August 3, 2007

मां

हर मां एक जैसे होती है
भीतर से
और बेटे- बाहर से
इन दिनों 10 साल बाद फिर मां के साथ रह रहा हूं। पिछले महीने आईं थी, तब से उनका जी नहीं किया जाने का. मां का मन कभी कभी गांव की तरफ भागता है वहां के रिश्ते नाते उन्हें बुलाते होंगे, लेकिन दिल बेटे(मुझ)को छोडकर नहीं जा पाता. रात 1-2 बजे खाने पर इंतजार करती हैं और आंखें कमजोर होने के बावजूद आवाज से देख लेतीं हैं कि मैं कितना खा रहा हूं और कितना छोड रहा हूं. जब मां को छोडकर (1997 में) सफर पे निकला था तो सोचा था कि मैं कभी मुड न सकूंगा... अब सोचता हूं हर आदमी क्यों घर छोडते समय पीछे मुडकर देखता है...
सचिन

2 comments:

राजेश पुरक़ैफ said...

सच में भाई, मां के साथ बिताए पल की याद आई।

pashupati said...

maan ke sath bitaye palon ko aur vistar de sakte the... waise sach maan ka adha man hamare sath aur adha ghar main laga rahta hai... shadi se pahle maan ek mahine mere sath rahee... aur is bar to karib 4 mahine... ye pichhle kaiee salon main maan ke sath gujara gaya adhiktam samay hai... ye post padhne ke bad maan ko fir delhi bula lene ko jee kar raha hai... per maan ke yahan aate hi papa akele ho jate hain purnea main... aur fir... khair...