September 15, 2007

विशिष्ट ब्लॉगर इसे न पढें

ये सुरीले लोग कौन हैं


इधर के दिनों में टेलीविजन ने दुनिया को नए गायक देने का बीडा उठाया है. अच्छी बात है. गायन संगीत से जुडा है साथ ही भाव रचना का भी विस्तार है. शब्द भी संगीत की गाडी पर चढकर जल्दी लोक तक पहुंचते हैं. इसलिए यह सीधे जन से जुडा है. इस तरह मेरी तई टेलीविजन एक अच्छा काम कर रहा है. लेकिन मैं पूरी तरह से इसके पक्ष में खडा नहीं हो पाता. संगीत मेरी समझ में नहीं आता यह एक सच है पर कारण नहीं. दरअसल जिस तरह संगीत की बारीकियां पहचानना और अच्छा लगना दो भिन्न स्थितियां हैं, उसी तरह कोई काम अच्छा होना और उसे अच्छी तरह से करना भी दो अलग स्थितियां हैं. क्या टेलीविजन यही कर रहा है? यानी एक अच्छे काम को गलत ढंग से कर रहा है. दूसरी बात जो मुझे ज्यादा कचोटती है वह है इन गायन प्रतियोगिताओं की इडीविजुअलिटी.
मेरी गायन से भेंट "आल्हा" की शक्ल में हुई. रात में दालान पर दरियां बिछ जाती थीं. ढोलक, मंजीरे, थाल और चमटी की आवाजों में गुंथे शब्द कानों में उतरते थे.
चढ़ी पालकी मल्हना रानी, जगनेरी में पहुँची जाये
गओ हरकारा जगनायक पै, जगनिक सो कही सुनाय
मल्हना आई दरवाजे पै जल्दी चलो हमारे साथ
जगनिक आये और द्वार पै मल्हना छाती लियो लगाय
जैसे जैसे महौल में तेजी आती जाती ढुलकिये भी हाथ तेज करते जाते शायद उनके हाथों की रफ्तार पर ही माहौल में गर्माहट आती थी. दोनों में से पता नहीं कौन कर्ता था कौन उत्प्रेरक. बस झूम जाते थे.
बारह बरस लौ कुकूर जीवै और तेरा लै जियै सियार।
बरिस अठारह क्षत्री जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।
तब समझ में नहीं आता था पर लगता था कि बस 18 के बाद सब बेकार. अब कई सतहों पर इसके अर्थ पता चलते हैं. सचमुच वह बेफिक्री अब नहीं. संगीत की बेफिक्री.
यह गायन की सामूहिक परंपरा थी जो गम्मतों और मानस के जरिये मैंने जानी. झारखंड में गायन की सामूहिकता के एक बिल्कुल नए रूप से परिचित हुआ. वहां गायन जीवन व्यवहार का हिस्सा था. गांव में हरिजन टोले से अक्सर ढोलक की आवाज आती थी. तब भी कोई एक आवाज नहीं आती थी. समूह की आवाज आती थी. रांची में भी सामूहिक आवाजें ही सुनीं. मस्त कर देने वाला संगीत. उनकका गायन किसी उत्सव का मोहताज नहीं था. वे गायन के जरिये अपने सुख दुख बांटते थे, एक दूसरे से जुडते थे.
दिक्कतें यहीं हैं. आज टेलीविजन जितने गवैये तैयार कर रहा है उन शो में कहीं सामूहिकता नहीं है, इंडीविजुअलिटी है. क्या विशिष्टता के बिना वर्चस्वशाली-सत्ताधारी नहीं गा-गवा सकते हैं. यह लोक गायन नहीं है. यह तो ताकतवर का गायन है. बिल्कुल सत्ता की तरह. चुने हुए ही विजेता होते हैं यहां, जिन्हे ज्यादा वोट मिलेंगे वे विजेता होंगे और वोट वे ही दे सकेंगे जिनकी मोबाइल की अंटी में पैसा होगा या जिनकी जद में डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट कॉम होगा.
राजेश जोशी सही कहते हैं. सामूहिकता वर्चस्वशाली का गुण नहीं हैं. उत्पीडित का स्वभाव है.

5 comments:

रमेंद्र said...

तुमने एसएमएस किया या नहीं

Udan Tashtari said...

आपने मना कर तो नहीं पढ़ा. क्या करें?? अलाऊ कर दो भाई पढ़ने को, प्लीज.

संजय तिवारी said...

बाजार की मांग है भाई....
वैसे मैं विशिष्ट ब्लागर नहीं हूं.

ALOK PURANIK said...

भईया घणे होशियर तो तुम पहले से ही हो, और कित्ता होशियार होगे। और ये विशिष्ट ब्लागर कौन हैं जी।

Manish said...

अच्छी बात उठाई है आपने...खासकर प्रतियोगिताओं की इडीविजुअलिटी पर। समाज से सीधे जुड़े संगीत को बाजार शासित व्यवस्था में इस रूप में दिखना मुश्किल है। पर उस तरह का संगीत नैसर्गिक है, उसे पनपने के लिए किसी talent hunt की आवश्यकता नहीं।
रही बात sms की तो यहाँ तो गरीबी अपने आप में वोट खींचने का काम करती है। मुझे अच्छी तरह याद है कि इन्हीं 'टेंट में पैसे रखने वालों ने' इंडियन आइडल १ में पंजाब के एक पेंटर को उतना अच्छा ना गाने के बावजूद ५ वें नंबर तक पहुँचाया था ताकि उस की जिंदगी संवर जाए।