May 24, 2007

निरुत्तर

संजय कुमार शर्मा
सर्द शाम । उस पर भी मेरठ-दिल्ली नेशनल हाइवे पर खडे होकर बस का इन्तजार करना बड़ा दुरूह था मेरे लिए । एक बड़ा सा वहां पास से गुज़रता तो उड़ती हवा तन बदन को झकझोर जाती ।
अँधेरा घाना होता गया । जैसे जैसे अँधेरा बड़ा मेरी व्याकुलता भी बदती गई । गाजियाबाद सिंहानी चुंगी पर खडे होकर पहले मैं बस को हाथ देता और बाद मैं गलियां । मेरी उम्मीद और जरूरत के मुताबिक बस रुकती नहीं और मैं फफक पड़ता हूँ । हरामी ......साले....आम आदमी की कोई परवाह नहीं । कोई डिसिपिलन नहीं रह देश मैं । तभी एक बस रुकी । उसने इत्तमीनान से मुझे बैठाया और चल दिया ।
थकी हुई बस । रुकती तो चलने का नाम ना लेती और चलती तो मानो रेंग रही हो । मैं अब भी व्याकुल था बिफ़र रहा था...हरामजादे हर जगह रोक देते हैं....कोई नियम कानून नहीं । बस को रेंगता देख ना रहा गया तो मैं भिड़ गया कंडक्टर से । जब बस मैं जगह नहीं है तो जगह जगह क्यों रोक देते हो ....हमें घर भी जाना है । कोई ध..र...म....शा....ला... ।
मेरी बात बीच मैं ही काटते हुए कंडक्टर बोला 'भाईसाहब दस मिनिट पहले बस ना रोकता तो आप कहॉ होते । सोचो कि आप नीचे खडे हैं और ........ ।
मैं निरुत्तर था ।