March 28, 2017

गरीबी के खिलाफ कितनी कारगर यूबीआई योजना?

सचिन श्रीवास्तव
इस साल की शुरुआत से सार्वभौमिक मूल आय योजना यानी यूनिवर्सिल बेसिक इनकम (यूबीआई) का मसला बहस में है। अब अगर सब कुछ ठीक रहा तो जम्मू-कश्मीर यूबीआई लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन जाएगा। जम्मू-कश्मीर सरकार की कवायद के बाद एक फिर सार्वभौमिक मूल आय योजना पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस साल बजट के पहले आर्थिक समीक्षा में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने सार्वभौमिक मूल आय को विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के विकल्प के रूप में सुझाया था, जिससे गरीबी कम हो सकती है।

क्या है सार्वभौमिक मूल आय योजना?

देश के हर नागरिक को बिना किसी शर्त के एक निश्चित रकम देने की योजना। चाहे वह किसी भी आय समूह का हो। इसकी मूल धारणा यह है कि सरकार देश के हर नागरिक को एक न्यूनतम आय सुनिश्चित करे यानी उसके खाते में एक निश्चित न्यूनतम आय डाल दी जाए। कहा जा रहा है कि इससे गरीबी काफी कम हो जाएगी।

जम्मू-कश्मीर की योजना
जम्मू-कश्मीर के वित्त मंत्री हसीब दराबू ने हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष राज्य की यूबीआई योजना का खाका रखा है। केंद्र की स्वीकृति के बाद राज्य में यह
योजना लागू हो जाएगी।
04 से 05 हजार करोड़ रुपए मिलते हैं अभी जम्मू-कश्मीर को केंद्र सरकार से विभिन्न योजनाओं जैसे मनरेगा, छात्रवृत्ति, मिड-डे मील आदि के लिए
05 हजार करोड़ रुपए अपनी ओर से यूबीआई योजना में देगी जम्मू-कश्मीर सरकार
5000 रुपए हर महीने राज्य की 20 लाख गरीब आबादी को देने पर खर्च आएगा 1 हजार करोड़ प्रति माह
1.5 लाख रुपए सालाना आय वाले परिवारों को यूबीआई का लाभ न देने का भी है प्रस्ताव

बेहतर विचार, लेकिन चर्चा की दरकार
आर्थिक समीक्षा में सरकार ने कहा कि यूबीआई एक बेहतर विचार है, और अगर इसे लागू नहीं किया जा सकता तो भी कम से कम इस पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। असल में यूबीआई को लेकर बड़ी चिंता यह है कि यह सिर्फ एक और सरकारी योजना न बने, बल्कि सभी तक इसका लाभ पहुंचे।

कितना होगा खर्च
100 रुपये
नकद हर नागरिक को दिए जाएंगे तो एक सौ पच्चीस करोड़ की आबादी पर यह राशि सालाना डेढ़ लाख करोड़ रुपये होगी।
05 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है फिलहाल सरकार अपनी विभिन्न राहत योजनाओं पर सालाना
300 रुपए से कुछ अधिक हो सकती है मौजूदा राहत खर्च के आधार पर यूबीआई की राशि
4 से 5 प्रतिशत जीडीपी लागत के बदले 0.5 प्रतिशत गरीबी घटाई जा सकती है यूबीआई से, सरकार के मुताबिक।
25 प्रतिशत उच्च इनकम वाले लोग शामिल नहीं होंगे इस योजना में
3 प्रतिशत है जीडीपी की, फिलहाल मध्य वर्ग की सब्सिडी खाद्य, पेट्रोलियम और उर्वरक पर

गरीबों की मदद का प्रभावी तरीका: सरकार
केंद्र और राज्य की योजनाओं और उनके आवंटन के आधार पर सरकार का कहना है कि जितना पैसा सब्सिडी और योजनाओं में खर्च किया जाता है, वह सीधे नागरिकों तक पहुंचे तो बेहतर हालात बन सकते हैं। आर्थिक समीक्षा में सरकार ने कहा कि उन जिलों में इसकी जरूरत ज्यादा हैं, जहां राज्य की क्षमता सबसे कम है। इसे गरीबों की मदद का प्रभावी तरीका बताया गया।

3 स्तंभ जेएएम पर टिकी होगी योजना
केंद्र सरकार की यूबीआई योजना जेएएम यानी जनधन, आधार और मोबाइल तीन स्तंभ पर टिकी होगी। इसे लागू करने के लिए जेएएम (जनधन, आधार और मोबाइल) व्यवस्था से सुनिश्चित होगा कि लाभ सीधे खाते में पहुंचे। साथ ही केंद्र और राज्य के बीच इसकी लागत की हिस्सेदारी पर भी बात सफलता टिकी होगी।

कल्याणकारी योजनाएं हो जाएंगी बंद
फरवरी के आखिरी सप्ताह में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा था कि सार्वभौमिक मूल आय योजना को मौजूदा कल्याण योजनाएं वापस लेने के बाद ही लाया जा सकता है। असल में यूबीआई की लागत इतनी भारी-भरकम है कि इसे मौजूदा कार्यक्रमों के साथ नहीं लाया जा सकता। सरकार इसका बोझ भी नहीं उठा पाएगी।

यूरोप से आया है यह विचार
सबसे पहले यूबीआई की चर्चा यूरोपीय देशों में हुई। फिनलैंड ने इसे सीमित स्तर पर लागू किया है। हालांकि फिनलैण्ड में शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात पर सरकार भारी खर्च करती है और यह सेवाएं लगभग मुफ्त हैं। वैसे भी स्कैन्डेनिवियाई देशों जैसे नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड आदि में दुनिया के सबसे ज्यादा 'कल्याणकारी राज्यÓ हैं।

बेरोजगारी के कारण मिला इस धारणा को बल
बीते सालों में दुनियाभर में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी है। ऐसे में बेरोजगारी भत्ता कई देशों में आम बात हो गई है। अब इसे आगे बढ़ाते हुए सरकार देश के सभी नागरिकों को न्यूनतम राशि देने के विकल्प पर बात कर रही है। स्वभावत: यह राशि न्यूनतम वेतन और बेरोजगारी भत्ते से कम होगी।

महंगाई से होगी योजना प्रभावित
आलोचकों का कहना है कि इस योजना से गरीबी घटने के बजाय बढ़ेगी। फिलहाल कल्याणकारी मदों में कटौती का पता चला जाता है, लेकिन नकदी हस्तांतरण में कटौती अप्रत्यक्ष होगी। जाहिर है यह राशि लंबे समय तक समान ही रहेगी। ऐसे में नकदी वही बनी रहेगी पर असल में महंगाई बढऩे के कारण वह कम होती जाएगी। जो नकदी पहले 50 किलो गेहूं खरीदती थी, वह 25 या 10 किलो की खरीदारी ही कर पाएगी। मनरेगा इसका उदाहरण है। दस साल बाद भी इस मद में आवंटित राशि वही है। इसका मतलब यह है कि वह आधी से कम हो चुकी है।

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