October 2, 2010

मुर्दा-शांति में खलल डालती एक कविता

शांति हर उस दिल के लिए प्रिय होती है, जो समानता, बराबरी, हक और इंसाफपसंद है। लेकिन शांति किस कीमत पर? यह बडा सवाल है। और इस जवाब की जद में मुल्कों, समाजों, धर्मों और इंसानियतों का वह इतिहास आता है, जिसमें ज्यादा जोर से, बडे शोर से पैदा हुई धमक को सच मानने की गफलतें भरी पडी हैं। अयोध्या एक विवाद भर नहीं है। इसे हम हिंदुस्तानी राजनीति की धडकन की तरह भी देखते हैं। उन लोगों के लिए यह एक कविता एक अप्रिय घटना है, जो चाहते हैं कि हिंसक और मासूम चेहरे एक ही जगह चस्पां रहे। अश्विनी पंकज की यह कविता उन्हीं के शब्दों में- "उन लोगों के लिए जो यह मान रहे हैं किन्यायका फैसला ठोस सबूतों से नहींआस्थासे होना चाहिए".

हजारों मुंह से बोला गया झूठ सच होता है
अश्विनी पंकज

हम आदिवासी हैं
इसलिए इस देश पर हमारा कोई हक नहीं है
यह इस सदी में
महीने के आखिरी दिन आया फैसला
तुम्हारी नई उदघोषणा है
यह नई बात नहीं है कि
जब भी किसी सफेद महल से
या किसी गहरे भगवे चोगे के भीतर से
जब शांति की अपील आती है
किसी न किसी समुदाय का
जनसंहार हो चुका होता है
या ऑपरेशन ग्रीन हंट जारी रहता है
बहुसंख्यक आबादी की आस्था का सीधा अर्थ है
संविधान की हत्या
लोकतंत्र का सरेआम अपहरण-आखेट

क्या सिर्फ इसलिए हमारा कत्ल होगा कि
हम बहुत थोड़े हैं
क्या हमारी भाषाओं को सिर्फ इसलिए
शास्त्रीय नहीं माना जाएगा कि
हमारे शब्दकोषों में तुम्हारी तरह
‘मादरचोद’ जैसा कोई शब्द नहीं है
क्या हमारे जाहेर थान और सरना स्थल
इसलिए पवित्र नहीं हैं कि
हम अपनी सर्वोच्च आत्माओं के लिए
किसी समुदाय को लूट-मार कर
महलनुमा ईश्वरालय नहीं बनाते
कि हमारी पुरखा आत्माएं पूंछविहीन हैं
या उन्हें वस्त्र पहनाने के लिए
अपनी औरतों को हम नंगा नहीं करते
तुम्हारे ईश्वरों के भोग-श्रृंगार के लिए
सुंदरता को कुरूप नहीं बनाते

झंडा, राज, सीमाएं सब तुम्हारे हैं
तुम गुवाहाटी में हमें नंगा करो
मार डालो कलिंग नगर में
हमारी आस्था के केन्द्र
नियमगिरी को बूटों से रौंद डालो
या अयोध्या में दे दो शिकस्त
हम आदिवासी
भारत के किसी भी जंगल में
तुम्हारे हनुमानों की अवैध पैदाइशों के
हमेशा गवाह बने रहेंगे

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