादा नुकसान किया और उसे एक संतुलित मंच नहीं बनने दिया। ये विचारधारात्मक पूर्वाग्रह कभी सती-प्रथा के समर्थन के चरम पर पहुंचते रहे, कभी धुर भाजपा विरोध के चरम पर। इससे प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी दोनों क़िस्म के पाठक अख़बार से कटते चले गये।

- दिल्ली के मुख्य संस्करण के अलावा इस अख़बार के स्थानीय संपादकों के पदों पर चंडीगढ़, मुंबई, कलकत्ता में ऐसे लोगों को चुना गया, जिनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में न तो कोई विशेष योग्यता थी, न ही ख़ास अनुभव। वहां के पत्रकारों के मुताबिक इनमें से एकाध ने तो निजी स्वार्थों के लिए अख़बार का ज़बर्दस्त दोहन किया। अख़बार में कार्यरत पत्रकारों को कोई प्रोत्साहन, प्रमोशन, बेहतर अवसर कभी नहीं दिया गया।

- ये अफ़वाहें हैं कि समूह के मालिक विवेक गोयनका ने लगभग हर बैंक से कर्ज़ लिया है। इसके अलावा पब्लिक-शेयर के रूप में काफी पैसा उगाहा है और अब वे दुबई में न्यूज़-प्रिंट का प्लांट लगा कर ब्रिटेन या स्विट्जरलैंड में रहते हैं। एक-डेढ़ साल से वे भारत नहीं आये हैं। उनकी पत्नी ही कारोबार देखती हैं। उन्हें इसका अनुभव नहीं है, और कंपनी के मुख्य कर्ताधर्ता शेखर गुप्ता के भी ‘आज तक’ में जाने की बातें हवा में है।

- दत्ता सामंत के नेतृत्व में 1984 में हुई हड़ताल के बाद से मालिकों ने इस बात की सावधानी बरती थी कि पत्रकार समूह में संगठित न हो पाएं। इसके लिए उन्होंने अपने ही पिट्ठुओं को यूनियन नेता बनवाया और उन्हें पालते रहे।
ये और ऐसे ही अनंत कारण हैं। पहले मुंबई और चंडीगढ़ में जनसत्ता, फिर अब मुंबई में सांझ जनसत्ता का बंद होना पूंजीवादी घरानों तथा ऐसे घरानों जहां से अंग्रेज़ी के अख़बार भी निकलते हैं, के प्रबंधन पर गहरा सवाल है। आज तक हिंदुस्तान के बड़े अख़बार मालिकों ने अपने प्रबंधन के शीर्षस्थ अधिकारियों की योग्यता और दक्षता के इस पहलू पर कभी गौर ही नहीं किया कि जब हिंदी अख़बारों के विशाल बाज़ार का विस्फोट हो रहा है तो क्यों उन्हें अपने हिंदी प्रकाशन समेटने पड़ रहे हैं?

अब बारी दिल्ली के जनसत्ता की है। बारी अब उन प्रभाष जोशी की परीक्षा की भी है, जो अक्‍सर अपने कॉलमों में जनसत्ता के कर्मचारियों का ज़िक्र इस तरह करते रहे हैं जैसे वे सचमुच एक परिवार का ही आत्मीय अंश हों, एक्सप्रेस-समूह सच का कोई बहुत बड़ा पैरोकार हो, और पत्रकारिता (जो कि मौजूदा ढांचे में पूंजीवादी उपक्रम है और उसी के उद्देश्यों से संचालित और उसके अंतर्विरोधों से भरपूर है) कोई बहुत पवित्र चीज़ हो। यह उनका नैतिक कर्तव्य बनता है कि मुग्ध भाव से वे जिस गांधीवाद का ज़िक्र करते रहे हैं और बड़ी दृढ़ता की भंगिमा में आदर्शवादी लेखन करते रहे हैं, उसका कम-से-कम आंशिक प्रमाण अवश्य दें। उन्हें गांधीवादी शस्त्रों, उपवास से लेकर कोर्ट-कचहरी तक की लड़ाई, जुलूस, प्रदर्शन – हर चीज़ में अग्रिम मोर्चे पर कर्मचारियों के साथ रहकर सिर्फ़ यह साबित करना है कि जैसा कुछ वे पत्रकारिता के माध्यम की बदौलत खुद को दिखाते रहे हैं, वह सिरे से मिथ्या नहीं था, क्योंकि यह सिर्फ़ जनसत्ता के पत्रकारों/कर्मचारियों के हितों का मामला नहीं है। यह उस बुनियादी संघर्ष का मामला है, जो श्रम और परजीविता के बीच हर युग में अलग-अलग रूपों में गतिमान रहा है। यह उन मूल्यों का मामला भी है, जो सिर्फ़ जीने से ही प्रमाणित होते हैं, न कि मात्र लिखने-बोलने से।

यह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही है, जिसने हिंदुस्तान में भिखारियों और बेरोज़गारों की फौज गढ़ रखी है, यहां की कृषि-व्यवस्था को चैपट कर दिया है। मुल्क विदेशों में गिरवी पड़ा है। पूंजीवाद की इन्हीं कारस्तानियों की सर्वोच्च कड़ी रोजगार प्राप्त श्रमिकों को बेरोजगार करना और बेरोज़गार करते वक्‍त उनके पूंजीवादी क़ानूनों में भी स्वीकृत आर्थिक हितों और जायज कंपनसेशन का भुगतान न करना और इसके लिए षड्यंत्र-पर-षड्यंत्र रचना है। यह क़तई सिर्फ़ उन थोड़े से कर्मचारियों का मामला नहीं है। यह संपूर्ण पूंजीवादी प्रणाली से जुड़ी हिंसक लूट का मामला है, जिसके परिणाम दूर तक जाते हैं। यह जनसत्ता के कर्मचारियों को भी याद रखना चाहिए और निहित स्वार्थों के बजाय विफलता की कीमत पर भी अपने आर्थिक अधिकारों की लड़ाई लड़नी चाहिए।

कुछ ही महीनों में यह दिखेगा ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के ये सामयिक पृष्ठ कारे कागद ही रह जाते हैं या इन पर सचमुच कोई इबारत अंकित होती है।

9 November 2009

सत्ता के निशाने पर नक्सली या नक्सलियों के निशाने पर सत्ता

सरकारी हलकों से लेकर जनसंघर्ष तमाम मोर्चों और कॉरपोरेट हाउसों से लेकर खबरों की तलाश में भटकते अखबारनवीसों तक के बीच माओवाद एक चर्चित शब्द है। इनमें से बडे हिस्से के लिए यह खाली समय में "वक्त काटने के लिए की गई जुगाली" हो सकता है और कई के लिए "भारतीय जनता के हक की गुहार", कुछ इसे "भटके हुए नौजवानों का विद्रोह" कहते हैं, तो कुछ इसे "विदेशी पूंजी से संचालित तोडफोड"। जाहिर है यह सभी विशेषण भारतीय नक्सल आंदोलन के वर्तमान स्वरूप को समझने में मदद नहीं करते। कॉ. एबी बर्धन ने अपने लेख में भारतीय सत्ता के विरुद्ध चल रहे सशस्त्र संघर्ष का विश्लेषण करते हुए अपने इस लेख में नक्सल राजनीति के हालिया धरातल को टटोला है। उन्होंने कुछ सवाल भी उठाये हैं, जो मुख्यधारा की मीडिया में सिरे से गायब हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बडी चुनौती कहे जाने वाले नक्सल आंदोलन पर बातचीत के कुछ सूत्र कॉ बर्धन ने दिये हैं।
सत्ता के निशाने पर नक्सली या नक्सलियों के निशाने पर सत्ता
-का. ए. बी. बर्धन

हाल के दिनों में भारत में माओवादी काफी चर्चा में रहें हैं। लालगढ़ और झारखंड की सीमा से लगे पश्चिमी बंगाल के मिदनापुर जिले में माओवादियों की सक्रियता पिछले कुछ महीनों से संचार माध्यमों की सुर्खियों में स्थान पाती रही है।
लालगढ़ के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और लिखना जारी रहेगा। उन माओवादियों में हमारी गंभीर दिलचस्पी है जिन्होंने गहरे शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते हुए और राज्य पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध आदिवासी जनों के आन्दोलन की पीठ पर सवार होकर लालगढ़, छत्तीसगढ़ के दंडाकारण्य में और कुछ अन्य क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमा ली हैं।
लालगढ़ से पहले माओवादी गुरिल्लों ने गढ़चिरौली (महाराष्ट्र,) दांतेवाड़ा (छत्तीसगढ़), लातेहार, खुंटी (झारखण्ड), कोरापुट (उड़ीसा), धामतारी (छत्तीसगढ़) आदि स्थानों पर पुलिस बल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस (सी आरटीएफ) ,सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी आरपीएफ) कर्मियों और कमांडों पर हमलों का एक सिलसिला चलाया, जिसमें इन बलों के 112 कर्मी मारे गए और अनेक जख्मी हुए। कोरापुट जिले के दामनजोडी़ में, जहाँ सीआईएसएफ के 8 कर्मी मारे गये थे, उनका हमला एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम- नालको की पंचपटमाली बाक्साइट-खदान और एनएमडीसी के खदान-पर हुआ था। हमले का उद्देश्य वहाँ बारूद खाने में जमा अच्छी किस्म के विस्फोटकों पर धावा बोलना था। उस धावे से इन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कामकाज में बाधा पहुँची और वहाँ काम करने वाले हजारों मजदूरों में डर की भावना पैदा हो गई। सबसे गंभीर मामला था बीजापुर जिले (छत्तीसगढ़) में पुलिस के बेस कैम्प पर दहला देने वाला हमला, जिसमें 65 पुलिसकर्मी मारे गए। ये सारी कार्रवाइयाँ चुनाव से ठीक पहले या चुनाव के दौरान की गईं। ज़ाहिर है उनको चुनाव पर नजर रखते हुए अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पदभार सँभालते ही यह घोषणा करनी पड़ी कि आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद से निपटना यूपीए-2के लिए एक सर्वप्रमुख प्राथमिकता का कार्य होगा। लालकिले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में भी प्रधानमंत्री माओवादियों को यह चेतावनी देना नहीं भूले कि ‘‘जो लोग सोचते हैं कि वे हथियारों का सहारा लेकर सत्ता पर कब्जा कर सकते हैं वे हमारे लोकतंत्र की ताकत को नहीं समझते। केन्द्र सरकार नक्सली गतिविधियों से निपटने की अपनी कोशिश को तेज करेगी।’’ 17 अगस्त को आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में वामपंथी उग्रवाद से लड़ने का मुद्दा एजेंडे में सबसे बड़े मुद्दों में से था और इसकी प्राथमिकता सूखे की आपदा के बराबर हो गई जिससे देश का आधा हिस्सा प्रभावित है। तमाम आवश्यक वस्तुओं की महंगाई, जिससे हमारे देश के लोगों को ज़बरदस्त चोट पहुँच रही है, उसका तो उसमें थोड़ा बहुत ही जिक्र हुआ।
प्रधानमंत्री ने पहले कहा था कि 160 जिले माओवादियों के नियंत्रण में हैं या इतने जिलों में वे घुसपैठ कर चुके हैं। जब एक इन्टरव्यू लेने वाले ने सी0पी0आई0 (माओवादी) के महासचिव गणपति से पूछा कि कितना भूक्षेत्र उनके वास्तविक निंयंत्रण में है तो उन्होंने शालीनता एवं संकोच प्रदर्शित करते हुए कहा कि वे इस तरह के आँकड़ों पर यकीन नहीं करते हैं। इससे यही पता चलता है कि ‘‘भारत के प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग के लिए वे (माओवादी) कितना बड़ा दुःस्वप्न बन गए हैं।’’ उन्होंने कहा कि ‘‘ये अधिकांश आँकड़े’’ महज काल्पनिक हैं और इन्हें जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि क्रांतिकारी आंदोलन को दबाने के लिए और अधिक पुलिस बल तैनात किया जा सके और ज्यादा पैसा आवंटित किया जा सके। पर साथ ही गणपति यह बखान करना नहीं भूले कि ‘जहाँँ तक हमारे असर की बात है वह इससे भी ज्यादा हैं।’’
आजकल, माओवादी राजनैतिक और संचार माध्यमों, दोनों ही क्षेत्रों में चर्चा का विषय हैं। अतः किसी को भी उनके बारे में और अधिक जानना चाहिए। ऐसे मामलों में जानकारी का पहला साधन जिसमें क्रांति के लिए संघर्ष करने वाली एक पार्टी जैसा वे दावा करते हैं- के रूप में उन्होंने अपनी नीतियों, अपने उद्देश्यों एवं लक्ष्यों, अपनी कार्यनीति और रणनीति को पेश किया है। उनके वास्तविक व्यवहार से भी तुलना कर उसे देखा जाना चाहिए।
उनके सबसे अधिक महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से बहुत से हमारे पास हैं। यहाँ हम उनमें से तीन का हवाला दे रहे हैं:
(1) उनका पार्टी कार्यक्रम, जिसे अनुमानतः उनकी 9वीं कांग्रेस में पारित किया गया। यह सी0पी0आई0 (एम0एल0), पीपुल्स वार, एम0सी0सी0आई0 और सी0पी0आई (एम0एल0) पार्टी यूनिटी के परस्पर विलीनीकरण और स्वयं का सी0पी0आई0 (माओवादी) का नाम रखने के बाद आयोजित एकता कांग्रेस (यूनिटी कांग्रेस) थी। यह 9वीं कांग्रेस, सी0पी0आई0 (एम0एल0) पीपुल्स वार की आठवीं कांग्रेस के 37 वर्ष बाद, 2007 में गुप्त रूप से आयोजित की गई थी। (2) सी0पी0आई0 (माओवादी) के महासचिव गणपति के साथ इन्टरव्यू। यह एक लम्बा और विशद इंटरव्यू है जिसमें उनके कार्यक्रम, उनकी वर्तमान गतिविधियों आदि के वस्तुतः तमाम पहलू शामिल हैं। इसे सी0पी0आई0 (माओवादी) के प्रवक्ता, किसी आजाद नाम के व्यक्ति ने अप्रैल 2007 में जारी किया था, और (3) सी0पी0आई0 (माओवादी) पोलित ब्यूरो द्वारा 12 जून 2009 को जारी ‘‘चुनाव बाद की स्थिति पर एक रिपोर्ट-हमारे कार्य।’’ ये सब काफी विस्तृत एवं विशद दस्तावेज हैं। कुछ समय बाद एक राजनैतिक पेम्फलेट में उनके सम्बंध में विश्लेषण और चर्चा की जानी चाहिए। फिलहाल हम कुछ पहलुओं पर विचार करना चाहते हैं जो आंदोलन के तात्कालिक महत्व के हैं।
पार्टी कार्यक्रम इस बात पर जोर देते हुए शुरू होता है कि दो धाराएँ, जो सी0पी0आई (माओवादी) बनाने के लिए एक साथ मिलीं, ये ‘‘माक्र्सवाद-लेनिनवाद -माओवाद को भारत के मौजूदा वास्तविक हालात में लागू करने की प्रक्रिया में और सी0पी0आई0 और सी0पी0आई0 (एम) के पुराने चले आ रहे संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष कर उसका पर्दाफाश कर सामने आईं।’’ वर्षों पहले सी0पी0आई0 से टूटकर अलग होते समय सी0पी0आई (एम) ने सी0पी0आई0 पर ‘‘संशोधनवादी’’ का आरोप लगाया था। अब वही आरोप लगने की बारी सी0पी0आई0 (एम) की है। इसके परिणाम स्वरूप सी0पी0आई0 (एम0एल0) बना। का0 गणपति सी0पी0आई0 (एम0एल0) को यह कहते हुए निपटाते हैं कि विनोद मिश्रा के नेतृत्व वाले ‘लिबरेशन’ ग्रुप का 1970 के गौरवपूर्ण संघर्षों के इतिहास के बाद 1980 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में अधः पतन शुरू हो गया...’’।
अन्य कुछ ग्रुपों को भी इसी तरह निपटाते हुए वह कहते हैं कि ‘‘वे राज्य के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत को भविष्य में किसी शुभ मुहूर्त के लिए टालते रहे।’’ अब सी0पी0आई0 (माओवादी) ही एक ऐसी अकेली पार्टी है जो लम्बे जनयुद्ध को चलाएगी और जनवादी क्रांति एवं समाजवादी क्रांति दोनों ही चरणों के दौरान देश की तमाम ताकतों की अगुवाई एवं पथ प्रदर्शन करेगी। हर कोई जानने को उत्सुक होगा कि इस तरह भारतीय क्रांति का नेतृत्व पहले से मजबूत हो गया है या कमजोर।
अपने आप को, हर किस्म के दमन और सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरूद्ध ‘‘संघर्षरत जनगण’’ का सच्चा एवं एकमात्र रक्षक के रूप में पेश करते हुए, सी0पी0आई0 (माओवादी) मुख्यधारा की कम्युनिस्ट पार्टियों और तमाम अन्य कम्युनिस्ट ग्रुपों की अवमानना करने की हद तक चली गई है। ऐसा नहीं है कि वह मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अपने ऊपर लगाम लगाने की भूमिका से अनजान है। चुनाव बाद की स्थिति के सम्बंध में वह अपनी रिपोर्ट में कहते हैं:
‘‘इस तथ्य ने, कि कांग्रेस नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) फिर से निर्वाचित हो गया हैऔर कांग्रेस की लोकसभा में सीटें बढ़ गई हैं और वह पिछली बार के मुकाबले कहीं अधिक निर्णायक भूमिका अदा करने की स्थिति में है यूपीए को और इसके बड़े घटक कांग्रेस को हमारी पार्टी और आंदोलन के विरुद्ध पहले से कहीं अधिक नृशंस और पहले से कहीं अधिक बड़े सैन्य हमले शुरु करने के लिए कहीं अधिक संभावनाएँ प्रदान कर दी हैं। पिछली सरकार में, जहाँ इसके पास अपेक्षाकृत कम सीटें थीं, सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस को अपने विभिन्न सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता था और वामपंथ ने भी लगभग चार वर्ष तक मनमोहन सिंह सरकार पर कुछ दबाव बनाए रखा। हमें ध्यान रखना होगा कि चुनाव परिणाम से यूपीए सरकार को कहीं अधिक क्रूर किस्म के कानून बनाने और कहीं अधिक फासिस्ट कदमों पर अमल करने और जन संघर्षों को कुचलने की अधिक गुंजाइश मिल गई है।‘‘
माओवादी और बहिष्कार का उनका आह्वान
चुनाव के संबंध में माओवादियों की रिपोर्ट, चुनाव के बहिष्कार के अपने अभियान पर विस्तार से चर्चा करती है। वह कहती है कि अपने शासन के लिए वैधता प्राप्त करने के लिए और संसदीय व्यवस्था की छवि को फिर से चमकाने के लिए शासक वर्गाें ने अपने पास उपलब्ध सभी तौर तरीकों का इस्तेमाल किया। यहाँ तक कि बंदूक की छाँह में मतदान कराया (शंातिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में सुरक्षा बल इस काम में जुटाए गए)। उद्देश्य था मतदान का और अधिक प्रतिशत और भारत में लोकतंत्र के लिए और अधिक अंक सुनिश्चित किया जाए।
माओवादी कहते हैं कि ’’हमारी पार्टी द्वारा चुनाव के बहिष्कार को विफल करने के लिए प्रतिक्रियावादी शासकों ने अपने पास उपलब्ध तमाम तौर तरीकों का इस्तेमाल किया था और वह आगे दावा करते हैं कि ’’कुल मिलाकर, चुनाव से दूर रहकर मतदाताओं के बहुमत ने अपेक्षाकृत अधिक जागरुकता का परिचय दिया। हमारा प्रचार अभियान इतना प्रभावी था कि दंडकारण्य (दांतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, बस्तर और कांकेर जिले और राजनांदगांव के कुछ हिस्से) के अधिकांश देहाती इलाकों में, बिहार और झारखण्ड के अनेक जिलों में जहाँ मतदान प्रतिशत 2004 के मुकाबले अत्यधिक कम हो गया, पश्चिम बंगाल में पश्चिम मिदनापुर, बांकुड़ा और पुरूलिया में राजनैतिक पार्टियों का चुनाव मुश्किल से ही कहीं था और पश्चिम बंगाल के लालगढ़ क्षेत्र में पूरी तरह बहिष्कार हुआ।
सर्वप्रथम, तथ्य क्या हैं?
पिछले तीन दशकों से मतदान प्रतिशत में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। 1977 में मतदान 60.5 प्रतिशत था और इस बार मतदान 58.2 प्रतिशत था। थोड़ा सा ही कम। यह सोचना कि माओवादियों के बहिष्कार अभियान का कोई महत्वपूर्ण असर पड़ा महज अपने आप को भुलावे में रखना होगा।
जहाँ तक बंदूक उठाए उन सुरक्षा बलों की बात है जिन्हें और अधिक प्रतिशत के लिए जुटाया गया था तो यह भी उतना ही सही है कि माओवादियों ने जिन कुछ इलाकों का नाम लिया है वहाँ बहिष्कार भी बंदूक की छाँह में ही लागू किया गया था। जो कोई भी मतदान करने जाएगा उसे बुरा नतीजा भुगतने की धमकियाँ दी गईं थीं। अपने अनुभव से हम कह सकते हैं कि बहिष्कार को लागू करने से भाजपा/कांग्रेस को ही विधानसभा और संसदीय चुनाव जीतने में मदद मिली और सीपीआई के उम्मीदवारों को, जो शुरु से ही ‘‘सलवा जुडुम‘‘ की लूटपाट और विध्वंस के विरुद्ध संघर्ष की कतारों में खुलेआम सबसे आगे थे, नुकसान पहँुचा।
यह याद किया जा सकता है कि जैसे ही कांगे्रस एवं विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा ने ‘सलवा जुडुम‘ नाम से समाज में अपराध एवं अव्यवस्था को रोकने की कोशिश में स्वयं-नियुक्त समूह का गठन किया तो सीपीआई ने रायपुर में एक प्रेस कांफ्रेंस की, और यह कहते हुए इसकी निंदा की कि यह माओवादियों को आदिवासियों के विरूद्ध लड़ाने की और उनके बीच गृहयुद्ध पैदा करने की कोशिश है। उसके बाद सलवा जुडुम के विरूद्ध होने वाली सबसे बड़ी रैली भी सीपीआई ने जगदलपुर में, लोहांडीगुडा और दांतेवाडा में आयोजित की थी और सीपीआई के सर्वोच्च नेताओं ने उन रैलियों को सम्बोधित किया था। इस घृणित मुद्दे के मामले में कांग्रेस और भाजपा हाथ मेें हाथ मिलाकर काम कर रहे थे। ये सब सुपरिचित तथ्य हैं।
मुम्बई का उदाहरण, जहाँ केवल 43.52 प्रतिशत लोग मतदान के लिए आए और जिसका जिक्र माओवादियों ने बड़ी खुशी जाहिर करते हुए किया है, सर्वथा गलत है। न ही यह इस कारण है कि उस शहर के आधिकांश लोगों की नजर में संसदीय व्यवस्था ने अपनी तमाम विश्वसनीयता खो दी थी। यह माओवादियों की साफ-साफ आत्मपरकता है। मुम्बई में कम मतदान के लिए अन्य कारक जिम्मेदार हैं।
किसी खास मामले में, किसी खास समय पर, विशेष परिस्थितियों के कारण बहिष्कार को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की बात को तो समझा जा सकता है, पर ‘‘एक उल्लेखनीय रूझान के उभरने’’ के रूप में और संघर्ष के एक सर्वाधिक प्रभावशाली तरीके के रूप में इसे बताना, इसे एक सबसे अच्छी नीति, आंदोलन की एक आम कार्यनीति की हैसियत देना है। बहिष्कार संघर्ष का एक विशेष तरीका हो सकता है जो किसी विशेष परिस्थिति के लिए ठीक हो। यह संस्था (यानी संसद) के चरित्र से पैदा नहीं होता। यह एक ऐसा तरीका है जिसे संसदीय चुनाव कराए जाने को रोकने के लिए किया जा सकता है, उदाहरण के लिए ऐसे में जबकि कोई क्रांतिकारी उभार हो रहा हो और शासक वर्ग उस उभार को किसी इस या उस तरीके से डाइवर्ट करने की कोशिश करें।
संसद और उसकी प्रासंगिकता
हम कम्युनिस्ट वर्तमान व्यवस्था की कमियों-खामियों को पूरी तरह से जानते हैं। इसके सम्बंध में अनुभव हमारे सामने हैं। 543 में से 145 संसद सदस्य अपने निर्वाचक गणों में से 20 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं के मत प्राप्त कर जीते हैं। अतः वे दावा नहीं कर सकते कि वे वास्तव में अपने चुनाव क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। विभिन्न पार्टियों के अनेक उम्मीदवार होते हैं और निर्दलीय उम्मीदवार भी बीच में होते हैं-तो इतने सारे उम्मीवादरों के बीच मुकाबला इस तरह का हो जाता है कि इन उम्मीदवारों के बीच मत बँट जाने के कारण कोई उम्मीदवार 10 प्रतिशत से कम वोट हासिल कर, भी चुनाव जीत सकता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कुछ देशों में ऐसे प्रावधान हैं कि यदि किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक (50 प्रतिशत जमा एक) वोट न मिले तो फिर पहले और दूसरे स्थानों पर आए उम्मीदवारों के बीच में चुनाव कराया जाता है। पर भारत ने निष्ठापूर्वक ब्रिटिश प्रणाली को अपनाया है जिसमें इस तरह का प्रावधान नहीं है।
आज जो पूँजीवादी व्यवस्था मौजूद है, उसमें पैसा ही प्रधान है, अनेक स्थानों पर वोट पूर्णतया खरीदे जाते हैं और धन-बल की एक बड़ी भूमिका रहती है। इस तरह चुनाव लड़ना गरीब और आम आदमी की पहुँच से दूर होता जा रहा है। अतः इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि वर्तमान लोकसभा में 300 सदस्य ऐसे चुनकर आए हैं जिन्होंने स्वयं ही माना है कि वे करोड़पति हैं। अन्य अनेक संसद-सदस्य पैसे वालों के समर्थन से आए हैं और वे वस्तुतः पैसे वालों की जेब में हैं। अनेक अपराधी भी संसद के दोनों सदनों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
वर्तमान संसदीय प्रणाली के इन एवं अन्य पहलुओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। पर क्या इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि संसद एक ‘‘गली-सड़ी, सड़ांध मारती संस्था’’ है, ‘‘बक-झक करने की जगह’’ है और इसके अलावा अन्य कुछ नहीं? विधायिका के चुनाव में भारत की जनता नियमित रूप से भारी संख्या में हिस्सा लेती है। भारत के लोग सरकारों को बदलना जानते हैं, जिस पार्टी को पसंद नहीं करते उसे सत्ता से हटाना जानते हैं और शासक वर्ग के गलती करने वाले संसद सदस्यों को उनकी जनविरोधी नीतियों के लिए सजा देना जानते हैं। अनेक ‘‘जनता के सदस्य’’ भी विभिन्न कारणों से दुर्भाग्यतः चुनाव हार जाते हैं। पर कुल मिलाकर लोग आंदोलन करने में और महत्वपूर्ण मुद्दों को समाधान के लिए उठाने में और सरकारों पर लगाम लगाने आदि में कामयाब हुए हैं, खासकर जब कभी संसदीय संघर्ष के साथ ही साथ जनसंघर्ष भी चल रहा होता है। पर निश्चय ही तमाम मामलों में जनगण की कार्यवाइयाँ ही निर्णायक कारक होती हंै। यद्यपि यह बात हर बार संसद में सही-सही नहीं झलक पाती है। इसके लिए संघर्ष को जारी रखना होगा।
जैसा कि हम देखते हैं कि संसदीय प्रणाली की कुछ सीमाएँ, कुछ कमजोरियाँ हैं, पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसकी प्रासंगिकता है।
भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन ने शुरू से ही समानुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के लिए जोर दिया है। इससेे ‘‘जिसे सबसे अधिक वोट मिले वही जीता’’ की प्रणाली खत्म हो जाएगी क्योंकि इस प्रणाली से आमतौर पर ऐसी सरकार बनती है जिसे अल्पमत वोट मिले होते हैं। वर्तमान सरकार समेत हमारी अधिकांश सरकारें इसी तरह बनी हैं।
कम्युनिस्ट अंादोलन किसी निर्वाचित सदस्य को, जिसने जनता का विश्वास खो दिया है, ‘‘वापस बुलाने’’ के प्रावधान के पक्ष में रहा है।
हमने उपर्युक्त कुछ बातंे यह दिखाने के लिए कहीं हैं कि चुनाव प्रणाली एक ऐसा मुद्दा नहीं है कि उसे यों ही आसानी से खारिज किया जा सके, बल्कि इसके लिए राजनैतिक चेतना को बढ़ाने, वर्ग संघर्ष को विकसित करने के साथ ही साथ हरेक महत्वपूर्ण एवं ठोस मुद्दे पर जन कार्यवाई को चलाने की जरूरत है।
अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं को मारने, कत्ल करने के सम्बन्ध में
स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर अनेक कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, यहाँ तक कि पार्टी के उन सामान्य कामरेडों की हत्या, जो लालगढ़ इलाके में पंचायतों के सदस्य हैं, से माओवादियों के स्टैण्ड और दृष्टिकोण के सम्बंध में कुछ सवाल उठे हैं। इन कार्यकर्ताओं के घरों को जला दिया गया, सी0पी0आई0 (एम) और सी0पी0आई0 के दफ्तरों में तोड़फोड़ की गई है। यहाँ तक कि पार्टी दफ्तरों पर लहराने वाले लाल झण्डों को भी जलाया गया है। कहने की जरूरत नहीं कि इससे न केवल इन पार्टियों के पीछे चलने वाले लोग बल्कि अन्य लोकतांत्रिक तबके भी नाराज हुए हैं। संचार माध्यमों के कुछ हिस्सों द्वारा इन घटनाओं को ‘‘प्रतिशोध हत्या’’ के रूप में पेश करने की कोशिश को सही नहीं माना जा सकता है। यदि इसे सही मान लें तो यह श्रृंखला कहाँ जाकर खत्म होगी?
यदि सशस्त्र झगड़े के दौरान कोई व्यक्ति मारा जाता है तो बात समझ में आ सकती है। पर यदि किसी व्यक्ति को उसके घर से बाहर खींच कर या घात लगाकर या रास्ते में पकड़कर उसे गोलियों से छलनी कर दिया जाए तो इस बात को माओवादी किस तरह ठीक ठहराते हैं? क्या यह सोचे-समझे तरीके से हत्या से किसी तरह से कोई अलग चीज है? क्या निर्दोष नागरिकों की हत्या को वे ‘‘दुर्घटना’’ या ‘‘आनुषंगिक नुकसान’’ कहकर खारिज कर सकते हैं? अमरीकी साम्राज्यवादी प्रायः इस तरह के बहाने पेश करते हैं।
माओवादी इस आरोप से बच नहीं सकते, और वे इस बात को जानते हैं। यही कारण है गणपति से इण्टरव्यू के दौरान एक प्रश्न पूछा गया और महासचिव ने 2007 के एक मामले का, यानी झारखण्ड मुक्तिमोर्चा के नेता और जमशेदपुर के संसद सदस्य सुनील महतों की हत्या का जिक्र कर जवाब दिया।
अपने उत्तर में गणपति कहते हैं, ‘‘हम एक बात स्पष्ट करना चाहते हैं, हम राजनैतिक पार्टियों के नेताओं या साधारण सदस्यों की अंधाधुंध हत्याओं के पक्ष में नहीं है। हम विभिन्न राजनैतिक पार्टियों की जनविरोधी नीतियों और समाज में अपराध एवं अव्यवस्था को रोकने के लिए, स्वयं-नियुक्त ‘गैंगों के हमलों’ के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए, उनका पर्दाफाश करने के लिए, उन्हें अलग- थलग करने के लिए बुनियादी तौर पर जनगण की लामबंदी पर भरोसा करते हैं, हम अपनेे पी0एल0जी0ए0 दस्तों और एक्शन टीमों को जहँा जरूरत हो, लगाते हैं। सुनील महतों की हत्या का, पूरे झारखण्ड मुक्तिमोर्चा के प्रति हमारे विरोध के रूप में अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। जब तक वह जनविरोधी गतिविधियों में लिप्त होने से और क्रांतिकारी आंदोलन के विरूद्व हमला करने से विरत रहता है तब तक हम झारखंड मुक्तिमोर्चा के विरूद्व नहीं। निश्चय ही माओवादी ही अकेले ऐसे हैं जो अभियोक्ता (आरोप लगाने वाले) भी होंगे, जज भी होंगे और सजा पर अमल करने वाले भी।
इतना कहने के बाद गणपति ने हत्या को यह कहते हुए ठीक ठहराया कि ‘‘सुनील महतो के मामले में, हमें उसे केवल इस कारण ठिकाने लगाना पड़ा क्योंकि वह झारखंड में क्रांतिकारी आंदोलन का नृशंस दमन शुरू करने में सक्रिय रूप से शामिल था।‘‘
क्या इस स्पष्टीकरण को क्रंातिकारी स्वीकार कर सकते हैं, और क्या क्रांतिकारियों के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जा सकता है? अनेक स्थानों पर अनेक कम्युनिस्टों को क्यों मार डाला गया? लालगढ़ एवं अन्यत्र स्थानों पर सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं को उनके घर से उठाकर या रास्ते में पकड़ कर क्यों मार डाला गया? क्या वे वर्ग शत्रु थे; क्या वे समाज से अपराध एवं अव्यवस्था को ठीक करने के लिए स्वयं-नियुक्त समूहों के लोग थे, पुलिस के मुखबिर थे या क्या थे? माओवादी उन्हें किस केटेगरी में रखते हैं? वे लड़ने वाले लोग थे या महज सीधे-सीधे राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी थे जिन्हें किसी इलाके पर कब्जा करने या प्रभुत्व जमाने के लिए खत्म करना जरूरी था? ऐसा कैसे है कि इस मामले मंे लालगढ़ में माओवादी, तृणमूल कांग्रेस और तथाकथित ‘‘पुलिस अत्याचार के विरूद्ध जनसमिति’’ जो माओवादियों का स्वयं का मोर्चा संगठन है- के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करते हंै?
लालगढ़ में माओवादी नेता ने स्वयं ही बताया है कि नंदीग्राम मामले में उन्होंने किस तरह तृणमूल कांग्रेस की मदद की थी और किस तरह तृणमूल कांग्रेस ने लालगढ़ में उनके साथ मिलकर काम किया। इस बीच तृणमूल के नेता केन्द्र में यूपीए सरकार के मंत्री बन चुके थे। अतः उस माओवादी नेता को अपेक्षा थी कि एवज में तृणमूल का नेतृत्व केन्द्र पर दबाव बनाए कि वह लालगढ़ के आपरेशन में पश्चिम बंगाल सरकार के साथ सहयोग न करे। यह माओवादियों और तृणमूल कांग्रेस के बीच साँठगाँठ का आँखों देखा विवरण है जिसमें कांग्रेस भी शामिल हो गई। यह साँठगाँठ किन दीर्घकालिक या अल्पकालिक लक्ष्यों के लिए है?
अल्पकालिक लक्ष्य सामने नजर आते हैं। लक्ष्य-है आम अराजकता एवं अव्यवस्था के हालात पैदा कर, वाममोर्चा सरकार को अस्थिर बनाया जाए। स्थिति को और अधिक उकसाने-भड़काने के लिए तृणमूल मंत्री उस इलाके में जाते हैं और इस तरह वे लालगढ़ में माओवादियों की मदद करते हैं।
पर उनके दीर्घकालिक उद्देश्य क्या हैं? पश्चिम बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस को सत्ता में लाना क्या माओवादियों की व्यापक कार्यनीति का एक हिस्सा है? ऐसा नहीं कि माओवादी इस समस्या को न जानते हों। असल में, चुनाव बाद की स्थिति पर, उनकी रिपोर्ट में माओवादियों ने इस बात का नोट लिया है कि ‘‘विडम्बना है कि ममता की तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा सरकार द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों का अपने स्वयं के कारणों से तीव्र विरोध कर रही थी।’’ इन्होंने पश्चिम बंगाल में अराजकता और हत्या का जो अभियान छेड़ रखा है उसमें दोनों पार्टियाँ जिस तरह घनिष्ठ रूप से मिलकर काम कर रही हैं उसके बारे में इन पार्टियों को काफी सफाई देनी होगी। इसी तरह कांग्रेस को भी सफाई देनी होगी जो अपने संकीर्ण हित साधने के लिए उन्हें पश्चिम बंगाल में बढ़ावा दे रही हैं।
अब ‘‘हत्याओं और व्यक्तियों की राजनैतिक मकसद से हत्या और किसी झगड़े में न शामिल लोगों के खिलाफ हिंसा के व्यवहार के मुद्दे पर आते हैं। इस सम्बंध में विश्व के एक महानतम क्रांतिकारी, एक जीवित महानायक फिडेल कास्ट्रो ने इन विषयों पर अत्यंत प्रबोधक राय जाहिर की है। उन्हें स्वयं भी विश्व की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति-अमरीकी साम्राज्यवाद के हमलों का मुकाबला करना पड़ा और वह भी कोई एक या दो बार नहीं, अमरीका पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से लगातार हमले करता आ रहा है। इस एवं अन्य विषयों पर कास्ट्रों के विचारों का एक सार-संग्रह एक पुस्तक के रूप में छपा है-‘‘फिडेल के साथ बातचीत’’। इस लेख में स्थान की कमी के कारण हम उनके कुछ ही उद्धरण दे रहे हैं जो इसी पुस्तक से लिए गए हैंः-
प्रश्न-क्या आपने, उदाहरणार्थ, बाटिस्टा की फौजी टुकड़ियों के विरूद्ध आतंकवाद का सहारा लिया या राजनैतिक मकसद से हत्याओं की साजिशों का रास्ता अपनाया?
उत्तर-न तो आतंकवाद और न ही राजनैतिक मकसद से हत्या। आप जानते हैं, हम बाटिस्टा का विरोध करते थे पर हमनें उन्हें जान से मारने की कोशिश कभी नहीं की, हालाँकि हम इसमें कामयाब हो सकते थे क्योंकि उनकी स्थिति ऐसी थी कि उन पर ऐसे हमले किए जा सकते थे। पहाड़ों में उनकी सेना के विरूद्ध संघर्ष करना या एक ऐसे किले पर फतह पाना, जिसकी रक्षा एक पूरी की पूरी रेजीमेंट करती हो, कहीं अधिक कठिन काम था।
प्रश्नः कार्रवाई के उस सिद्धांत के बारे में, जिसमें निर्दोष लोग शिकार बन सकते हैं, आपका क्या विचार है?
उत्तर-इसके बजाय युद्ध के बारे में बोलते हुए मेरा कहना है कि हमें इस तरह की समस्या से निपटने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि हमारा युद्ध 25 महीने चला और मुझे एक भी मामला याद नहीं कि हमारे पहले दस्ते ने जो लड़ाइयाँ लड़ीं उनमें कोई असैनिक व्यक्ति मारा गया हो, मुझे अन्य सेना प्रमुखों से पूछना होगा कि क्या उन्हें सैनिक कार्रवाइयों के दौरान ऐसी किसी घटना की याद है।
हमारा सिद्धांत यह था कि निर्दोष लोगों को खतरे में न डाला जाए, यह हमारा दर्शन था। यह एक सिद्धांत था जिसका हमने हमेशा पालन किया, एक कट्टर सिद्धांत की तरह। ऐसे मामले हुए थे जिनमें गुप्त लड़ाकों ने, जो आंदोलन से सम्बंध रखते थे, बम चलाए, वह भी क्यूबा में क्रांतिकारी संघर्षों की परम्परा का एक हिस्सा था। पर हम वैसा नहीं करना चाहते थे, हम उस तरीके से सहमत नहीं थे। जहाँ कभी लड़ाई के दौरान असैनिक लोगों को जोखिम होता हम उनका सचमुच ख्याल रखते थे।
प्रश्नः आज विश्व में अन्यत्र ऐसे हिंसक ग्रुप हैं जो राजनैतिक उद्देश्यों पर आगे बढ़ने के लिए अंधाधुंध राजनैतिक हत्याओं और आतंकवाद का सहारा लेते हैं। क्या आप ऐसे तरीकों को अस्वीकार करते हैं?
उत्तर-मैं आपको बता रहा हूँ कि आप आतंकवाद पर चलते हुए किसी युद्ध को जीत ही नहीं सकते, क्योंकि युद्ध को जीतने के लिए आप को जिस जनता को अपने पक्ष में रखने की जरूरत हैं आप उससे उस जनता का विरोध, उससे दुश्मनी और उसकी अस्वीकृति मोल लेंगे।
मैंने आपसे जो कुछ कहा है उसे मत भूलेंः हम पहले ही माक्र्सवादी लेनिनवादी शिक्षा पा चुके थे, और मैंने आपको बताया था हमारे क्या विचार थे। उस शिक्षा ने हमारी कार्यनीतियों को प्रभावित किया। जब आप जानते हैं इसमें कोई समझदारी नहीं है तो राजनैतिक हत्याओं का सहारा लेने की जरूरत नहीं।
न तो हमारी स्वतंत्रता के सिद्धांतकारों ने और न ही उन लोगों ने, जिन्होंने हमें माक्र्सवादी लेनिनवादी विचारधारा की सीख दी, राजनैतिक हत्याओं की या ऐसी कार्रवाइयों की, जिनमें निर्दोष लोग मारे जा सकते हैं, वकालत की। क्रांतिकारी सिद्धांत जिन तरीकों की अपेक्षा करते हैं उनमें ये तरीके शामिल ही नहीं थे।
उस नीति और सैनिक कार्रवाई सम्बंधी अवधारणाओं के बिना हमने उस युद्ध को नहीं जीता होता।
प्रश्नः तथापि, सिएरा माऐस्ट्रा में आपको ‘‘क्रांतिकारी अदालत’’ स्थापित करनी पड़ी थी जो आपको मौत की सजा लागू करने की दिशा में ले गई, क्या ऐसा नहीं है?
उत्तर-हमने यह सिर्फ देशद्रोह के मामलों में किया। मौत की सजा दिए गए लोगों की संख्या अत्यंत कम थी। एक ऐसे समय जब हमारी सेना अत्यंत सीमित थी, हम मुश्किल से 200 लोग ही थे, मुझे विद्रोही सेना के शत्रु के साथ सहयोग करने वाले समूह के कुछ लोगों द्वारा लूट और डकैती के मामले अचानक सामने आने की बात याद आती है।
हमारे लिए लूट एवं डकैती की बातें अत्यंत विनाशकारी हो सकती थीं, और हमें उनमें से कुछ को एकदम फाँसी ही देनी पड़ी। उनमें से जिन लोगों ने घरों को या दुकानों को लूटा था उन पर मुकदमा चलाया गया और उस मौके पर युद्ध के बीच में हमने उन्हें फाँसी की सजा दी। वह अपरिहार्य था, और असरदार था, क्योंकि उसके बाद विद्रोही सेना के किसी सदस्य ने कोई दुकान नहीं लूटी। एक परम्परा बन गई। क्रांतिकारी नैतिकता एवं जनता के प्रति चरम सम्मान की बातें प्रचलित एवं प्रबल रहीं।
का. फिडेल कास्ट्रो ने अपनी विशिष्ट विनम्रता के साथ आगे कहा कि उन्होंने जो गुरिल्ला युद्ध लड़ा वह नैतिकता के सिद्धांतों को ध्यान में रखने वाला कोई एकमात्र युद्ध नहीं था। उससे पहले वियमतनाम के देशभक्तों और ऐसे अन्य क्रांतिकारियों ने भी इन्हीं नैतिक सिद्धांतों को अपनाया था। नैतिकता का आचार महज एक नैतिकता का प्रश्न नहीं है। उन्होंने कहा कि नैतिकता, यदि निष्कपट एवं सच्ची हो तो उससे कुछ अच्छा फल मिल सकता है।
‘‘हमने यदि उस सिद्धांत पर अमल न किया होता तो लड़ाके संभवतः यहाँ-वहाँ कुछ कैदियों को गोली मार देते और तमाम किस्म के निंदनीय काम किए होते। अन्याय एवं अपराध के विरूद्ध इतनी अधिक घृणा थी।’’
मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि कास्ट्रो भावुक उदारवादी थे। वह एक क्रांतिकारी हैं और उन्होंने एक सिद्धांत, एक दर्शन के रूप में और क्रांतिकारी युद्ध के दौरान एक कार्यनीति के रूप में क्रान्तिकारी नैतिकता की चर्चा की है। क्रांतिकारियों को हमेशा ही अपने स्वयं के अनुभवों एवं व्यवहार से और अन्य क्रांतिकारियों के अनुभवों एवं व्यवहार से सीखना चाहिए। फिडेल कास्ट्रों के इन विचारों के बारे में माओवादियों का क्या कहना है?
प्रतिबंध पर गृह मंत्रालय के सुझाव
भारत सरकार का गृह मंत्रालय पश्चिम बंगाल में सी0पी0आई0 (माओवादी) पर प्रतिबंध लगने के लिए दबाव डालता रहा है, जैसा कि कई राज्यों में किया गया है और केन्द्र ने भी किया है।
सी0पी0आई0 ने प्रतिबंध के सुझाव का विरोध किया है। सी0पी0आई0 (एम) और अन्य वामपंथी पार्टियों ने भी वैसा ही किया है। अतः पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार ने प्रतिबंध की घोषणा नहीं की है। यह बिल्कुल अलग बात है कि केन्द्र का प्रतिबंध कुल भारत पर लागू होता है और इस कारण पश्चिम बंगाल पर भी लागू होता है। क्या इसका अर्थ यह है कि प्रतिबंध के सम्बंध में वाममोर्चा की अनिच्छा या इंकार महज एक आडम्बर है?
पहली बात तो यह है कि माओवादियों पर प्रतिबंध का उल्टा नतीजा निकलता है, और यह एक निरर्थक कोशिश है। भारतीय राजनैतिक मैदान में वे खुलेआम काम नहीं करते हैं। सशस्त्र संघर्ष, लम्बे युद्ध की उनकी कार्यनीति देश के खुले कानूनी ढाँचे में नहीं चलायी जाती है। जब बात इस तरह की है तो उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध से उनकी कार्यवाइयों पर कोई अंकुश कैसे लगता है, उनकी कार्रवाइयां कैसे रुकती हैं?
दूसरी बात यह है कि किसी राजनैतिक पार्टी पर प्रतिबंध की घोषणा का अर्थ है समस्या के राजनैतिक समाधान की और सम्बंधित पार्टी के साथ राजनैतिक वार्ता की तमाम कोशिशों को छोड़ना, उसे कोई राजनैतिक जगह देने से इंकार करना और उस स्थिति को न देखना या स्वीकार न करना जिसने इस समस्या के पैदा होने और बढ़ाने का काम किया है।
यदि कोई पार्टी या संगठन प्रतिबंध से पहले खुलेआम काम करता है तो प्रतिबंध उसे भूमिगत काम करने की तरफ धकेल देता है। इससे समस्या हल नहीं होती, और न ही वह पार्टी या संगठन प्रतिबंध के कारण गायब हो जाता है।
अन्य बातों के अलावा इन कारणों से हम नहीं समझते कि प्रतिबंध माओवादी कार्रवाइयों से पैदा होने वाली समस्या का कोई जवाब है। अधिक से अधिक प्रतिबंध भविष्य में बनने वाले कुछ समर्थक या हिमायती लोगों को प्रतिबंधित पार्टी से दूर रहने के लिए असर डाल सकता है या डरा सकता है।
‘‘आतंकवाद’’ को और ’’वामपंथ उग्रवाद’’ (वर्तमान मामले में माओवाद का दूसरा नाम) को एक तराजू से तौलना, जैसा कि सरकार करती है, पूरी तरह गलत और अनुचित है। इससे पता चलता है कि सरकार इन दोनों बातों के चरित्र और मूल कारणों को नहीं जानती, समझती। ये दोनों बातें हथियारों की मदद से हिंसा में अभिव्यक्ति पाती हैं। जिससे सुरक्षा बलों के कर्मियों के अलावा मासूम लोगों की जानें जाती हैं-यह पहलुओं को सतही एवं ऊपरी तौर से देखने की बात है।
माओवादी समस्या के कुछ सामाजिक आर्थिक आयाम हैं। यह समस्या अधिकांश उन क्षेत्रों में हैं, जो दूर दराज के और पिछड़े और उपेक्षित क्षेत्र हैं और जहँा सामन्ती एवं अर्ध-सामन्ती शोषण चरम सीमा तक एवं व्यापक पैमाने पर जारी है। ऐसे क्षेत्रों में माओवादियों को अपनी गतिविधियाँ चलाने और अपने असर के दायरे को बढ़ाने के लिए अनुकूल जमीन मिलती है। यह मुख्य धारा की कम्युनिस्ट पार्टियों की विफलता है कि यह मैदान उनके लिए खुला पड़ा है। पर माओवादियों पर यह इल्जाम लगाना कि वे विकास का विरोध करते हैं इस हकीकत को छिपाने की बात है कि माओवादी ठीक उन्हीं सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं, जो सरकार एवं प्रशासन द्वारा कई दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। निश्चय ही, इन इलाकों को अपना आधार बनाकर माओवादी अब अपनी गतिविधियों को अन्य इलाकों तक फैलाने में कामयाब हैं।
अतः चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, उसे उन सामाजिक आर्थिक समस्याओं का समाधान करना होगा, जिन्होंने माओवादियों को पैदा करने और बढ़ाने का काम किया है। इससे केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में निपटने से काम नहीं चलेगा। जब कभी और जहाँ कहीं अराजकता और लोगों की हत्याओं से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाइयाँ करनी हों और इस तरह जनता को सुरक्षा प्रदान करनी हो तब भी इस समस्या के सामाजिक, आर्थिक पहलू को भुलाया नहीं जा सकता है। सी0पी0आई0 (माओवादी) और तृणमूल कांग्रेस का एक दूसरे के साथ हो जाना और लालगढ़ में कांग्रेस का उनको मौन समर्थन-यह बहस का मुद्दा रहेगा। कौन किसके मकसद पूरे कर रहा है और इसका अंतिम लक्ष्य क्या है?
अपने इस तरह के दृष्टिकोण और कार्रवाइयों से माओवादी क्रांति के उद्देश्य के लिए भारत की जनता के अत्यधिक विशाल संख्या को अपने समर्थन में नहीं खींच सकते। वास्तव में इससे उस उद्देश्य एवं लक्ष्य को नुकसान पहुँच रहा है जिसके लिए कम्युनिस्टों ने अपने जीवन को समर्पित कर रखा है।

8 November 2009

भोपाल के अखबारों में नहीं थी प्रभाष जी के निधन की खबर!!

वासु पिछले दिनों ही दिल की बीमारी से उबरे हैं। अभी साल भी पूरा नहीं हुआ उनके हार्ट अटैक को. जिस आदमी के दिल का 40 फीसदी हिस्सा ही काम का हो उसके लिए अतिरिक्त तवज्जोह देना लाजिमी है। सो नई इबारतें की नये मंच पर पहली बात उनकी। वासु मित्र पत्रकारिता के बेहद पुराने छात्र हैं, स्टेट रिसोर्स सेंटर में लोगों के दुख का लेखा जोखा तैयार करते हैं, अपने दुखों को भूलने का यह उनका पुराना तरीका है। यात्राएं और गप्पबाजी पसंद वासु प्रभाष जोशी जी के मंच से चले जाने से दुखी तो हैं ही उनके साथ किये गये अखबारी मजाक से भी नाखुश हैं। उनकी बात।
पत्रकारिता के पुरोधा को भी न मिल पायी चार कॉलम की जगह
-वासु मित्रा
देश के जाने माने और हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे। पत्रकारिता जगत के लिये यह एक बहुत बड़ी दुख:द खबर है। एक वरिष्ठ पत्रकार जिसने अपनी कलम से पत्रकारिता जगत को न सिर्फ एक नया आयाम दिया 12 वर्षों तक जनसत्ता का संपादन करते हुए उनकी लेखन शैली से नए युग के हिंदी के पत्रकारों में एक नयी सोच पैदा हुई। अपनी विलक्षण प्रतिभा एवं लेखन शैली से उन्होंने जनसत्ता जैसे समाचार पत्र को व्यावसाकयिकता के इस दौर में भी उन्होंने न र्सिफ पत्रकारिता की मूल भावना को जिंदा रखा बल्कि हिंदी पाठकों के बीच समाचार पत्र की विश्वसनीयता बनाये रखा। यह बड़ी विडंबना है कि प्रभाष जोशी जी के निधन पर भोपाल के किसी भी समाचार पत्र (राजस्थान पत्रिका को छोड़)। जो अपने आप को भारत का सबसे बड़ा समाचार समूह, विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार घोषित करते है। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता के इस पुरोधा के देहावसान भी खबर प्रकाशित करने की कोई जरूरत नहीं समझी, आज के समय में जहां हिन्दी न सिर्फ अपनी राष्ट्रभाषा के महत्व को बचाने में संघर्षरत है वहीं एक वरिष्ठ हिन्दी भाषी पत्रकार जो देश के प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ संपादक के साथ-साथ गांधीवादी चिंतक के देहावसन भी खबर छापने की जरूरत किसी भी मीडिया हाऊस ने नहीं समझी। । प्रभाष जोशी एक गंभीर पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी सारी जिन्दगी पत्रकारिता के लिये लगा दिया था। उनकी भाषा शैली में हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नया मार्ग तैयार किया था। भोपाल के सभी मीडिया हाउस लिये यह शर्म की बात है जिन्होने पत्रकारिता जगत के इस बड़ी खबर को अपने अखबार में श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिये चार कॉलम तो दूर अपितु चार लाइन की खबर नहीं छाप सकी समझा। भोपाल के मीडिया हाउसों के पत्रकारिता सिद्धांत और उनकी विश्वनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह है जिन्होंने पत्रकारिता जगत के इस पुरोधा के देहावसान जैसी खबर को उनको सुधी पाठकों तक नहीं पहुँचाया।

आज से आपकी इबारतें ही, मुझसे नहीं लिखा जाता

रूसी क्रांति दिवस की शुभकामनाएं। इधर वक्त की कमी थी (जो जल्द खत्म नहीं होने वाली) सो आपसे बातचीत का मौका नहीं मिला। कई मित्र नाराज हैं, कई तकरीबन हिंसक भावों के साथ खा जाने वाली नजरों से ताक रहे थे। लिखना बंद कर देने की सच्ची दलील भी काम नहीं आई। हालांकि मुझे खुद अफसोस है कि लिखने के अलावा बातचीत के रास्ते कम और धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं, फिर लिखना ही बेहतर है। यूं भी मैं लिखकर ही आपसे ठीक ढंग से बात कर पता हूं। और फिर इधर कई मुद्दों पर बात करनी थी। जैसे ईराक, जैसे झारखंड, जैसे हवा का लगातार जहरीला होता जाना, जैसे आदमी का चुप लगा जाना, जैसे पैसे का एक तरफ बहते चले जाना, जैसे दुखों का पहाड बडा होता चला जाना, जैसे सच्ची खुशियों का पीछे धकेले जाना, जैसे अनायास ही सबसे मजबूत हाथ का बिछुड जाना....... बहक रहा हूं? शायद!
तो मुद्दे की बात। अब यह ब्लॉग आपके हाथ में हैं, इसे आप चलायें, आप लिखें। जो लिखें उसे chefromindia@gmail.com पर मेल कर दें। अगर वह मेहनतकश आवाम, मनुष्यता, इंसानी हक और बराबरी के पक्ष में होगा तो साया होगा ही। अब मैं नहीं लिख पाउंगा। लिखना एक आदत है, जो छूट रही है बेहद तेजी से। आपके लिखे के इंतजार में।
सचिन

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