January 26, 2010

मैं आज से उसको अपना दोस्त मानने से इंकार करता हूं

वह कभी मेरा दोस्त था। साथ कई खूबसूरत शामें गुजारीं। दुनिया की बेहतर शक्ल को ईजाद करने के लिए कसरतें कीं और बराबरी की दुनिया के वे हामी भी लगा। इन दिनों जब वह मुझे अपनी इच्छाओं, सपनों और जरूरी कामों से दूर जाता लग रहा है, अफसोस की शक्ल में दोस्ती की नींव को फिर खोदने में कोई मजबूरी नहीं दिख रही। ऐसे दोस्त जीवन से बाहर हो जाएं यही अच्छा है। एक गलत शख्स से दोस्ती का खामियाजा भुगतने की तकलीफ उस तकलीफ से बडी है, जो एक अच्छा दोस्त खो देने पर हो रही है। तुमसे जो अभी अभी बातचीत की है वह शायद दो पासवर्ड के बीच ही रहेगी, लेकिन उसे करते हुए जो टूटन मैंने महसूस की है वह तुम कभी महसूस नहीं कर सकते, जो स्वार्थी होने की गर्वोक्ति पूरी आवाज में कर रहे हो। याद होंगी वह शामें जिनमें बडी झील को शब्दों में पिरोते हुए हमने दुनियादारी पर कुछ बेहतरीन किस्से बुने थे। मुझे नहीं पता तुम अपनी शक्ल में कब मौजूद रहे। भोपाल में, दिल्ली में, रांची में, पटना में या उन दिनों में जब मैं मेरठ से बेइरादा दिल्ली की सडकों पर आवारगी के लिए तुम्हें टटोलता था।
खैर शुक्रिया कि रहा सहा यकीन भी आज डिगा दिया जो मनुष्य होने के एवज में मुझे मिला था। यकीनन तुम कामयाब होगे। तुम्हारी कामयाबी पर कोई भी यकीन कर लेगा। मेरी शुभकामनाएं। एक जाते हुए दोस्त की शुभकामनाएं लेने का सलीका शायद भूल चुके होगे, इसलिए सिर्फ अलविदा। इन शब्दों के साथ कि


मेरे हिस्से की नमी में थोडा नमक था
मेरे हिस्से के पानी में कुछ किस्से
मेरे हिस्से के जीवन में एक बेशक्ल इरादा था

तुम्हारे हिस्से की जमीन में खून की बूंदे थीं
मेहनतकश आवाम के खून की बूंदें
जिनमें सपने थे दुनिया की बेहतर शक्ल के
किस्से थे खूबसूरत दिनों के
इरादे थे उम्मीद की बाजू पर टंगे हुए

सच की हर सेंधमारी के खिलाफ
तुमने टांग रखे थे अपने हथियार
तुम्हारे हिस्से की जमीन से कहीं ज्यादा थी तुम्हारे कब्जे में जमीन

कब्जे की जमीन का अपना इतिहास था
तुम्हारी जमीन पर दर्ज हुई खून की बूंदों का इतिहास
खून के रंग ओ बू से उठती लकीर के खिलाफ
तुमने लगाई ताकत
ताकत जिस पर रहा हमेशा तुम्हारा कब्जा

ये ताकत जिस दिन हमारे हिस्से में आएगी
हम बुनेंगे
बेहतर दुनिया का दरीचा
इंसानी हक का नया फलसफा
तब तक इंतजार
हमारी नियति है
तुम्हारी नीयत


7 comments:

Udan Tashtari said...

लेबल देखते हुए काश!! ये दोस्तों की शरारत ही हो...

तोड़ देना बहुत सरल होता है, जोड़ना उतना ही कठिन..आशा है फैसले आवेश के बदले शान्त मन से सोच समझ कर ही लोगे.

शुभकामनाएँ.

विक्षुब्ध सागर said...

कविता अच्छी लगी....

अविनाश वाचस्पति said...

विचारों से असहमति
अवश्‍य दर्ज करो
नीयत खराब हो
तो नियति बदल जाती है
सचिन
सही कह रहे हो
पर अविनाश दास के
नाम में ही है सब मौजूद
वो है दास
पर किसका अपने नाम का
दोस्‍तो का नहीं
दोस्‍तो के दास तो हम हैं
हमें फख्र होता है अपने दोस्‍तो
का दास होने पर।

प्रकाश गोविन्द said...

भाई आपका यह एलानिया अंदाज मन को न भाया !
दोस्ती का रिश्ता तमाम अहसासों और विचारों से जुड़ा होता है ! कभी हम अपने दोस्त से सहमत होते हैं कभी असहमत ! मन-मुटाव होना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन अक्सर देखा गया है समय की गति अपने साथ सारे क्लेश समेत लेती है और सम्बन्ध पहले से ज्यादा मजबूत भी बन जाते हैं ! इस तरह आपसी संबंधो की बातें सार्वजनिक करना नितांत गलत है !

Bijen Salam said...

आपने दोस्‍त मानने से इनकार कर दिया. बहुत अच्‍छी बात है. दोस्‍ती मानना और इनकार करना आपके हाथ में है. ये कोई नहीं रोक नहीं सकता. मगर एक बात ये है कि दोस्‍त किसने मानना था. आपने या उन्‍होंने. आपने गौर नहीं किया कि उन्‍होंने भी उतनी ही जगह दी जितना आपने दी है. खैर हर लिया गया निर्णय सही होता है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सच यह है सचिन कि आप मुक्त हो गये

इस आदमी के जो किस्से मैने सुने हैं और जो हरकतें मोहल्ला पे देखी हैं उसके बाद पिछले काफ़ी अरसे से उस ब्लाग पर जाना छोड़ दिया है। यह आदमी महाझूठा, पतित, तिकड़मबाज, लोलुप और चरित्रहीन है जो अपने ब्लाग का उपयोग इन सब के लिये करता है। मुझे पूरा विश्वास है कि उस पर अजीबोगरीब एनानिमस नामों से चलने वाली सारी बहसें वही संचालित करता है। किसी और ब्लाग पर इतने एनानिमस कमेण्ट नहीं देखे।

आशीष झा said...

यह जानकर न दुख हुआ न खुशी कि अविनाश ने एकऔर दोस्त खो दिया। उसे दोस्तों से अधिक दुश्मनों की आज जरूरत है। आज जो लोग उसे जानते हैं, उसके दुश्मनों की वजह से। पत्रकारिता के इस राज ठाकरे को विवादों मे रहने से ही नाम मिला है और वो विवादों मे रहना भी सीख लिया है। सचिन अगर तुम उससे दोस्ती नहीं चाहते तो पहले उसपर लिखना और पढऩा छोड़ दो।