July 24, 2007

चे ग्वेवारा का ( फिदेल को संबोधित) क्यूबावासियों के नाम अंतिम पत्र


क्यूबा में सफल क्रांति के बाद और चे ग्वेवारा के क्यूबाई राष्टीय बैंक का अध्यक्ष बनने पर जुलाई 1960 में अमेरिकी न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट में कहा गया था -"अर्नेस्टो चे ग्वेवारा ही कास्ट्रो सरकार का मष्तिष्क है।ग्वेवारा क्यूबाई नहीं बल्कि अर्जेंटीनी है, वह स्वभाव से कोई भावुक लातिन अमेरिकी नहीं है, बल्कि ठंडे दिमाग से सोच विचार करने वाला कम्यूनिस्ट है. यह ग्वेवारा है, फिदेल या राउल कास्ट्रो नहीं जो तेजी से घूमने वाले आज के कालचक्र को नियंत्रित कर रहा है, जबकि क्यूबा में निवेशित विशाल अमेरिकी पूंजी को जब्त किया जा रहा है. ग्वेवारा और उसके कम्यूनिस्ट सहायकों के लिये क्यूबा उनके मिशन की एक घटना मात्र है और वह मिशन है लातिन अमेरिका के अधिकांश हिस्से में कम्यूनिस्ट सत्ता स्थापित करने के लिये क्यूबा को एक अड्डे की तरह विकसित करना ". यह पंक्तियां अमेरिकी साम्राज्यवाद के उस प्रवक्ता ने लिखी हैं, जिन्हे फेलिक्स ग्रीन ने एक किताब में बिल्कुल सही नाम दिया है-दुश्मन. उपरोक्त विलाप का दूसरा पक्ष भी है कि चे में अपने घोर विचारधारात्मक शत्रुओं को प्रभावित करने, उनको अपनी प्रशंसा के लिये बाध्य करने का गुण था. चे का जीवन इस बात का उदाहारण है कि एक व्यक्ति जो विश्व की जनता की मुक्ति के क्रांतिकारी संघर्षों से जूझ रहा हो कैसे जनता के शत्रुओं से भी मान्यता व आदर प्राप्त कर सकता है.यहां हम चे का फिदेल कास्त्रो को लिखा अंतिम पत्र प्रकाशित कर रहे हैं. यह पत्र चे ने फिदेल को 1 अप्रैल 1965 को लिखा था। 1965 की शुरुआत में साम्राज्यवाद के विरुद्ध पूरी दुनिया में चल रहे आंदोलनों की एकजुटता के लिए सघन यात्राएं करने के बाद चे 14 मार्च 1965 को हवाना लौटे और उसके बाद सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिये. तकरीबन एक माह बाद इस बारे में फिदेल ने महज इतना कहा-"वह हमेशा वहीं रहेगा जहां क्रांति के लिए वह सबसे लाभदायक रहेगा.इससे पुष्टि हो गई कि चे क्यूबा में नहीं है। लेकिन कहां है? इस सवाल का जवाब पूंजीवादी अखबार भिन्न भिन्न तरह से दे रहे थे। कुछ का अनुमान था कि वे वियतनाम, ग्वेटेमाला, वेनेजुएला, पेरू, कोलंबिया, ब्राजील या इक्वाडोर में हैं. कुछ ने लिखा कि वे डोमेनिक गणतंत्र के संविधानवादियों के संघर्ष में भाग लेते हुए कत्ल कर दिये गये. अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक ने 9 जुलाई 1965 को लिखा कि चे ने क्यूबा के गुप्त सूत्र एक करोड डालर में बेच दिये और भागकर छिप गये. उरुग्वे के साप्ताहिक 'मोर्चा' ने लिखा कि चे ओरिएंटे प्रांत में लिखने का काम कर रहे हैं और लंदन के इवनिंग पोस्ट ने लिखा कि वे चीन में हैं. 3 अक्तूबर 1965 को फिदेल ने इन भ्रांतियों और दुष्प्रचारों पर रोक लगाते हुए चे के उपरोक्त पत्र को केंद्रीय कमेटी के एक अधिवेशन में रखा और पढा. पत्र इस प्रकार है---
कृषि वर्ष
हवाना,
1 अप्रैल 1965
फिदेल
इस समय मैं कई चीजों को याद कर रहा हूं। जब मैं तुमसे मारिया अंटोनियो (क्यूबाई क्रांतिकारी)के घर पर मिला था। कैसे तुमने "यात्रा" का प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए जोरदार तैयारियां चल रही थीं. एक बार मुझसे पूछा गया था कि यदि मेरी मृत्यु हो जाए तो किसे सूचित किया जाए. मैं इस तथ्य से चकित था कि क्या ऐसा होना संभव है. बाद में मैंने जाना कि यह सच था. क्रांति (यदि वह सचमुच क्रांति है) में या तो जीत मिलती है या मौत. जीत के इस रास्ते में बहुत से साथी शहीद हो चुके थे. आज उन बातों को कम नाटकीय ढंग से प्रकट किया जाता है, क्योंकि हम अधिक परिपक्व हो गये हैं, लेकिन स्थिति वही की वही बनी हुई है. मैं महसूस करता हूं कि मैंने अपने कर्तव्य को आंशिक रूप से पूरा किया है, जिसने मुझे क्यूबा की भूमि पर क्यूबा की क्रांति से बांध रखा था और इसलिए मैं तुमसे, कामरेडों से, तुम्हारे लोगों से, जो अब मेरे अपने हो गये हैं, विदा लेता हूं. पार्टी नेतृत्व के सभी पदों से मैं औपचारिक रूप से इस्तीफा देता हूं, मंत्री पद छोडता हूं, मेजर का पद छोडता हूं और क्यूबा की नागरिकता भी त्याग रहा हूं। आधिकारिक रूप से अब क्यूबा से मेरा कोई संबंध नहीं है, जो संबंध हैं वे अन्य प्रकार के हैं, जिनको पदों की भांति छोडा नहीं जा सकता.
जब मैं अपने बीते हुए जीवन पर नजर डालता हूं तो महसूस करता हूं कि मैंने क्रांति की विजय और उसकी मजबूती के लिये पर्याप्त ईमानदारी व समर्पण की भावना से काम किया। मेरी गंभीर गलती केवल यह थी कि सियेरा मिस्ट्रा के प्रथम दिनों से ही मैं तुम्हारे उपर और अधिक विश्वास नहीं रख सका। और एक नेता व क्रांतिकारी के रूप में तुम्हारे गुणों को भली भांति व शीघ्रता से समझ नहीं पाया.
मैंने बहुत शानदार दिन गुजारे हैं और तुम्हारे साथ रहकर मैंने कैरबियन (मिसाइल) सफर के गौरवपूर्ण व कठिन दिनों में अपनी जनता के साथ होने का गर्व महसूस किया है। एक राजनेता के रूप में तुम्हारे गुण उतने कभी नहीं निखरे थे, जितने कि उस समय। मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने बिना हिचकिचाहट के तुम्हारा अनुसरण किया और सोचने व देखने तथा खतरों व उसूलों का आकलन करने के तुम्हारे ढंग से अपने को एकाकार कियाण
अब मेरी विनम्र सेवाओं की विश्व के दूसरे राष्ट्रों को आवश्यकता है। मैं वह कर सकता हूं जिसको करने से तुम वंचित हो क्योंकि प्रधान के रूप में क्यूबा की जिम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर है और अब विदा होने का समय आ गया है।
मैं यह जता देना चाहता हूं कि मैं हर्ष और विषाद दोनों का अनुभव करते हुए ऐसा कर रहा हूं। एक निर्माता और अपने प्रियजनों के सबसे प्यारे व्यक्ति के रूप में मैं अपने पीछे अति उज्जवल आशाएं छोडे जा रहा हूं। मैं उन लोगों से विदा ले रहा हूं, जिन्होंने अपने पुत्र के रूप में मुझे स्वीकार किया. इससे मेरी भावना आहत हो रही है. मैं युद्ध के नए मोर्चे पर अपने साथ वह आस्था लेकर जा रहा हूं, जिसे तुमने जागृत किया था. मैं अपने लोगों की क्रांतिकारी भावना और सबसे पुनीत कर्तव्य को पूरा करने की भावना लेकर जा रहा हूं, जो यह है :कोई कहीं भी हो उसे साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करना है. यह संकल्प मुझे सुकून देता है और गहरे से गहरे घाव को भर देता है
मैं इस बात को दोहराता हूं कि मैं क्यूबा को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करता हूं सिवाय उसके जो क्यूबा की मिसाल से पैदा होती है। यदि मेरा अंतिम समय किसी अन्य देश के आकाश के तले आता है तो भी मेरा अंतिम विचार इस देश की जनता के लिए और खासकर तुम्हारे बारे में होगा। जो कुछ तुमने मुझे सिखाया है उसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूं. तुम्हारे अपने जीवन के उदाहरण के लिए मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूं और प्रण करता हूं कि अंत समय तक मैं अपने उद्देश्य के प्रति वफादार रहूंगा.
मैं अपनी क्रांति की विदेश नीति से सदैव एकाकार रहा हूं और आज भी हूं। मैं जहां भी रहूंगामैं अपनी क्रांति की विदेश नीति से सदैव एकाकार रहा हूं और आज भी हूं। मैं जहां भी रहूंगा मुझे क्यूबाई क्रांतिकारी होने के नाते अपनी जिम्मेदारियों का बोध रहेगा और उसी प्रकार आचरण करूंगा. मुझे इस बात का अफसोस नहीं है कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के लिए कोई भी भौतिक वस्तु छोडकर नहीं जा रहा हूं. मैं प्रसन्न हूं कि ऐसा हो रहा है. मैं उनके लिए कुछ भी नहीं मांगता. राज्य उनके भरण -पोषण और शिक्षा के लिए पर्याप्त प्रबंध करेगा.
मैं तुमसे और हमारी जनता से और बहुत कुछ कह सकता हूं परंतु मैं समझता हूं कि वह अनावश्यक है। जो मैं तुमसे और हमारी जनता से कहना चाहता हूं उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है और कागज बरबाद करने से कोई फायदा नहीं है।
सदैव विजय की ओर!
स्वदेश या मृत्यु!
क्रांतिकारी जोश के साथ मैं तुम्हारा आलिंगन करता हूं
चे
उन लोगों के लिये जो क्रांतिकारियों के बारे में बात करते हुए उन्हें ह्रदयहीन, भावनाहीन जडवत प्राणी समझते हैं, यह पत्र उदाहरण पेश करता है कि एक क्रांतिकारी के ह्रदय में कितनी शुद्धता और श्रेष्ठता की भावना पाई जाती है। चे ने क्यूबा इसलिये छोडा क्योंकि वे हथियारबंद होकर साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष करना चाहते थे
इसे वे अपना परम कर्तव्य मानते थे इसलिये युद्ध में भाग लेने की उनमें जबरदस्त ख्वाहिश पाई जाती थी। 1956 में चे एक अनजान अर्जेंटीनी डाक्टर थे, जो परिस्थितिवश मैक्सिको आ गया था और फिदेल के नेतृत्व में सक्रिय क्रांतिकारियों से उनकी मुलाकात हो गई थी. 1965 में चे विजयी क्यूबा के एक प्रमुख नेता और क्रांतिकारी सरकार की महत्वपूर्ण हस्ती थे. वही चे अब नये क्रांतिकारी क्रिया कलापों की तलाश में क्यूबा छोडकर अचानक बाहर चले गये थे. बेहतर और सुंदर दुनिया का स्वपन देखने वाला यह यायावर नवंबर 1966 के पहले सप्ताह में छदम नाम से बोलिविया पहुंचा और वहां एक स्थान पर बोलिविया के छापामार आंदोलन का अड्डा स्थापित किया.
बोलिविया की जनता ने चे के नेतृत्व में उभरते छापामार आंदोलन का स्वागत किया। अगस्त 1967 के शुरू में लातिन अमेरिकी एकजुटता संगठन का सम्मेलन हवाना में हुआ। जिसमें पूरे लातिन अमेरिका में चल रहे छापामार आंदोलन का समर्थन किया गया और चे को आनरेरी अध्यक्ष चुना गया. चे ने इस आंदोलन, जिसे ट्रिकांटिनेंटल भी कहा जाता है, को भेजे गए संदेश में कहा था- आइये हम सच्चे सर्वाहारा अंतर्राष्ट्रीयवाद का विकास करें.....
8 अक्तूबर 1967 को 17 छापामारों और बोलिविया की सैन्य टुकडी के बीच घमासान लडाई हुई जिसमें चे गंभीर रूप से घायल हो गये। और बंदी बना लिये गये। चे के पकडने वाले कमांडर पराडो सालमन ने चे को फौरन पहचान लिया उसने संदेश भेजा 500 "कैन्साडो" अर्थात-चे को पकड लिया है.
चे व साथियों को कडी निगरानी में हिग्वेरा भेजा गया। सुबह होते ही बोलिविया सरकार की बडी सैन्य हस्तियां और सीआईए एजेंट हिग्वेरा पहूंचने लगे। एजेंट डाक्टर गोन्जालेज ने चे से पूछा था: " तुम क्या सोच रहे हो?"
चे ने कहा- मैं क्रांति के अमरत्व के बारे में सोच रहा हूं।
संभवतः यह चे के अंतिम शब्द थे।

3 comments:

सचिन said...

मनीष ने कहा : चे ग्वेवारा के बारे में इस जानकारी को देने का शुक्रिया !

Srijan Shilpi said...

महान क्रांतिकारी चे ग्वेवारा की भावनाओं और विचारों को पेश करने के लिए धन्यवाद! जब भी मैं चे के बारे में पढ़ता हूं, मुझे अपने नेताजी सुभाष की याद आने लगती है।

रमेंद्र said...

चे के बाद अब किसकी बारी है