January 5, 2008

निजी पोस्ट जो सार्वजनिक हो गई.... उफ की उठती नहीं ये चाक करके जिगर को

मेरी पिछली पोस्ट पर कई कमेंट आए... कुछ ने इसे स्टंट करार दिया तो कुछ ने फोन करके मुझे दिलासा दी... कुछ लोगों ने मुझे अपने हालात सुनाए तो कुछ इश्क के खता खाए लोगों ने पूरी आधी दुनिया पर बेजा गालियों की बौछार करते हुए उन्हें कठघरे में खडा कर दिया... सबको सुना सबको गुना.. अपनी बात को दिल से कहने पर एक फायदा तो होता है अनचाहे ही सही लोगों के चेहरे पूरे पूरे दिखाई देने लगते हैं.. उनके अंदर का पूरा कालापन सामने आ जाता है ... कमेंट तो काफी कम हैं कई मित्रों ने फोन पर जो जहर उगला है वह यदि पूरा पूरा यहां रख दूं तो कई मर जाएं... .कई वामपंथी चरित्र के वे लोग जिनकी मैं इज्जत भी करता था इस कदर महिला विरोधी है पहली बार पता चला... मुझे ही घिन आ रही है कि उन्हें मैं कभी अपना मित्र कहता था... खैर राजू नीरा ने मुझे चीजों को सार्वजनिक करते हुए उन्हें सार्वभौमिक करने की कला बताई तो अश्विनी पंकज ने चीजों का सिरा पकड कर सही निर्णय लेने की समझदारी से रूबरू कराया... रमेंद्र ने पुराने उदाहरण से हिम्मत दिलाई वहीं मेरे अजीज सत्यप्रकाश चौधरी ने हौसला देने के साथ ही आगे के लिए सबक लेने का जरूरी फलसफा लिया... जितने लोग उतनी समझाइशें.... हैं कितने दीवाने लोग...
इन सभी मित्रों से अलग रंगत की मेरी एक दोस्त जिसे शायद दोस्त से ज्यादा गमगुसार और राजदार कहूं तो ठीक होगा, जिससे मैं कभी मिला नहीं और रोज मिलता हूं.... जिससे मैंने कभी बात नहीं की और हर पल बात करता हूं, ने इस निजी पोस्ट के निजित्व को बचाते हुए मुझे मेल किया उस मेल का मजमून कुछ यूं था-
हमारे एक मित्र हैं चचा साहिर लुधियानवी के भतीजे सचिन। आजकल ये इश्क के मारे हैं। इनकी प्रेमिका है कि इनका फोन ही नहीं उठाती और इक ये हैं कि उसके गम में सारी दुनिया को अपनी प्रेम कहानी बतला दी । लिखते-पढ़ते अच्छा हैं और जब तक प्रेमिका पत्नी बन कर अपना रौद्र रूप ना दिखा दे तब तक कम्यूनिस्ट भी हैं। अपनी नितांत निजी पोस्ट के साथ इन्होंने बेहद खूबसूरत सूर्ख गुलाब का फूल भी लगाया , हम भारतीयों का प्रेम इजहार करने का हजार साल पुराना तरीका ( कम आन यार दैनिक भास्कर के साथ जुड़े होकर भी पुराने आइडिया इट डज नाट वर्क हियर, थोड़े से क्रिएटिव तो हो जाते) शायद अभी जनाब को ये नहीं पता कि प्रेम जब पकने लगता है तो इस गुलाब की पत्तियां झड़ जाती हैं तो सिर्फ कांटे रह जाते हैं। तो सचिन मेरी ये सलाह है- ये किस मकाम पर पहुंचा दिया जमाने ने/ कि अब हयात पे तेरा भी इख्तियार नहीं
मैंने अपनी आदत के अनुसार कुछ जवाब की सी शक्ल का उन्हें भेजा. इसे आप लोगों तक इसलिए पहूंचा रहा कि मैं नहीं चाहता कि मेरी जिंदगी का कोई भी हिस्सा किसी से छुपा रहे.. मेरे जीवन का हर हिस्सा आप जानते हैं कोई न कोई जानता हैं... सच के साथ मैंने जो उन्हें कहा वह यह है......
आलोक धन्वा का नाम सुना होगा और मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आप
क्रांति को भी जानती होंगी.. तो मैडम जी हम ठहरे पुराने आशिक पुराने जमाने के आशिक
लेकिन आपने इश्क किया होता तो जानती कि इश्क कितना भी पुराना क्यों न हो वह होता हर पल नया ही है अनूठा कुछ ज्यादा रेशमी कुछ ज्यादा मुलायम... पर क्या करें कम्बख्त
इश्क हर्फ ए अव्वल तो है ही इब्तिदा भी है और इंतिहा भी ...
मुझ जैसे आवारा मिजाज के पांवों को इसने जितना भी थामा है मैं उतरा ही गहरा उतर रहा हूं डूब रहा हूं यह अलग बात कि जो डूबा सो पार का ही बेइम्तियाज नतीजा है इश्क...
तो मोहतरमा अगली बात आपकी फोन न उठाने को लेकर है ... मैं ही सवाल हूं अपना मैं ही जवाब हूं उसका के अंदाज ये कुछ यूं है कि किसी फूल से आपने बात की है अगर हां तो उसका नंबर मुझे दे दीजिए और इसी क्रम में बादलों, पहाडों, नदियों, झरनों, हवाओं के साथ मुझे घटाओं के कलरव के कलकल के और हो सके तो वादियों के फोन नंबर भी दे दीजिएगा यानी उन सभी चीजों के जो जीवन को जीने लायक बनाती है खूबसूरत बनाती है हर किसी के लिए उम्मीद, आशा, आप्टिमिज्म का मजबूत सहारा बनती हैं... उन सभी शै से मैं बात करना चाहता हूं और खूब बात करना चाहता हूं... जहां तक प्रेमिका के पत्नी बनकर रोद्र रूप धारण करने की बात है और मेरे कम्यूनिज्म पर आफत की फ्रिक आपको है तो जनाबे मगरिब अभी हमारे फाख्तों का इल्म इतना भी सुरूरी नहीं है कि किसी कमअक्ल कत्थई आंखों वाली की नादानियां हमारी दानां फितरत को बदल दें... हां काली आंखों के जादू में कुछ दिनों तो गुम हुआ जा सकता है लेकिन मेरी जान अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे/ और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा/ राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा....
बाकी रही सुर्ख गुलाब को पिछडे जमाने का मानने की बात तो अब
आपकी इस सादा दिली पे तो हम इतना ही कहेंगे कि .... जरा आंख से छूकर जो कह दूं अपने दिल का हाल/ तो गुल ओ आरिज क्या तमाम बदन मुजस्सिम गुलाब हो जाए...... यूं तो कांटों से निबह करना हमें आता ही है किसी वक्त ओ लालाजार में आपकी नम पलकों पे कोई आंसू टिके तो पूछना मेरा पता जानता है कि नहीं.....
उम्मीद है इन लफ्जों को अन्यथा न लेंगी... हम शेख फरीद के शिष्य हैं हमें इश्क के लिए किसी नाजनीन के नखरों की तलब नहीं होती हम तो इस दुनिया से प्रेम करते हैं जो हमारी है हमारी रहेगी इसके नाजो अंदाज को किसी पूरी रात का कालापन डरा नहीं सकता और जीते जी ये बेकैफ जमाना हमें जुदा कर नहीं सकता.....

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