June 14, 2012

संघर्षरत जनता का वैश्विक प्रतिनिधि

8 अक्तूबर 1967 को 17 छापामारों और बोलिविया की सैन्य टुकड़ी के बीच घमासान लड़ाई हुई। चे गंभीर रूप से घायल हो गए। बंदी बना लिए गए। कमांडर पराडो सालमन ने चे को फौरन पहचाना, उसने संदेश भेजा ‘500 कैन्साडो’ अर्थात- चे को पकड़ लिया है। उन्हें कड़ी निगरानी में हिग्वेरा भेजा गया। सुबह होते ही बोलिविया की बड़ी सैन्य हस्तियां और सीआईए एजेंट वहां पहुंचे। एजेंट डॉक्टर गोन्जालेज ने चे से पूछा-‘तुम क्या सोच रहे हो?’ चे ने कहा, ‘मैं क्रांति के अमरत्व के बारे में सोच रहा हूं।’ यह चे के अंतिम शब्द थे। 14 जून 1928 को जन्मे चे की 84वीं वर्षगांठ पर विशेष प्रस्तुति

-सचिन श्रीवास्तव
क्यूबा आज एक मिसाल है। वहां क्रांति का जो रास्ता अख्तियार किया गया वह दुनिया के दूसरे मुल्कों के लिए सही है या गलत? भौगोलिक रूप से बड़े देशों में क्रांति की अवधारणा क्यूबा जैसे छोटे देश से मिसाल नहीं पा सकती? और आज क्यूबा की क्रांति जिन परिस्थितियों में घटित हुई, उन्हें पूरी दुनिया आधी सदी पीछे छोड़ आई है? यह सारे सवाल अपनी जगह सही हो सकते हैं, और यह भी सच्चाई का एक पहलू हो सकता है कि हिंसा रहित क्रांतियां भी अपने आप में अनूठी मिसाल हैं। लेकिन आज जिस शख्स के बारे में हम बात कर रहे हैं, वह ऐसे सवालों से अपने पूरे जीवन जूझता रहा और लगातार इनका जवाब भी देता रहा। उसने हिंसा का रास्ता चुना था। हम बात कर रहे हैं, अर्नेस्टो चे ग्वेवारा लिंच की।
अनेस्टो चे ग्वेवारा लिंच। पूरा नाम ही अपने आप में वह मिसाल है, जो उसे वैश्विक ही नहीं इंसानी पहचान देती है। अर्नेस्टो मूल नाम है, यह उसके दादा के सम्मान में रखा गया था। डॉन अर्नेस्टो यानी चे के पिता ने। चे नाम क्यूबाई क्रांति के दौरान मिला, जिसका अर्थ होता है, प्रिय। हालांकि क्यूबाई जनता ‘चे’ का इस्तेमाल हर प्रिय अहसास के लिए करती है। ग्वेवारा टाइटल चे को उनके पिता की ओर से मिला, और इस परिवार में मां के उपनाम को भी नाम के साथ जोड़ने का चलन है। चे के नाना लिंच समुदाय के थे। इस तरह पूरा नाम बना अर्नेस्टो चे ग्वेवारा लिंच।
ऐसे व्यक्ति के दिल में अपनी जनता के प्रति जीवंत अहसास और उसकी मुक्ति की
सफल कामना होना कोई बड़ी बात नहीं। चे के दिल में यह शुरुआत से ही थी। हालांकि चे ने खुद अपनी पूर्व प्रेमिका को लिखे एक खत में स्वीकार किया है कि वह शुरुआत में एक जोखिम उठाने वाला व्यक्तिवादी ही था। फिदेल ने चे को बदला। उसे वह महान उद्देश्य दिया, जिसने अर्नेस्टो को चे में बदल दिया। चे का पूरा जीवन रहस्यमयी रहा और उसके बारे में कई किस्म की अफवाहें लगातार उड़ती और उड़ाई जाती रहीं। खासकर अमेरिकी पूंजीवाद के पिछलग्गूयों द्वारा।
चे के विरोधी भी आज मानते हैं कि वह सर्वाहारा का सच्चा प्रतिनिधि था। क्यूबाई क्रांति के बाद चे वहां की राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष बने। जुलाई 1960 में अमेरिकी न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट में कहा गया था, ‘अर्नेस्टो चे ग्वेवारा ही कास्त्रो सरकार का मष्तिष्क है। ग्वेवारा क्यूबाई नहीं, बल्कि अर्जेंटीनी है। वह स्वभाव से कोई भावुक लातिन अमेरिकी नहीं है, बल्कि ठंडे दिमाग से सोच-विचार करने वाला कम्यूनिस्ट है। यह ग्वेवारा है, फिदेल या राउल कास्त्रो नहीं, जो तेजी से घूमने वाले आज के कालचक्र को नियंत्रित कर रहा है, जबकि क्यूबा में निवेशित विशाल अमेरिकी पूंजी को जब्त किया जा रहा है। ग्वेवारा और उसके कम्यूनिस्ट सहायकों के लिए क्यूबा उनके मिशन की एक घटना मात्र है। और वह मिशन है लातिन अमेरिका के अधिकांश हिस्से में कम्यूनिस्ट सत्ता स्थापित करने के लिए क्यूबा को एक अड्डे की तरह विकसित करना।’ यह पंक्तियां अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रवक्ता ने लिखी हैं, जिन्हे फेलिक्स ग्रीन ने नाम दिया है- दुश्मन। इस विलाप का दूसरा पक्ष भी है कि चे में अपने घोर विचारधारात्मक शत्रुओं को प्रभावित करने, उनको अपनी प्रशंसा के लिए बाध्य करने का गुण था। चे के बारे में यह लगातार कहा जाता रहा कि वह भावुक नहीं है। चे ने यह बात कई बार कहकर नहीं करके झुठलाई। वह अपने मित्रों, परिचितों, परिवार और खासकर बच्चों के प्रति गहरी संवेदना रखता था। 1960 में चे अपने अर्जेंटीनी दोस्त अल्बर्टो, जिनके साथ चे पूरे लेटिन अमेरिका की मोटरसाइकिल से यात्रा की थी, से कहा था, ‘मैं यहां आराम से बैठा हूं और मेरे दोस्त बोलीविया समेत दूसरी जगहों पर मेरे गुरिल्ला प्रयोगों को भोंड़े ढंग से लागू करते हुए मर रहे हैं’। जाहिर है चे गुरिल्ला युद्ध की योजना को कम से कम हिंसा के रूप में देखते थे।
यहां हम चे का फिदेल कास्त्रो को लिखा अंतिम पत्र प्रकाशित कर रहे हैं। इस पत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानना दिलचस्प होगा, क्योंकि पूरी दुनिया में हालात तकरीबन 50 साल पहले जैसे ही हैं। यह पत्र चे ने फिदेल को 1 अप्रैल 1965 को लिखा था। 1965 की शुरुआत में पूरी दुनिया में चल रहे आंदोलनों की एकजुटता के लिए सघन यात्राएं करने के बाद चे 14 मार्च 1965 को हवाना लौटे। उसके बाद सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए। तकरीबन एक माह बाद फिदेल ने महज इतना कहा, ‘वह हमेशा वहीं रहेगा, जहां क्रांति के लिए वह सबसे लाभदायक रहेगा। इससे पुष्टि हो गई कि चे क्यूबा में नहीं हैं। अखबारों का अनुमान था कि वे वियतनाम, ग्वेटेमाला, वेनेजुएला, पेरू, कोलंबिया, ब्राजील या इक्वाडोर में हैं। कुछ ने लिखा कि वे डोमेनिक गणतंत्र के संविधानवादियों के संघर्ष में भाग लेते हुए कत्ल कर दिए गए। अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूजवीक’ ने 9 जुलाई 1965 को लिखा कि चे ने क्यूबा के गुप्त सूत्र एक करोड़ डॉलर में बेच दिए हैं और भागकर छिप गया है। उरुग्वे के साप्ताहिक ‘मोर्चा’ ने लिखा कि चे ओरिएंटे प्रांत में लिखने का काम कर रहे हैं और लंदन के ‘इवनिंग पोस्ट’ ने लिखा कि वे चीन में हैं। 3 अक्तूबर 1965 को फिदेल ने भ्रांतियों और दुष्प्रचारों पर रोक लगाते हुए चे के उपरोक्त पत्र को केंद्रीय कमेटी के एक अधिवेशन में रखा और पढ़ा।
जो चे समेत सभी क्रांतिकारियों को ह्रदयहीन, भावनाहीन जड़वत प्राणी समझते हैं, यह पत्र उदाहरण है कि एक क्रांतिकारी के ह्रदय में कितनी शुद्धता और श्रेष्ठता पाई जाती है।  यह पत्र उन कारणों को भी सामने लाता है, जो आरामतलब जिंदगी के बजाये चे को संघर्ष की प्रेरणा देते थे। ’’

( 10 जून को जनवाणी के रविवारीय साप्ताहिक रविवाणी में प्रकाशित)

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