December 3, 2007

अपना चेहरा देखेंगे मेरी नजर से

गुलजार हमारे समय के ही गीतकार हैं। यह एक सच है जिसपर मुझे कभी यकीन नहीं हुआ. परिचय से में परिचित हुआ था छुटपन में अपनी ही जिक्र लगता था. तब सोचता था कि कोई मास्टर इस तरह से भी पढाए. फिर मोगली ने हमारी दोपहरों में रोमांच भरा. गिलहरियों से लेकर कुत्तों तक से बातें करते हुए हम इस किरदार को जीते थे. बचपन के दोस्त थे मनीष भाई, विकास, रजनीश, राघवेंद्र, इंद्राज, कमल................ रविवार को चड्डी पहनकर खिले फूल की खुशबू सूंघते हुए हम शाम में सचिन हुए जाते थे. इस बीच दोपहर में नदी में दो तीन घंटे की तैराकी हमें तरल बनाती थी. असल में इन्ही दिनों मेरी फिलवक्त की घुमक्कडी की शुरुआत पडी. पिताजी छपरी में खाट डाले ऊंघते थे और हम घर से निकल नहीं पाते थे. दोपहर की गर्मी में आम के पेड के नीचे बैठकर किशोरावस्था की शुरुआत करते हुए हम उसी दौरान लापरवाह हुए. शिकायतें तब हमें बुरी लगती थीं. छोटे भाई शिकायतें करते थे- आज ये बीडी पी रहे थे, आज सचिन ने दो लडकियों की चोटी बांध दी. आज किसी के बाग से ककडी चुराई, आज मंदिर में से ठाकुरजी उठा लिए.......... अंतहीन शरारतों की अंतहीन शिकायतें. इस दौर में मेरा बडा भाई मनीष मेरा दोस्त था. अच्छा दोस्त. मां और ताई में हुई लडाई ने कभी हमें एक दूसरे से अलग नहीं किया. मां हर शाम समझाती मुझे कि मनीष के घर मत जाना. यही नसीहत दूसरे सिरे से मनीष को मिलती और रोज सुबह हम दोनों साथ साथ होते थे.
अब शिकायतों नसीहतों को मान लेता हूं। अब मन उतना साफ नहीं रहा. रीजनिंग भी काम नहीं करती. अब इस तरह के मामलों में निर्दोष दोस्तों से बोलचाल बंद हो जाती है. षडयंत्र भी थोडे बहुत कर लेता हूं. बडे षडयंत्र सीख रहा हूं. कभी पता चले कि 50 हजार की सेलरी पा ली है, तो समझिये कि बडा षडयंत्र मैंने सीख लिया. यह सब मैंने मेरठ में सीखा. अपने भीतर का कमीनापन देखता हूं तो उसका 70 फीसदी मेरठ की देन दिखाई देता है. घर से निकलते वक्त तो मैं साफ था. जो गंदगी भरी उसमें 2005 के बाद इजाफा हुआ तब मैं मेरठ आया था. यानी यहीं सीखी जिंदगी को शानदार बनाने की कुंठित कला.
इस एकालाप का सिरा पकडा आपने असल में अब मैं आप लोगों से सीखी गई होशियारियों को एक एक बाहर लाने की अपनी जिद पूरी करना चाहता हूं। मैं जो इस वक्त लुधियाना के आरती चौक पर आप सभी को याद कर रहा हूं यानी विनय भूषण, यशवंत सिंह, अश्विनी पंकज, अविनाश, पुष्पेंद्र पाल सिंह, कमल दीक्षित, चेतन शारदा,हरिवंश जी, गिरीश मिश्र, यशपाल सिंह, सौरभ सुमन, पशुपति शर्मा, संदीप ठाकुर, अनवर मजीद, सुधाकर दास, प्रवीण कुमार, सत्यप्रकाश, फैसल अनुराग, राजेश जोशी, हरिओम राजोरिया, मंगलेश डबराल, विजय बहादुर सिंह, पुष्य मित्र, ...................
मैं शुरू करूंगा कल से इस किस्त को
अब आवाजाही सघन कीजिए और जानिए अपने आसपास पाए जाने वाले चेहरों के असली चेहरे।
अगली किस्त में पढिए- रांची मेरी रांची,- जिसमें रहते हैं कुछ अहबाव, जिन्होंने सीखी है मारकर चाकू आस्तीं में छुपाने की अदा, जिन्हें आता है बुरी बातों पर मुश्कुराना, जिन्होंने होठ सी रखे हैं हर जुल्म ओ ज्यादती के खिलाफ

सचिन श्रीवास्तव
09780418417

1 comments:

chavanni chap said...

शुरु करें...चवन्नी तैयार है.