July 29, 2007

सुगम मिली सिरकारी ताकत

कविता के शहरी भूगोल और ठेठ गंवई मिजाज में जो एक बडा फर्क है वह संदर्भों का है. शहरी कविता के संदर्भ जहां बडे दूर और उंचे-उंचे दिखाई देते हैं. वहीं देशज कविता जिसे प्रचलन में लोक कविता कहा जाता है अपने आसपास के दृश्यों, छवियों के साथ खलनायकों का बेहद साफ और बिना लाग लपेट का कथ्य होती है.महेश कटारे "सुगम" के गीत (जो गजलों के बेहद करीब है) इसीलिए अपने कथ्य में परिचित और संदर्भों में सुपरिचित हैं. सुगम जी बुंदलखंड के मध्यप्रदेशी कस्बे कुरवाई में रहते हैं. वे वहां इसलिए रहते हैं क्योंकि नौकरी करते हैं. नौकरी के अलावा वे बुंदेली समाज की विसंगतियों के साथ समाज के सबसे जाने पहचाने बुरे चेहरों और सरकारी कारिंदों की कारगुजारियों को बेपर्दा करते हैं. सुगम बेहद सीधे सच्चे लफ्जों में सरकार के सबसे निचले हाकिमों और गांव की हवेली के बीच के रिश्ते बताते हैं, ताकतवर की हरकतों को नोट करते हैं और एक सधी आंख से घरों के भीतर होने वाले उंच नीच को पकडते हैं. हालांकि पटवारियों, पुलिस, लंबरदारों और पटेलों आदि के चरित्रों से ग्राम्य समाज परिचित है, लेकिन काव्य के साथ इन पर किये व्यंग्य को महसूसना मजा तो देता ही है उकसाता भी है. और जब गांव खेडे के बच्चे बूढे समय कुसमय इन गीतों की पंक्तियां फैंकते हैं, तो वह सही जगह घाव भी करती है. कविता का इससे बेहतर इस्तेमाल भी होता है क्या?
कवि मित्र हरिओम राजोरिया ने नई इबारतें के लिए महेश कटारे सुगम जी की तीन गजलें उपलब्ध करवाईं उनका शुक्रिया।

ऐई गांव के ग्योंडें

भैया जबसे थानों खुल गऔ ऐई गांव के ग्योंडें
सुनो कुजानें को को लुट गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

पुलस, दरोगा, डिप्टी, मुतके गोला और बंदूकें
इत्तौ बडौ हजम्मा जुर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

एक सिपईया बडौ हरामी दिन भर पियै फिरतौ
कुसमा कोरन खौं लै उड गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

इत्तौ जुरम हतौ घंसू कौ मुरगा नई लै गऔ तो
पीठ कौ सबरौ मांस उघर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

हलकैंया मेंतर थाने की सब पोलें जानत्तौ
एक दिना गोली से मर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

भौत रात तक गांव को मुखिया थाने में बैठत है
उ कौ सोई ईमान बिगर गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

सुगम ऐई थाने ने मोरौ गांव लूट डारौ है
हत्यारौ जौ काय खौं खुल गऔ ऐई गांव के ग्योंडें

गऔ पैले कौ पटवारी

भैया बडौ जुलम वौ कर गऔ पैले कौ पटवारी
ई कौ रकबा उ खौं लिख गऔ पैले कौ पटवारी

अब जौ आ गऔ नऔ पटवारी पोलें सब खुल रई हैं
परती तक पै कब्जा लिख गऔ पैले कौ पटवारी

ग्राम सभा की सोला एकड सभापति खौं दै गऔ
नासमिटौ जौ कैसी कर गऔ पैले कौ पटवारी

धनुआ ने रिशपत नई दई ती बस एइ कारन सें
उ कौ पट्टौ कैंसल कर गऔ पैले कौ पटवारी

नऔ पटवारी जे कै रऔ तौ सुगम लडे तुम हुइयौ
एइ से ऐसी तैसी कर गऔ पैले कौ पटवारी

गुंडा हो गऔ गांव सभापत

अब तौ सबकी हो गई आफत
गुंडा हो गऔ गांव सभापत

लच्छन उके नोंने नंइयां
पीवौ खावौ उकी आदत

ज्वान मोंडियें रौताने की
अब नें बच हैं एकउ साबत

जित्ती जगा हती सिरकारी
अब फिर रऔ है उखौं नापत

अब बन जै है पैसा बारो
काल फिरत्तो सब से मांगत

लट्ठ बाज वौ हतौ पैल से
सुगम मिली सिरकारी ताकत

संपर्कः महेश कटारे सुगम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कुरवाई, वाया बीना, जिला विदिशा। फ़ोन +919425134462.

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। बधाई!

Sanjeeva Tiwari said...

बधाई !
आरंभ

हरिराम said...

'देखन में छोटो लगे, घाव करे गम्भीर' कहावत सचमुच इनमें प्रकट हुई है।