October 20, 2008

वो चांद को नहला रहा था जिसमें नदी डूब गई

पांच दिन हो गए. आप भी सोचते होंगे ये कहां चला गया. इन पांच दिनों में मैं उसी के साथ रहा. सोचता हूं आपको उसका नाम बता दूं, लेकिन उसमें खतरा है. उसके नाम के साथ कई दूसरी चीजें भी चली आती हैं जैसी उसकी एक खास पहचान उसके नाम से उसके शहर का भी पता चलता है जो आपकी आंख में कुछ दोष ला सकता है. मेरी आंख में आ चुका है. फिलवक्त उसके नाम को छुपाते हुए हम उसी की बात करते हैं.
बताता चलूं कि बीते दिनों उसी के साथ था और उसके साथ होते हुए आप कुछ और करने के बारे में सोच भले लें, कर नहीं सकते. दोस्ती का फितरती उसूल ऐसा ही होता होगा. वह खींचता है अपनी तरफ और फिर जब आप उसकी जद में आ जाते हैं तो खाली छोड देता है. इस तरह आप किसी काम के नहीं रह पाते. यानी वह संक्रमण है. खैर. मैं उसके साथ था. हम दोनों एक नदी पर बने डेम की तलछट की ओर जा रहे थे. बीच में एक कस्बा जो सैनिकों के बूटों से मुस्तैद रहता है पडा. हम वहां रुक गए. ये रुकना उसी की बदौलत था. उसने बताया कि वह यहां काफी समय पहले आया था. यह काफी समय मेरी तई. दो तीन साल का था, लेकिन बाद में उसकी बातों से पता चला कि वह तकरीबन दस साल बाद इस कस्बे में लौटा था. उसने कई चीजों को छूकर देखा. पता नहीं वह उनकी गर्माहट महसूस कर रहा था या फिर अपने लौटने का आश्वासन दे रहा था. जिन पेडों, पत्थरों और दीवारों को उसने छुआ उस वक्त वह खुश भी था और उदास भी. खुशी उसकी आंखों से पानी बनकर पिघल रही थी और उदासी का पूरा वृत उसकी आंख के भीतर बन रहा था. मैं ज्यादा देर तक उसकी आंखों में नहीं देख पाया. उनमें अजीब किस्म की रंगत थी. थोडी हरी और थोडी लाल. यानी दुख और खुशी की एक सी रंगत.
हम जब नदी के किनारे पहुंचे तब तक सूरज बुझ चुका था और चांदनी का चकमक बागीचा वहां बिछा हुआ था उसने अपने प्रिय कवि के चांद के बारे में सबसे दिलचस्प बयान को दोहराया और सफेद हो रही रात में खुद को छोड दिया. पहले वह नदी के किनारे बैठा बहुत देर तक उसने अपने दोनों पैर नदी में डुबाए रखे. इस तरह वह अपनी धूल साफ कर रहा था या नदी से उसकी तरावट ले रहा था पता नहीं चल पाया लेकिन उस वक्त वह दूसरे किस्म का इंसान था. फिर धीरे से वह नदी में उतर गया. कमर तक पानी में जाने के बाद उसने जो किया वह हैरतअंगेज था और चमत्कृत कर देने वाला था. चूंकि उस घटना का एकमात्र गवाह मैं ही हूं और चाहकर भी उसका कोई और सबूत नहीं दे सकता, लेकिन आप जानते हैं कि अब तक मैंने जो कुछ भी आपको बताया वह एकदम सच्ची बात है. यूं भी झूठ बोलने का कोई खास फायदा नहीं जबकि यह पता है कि उसे आप दो सेंकेंड से भी कम वफ्फे में ताड सकते हैं. तो यकीन कीजिए जो मैं बता रहा हूं वह एक दम सच्ची बात है. हुआ यूं कि उसने नदी में खडे होकर रात की उस सन्नाट चांदनी में अपना हाथ बढाया कुछ उसका हाथ ऊपर आसमान की ओर बढ रहा था और कुछ चांद धीरे धीरे नीचे की ओर उतर रहा था. फिर ऐसा हुआ कि पूरा का पूरा चांद उसके हाथ में आ गया उसने अपना हाथ नीचे किया और उसे नदी में डुबो दिया. थोडी देर के लिए पूरी नदी चांदनी में नहा गई. पहले मैं समझा था कि उसने चांद को नहलाने के लिए ऐसा किया है लेकिन हुआ एकदम उलटा और नदी चांद की सफेद रोशनी में नहाने लगी. इस तरह नदी के भीतर एक झक उजाला पसर गया जिसमें कई सारे चांद ठंडे होकर पडे थे. इस पूरे काम के दौरान उसने आंख बंद कर रखी थी और चांद को नदी में उतारने के बाद उसने आंखें खोल ली. फिर कहने लगा- देखो ये जो चांद है न दिन भर यहां से वहां टहलता रहता है, जानते ही हो इन दिनों कैसी कैसी हवाएं चल रही है चारों तरफ. इन हवाओं की सारी गंदगी नदी में जाती है सो सोचा चांद के साफ मौसम की हवा नदी में मिलाकर इसे साफ कर दिया जाए.
मैं हतप्रभ था और औचक नजरों से उसकी तरफ ताक रहा था मैं अपनी आंखें कई बार झपकाईं साथ ही कई बार गाल पर चांटे भी लगाए लेकिन यह सपना नहीं था जो टूटता फिर उसी ने खुद को बाहर निकाला. चांद को वापस पूरब के आसमान में टांक दिया और सधे कदमों से चलता हुआ मेरे करीब आया. उसने जो कहा वह पूरी तरह मुझे याद नहीं लेकिन उसके कहने का मतलब यही था- तुम्हारी दुनिया में भले ही मैं एक हारा हुआ जुआरी माना जाउं, यहां मैं हार जीत से ऊपर एक इंसान की तरह बरताव करने की स्वतंत्रता रखता हूं.

8 comments:

sumansourabh said...

सुंदर

Pratyaksha said...

एक बार फिर ..बढ़िया

अपना अपना आसमां said...

सचिन बेहद कलात्मक रचना... खुशी है कि इतनी गहरी कल्पनाओं के साथ जीते हैं।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

क्या वह सच है ..या महज तुम्हारी एक कल्पना ..यदि चाँद को यूँ दिल में बसा कर हम यूँ चांदनी में ढाल सकते तो..यह जहाँ दूसरा ही होता ...पर यदि यह सच है तो तुम किस्मत वाले हो जो ऐसे इंसान के साथ हो...

Udan Tashtari said...

वाह मेरे भाइ वाह!! कितना गहरे उतर के लिखते हो कि पढ़्ने वाला न संभले तो लेख कब का खत्म हो जाये और वो डूबा ही रह जाये.

बहुत जबरदस्त!! बने रहो-पढ़ाते रहो.

शायदा said...

क्‍या बात है भई....मामला भी बता दो क्‍या है

neelima sukhija arora said...

shaydaa di ne pakad liya hai sachin ab bataa hi do maamla kya hai

bhoothnath said...

jab ham yah soche ki chaand nadi me dubaa jaaye......aur agle pal hi yah pata lage ki are.....e....e....e....

ye kya........!!....nadi hi chaand men dub gayee......!!
nahin bhai aap haare hue juaari katai nahin ho !!