आमद का शुक्रिया


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9 June, 2009

हबीब दा से आखिरी बातचीत

वालिद की वसीयत पूरी करने का सुकून

यकीनन पहाड़ टूटा है। हकीकत इतनी ही ठोस और बेरहम होती है। सोमवार की सुबह सूरज अंधियारा लेकर उगा था। हबीब साहब के इंतकाल के बाद वक्त थम गया। हंसी रुक गई। उम्मीद ठहर गई। अंधेरा छटा तो हौसला मुस्कुराया, कि लोक की आस्था में रची आवाज कभी थम नहीं सकती, उम्मीद से भरे सीने की धड़कन कभी नहीं रुकती, सपनों से भरी आंखें कभी नहीं बुझतीं। एक दिल की धड़कन थमी, तो हमारे हबीब लाखों दिलों में धड़कने लगे...
हबीब दा के वालिद युसुफ जई कबीले के थे। तनवीर तखल्लुस की जरूरत उन्हें शायरी करते हुए पड़ी। बाबा ने नाम रखा था हबीब अहमद। इस तरह पूरा ना बनता था- हबीब अहमद युसुफजई खान तनवीर।
अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। अपने आखिरी वक्त तक हबीब दा ऊर्जा से भरपूर थे। उन्हें अपनी सीमाओं का ख्याल था, लेकिन इस वजह से कभी अपनी इच्छाओं को नहीं रोका। वे लगातार काम करते रहे। थियेटर के लिए, आर्ट के लिए, लोक के लिए। थकान उन्हें कभी नहीं रही। हाल ही में हबीब दा से मुलाकात हुई। तो जिक्र निकला इच्छाओं का। उन्होंने एक जरूरी इच्छा पूरी होने और एक इच्छा पूरी न होने की याद साझा की। हबीब दा के वालिद चाहते थे कि वे कम से कम एक बार पेशावर जरूर जाएं, यानी स्वात।
दूसरे, हबीब दा की इच्छा थी कि वे अफगानिस्तान के लोक कलाकारों के साथ एक वर्कशॉप करें। चार दशकों की जद्दोजहद के बाद वालिद की इच्छा पूरी करने पेशावर तो पहुंच गये, लेकिन अफगानी कलाकारों के साथ वर्कशॉप की इच्छा अधूरी ही रह गई। स्वात की यादों को जाहिर करते हुए हबीब दा के चेहरे पर एक हल्की लकीर उभरती थी। जो दो देशों के बीच खिंची लकीर से मिलती जुलती है। वे कहते थे, कि इच्छा पूरी होना या न होना जरूरी नहीं, इच्छा का होना ही सबसे जरूरी है। हबीब दा अपनी आत्मकथा लिख रहे थे। उसका पहला हिस्सा वे पूरा कर चुके थे और उसी में पेशावर व अफगानिस्तान की यात्राओं का जिक्र है। यह बातचीत पत्रिका के आज के अंक में प्रकाशित है, लेकिन अखबारी मजबूरियों के चलते पूरी नहीं आ सकी. यहां यह बिना कांट छांट के प्रस्तुत है. इच्छाओं के बारे में हबीब दा से यह आखिरी, उन्हीं के लफ्जों में।

वालिद चाहते थे कि पेशावर जरूर जाऊं
"आखिरी वक्त में वालिद की दो ही इच्छाएं थीं। पहली का जिक्र वे अक्सर करते थे कि उस सूदखोर हिम्मतलाल के 19 रुपए 75 पैसे लौटा देना। अब्बा ने यह पैसा सूद पर लिया था। वे सूद पर पैसा लेना और देना दोनों को गुनाह मानते थे और हिम्मतलाल के सूद के कारण वे खुद को पूरी उम्र गुनहगार मानते रहे। वसीयत में अब्बा ने कहा था कि पेशावर जरूर जाना। हिम्मतलाल तो कभी मिले नहीं लेकिन पेशावर जाने के लिए कई कोशिशें की। 1958 के बाद पेशावर जाने के लिए जद्दोजहद करते रहे। 1972 में काबुल तक गया। तब सांसद था। काबुल से पेशावर बहुत करीब है। उस वक्त बंग्लादेश अलग हो गया था। मेरे देखते-देखते कई लोग भाग रहे थे, परेशान होकर, स्वात से। यह सब देखा था उसी दौर में। माहौल में तनाव घुला हुआ था। पेशावर जाना नामुमकिन हो गया था। बड़े भाई अक्स पेशावर के खूबसूरत बाजार किस्सा खानी और चने और मेवे का जिक्र बड़े चाव से करते थे। सुना था कि वहां पिस्ता-बादाम जेब में भरकर लोग काम पर निकलते थे। पेशावर जाने की इच्छा तेज हो रही थी, लेकिन पाकिस्तान में कराची तक का वीजा था। वहां लेखकों ने कई कोशिशें कीं, लेकिन नहीं जा सके। एक बार जलालाबाद गये थे। वहां खान अब्दुल गफफार से पेशावर और स्वात के बारे में कई बातें हुई, लेकिन वहां से भी पेशावर नहीं जा पाए। 1990 में भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल लाहौर, कराची और इस्लामाबाद में थियेटर गतिविधियों के लिए माकूल माहौल तलाशने के लिए भेजा था। हमें क्वआगरा बाजार´ के प्रदर्शन के लिए जगह देखनी थी। जगहों में पेशावर का जिक्र नहीं था। पेशावर के थियेटर के बारे में मैंने सुन रखा था। वहां बहुत बेहतर थियेटर स्टेज है, वह देखना चाहते हैं। पाकिस्तानी अथॉरिटी ने बार्डर सुलगने का हवाला दिया और कहा कि हम वहां नहीं भेज सकते। मुझे आगरा बाजार के लिए बड़ा स्टेज चाहिए था। जिसमें 52 लोग आ सकें। सुन रखा था कि पेशावर का ऑडिटोरियम इसके लिए बेहतर है। साथ ही वालिद की इच्छा पूरी करने की हसरत भी फिर सिर उठा रही थी। अथॉरिटी को बताया तो उन्होंने दो दिन के लिए पेशावर जाना मुमकिन किया। अब्बा कहते थे कि पेशावर जाना तो चप्पली कबाब खाना मत भूलना। हमने पेशावर के दोस्तों से जिक्र किया, तो वे बोले कि आप दो दिन के लिए यहां आएं हैं और अफसोस ये दो दिन मीट लैस हैं। पेशावर में इतना गोश्त खाया जाता है कि अगर दो दिन के लिए सरकारी रोक न हो तो ईद पर कमी पड़ जाए। साथ ही दो दिन में अजीज भी हो जाता है, तो इन दो दिनों में उसे पनपने दिया जाता है। बहरहाल, हमारी किस्मत नहीं थी कि चप्पली कबाब खायें, लेकिन फिर भी बाप की वसीयत पूरी कर दी इसका सुकून था।´´
अफगानी कलाकारों के साथ वर्कशॉप न कर सका
"1972 में सरकार की ओर से फरमान मिला कि मालूम करो कि काबुल में थियेटर वर्कशॉप हो सकती है कि नहीं। तब बन्ने भाई सज्जाद जहीर के साथ काबुल पहुंचे थे। कहवा पीते हुए हमने काबुल में थियेटर की बातें कीं। वहां जबरदस्त लोक थियेटर है। अफगान की तवायफों का नाच लगातार चलता है। यह हमारे राई के करीब है। वहां का काफी सारा फोक आर्ट दबा पड़ा है। एनर्जी से भरपूर। उनके मूवमेंट बहुत ऊर्जा लिए हुए हैं और खूबसूरत भी हैं। तवायफों का नाच तकरीबन खुले में होता है। या फिर कनातें लगा दी जातीं। बैकलैस बेंच पर दर्शक बैठे रहते। हम और बन्ने भाई वहीं बैठे। चाय, कहवा, मूंगफली बिक रही थी। यही मनोरंजन था उस वक्त के अफगानिस्तान में। कला से भरपूर माहौल था वह। उन लोगों को लेकर थियेटर वर्कशॉप की हसरत थी, लेकिन हालात बदले और 1990 के बाद एशियाई थियेटर को जोड़ने के लिए किये जाने वाला काम रुक गया। कल्चरल मूवमेंट बंद हो गये। हालांकि हम इंतजार कर रहे थे कि हालात बदलेंगे तो वर्कशॉप हो जाएगी। वसंत के मौसम में एक टोकरी आई, ड्राई फ्रूट की इसमें कोई मैसेज नहीं था। वह लिखा था- कश्मीर इश्यू राइज। हम समझ गये कि हम वहां ड्रामा के लिए कोई जमीन नहीं बची है। इस तरह यह हसरत अधूरी ही है।´´

2 June, 2009

इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन ..?

मौत कई लोगों के लिए एक सूचना भर होती है. तिल तिल कर मरते, हर रोज जीने की जद्दोजहद में मशगूल लोगों के लिए यह अंत भी है. फिर भी यह दुख से भर जाती है. क्योंकि मौत के साथ सपना देखने वाली आंखें भी बुझ जाती हैं. कुलदीप नारायण मंजरवे जी के रहने का दुख भी इन्ही बहुत से दुखों के बीच से झांकता एक बडा और सहमा हुआ सच है. अब उनके हाथ कुछ नहीं रचेंगे. उनकी मौत की सूचना निराला ने दी. कुलदीप जी की मौत से विचलित निराला ने अपना दुख कागज से कहा और मेल कर दिया. मैं कुलदीप जी से कभी नहीं मिला. बातचीत में कई बार जिक्र आया, लेकिन वह अनायास चले आने वाले नामों के क्रम का हिस्सा ही रहा. अफसोस मैं इस शख्सियत के कभी रूबरू नहीं हो सका. जिनसे कला को गढा, जीवन को भी.

मुझे गाजे-बाजे के साथ विदा करना,
लगे
कि कलाकार का जनाजा है, ऐरे-गैरे का नहीं...

निराला तिवारी
वह रविवार 31 मई की शाम थी. महीने का आखिरी दिन. मन यूं ही इधर-उधर भटक रहा था. लेकिन नहीं पता था कि यह मेरे आत्मीय और समाज-दुनिया से उपेक्षित एक महान कलाकार के जीवन का भी आखिरी दिन था. शाम को एक अजीज मित्र को मैसेज भेजा- आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन डियर...?
अभी यह मैसेज भेज कर मित्र से मिलने वाले जवाब की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि रात नौ बजे के करीब एक अपरिचित नंबर से फोन आया. फिर जो पता चला- उसमें खुशी तो थी लेकिन गम और दुखों के पंख पर सवार होकर आयी थी.
फोन कुलदीप नारायण मंजरवे के पुत्र बिनू ने किया था. यह बताने को कि पिताजी गुजर गये. खबर सुन कर मैं सकते में तो नहीं आया लेकिन लेकिन खुद को गुनाहगार और शर्मसार जरूर महसूस करने लगा. लगा मैं कोई जुर्म कर बैठा हूं. उनके जीते-जी उनकी उस डायरी को किताब की शक्ल में नहीं छपवा सका, जिसके लिए वे पिछले कई दिनों से बार-बार कह रहे थे.
मुझे उनकी मृत्यु का दुख इसलिए ज्यादा नहीं हुआ, क्योंकि दो दिन पहले ही मैं उनसे मिलने उनके घर गया था. करीब दो घंटे तक उनके साथ रहा था... कुलदीप तब जी भर के दुआएं दे रहे थे मुझे और साथ ही रो भी रहे थे, इस कामना के साथ कि अब गुजर ही जाऊं तो बेहतर...! मंजरवे को हार्ट की शिकायत थी. वे सीने की दर्द से तकलीफ महसूस कर रहे थे लेकिन उस दर्द से भी ज्यादा कई तकलीफें जिंदगी की आखिरी बेला में उन्हें घुटन दे रही थीं.
83 वर्ष के मंजरवे के बारे में संक्षिप्त जानकारी यह है कि वे शिल्पकार थे. पटना आर्ट कॉलेज के छात्र रह चुके थे. पेपरमैसी आर्ट के मास्टर थे. रांची के कोकर इलाके में पिछले 40 साल से एक कमरे में वह और उनका पूरा परिवार रहता था. उस एक कमरे को मकान, दुकान, कारीगरी का कारखाना... कुछ भी कह सकते हैं. मूर्तियों के ढेर के बीच तीन बिस्तर पर 12 सदस्यीय परिवार का आशियाना. एक बेड पर चादर से परदेदारी कर बेटा-बहू, तो उसके बगल वाले बिस्तर पर बच्चे और ईंट को सजाकर लकडी के पट्टे से बनाये गये एक पलंग पर मंजरवे सोते-बैठते...
मंजरवे बिहार के जमुई जिला के चांदन गांव में पैदा हुए. कला की सनक स्कूली जीवन से इस तरह सवार हुई कि उसकी कीमत पर किसी चीज से समझौता करने को तैयार नहीं. पटना आर्ट स्कूल से पढाई पूरी करने के बाद इन्हें देवघर विद्यापीठ में नौकरी मिली. वहां मन उचटा तो झारखंड के ही सरायकेला-खरसावां में सरकारी नौकरी करने चले आये. लेकिन कलाकार मन को न चाकरी रास आ रही थी न नया शहर. सो आखिर में शिल्प कला केंद्र का एक बोर्ड लगाकर एक शेड के नीचे कला सृजन में लग गये. यह 1973 की बात है, जब उन्होंने शिल्प कला केंद्र की स्थापना की. तब से न जाने कला, कलाकारी और कलाबाजी की दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी, मगर मंजरवे वहीं के वहीं रह गये. अपनी सादगी और सच्चाई के साथ. अपनी धुन में इतने मगन रहे कि उन्हें कभी शिल्प कला केंद्र को रजिस्टर्ड संस्था बनाने ख्याल भी नहीं आया.
मंजरवे को गांधी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण आदि का सान्निध्य मिल चुका था. असहयोग आंदोलन के दिनों में जब बंगाल से कुछ लडकियां पटना पहुंचीं तो उन्हें चरखा प्रशिक्षण का जिम्मा गांधीजी ने मंजरवे को ही सौंपा था. आजादी की लडाई के दिनों में नाटक खेले जाते थे तो उसमें मेकअप मैन के रूप में मंजरवे होते, ये नाटक पटना व आसपास के इलाके में काफी चर्चित हुए थे. डॉ राजेंद्र प्रसाद इनकी कला के कद्रदानों में से थे और विनोबा, जयप्रकाश भी कहते- मंजरवे, तुम्हारे जैसे साधक की ही जरूरत है. मंजरवे ने भारत छोडो आंदोलन के दौरान पटना से लेकर बाढ तक के इलाके में गांव-गांव में पैदल जाकर लोगों को जागरुक किया था.
मंजरवे साधक ही बने रहे. जब तक जवानी रही तब तक अपने ही हाथों से बना कपडा पहनते रहे. लेकिन इन सबसे वैसा कुछ भी नहीं हो सका, जिसकी दरकार उन्हें थी. न मुफलिसी दूर हो सकी, न उपेक्षा. लेकिन उम्मीदें थीं कि टूटती नहीं थीं, आखिरी वक़्त तक. मंजरवे के उस टूटे हुए मकान में कई मूर्तियां बनी हुई मिलेंगी. इन मूर्तियों का निर्माण मंजरवे से किसी नेता या स्वयंसेवी संस्था ने करवाया था... बेचारे मंजरवे, दिन-रात एक कर, अपना पैसा लगा कर इन मूर्तियों का निर्माण करते रहे, लेकिन उन्हें ले जाने वाला अब तक यानी दस वर्षों बाद तक कोई नहीं आया.
सरकारी विभागों ने तो न जाने कितनी बार छला. एक दफा ग्रामीण विकास विभाग ने उनकी बनायी कलाकारी को यह कह कर ले लिया कि वे उसे राष्ट्रीय सम्मान के लिए भेजेंगे. मंजरवे ने उसे दिया. बाद में राष्ट्रीय सम्मान की बात कौन करे, वह कलाकृति भी कौन हजम कर गया, आखिरी दिनों तक पता नहीं चल सका.
इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ. मंजरवे को किसी सरकारी बाबू ने बता दिया कि आपका नाम तो इस बार राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए गया है. आप तैयार रहियेगा. जिस दिन यह पता चला, उसी दिन से मंजरवे कभी आधी रात को जग कर तो कभी भरी दुपहरिया में एक नयी कृति के निर्माण में लग गये. शरीर साथ नहीं देता था, फिर भी वे लगे रहते... उस कृति का निर्माण उन्होंने राष्ट्रपति को देने के लिए किया. वे बताते थे कि जब सारे कलाकार राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए राष्ट्रपति भवन पहुंचेंगे तो वे सम्मान लेकर आ जायेंगे. मैं सिर्फ लूंगा नहीं, राष्ट्रपति को भी कुछ दूंगा.
सच यह था कि मंजरवे का नाम किसी राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए नहीं गया था. किसी ने उन्हें बेवकूफ बनाया था. अभी वह इस छलावे में ही थे कि किसी ने मंजरवे को कह दिया कि आपके शिल्प कला केंद्र का भव्य निर्माण करवा देंगे, कैसा चाहते हैं आप? एक बार फिर से मंजरवे नकशा बनाने में लग गये और कपडा, लकडी, मिट्टी, कागज आदि से जोड कर मंजरवे ने शिल्प कला केंद्र का एक नमूना ही तैयार कर दिया. दो दिनों पहले जब मैं उनसे मिलने गया था तो उन्होंने अपनी किताब के बारे में पूछने के बाद उस नमूने को दिखाते हुए कहा था- ऐसा ही बन जाता शिल्प कलाकेंद्र तो मजा आ जाता, खूब काम होता...
न तो खूब काम करने और न ही उसे देखने को मंजरवे अब इस दुनिया में हैं. उनका बेटा बिनू कलाकार से मजदूर बनने की राह पर है. जहां भी शिल्प कला केंद्र के लिए काम मांगने जाता है- सरकारी अधिकारी-बाबू पूछते हैं- संस्था है, एनजीओ है, ट्रस्ट है...आदि. इतने सवालों से जूझ कर आने के बाद बिनू जब अपने घर पहुंचता है, तो उस एक छोटे मकान में पडी मूर्तियां उन्हें ही चिढाती नजर आती हैं. बिनू अपने बाबूजी से भी कहते थे- आप जिंदगी भर मूर्तियों को गढते रहे, कभी हमारी जिंदगी गढने की परवाह भी किया होता. तब कुलदीप हंसते हुए कहते, मरूंगा तो जरा गाजे-बाजे के साथ कलाकारी वाले अंदाज में ले जाना, जलाना मुझे... बिनू ने किया भी वैसा ही. बाजा के साथ उनकी अर्थी उठी और घाट तक जाने वाले थे कुल जमा दस लोग...
यह भी अजब संयोग था कि मंजरवे की मौत की खबर सुन कर उस सवाल का जवाब भी मिल गया, जो मैंने अपने दोस्त से मैसेज के माध्यम से पूछा था-आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन ...?

31 May, 2009

ये इतिहास हमारा नहीं है

इतिहास क्यों लिखा जाता है. सबक लेने के लिए? गलतियों पर लानत फेरने के लिए? अपनी ताकत को देखने की जिद का नतीजा है इतिहास. या दादाओं के घी पीने के किस्सों में अपना हाथ सूंघने की रवायत. क्यों है ये इतिहास. हमने अपना इतिहास कभी नहीं लिखा. सर्द रातों में ठिठुरते हुए अपने ही भीतर समाते रहे. अपनी मामूली जीतों पर कभी खुश हो सकने लायक वक्त भी नहीं रहा हमारे पास, कब लिखते इतिहास. जो लड रहे थे, वे कभी इतिहास नहीं लिख पाए.

इतिहास उन्होंने लिखा जो युद्ध क्षेत्र से दूर थे. नक्काशीदार सुराहियों से पानी पीते हुए लिखा गया इतिहास. सीलन भरी कच्ची दीवारें तो बस बम के गोलों से नेस्तनाबूद होती रहीं. उसके बाद वे इतिहास लिखते रहे और हम इन दीवारों को फिर उठाते रहे. गारा मिलाकर फिर आसमान और आंख के बीच एक छत बनाते रहे. इतिहास नहीं लिखा हमने.

हमने गीत बुने. खाते हुए, सोते हुए, सुबह का इंतजार करते हुए, दोपहर का वजन कंधों पर उठाये हुए और शाम की हल्की हवा को पीते हुए गीत लिखे हमने. इन्हे इतिहास नहीं माना जाना चाहिए. कविता भी नहीं. कविता तो खूबसूरत होती है. गीतों में पीढा थी. गीतों में जद्दोजहद थी. गीतों में सीलन थी. गीतों में जीवन था. खूबसूरती नहीं थी. हमने फूलों के रंग नहीं बताए. हमने नदी की कलकल नहीं सुनी. हवाओं का संगीत नहीं अगोरा. हमने तो बस अपनी बिना सपनों की आंख में भरे हुए पानी को गीतों में उलीच दिया.

इतिहास की हमें जरूरत नहीं. इतिहास जीतों का होता है. छुटपुट कामयाबियों को जीत मानने की गलती नहीं करेंगे हम. हम अपनी पूरी लय में गायेंगे इतिहास को फतह के दिन. और वह दिन आएगा. हमारी उम्र में न सही. हमारे बाद खून के आंसू पीने वालों की उम्र में भी नहीं. उसके बाद जब कभी भी आएगा. हमारे गीतों में ढूंढ लेंगे वे इतिहास के पत्थरों की नमी.

29 May, 2009

झोंके का इंतजार, मेंढक, पसीना और चंद आवाजें

रात हो गई है. पास की नाली के पास रहता मेंढकों का परिवार एक लय में चीख रहा है. नहीं नहीं गा रहा है. शायद उनका कोई दुख उनसे छूट गया है. उस मेंढकी के परिवार में कितने लोग होंगे नहीं कह सकता पर वह अकेली नहीं होगी. प्यास होंठों को सुखाने लगी है और मैं अंधेरे में पानी की बोतल टटोलता हूं. किसी किताब पर हाथ पडता है और उसके कागज फडफडाने लगते हैं. टर्र टर्र ज्यादा भली लगती है इस फर्र फर्र से. हाथ खींच लेता हूं और थूक गटक लेता हूं. शायद बोतल का ढक्कन खुला रह गया था, अंधेरे में गलत हाथ पड गया तो नाहक पानी फैल जाएगा. किताबें गीली हो जाएंगी. इससे अच्छा तो प्यासा रहना ही है. पानी मेरे गले को चाहिए, किताबों ने पानी नहीं मांगा.

प्यास से ध्यान हटाने के लिए फिर मेंढक के बारे में सोचता हूं. वह पानी में तैर रहा होगा. नहीं भी तैर रहा होगा तो टांगे पसारे लेटा होगा. गर्मी को चिढाता हुआ. आवाज बंद हो गई. शायद उसकी आंख लग गई होगी. लेकिन बच्चे तो टर्रा सकते हैं, उन्हें डपटकर चुप तो नहीं कर दिया. उसके बच्चों की उम्र का अंदाजा लगना मुश्किल है. आवाज उम्र को धोखे में रखती है. अभी शाम को जिस दोस्त से बात हो रही थी वह भी कच्ची उम्र में बूढी आवाज निकाल रहा था. बातों में भी बुढापा झलक रहा था. लेकिन मानने को मन नहीं करता कि मेंढक बूढे होते होंगे. मेंढक हमेशा गुहारते रहते हैं. अपनी अकेली आवाज में दुनिया भर की लानतें खाते हुए. जो जाग रहे हैं, उन्हें लगता है मेंढक सोने नहीं देते, जो सो चुके हैं उनकी नींद में टर्र टर्र हो रही है.

फिर फर्र फर्र की आवाज आती है. शायद खिडकी से हवा का झोंका आया था. उसने किताबों को फिर खोल दिया था. मेरी पीठ पर पसीना फैल चुका है, वहां झोंका आता तो कुछ राहत मिलती. राहतों का इंतजार ही किया जा सकता है. वह प्रकृति से हो चाहे सरकार से.

कल प्रणब मुखर्जी नाम का कोई नेता कहा रहा था कि जल्द राहत मिलेगी, महंगाई से, मंदी से, पर उन्होंने भी गर्मी का जिक्र नहीं किया था. उसी वक्त लाइट चली गई थी. तब से नहीं लौटी. ये लाइट जाती कहां है. जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तभी चली जाती है. एक अकेली लाइट कहां कहां रहे. इसे हर जगह जाना होता है. आज खूब पार्टियां हुई हैं रात में देर रात तक, वहां लाइट को पहुंचना होगा, इसलिए यहां से चली गई. पार्टी में मौजूद ज्यादा लोगों का मजा किरकिरा न हो यह जरूरी है. मुझे तो यूं भी पसीना पोंछने की आदत हो चली है.

सुबह का इंतजार करना चाहिए. घडी है नहीं. मोबाइल भी डिस्चार्ज हो चुका है. लेकिन हवा का झोंका तो आया था यानी 3 से ऊपर का वक्त हो गया. बस एक घंटे और इंतजार फिर हवा थोडी तेज चलने लगगी. मैं आंख बंद किए पडा हूं, बालकनी का दरवाजा खुला है. हवा यही से आएगी. रोशनी यहीं से आती है.

26 May, 2009

खबर की कीमत पर विज्ञापन कौन छाप रहा है

इस समय की सबसे ज्यादा ऊबाऊ बहसों में से एक अखबार की गुणवत्ता कम होने की बहस है। दो अखबारी मित्र मिलें, कोई जान-पहचान वाला, किसी सरकारी अफसर से मिलो या किसी राजनीतिक से- सभी एक स्वर में मानते हैं कि अखबार से खबरें गायब हुई हैं। खासकर हिन्दी अखबारों में। तो इन अखबार में क्या छप रहा है? जवाब होता है- विज्ञापन। समझ नहीं आता जब सबको लगता है कि खबरें गायब हैं, यानी आनी चाहिए, तो वे कौन से मुट्ठीभर लोग हैं, जो खबरें दबा देते हैं और विज्ञापन लगा देते हैं? इसे मेरा भोलापन कहिए, सचमुच ये विज्ञापन बुद्धि में नहीं घुसता

चलिए इतना तो तय है कि विज्ञापन ने खबरों को प्रभावित किया है। थोड़ा पीछे नजर दौड़ायें तो दिखता है कि जिन खबरों की दम पर आठवें दशक के उत्तरार्ध में हिन्दी अखबारों ने बड़े विज्ञापनदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया था, अब वे विज्ञापन के लिए खबरों से समझौता करने लगे हैं। सातवें दशक के पहले तक अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिन्दी में विज्ञापन न के बराबर थे। यहीं नजर टिकाये रखें तो दिखता है कि इमरजेंसी के बाद दो घटनाएं एक साथ घटीं। हिन्दी अखबारों की खपत तेजी से बढ़ रही थी और अंग्रेजी अखबार दूरदराज के इलाकों से गायब थे। 1979 में पहली बार हिन्दी अखबारों की प्रसार संख्या अंग्रेजी से ज्यादा हुई और 99 तक आते-आते यह चौगुनी हो गई। उसके बाद थोड़ा ठहराव आया, लेकिन वह वक्ती मंदी रही और अब आलम यह है कि हिन्दी की प्रसार संख्या अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले 7 गुना ज्यादा है। हालांकि इस अनुपात में विज्ञापन नहीं बढ़े। यानी विज्ञापन का ज्यादा संबंध पाठकों की क्रय शçक्त से है, न कि प्रसार संख्या से। आज भी अंग्रेजी पाठकों की कुल क्रय शक्ति हिन्दी पाठकों के मुकाबले 15 गुना ज्यादा है। तो यह तो है विज्ञापन के खेल का ऊपरी परिदृश्य।

इसे उलट-पुलटकर देखने पर पता चलता है कि 1991 हिन्दी मीडिया के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर रहा। यह उदारीकरण का पहला साल भी था भारत में। और इसी समय हॉरलिक्स की एक विज्ञापन श्रृंखला आई थी हिन्दी के अलावा उçड़या, बांग्ला, असमी और मलयालम में। इस विज्ञापन में भाषा और उसकी संस्कृति को ध्यान में रखकर उत्पाद के बारे में बताया गया था। सभी विज्ञापनों का आधार था घर-परिवार, सुरक्षा और स्वास्थ्य। हॉरलिक्स 40 के दशक से अपना विज्ञापन दे रहा था, लेकिन विभिन्न भाषाओं में वह पहली बार लोगों तक पहुंचा। यही वह दौर था, जब हिन्दी मीडिया ने पहली बार विज्ञापन के केक का स्वाद पूरी तरह चखा और यही वह दौर था, जब उदारीकरण की आंधी में अखबार-पत्रकारिता की बहसों में मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, लोकहित आदि शब्द नकार दिए गए। शुरुआत में यह विज्ञापन भारतीय शील और संकोच की भाषा में आए और फिर कंडोम की छतरी लगाकर अपना लबादा उतारते गए और अब तकरीबन पूरी नंगई के साथ अखबारों में पसरे हैं। तो क्या उदारीकरण और विज्ञापन का कोई रिश्ता है? विज्ञापन पूंजीवाद का अग्रदूत है तो फिर उदारीकरण विज्ञापन की नाव होना चाहिए?

बहरकैफ, रॉबिन जेफ्री के शब्दों में इस आंधी के बाद अखबार निकालना उसी तरह हो गया कि हर रोज आपको पसंदीदा खाना मिले और उसे खाने के लिए पैसा अलग से। विज्ञापन के इस दौर का प्रभाव लोगों पर पड़ना ही था और वह पूरी ताकत से पड़ा। पहली बार अखबार आकर्षक हुए और उन तक आम आठक की पहुंच बनी, लेकिन एक सीमित दायरे में अब पाठक की रुचि अखबार तय कर रहे थे और अखबार की सोच विज्ञापन से तय हो रही थी। अखबारों ने लोगों को विरोध और सुविधा का दोहरा भ्रम दिया, यानि अगर वे असंतुष्ट हैं, तो एक व्यवस्था के तहत विरोध करें, उनकी बात सरकार तक पहुंचेगी, नतीजतन एक पूरी की पीढ़ी आराम पसंद और आलसी हो गई। यह पीढ़ी जमीन पर विरोध नहीं कर सकती। कागज पर विरोध करना सीख गई है।

विज्ञापन के संबंध में अखबार मालिकों में 20वीं शताब्दी में कुछ दुविधा दिखाई देती थी। एक दौर में विज्ञापन को क्वअभारतीयं और क्वराष्ट्रविरोधीं भी कहा गया। इससे उन सामाजिक-आर्थिक बदलावों की आहट मिलती है, जिन्हें कुछ लोग रोकना चाहते थे और कुछ इससे लाभ उठाना चाहते थे। दूसरी तरफ विज्ञापन अपनी स्वच्छंद आजादी चाहते थे, जो उन्हें मिल गई।

इसी क्रम में एक बात और ध्यान देने लायक लगती है। जवाहरलाल नेहरू भी गांधीजी की तरह विज्ञापनों को नापसंद करते थे, पर थोड़ा अलग संदर्भ में। इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि "विज्ञापन लोगों को उपभोग की ओर प्रेरित करते हैं और जिस चीज को लोग नहीं खरीदना चाहते हैं, उन्हें वे चीजें खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।"

मेरे एक साथी हैं, यहीं इंदौर में, वे कहते हैं- "आदमी से कोई ऐसा काम नहीं कराया जा सकता, जो वह नहीं करना चाहता"
लेकिन दोस्त उसका मन तो बदला जा सकता है। विज्ञापन यही करता है, आपके दिमाग में बैठकर पूरी सोच बदल देता है। तो चलिए मिलते हैं "आफ्टर अ लांग ब्रेक"!!!!

तब तक आप मुझे विज्ञापन का यह जाल समझाएं। वैसे अश्विनी पंकज ने इसे समझने के लिए मुझे यह लिंक भेजा है। आप यहां क्लिक करके देखिए कौन नियंत्रित कर रहा है यह खेल.

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