February 1, 2010

इस बेतरतीब समय की तरह कुछ पंक्तियां

अखबारी उलझनों के बीच कुछ और लिखना तकरीबन असंभव होता है। फिर भी एक बदलाव, एक छुट्टी, एक हल्कापन इंतजार में आंख लगाए रहता है। तब कविता की जमीन पर लौटना होता है। यह अखबारी किचकिच से दूर जाने का सुकून भी है, और फिर मोर्चे पर आने के लिए तलाशी गई ऊर्जा का स्रोत भी। कविता से बेहतर यकीन की ऊर्जा कहां मिलेगी।
ताजा कविता आपकी नजर:-





सच से बडी उम्मीद


इतनी
तो बदली दुनिया
इतना तो हुए बेहतर

मारकाट के वीभत्स इतिहास
लूट के शातिरपन
और शोषण के कई तरीकों कर ही दिया बेनकाब

बैलगाडी से हवाईजहाज का सफर यूं तो तय नहीं किया

अब तो कुछ ही दूर है चांद
रहेंगे वहां, चकमक चांदनी के दरीचों पर
कुंलाचे भरते हुए
करेंगे प्रेम
इसी दुनिया से
जिसका चौथाई हिस्सा डूबा है लबालब पानी में

जैसे डूबे हैं हम प्रेम में


पहुंच बढ रही है सुविधाओं तक लोगों की
चमकते शहरों में रह रही है दुनिया की 30 फीसदी आवाम

गांवों में भी पहुंच चुके हैं मोबाइल


कितना अच्छा होता

अगर होती बदलाव की यह बयार
इतनी ही सीधी, सपाट और सम्मोहित करने वाली
अभी अभी आई रपटें दुनिया की
40 फीसदी आवाम के भूखे पेट दिखा रही हैं

गुजरती हुई हवा अहसास दिला रही है अपनी गर्मी का
कोपनहेगन में जुटी भीड को ठेंगा दिखा दिया
शांति के सबसे बडे पुरस्कार से सम्मानित किए गए राष्ट्रपति ने

इतना ही होता तो कर लेते यकीन
कि विरोध की आवाजें हैं
तो बदल ही जाएगा वक्त

लेकिन देखिए तो किस निर्लज्जता से
डिस्को थेक में नाच रहे हैं
लिपे पुते अधनंगे जिस्म
किस शान से गुजर रही हैं भारी भरकम कारें
जबकि बिल्कुल इसी वक्त दो जून की रोटी के लिए
उडीसा से लेकर मोजाम्बिक तक

और ठंड से कंपकपाते साइबेरिया से लेकर पसीने से लथपथ तमिलनाडु तक

पेट और पीठ एक हो गये हैं
जैसे सारी की सारी तीसरी दुनिया

अब इसे यकीन कहें या भोलापन

बदलाव की हल्की आहट से चीख पडते हैं हम
खुशी से भर उठते हैं
चेहरे
कि उम्मीद बाकी है
कि और बेहतर होगी दुनिया
बस जो चुप बैठे हैं उनकी आवाज का इंतजार है!!!!

1 comments:

हिमानी said...

really ossam sir ..काफी दिनों बाद आज आपके ब्लॉग पर क्लिक हुआ और शब्दों के सागर से कुछ बेहतरीन मोती यहां जमा मिले...