October 27, 2007

हम हुए लुधियानवी

एक और शहर. आपने अमावट बनते देखा होगा. परत दर परत. अमरस के घडों निकलता है रस. कई हाथ एक साथ कलछुल निकालते हैं. यज्ञ का सा माहौल होता है. उसी के बीच परत दर परत साथ चलता है चाचियों, दादियों, बुआओं और ताइयों का बतरस. मुहावरों से भरी उनकी भाषा की मिठास धीरे धीरे अमावट में समाती है और बन जाता है तरावटी थक्का.
क्या शहर इसी तरह हममें समा जाते हैं. लुधियाना में एक मेरठ, एक रांची, एक भोपाल, एक गोरखपुर, एक कानपुर और एक कलकत्ता परद दर परद घुल गया है. फिर कहता हूं- कोई फर्क नहीं है किसी शहर में सब कुछ एक जैसा हैं वही लोग वही मिठास और वही कमी......... नहीं कहूंगा

शुभरात्रि

3 comments:

रमेंद्र said...

बनवास खत्म हो गया, ये मत सोचना कि लस्सी सिफॆ पंजाब में ही मिलती है. यहां भी दो नए लस्सी घोटने वाले तैयार हो गए हैं. अब ऐसी लस्सी पिलाएंगे कि एक में तो गिल्ली-डंडे का मजा मिलेगा तो दूसरे में जीवन-दशॆन की झलक दिखेगी.

अनिल रघुराज said...

क्या बात कही सचिन भाई। हर शहर में दूसरा शहर रहता है। दिल्ली, मुंबई में आपको कानपुर मिल जाएगा, बनारस मिल जाएगा, कन्नौज मिल जाएगा। कितने सालों से यह बात मैं महसूस कर रहा था और आपने इतने छोटे में इतने बेहतरीन तरीके से यह बात रख दी।

विकास परिहार said...

सही है मालिक शहरों के नाम भर बदलते हैं।
न तो इंसान बदलते हैं।
न ही ईमान बदलते हैं।
न ये ज़मीन-ओ-आसमान बदलते हैं।