नई सदी के पहले साल में कैडर को करीब से जाना. फ्रांस से अपनी यात्रा शुरू करते वक्त इस शब्द की तासीर, इसका ठोसपन और इसकी इतिहास दृष्टि और इसकी यूरोपीय यात्रा की समझ रखने वालों से मुलाकात हुई. अपने अपने संगठनों के जड पत्तों को जाने समझने वाले इन्ही लोगों के साथ भोपाल के काफी हाउसों, नुक्कडों, सभा, सेमिनार, झील और थियेटर की दुनिया में वक्त बिताते और प्रेस काम्पलेक्स की रातों में मैं कैडर हुआ. पत्रकारिता का कैडर. बुरा कैडर. पर समझने लगा था कि कितना ही दूर भागें अब यहीं रहना है. इससे निजात नहीं. उस वक्त भी और उसके बाद अलग अलग शहरों में उम्र बढाने के दौरान जाना कि एक कैडर के भीतर हर वक्त एक डर होता है. बता दूं कि इस समय तक नकार से एकाकार वाले फोल्डर में मूव हो चुके इस शब्द की राजनीतिक समझ से काफी हद तक वाकिफ हो चुका था. तो उन दिनों कई कैडरों से मिलना होता था. उनका डर वही था. सनातन डर. झूठ के मुलम्मे का डर और चेहरों पर चढी रंगीन पुताई का डर. जो जीवन वे जी रहे थे उसमें उन्हें पीछे देखने की फुरसत नहीं थी आगे देखने का भी वक्त नहीं था. बस अपने आसपास की दुनिया में जल रही आग से खुद को गर्म रखना होता था. रांची में एक कैडर के जीवन के बहुत करीब था और मैं इस कल्पना भर से कांप जाता था कि यह सपना नहीं है. यही उसका जीवन है. सच्चा, ठोस और भरपूर. उनकी खुशियों की हंसी इतनी धीमी होती थी कि वह पेट से नहीं निकल पाती. एक जंग लगे ताले के भरोसे अपना सबकुछ (जो चंद किताबों, दो जोडी कपडों, टूथपेस्ट, ब्रश, एक जर्जर हो चुकी तौलिया और घिस चुकी चप्पलों की शक्ल में नजर आता है) छोडकर वे अपने सीने में सपने और भरोसे के लाठी के साथ दिन की शुरुआत करते हैं. दुनिया की मक्कारियों को देखकर लाल होते हैं. निरे लाल. और किसी मासूम मुस्कुराहट के साथ खिलखिलाते हुए चाकलेट न खिला पाने की कसमसाहट को फीकी हंसी में घोलकर पी जाते हैं.
क्या जरूरी है जिंदगी को कैडर की ही तरह देखना? जबकि अपने सबसे बडे भरोसे की जीत पर हम सेंक रहे हों रोटियां.
मुझे जवाब मिला था- जरूरी नहीं कि हम कैसे जी रहे हैं, जरूरी यह है कि हम क्यों जी रहे हैं.
इसके बाद से कैडर शब्द मेरे लिए रीड ओनली हो गया.
अरूण आदित्य की इन पंक्तियों के बावजूद
पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?
लेना चाहता पता नहीं उसे कैसा लगे. एक अजनबी शहर में मकान ढूढंने के प्रक्रिया के बीच मैंने उसके चेहरे सो जो जाना उसे उतार दिया है. कई दिनों से उसे फिर फिर अपनी सी मस्ती में नहीं देखा कई दिनों से उसी खुली हंसी में सराबोर नहीं हुआ. असल में हकीकत के साथ हमकदम होते होते उसने शायरी का एक छोटा घरौंदा बनाना शुरू कर दिया है जहां बेशक्ल सी दुनिया एक हिस्सा नुमायां होता है. तो यह कविता उसी मित्र के लिए... 






