10 May, 2008

एक शब्द का प्रिय होना

हर शब्द का एक इतिहास होता है. कांति कुमार जैन जी से जाना था. कोई शब्द बनने की प्रक्रिया में कितना कितना कहां कहां से घिसा है. उसके साथ कहां कहां की धूल मिट्टी आई. किन राहों में संवरा और किनमें बिखरा. यह जानने, सुनने और समझने में मजा देता है, लेकिन यकीन जानिए महसूसने में बडी तकलीफ देता है. खैर इन सब से आप वाकिफ हैं और मुझसे बेहतर ढंग से वाकिफ हैं. फिलवक्त मैं एक शब्द कैडर में उलझा हुआ हूं. मेरे प्रिय शब्दों की सूची में यह बेहद पुराना शब्द है यह. राममंदिर "आंदोलन" के दौरान पहली बार यह शब्द सुना-पढा था. वह मेरी समझ के बनने का दौर भी था. तब उस भीड को कैडर कहा-लिखा जाता था, जो इतिहास की दराज से लंबे-लंबे जुमले निकाल कर अपने उन्माद को धारदार तर्क में बदल रही थी. तब जानकारी के जो साधन बुंदेलखंड के एक अध-पिछडे गांव में उपलब्ध थे उनमें चीजें एक ही तरफ से दी जा रही थीं. सो कुछ गलत तो लगता था लेकिन कितना और क्यों गलत है इसकी कोई साफ-साफ तस्वीर नहीं बनती थी. लेकिन तब बहुत गहरे में कहीं कैडर नकार वाले फोल्डर में सेव हो गया था. फिर अफसरों के तबादलों और एनसीसी की दो माही ट्रेनिंग के अलावा एनएसएस के पांच साल में कई तरह से यह शब्द जेहन में जगह बनाता गया.
नई सदी के पहले साल में कैडर को करीब से जाना. फ्रांस से अपनी यात्रा शुरू करते वक्त इस शब्द की तासीर, इसका ठोसपन और इसकी इतिहास दृष्टि और इसकी यूरोपीय यात्रा की समझ रखने वालों से मुलाकात हुई. अपने अपने संगठनों के जड पत्तों को जाने समझने वाले इन्ही लोगों के साथ भोपाल के काफी हाउसों, नुक्कडों, सभा, सेमिनार, झील और थियेटर की दुनिया में वक्त बिताते और प्रेस काम्पलेक्स की रातों में मैं कैडर हुआ. पत्रकारिता का कैडर. बुरा कैडर. पर समझने लगा था कि कितना ही दूर भागें अब यहीं रहना है. इससे निजात नहीं. उस वक्त भी और उसके बाद अलग अलग शहरों में उम्र बढाने के दौरान जाना कि एक कैडर के भीतर हर वक्त एक डर होता है. बता दूं कि इस समय तक नकार से एकाकार वाले फोल्डर में मूव हो चुके इस शब्द की राजनीतिक समझ से काफी हद तक वाकिफ हो चुका था. तो उन दिनों कई कैडरों से मिलना होता था. उनका डर वही था. सनातन डर. झूठ के मुलम्मे का डर और चेहरों पर चढी रंगीन पुताई का डर. जो जीवन वे जी रहे थे उसमें उन्हें पीछे देखने की फुरसत नहीं थी आगे देखने का भी वक्त नहीं था. बस अपने आसपास की दुनिया में जल रही आग से खुद को गर्म रखना होता था. रांची में एक कैडर के जीवन के बहुत करीब था और मैं इस कल्पना भर से कांप जाता था कि यह सपना नहीं है. यही उसका जीवन है. सच्चा, ठोस और भरपूर. उनकी खुशियों की हंसी इतनी धीमी होती थी कि वह पेट से नहीं निकल पाती. एक जंग लगे ताले के भरोसे अपना सबकुछ (जो चंद किताबों, दो जोडी कपडों, टूथपेस्ट, ब्रश, एक जर्जर हो चुकी तौलिया और घिस चुकी चप्पलों की शक्ल में नजर आता है) छोडकर वे अपने सीने में सपने और भरोसे के लाठी के साथ दिन की शुरुआत करते हैं. दुनिया की मक्कारियों को देखकर लाल होते हैं. निरे लाल. और किसी मासूम मुस्कुराहट के साथ खिलखिलाते हुए चाकलेट न खिला पाने की कसमसाहट को फीकी हंसी में घोलकर पी जाते हैं.
क्या जरूरी है जिंदगी को कैडर की ही तरह देखना? जबकि अपने सबसे बडे भरोसे की जीत पर हम सेंक रहे हों रोटियां.
मुझे जवाब मिला था- जरूरी नहीं कि हम कैसे जी रहे हैं, जरूरी यह है कि हम क्यों जी रहे हैं.
इसके बाद से कैडर शब्द मेरे लिए रीड ओनली हो गया.
अरूण आदित्य की इन पंक्तियों के बावजूद
पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?

7 May, 2008

एक अपील भरोसेमंद

भरपूर आंख से रिसते आंसू से
बनता है भरोसा
एक सधे हुए वाक्य के ठोस लगते सच को
पढता है भरोसा
किसी दोस्त का फिसलन भरी राह पर
पकडा गया मजबूत हाथ होता है भरोसा

कभी डगमगाते शरीरों में
पानी बनकर बहता
कभी मवाद रिसते जख्म में
मछली की शक्ल में चोटता
कभी पहले प्रसव की पीढा सा चीखता
अबोले शिशु की तालू चिपकी जुबान सा
ठिनकता है भरोसा

भरोसा कभी टूटता नहीं
भरोसे की नदी का पानी कभी नहीं सूखेगा
जितनी बार बहेगा आंख का पानी
उतनी उतनी बढेगी नदी भरोसे की

इस शंकाग्रस्त समय में
मुनादी हुई है
इसी ओर से
"जिन जिन के सपने टंगे हैं
भरोसे की खूंटी पर
जल्द-अ-जल्द उतार लें
कि भरोसा अब नहीं रहेगा
कि सड चुकी है भरोसे की लकडी
कि बह चुका है सारा पानी"

आपकी आंख का जरा सा पानी चाहिए
हो सके तो
इस नदी को सूखने से बचा लेना दोस्तो!!!

19 April, 2008

मकान जो कहीं नहीं है

यह कविता मेरे एक प्रिय मित्र के लिए समर्पित है. जिसने अभी अभी प्रेम विवाह किया है. मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता पता नहीं उसे कैसा लगे. एक अजनबी शहर में मकान ढूढंने के प्रक्रिया के बीच मैंने उसके चेहरे सो जो जाना उसे उतार दिया है. कई दिनों से उसे फिर फिर अपनी सी मस्ती में नहीं देखा कई दिनों से उसी खुली हंसी में सराबोर नहीं हुआ. असल में हकीकत के साथ हमकदम होते होते उसने शायरी का एक छोटा घरौंदा बनाना शुरू कर दिया है जहां बेशक्ल सी दुनिया एक हिस्सा नुमायां होता है. तो यह कविता उसी मित्र के लिए...
एक उमस भरी दोपहर में
वे घूमते हैं हाथों में हाथ थामे
उनकी आंखों में रिश्ते का यकीन है
उनकी पलकों में
विश्वास का ईथर है

भटकते हैं मकान दर मकान
अजनबी शहर में
आंखें उठती हैं शक की शक्ल में
हर चेहरे पर चस्पां हैं सवालों की तल्खी

अपने हाथों को कसकर
वे झांकते हैं टू लेट की
तख्तियों में बसी चाहरदीवारी में
अपनी दुनिया बसाने की मासूम इच्छा जो अभी अभी थी सबसे अदम्य आकांक्षा
पसीने के बीच बहने लगी है
कोकाकोला की बोतल के सहारे
लडते धूप से
वे बढ रहे हैं अगले मकान की ओर

उन्हें कहीं नहीं जाना है
वे कहीं नहीं जाएंगे
यहीं रहेंगे
किस्सों में उनका जिक्र आएगा
कहानियों में उन्हें पहचाना जाएगा
वे साथ साथ आए हैं शहर में
साथ साथ रहेंगे
जैसे रहते चले आ रहे हैं सात जन्मों से

3 April, 2008

अधूरी कविता जिसे पूरा नहीं होना---- कभी भी

हमें मरने की जल्दी नहीं थी
हम बेपरवाह थे उम्र से
चेहरे पर उगी दाडी ने हमें आश्वस्त किया
सफेदी ने हमें भरोसा दिया
हम भूल चुके थे लकीरों की आहटें
कभी कभी जब कोई नश्वरता को तरकश से निकालता था
प्रत्यंचा के पहले ही छीन लेते थे तीर
हमारे हिस्से में बहुत वक्त था
हमारे हिस्से में बहुत गुमान था

यह नई सदी के पहले दशक के अंतिम वर्षों का तेज जीवन था
जिसमें वर्चुअल दुनिया ने तेजी से जगह बनाई थी
सबसे ज्यादा बातें सोशल नेटवर्किंग और चैटिंग ने कराई थी
घंटों की बोर्ड से उलझते रहे थे महीनों दुनिया को जी भरकर नहीं देखा था
जो पहले शब्द थे वे वाक्य हो गए थे
वाक्यों ने जगह ले ली थी पैरा की
पैरा तो पूरे आलेख कहलाने लगे थे

हमारे पास बहुत वक्त था
लेकिन हम बात जल्द से जल्द खत्म कर देना चाहते थे
हरी से पीली और लाल होती बिंदियों से दोस्तों की ताजा हालत पता चलती थी
हमें पता ही नहीं चला कब गुजर गई बतकही
कहां चली गईं किस्सागोई की महफिलें
चाय की टेबिलों पर नहीं नाइट शिफ्ट में काम करते हुए जानीं दुनिया की सबसे चर्चित खबर पर सबसे उथली राय
पडोस की सीटों पर बैठे दुख से इस कदर अंजान थे
कि अपनी खिलखिलाहट पर उभर आई बेचैन पेशानी भी नहीं दिखाई दी
बौखलाए से फिरते समय में हमने हिस्से को इतना भरपूर कर लिया था
कि न चाहते हुए भी अपने से पार देख पाना मुनासिब न लगता था

अब जबकि थोडे दिन बचे हैं देह के
हम चाहते हैं गोल गोल घूमें
और पूछें
बोल बोल रानी
कित्ता कित्ता पानी.....

31 March, 2008

ये तो डिलीट हो लिए..

एपी पर फोटो सर्च कर रहा था.. इंडिया वर्ड के साथ. तीन पेज खुले और आखिरी पेज पर सबसे आखिरी फोटो इंडियन कम्यूनिस्ट के कैप्शन के साथ है.. फोटो की जगह लिखा है मिसिंग ऑर डिलीटेड.. कैप्शन पूरा पढने से पता चलता है कि विश्व के कम्यूनिस्ट लीडर्स के साथ भारतीय नेताओं के फोटोग्राफ का पोस्टर बेचता एक लडका इस तस्वीर में था... बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ कि एपी का कोई फोटो डिलीट किया गया... कुछ खास बात है क्या इसमें???


17 March, 2008

"मस्तराम" नहीं रहे


यह खबर जब मुझे मिली तब तक "मस्तराम" को यह दुनिया छोडे हुए तीन दिन हो चुके थे. मिलने जुलने वालों ने बताया कि अंतिम समय में वे खुद को कोस रहे थे. यूं मस्तराम का असली नाम कुछ और है.. लेकिन वे लिखाई पढाई के हल्के में हल्की सी तिरछी हंसी के साथ "मस्तराम" के नाम से ही जाने जाते थे. असल में यह नाम उन्होंने खुद नहीं चुना था. आर्थिक तंगी के दिनों में कुछ चटखारेदार सवाल पूछने की कला ने उन्हें आगरा के प्रकाशन उद्योग का दरवाजा दिखाया और वहीं से उन्हें दिल्ली मैं रहने की सलाह मिली. उसके बाद मस्तराम के साथ वह कई तरह की कलाबाजियां दिखाते रहे. जो उन्हें जानते हैं उनके बीच कई उनकी "खूबी" से परिचित नहीं हैं. इसलिए उनका असली नाम मैं यहां जाहिर नहीं कर रहा हूं. उन्ही के माध्यम से पता चला कि इसी नाम से कई और लोग भी पच्हत्तर रुपए प्रति प्रश्न की दर पर लिखते हैं.

मस्तराम को उनके असली नाम से बुलाने की जिद में कई बार मैंने उन्हें घेरा लेकिन कभी उन्होंने नहीं बताया. बहुत बाद में एक सार्टिफिकेट देखते हुए उनके जनेऊधारी नाम से पहचान हुई. जब भी वे मिले आर्थिक तंगी से जूझते रहे. चटखारेदार सवाल लिखकर पैसा कमाने का रास्ता उन्होंने कुछ मुसीबतों से उबरने के लिए चुना था और फिर कई वर्षों तक उससे बाहर नहीं आ सके. यूं अपने समय के कई अन्य लोगों की तरह वे भी लेखन को विशुद्ध पैसा कमाने का पैसा मानते थे. हालांकि जयशंकर प्रसाद की कई पंक्तियों को वे सुरीली आवाज में लयबद्ध ढंग से गुनगुनाते थे और मुक्तिबोध को हद से ज्यादा पसंद करते थे. बात बेबात कई जगह परसाई को कोट भी करते थे और कई सारे अंग्रेजी लेखकों के बारे में गहन जानकारी रखते थे, जिनके नाम उनके मुंह से सुनने के बाद मैं भूल जाया करता था. कई बार उनसे अपनी कमजोर अंग्रेजी के लिए फटकार सुनी और ही ही करके बात टाल दी.

अपने आखिरी वक्त में चाचू (यह भी एक नाम था जिससे उन्हें पुकारा जाता था) बेहद अकेले थे. दीवारों को घूरते हुए वह खुद को कोसते थे और जो मौत वे हर वक्त मर रहे थे उसके लिए उन बापों की बद्दुआओं को जिम्मेदार मानते थे जिनके बेटे उनका साहित्य पढकर दूसरी राह पर चल निकले या फिर एक समय को बरबाद कर लिया. 14 से 22 के बीच के लोगों में खूब पढे गुने गए मस्तराम जी अब हमारे बीच नहीं है. मेरे लिए तो यह निजी क्षति है. आपके लिए??????

वहां बदलाव की लय सुनी जा सकती है

पिछले दिनों भोपाल में था मैं. कुछ पारिवारिक दिक्कतों से फारिग होकर माखनलाल यूनिवर्सिटी पहुंचा. ऐसा हमेशा होता है. भोपाल के दौरे में से दो चीजों के लिए वक्त जरूर चुराता हूं. माखनलाल और लालघाटी. आज बात माखनलाल की.
मेरे समय का विवि अब यहां नहीं रहा. बिल्डिंग बदल गई है. सात नंबर स्टॉप से प्रेस कॉम्पलेक्स आते हुए यूनिवर्सिटी ने कई चीजों छोडी हैं.. नई चीजों की जगह बनाने के लिए ही... शायद... इस बदलाव पर हम बात कर चुके हैं.
इस बार भी यहां एक पुरसुकून माहौल था. एक बदलाव और देखा था.. "पत्रकार क्यों बनना चाहते हो?" यह सवाल इस क्षेत्र के हर नवांगतुक से थोडे बहुत हेरफेर के साथ कभी न कभी जरूर पूछा जाता है. हमसे भी पूछा गया था. मेरे साथियों के साथ मैंने भी कुछ रटे रटाए जुमलों को जवाब की शक्ल दी थी- "समाज के लिए कुछ बेहतर करना है", "अपने इस तरीके से दुनिया में पैदा हुई खामियां ठीक करने की कोशिश", "भ्रष्टाचार को बेपर्दा करना है", "कमजोरों की मदद"........ जैसे बयान थे हमारे.
चाहते हुए भी हम झूठ नहीं बोल रहे थे. अच्छे अच्छे जवाब देने की कोशिश तो थी लेकिन कहीं न कहीं वह जज्बा था. पता नहीं न्यूज रूम की भागदौड और प्रेशर के बीच अब कही कुछ कम हुआ है. बीच के रास्ते खोजे हैं बाजार से तालमेल बैठाने के. कुछ छोटी मोटी लडाइयां भी लडीं. और हथियार भी डाले.. भारी मन से नहीं गलबहियां करते हुए. खैर.
तो उन जवाबों में क्या था. क्या वह सुनने वालों को हौसला देते होंगे. बिल्कुल. इस बार माखनलाल में खुद में ये जवाब सुनकर भरोसे की दीवार से टिक गया था. हालांकि उन चेहरे पर उतना आत्मविश्वास न पाकर और उनकी मासूमियत देखकर कुछ दरक भी रहा था. भीतर से... ये लोग जल्द हथियार डालेंगे या फिर खेत हो जाएंगे.
माखनलाल में नए साथियों से जब मैंने वही सनातन सवाल पूछा था तो कुछ हेरफेर के साथ वही जवाब मिले थे. इक्का दुक्का जवाब- "यह भी एक फील्ड है, जिसमें कैरियर बनाया जा सकता है" थे, लेकिन उनके भीतर की अराजकता चेहरे से टपक रही थी.
खैर रचनात्मकता की एक दिलचस्प जादूबयानी वाला मामला अलग कर दिया जाए, तो क्या यह जवाब हौसला नहीं देते.. अपनी तमाम खामियों के बीच पत्रकारिता वहां पनप रही है. वहां कुछ कदम पांव ले रहे हैं. क्या उन कदमों के लिए ये पहाड पीछे सरकेंगे, नदियां रास्ता देंगीत.. देखते हैं..
.... एक बात और माखनलाल के नए विद्यार्थियों ने एक ब्लॉग बनाया है. अभी इस पर कुछ लिखा नहीं गया है. पर उम्मीद की जानी चाहिए कि पत्रकारिता के नए तेवर की बानगी यहां मिलेगी.. उत्साह तो आप लोग बढाएंगे ही..

16 March, 2008

क्या ब्लॉगवाणी भी चला नारद की राह

आज पूरे दिन ब्लॉगवाणी पर भडास दिखाई नहीं दिया. क्या इस बहुचर्चित ब्लॉग को बैन कर दिया है? बहुचर्चित इसलिए कि सारे दिन एग्रीगेटर पर पोस्ट न आने के बावजूद भडास को पूरे दिन में साढे तीन सौ से ज्यादा लोगों ने पढा. यह बात पहले भी उठ चुकी है कि कोई ब्लॉग कितना चर्चित है इसमें एग्रीगेटर का कोई खास रोल नहीं होता. खैर जुदा मसला है... आज में भडास पर गया था तो उसमें कोई आपत्तिजनक भाषा कम से कम पिछली सात आठ पोस्ट में तो नहीं ही थी. यानी जब भडासी सुधरने लगे तो उन पर बैन का कोडा चला दिया गया. अगर ऐसा है तो शर्म है. जिस शोर के साथ ब्लॉगवाणी शुरू हुआ था वह जज्बा खतम हो गया क्या. चलो अच्छा हुआ एक भ्रम और टूटा कि बोलने की आजादी ब्लॉग पर है... किस ढंग से बात कही जाए इसे मिलबैठकर समझाया जा सकता था.. लेकिन नहीं यहां तो मुंह बंद करने की सलाहियत ही है.. क्या बात है!!!! ब्लॉगवाणी की लोकतांत्रिक आवाजें कहां गई? कहां गए बजार पर बैन के विरोधी? सो गए क्या? चलिए अपन भी सोते हैं.... साली निकल गई अपनी भडास
तो संजीदा सोज बशारत मंजिल में बैठे सोचते होंगे कि क्या अगडम बगडम आंय बांय बक रहा हूं.... तो सोज साहब यह हमारे समय का सबसे नया खिलौना है जिससे हम मन बहलाव के लिए खेलते हैं... बशारत मंजिल से निकलकर बताशों वाली गली से होते हुए चावडी बाजार की तरफ आएं तो कल मुझे बुला लीजिएगा... कल इस खिलौने के कुछ और मजेदार किस्से सुनाउंगा....

4 March, 2008

आज बस इतना ही




कभी कभी बाज़ार में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

1 March, 2008

मोहल्ले और भडास की असली औकात या यूं कहें कि "ताकत"

पिछले दिन मोहल्ला और भडास पर जो विवाद चल रहा है. उसमें कई बार मठाधीशी का जिक्र आया है. मैं मुद्दे पर बहस करने के पक्ष में हूं. यहां मैं एक क्षेपक की तरह कुछ आंकडे रख रहा हूं. इसे मूल बहस से दूर रखकर बस इतना भर जान लें कि क्या सचमुच अविनाश और यशवंत की हैसियत ब्लॉगिंग की मठाधीशी करने की है.. या फिर ये दोनों भी किसी और के हाथों की कठपुतली भर हैं और किसी अन्य के खेल में मोहरे की तरह इस्तेमल हो रहे हैं? साथ में यह भी सोचें कि आपके अपने ब्लॉग की हैसियत इस खेल में क्या है... ये जो इतना सारा फ्री स्पेश मुहैया कराया गया है क्या महज दिल बहलाव के लिए है? अथवा इसकी कई और पर्तें भी हैं... दोस्तो खेल बहुत बडा है....
जरा इन बिंदुओं पर नजर डालें
शुरुआत: मोहल्ले की शुरुआत एक फरवरी 2007 को हुई और भडास की हालिया यानी दूसरी पारी 12 जनवरी 2008 को शुरु हुई. यूं भडास की पहली पारी मई 2007 के आसपास शुरु हुई थी.. दोनों ही स्थितियों में ब्लॉगिंग में अविनाश यशवंत से सीनियर प्लेयर हैं.
पोस्ट: अपने तकरीबन 13 महीने के कार्यकाल में मोहल्ले पर 482 पोस्टें डाली गईं जो उसके 41 मेंबर लेखकों ने डालीं. इसी तरह अपने हालिया दो माही कार्यकाल में भडास पर 1208 पोस्टें डाली गई, जिनमें से 437 पोस्टें ड्राफ्ट में ही रहीं यानी प्रकाशित नहीं की गईं यानी कुल 771 पोस्टें जो 229 भडासियों ने डालीं.
कमेंट: भडास की पोस्टों पर कुल मिलाकर 1079 कमेंट आए तो मोहल्ले पर 2779 कमेंट विभिन्न ब्लॉगरों ने डाले.. ध्यान रखने वाली बात यह है कि भडास पर ज्यादातर लोग कमेंट की बात भी नई पोस्ट की शक्ल में कहते रहे. इसलिए जहां भडास पर पोस्टें अधिक हैं वहीं कमेंट की संख्या कम है.. इसे भडास पर लिखने की खुली छूट भी बडा कारण रही.. इसके बरअक्स मोहल्ले में एक किस्म से कमान अविनाश जी के हाथ में ही रही..
विजिटर: लगे हाथ दोनों ब्लॉग के हिट्स भी देखें. अपनी पूरी अवधि में जहां मोहल्ले पर एक मार्च को रात बारह बजे तक 78 हजार पांच सौ 66 लोगों ने दस्तक देकर एक लाख 46 हजार 245 पन्ने खोले. वहीं भडास पर 28 हजार 810 विजिटर ने 45 हजार 470 पन्ने पढे.
कल कुछ और आंकडे पढने को मिलेंगे क्या?
(सभी आंकडे एक मार्च को रात बारह बजे तक)