October 15, 2008

कागज पर लिख्खा एक नाम

पिछली पोस्ट ने कुछ गफलत फैला दी. मैंने जिक्र किया ही था कि ये जो हिस्सा है वह उस लडके की डायरी का अंश है जो हाल ही में मुझे मिली है. हालांकि आपकी टिप्पणियां मैंने जस की तस उस तक पहुंचा दी हैं. जिन्हें सुनकर वह पहले डरा फिर उसने धीमी आवाज में शुक्रिया कहा. मैं नहीं जानता वह खुश था या उदास या फिर अपने लिखे को सार्वजनिक किए जाने के असमंजस में सोच की तीलियों को जला रहा था. उसके साथ कल ही काफी देर बैठने का मौका मिला और पता चला कि वह देश और दुनिया के बारे में एक मुख्तलिफ राय रखता है. वह चाहता है सारी सरहदों को मिटा दिया जाए या फिर इन्हें सिकोडकर इतनी छोटी कर दिया जाए कि उनमें महज एक ही आदमी रह सके यानी हर आदमी का एक देश हो जाए. जहां वह शासक भी हो, शासित भी हो और शोषक व शोषित भी. वह चीजों को गड्डमड्ड कर देने पर आमादा है और चाहता है कि एक ही हिस्से में पूरा जीवन देख लिया जाना चाहिए.

उसकी डायरी में एक के ऊपर लिखे दूसरे शब्द के बारे में उसका कहना है कि यह एक कला है जिसे वह पूरी नहीं सीख पाया. होता यह है कि अपने किसी प्रिय, अजीज का नाम आप कागज पर लिखें और फिर दूसरे उसी की तरह अजीज का नाम उसके ऊपर लिख दें तो इस तरह वे दोनों एक साथ हो जाते हैं. फिर जितने प्रिय हैं उनके नाम एक के ऊपर एक लिखते रहें. इस तरह जरा सी जगह में वे सब आ जाते हैं जिन्हें आप चाहते हैं. कुछ देर उन्हें गौर से देखेंगे तो सब के सब हरे रंग के हो जाएंगे और एक एक कर वे नाम ऊपर नीचे होने लगेंगे. साथ ही उन सब में का जो समुच्यय होगा वह अपनी तरह से एक नाम दिखाएगा. जो उन सभी के बीच आपको सबसे ज्यादा प्रिय होगा. मुझे लगा यह कोई खेल है लेकिन उसने मुझे डांटने के से अंदाज में कहा कि इसके लिए हमें पूरी साफगोई बरतनी पडती है कि सिर्फ वे ही नाम लिखें जिन्हें हम सचमुच प्यार करते हैं. उन्हीं दोस्तों, प्रेमी, प्रेमिकाओं, पडोसियों... यहां तक कि घरवालों के नाम लिखते हुए भी अगर कहीं भी जरा सा कोना खिलाफ का है तो वह नाम ड्राप कर दें.

वह बताता है कि शुरुआत में वह बहुत बहुत नामों को लिख देता था इस कला में. लेकिन बाद में उसे अहसास हुआ कि इस तरह वह उन लोगों को सता रहा है जिन्हें असल में वह प्यार ही नहीं करता और फिर उसने नाम लिखे तो दो और तीन से ऊपर नहीं जा सका.

मैं तो अब तक एक नाम लिखे बैठा हूं... आपने कितने लिख पाएंगे जरा कोशिश कीजिए दोस्त?

फिलवक्त अलविदा....

12 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक .है यह

Pratyaksha said...

दिलचस्प विचार ! अच्छा लिखा है ..

Udan Tashtari said...

वाकई, अगर सच्चे हृदय से यह मश्क्कत की जाये कि एक भी कोना जिसके खिलाफ नहीं है तो एक नाम लिख पाना भी उपलब्धि ही है..कितने गरीब है प्रेम में हम!!

बहुत खूब विचार लाये हैं.

Raju Neera said...

तो भई ले ही आये, पर जो भी इसे अच्‍छा कहे, उससे जरूर पूछो कि इसके लिये उसने किया क्‍या और नहीं किया तो किसका इंतजार है उसे।

seema gupta said...

'very interesting to read and know about this strange act of him..'

regard

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

achchha laga apk ilak me akar. sabse jyada achchha ye jan k lga ki abhi duniya me awara tabiyat k log baki hain.

neelima sukhija arora said...

वाकई तुम तो बहुत लकी हो यार तुम्हारे पास कम से कम एक नाम तो है, हमारे पास तो एक नाम भी नहीं है।

UDAI said...

वाकई ऐसे लोग महापुरुष होते हैं
सचिन भाई आप लकी हैं जो उनके
साथ कुछ वक्त भी बिता लिया
आगे की कडी जरूर लिखाना

rahul.ranjan said...

Adbhut..... wakai bahut rochak hai.....

BrijmohanShrivastava said...

प्रिय सचिन बहुत सशक्त रचना /बधाई

दीपक गौतम said...

maja aa gaya sir mujhe us ladke se milne ki iccha ho rahi hai

BrijmohanShrivastava said...

दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं /दीवाली आपको मंगलमय हो /सुख समृद्धि की बृद्धि हो /आपके साहित्य सृजन को देश -विदेश के साहित्यकारों द्वारा सराहा जावे /आप साहित्य सृजन की तपश्चर्या कर सरस्वत्याराधन करते रहें /आपकी रचनाएं जन मानस के अन्तकरण को झंकृत करती रहे और उनके अंतर्मन में स्थान बनाती रहें /आपकी काव्य संरचना बहुजन हिताय ,बहुजन सुखाय हो ,लोक कल्याण व राष्ट्रहित में हो यही प्रार्थना में ईश्वर से करता हूँ ""पढने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ ""