May 8, 2010

दौडते समय की, हांफ के बीच, एक बेचैन बयान

एक बेचैन दिमाग, साफ दिल और हक की बात बोलती जुबान इस समय क्या कर रही होगी? ठीक इस समय जब आप इन पंक्तियों को पढ रहे हैं. क्या कर रही होगी वह आंख जो दुश्मन की शक्ल भी पहचानती है और दुकानदारियों से परे जिसके लिए मुनाफे का मुहावरा सिर्फ सिक्कों की खनक नहीं है, वह आंख यकीनन कविता नहीं लिख रही होगी। पिछली पोस्ट में मैंने कविता कीउबकाई के बारे में जिक्र किया था और कविता पढना चाहता था। वह कविता जो तसल्ली दे, जो झिंझोडे अपनी काहिली पर। अश्विनी पंकज ने अभी अभी यह चंद पंक्तियां भेजी इस बयान के साथ कि- "अभी-अभी लिखी अपनी कुछ पंक्तियां भेज रहा हूं. पढ़ो और मेरे कवि होने की सारी संभावनाओं को एक क्षण में खारिज कर डालो. फिलहाल इसका कोई शीर्षक नहीं है." मैंने पहले भी कहा था और फिर कहता हूं कि अश्विनी हमारे समय के सबसे जरूरी कवियों में से एक हैं। मेरे लिए कविता का अर्थ यही पंक्तियां हैं, जिन्हें रचने के लिए कोई आश्वस्तिबोध नहीं बल्कि बेचैन रूह चाहिए। एक कवि की बेचैन रूह। शुक्रिया अश्विनी जो कविता पर भरोसा जिंदा रखा।

प्रियतमा पृथ्वी के नाम

मैं नहीं रख सका
पृथ्वी के लिए
दुःखों के अलावा
वह सबकुछ भी
जो हमारे समय में
इफरात में मौजूद था
एसएमएस के मैसेजों में
डिजिटल चैनलों में
लालकिले की प्राचीर से
उड़ते हुए उन शब्दों में
जिनकी ध्वनियां
स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस के दिनों में
दिल्ली की बजाय
कहीं और से आती थीं

वृक्षों के लिए हमारे पास
कुल्हाड़ी के सिवा
कुछ भी नहीं बचा था
जबकि उन्हीं दिनों
महँगी रसिक कारें
मौसम को रौंदती हुई
बेकाबू हुई जा रही थीं
फ्रीज के नये-नये मॉडलों से
अटा पड़ा था रसोईघर
और राजधानियों में दौड़ रही थीं
वातानुकूलित मेट्रो बसें और रेल

पहाड़ घिरे थे
दैत्याकार शावल मशीनों से
उन पर बसे हमारे घर
जागने से पहले ही
गिरा दिये गये थे
मलबे में दबी आँखें
कटहल के कौओ की तरह
बिखरी पडी थीं पहाड़ों पर
पंछियों का एक झुण्ड
अभी भी मंडरा रहा था
पहाड़ी फुनगियों पर

नदियों के लिए भी हम
सिवाय बोतलों के
कुछ नहीं बचा पाए थे
जबकि देश के एक बड़े क्रिकेटर ने
अपने नवनिर्मित आलीशान मकान में
स्वीमिंग पूल बनाया था
और माननीय न्यायालय ने
मोहल्ले की उस जनहित याचिका को
खारिज कर दिया था
जिसमें कुँओं के लिए
पानी की माँग की गयी थी

अपनी प्रेमिकाओं के लिए भी
हमारे पास
सिर्फ ड्यूडोरेंट ही रह गया था
हालांकि जवान गंध
अभी भी रह-रह कर तैर रही थी
लेकिन नौजवान देश
आउटसोर्सिंग में खप-खप कर
बेदम हो चुका था
सपने
जल्दी में निबटा दिये गये
गंदी चड्डियों की तरह
बिखरे हुए थे
हमारे समय के सबसे
लोकप्रिय सीरियलों में

और बच्चों के लिए क्या बचा था
बस निष्प्राण कार्टून्स
एक अजीब-सी अमानवीय
और अप्राकृतिक दुनिया
अभी भी थोड़ी-बहुत बची हुई दुनिया से
बिल्कुल भिन्न
उस गगनचुंबी ईमारत की
आलीशान बैठक में
जहाँ समंदर एक शीशे के जार में कैद था
और जिसमें तड़प रही थीं
दादी-नानी के किस्सों वाली
सारी की सारी रंगीन मछलियाँ
नक्काशीदार गमलों में
हवा के मामूली झोंको से भी
कँपकँपा उठ रहे थे पृथ्वी के सारे वर्षा वन

मुझे माफ करना
मेरी प्रियतमा धरती
नहीं जानता इन सबसे
कितना बचा रहेगा तुम्हारा रूप-लावण्य
तुम्हारी हँसी
और वह गंध
जिससे प्रकृति बौरा जाती थी
प्रेम लबलबाने लगता था

5 comments:

साहिल said...

सच कहा है... अश्विनी हमारे समय के महत्वपूर्ण ही नहीं ज़रूरी कवि हैं। अभी तक अश्विनी को जितना जाना है उसके मुताबिक यह कविता उसका एक बहुत छोटा सा हिस्सा है जो वे सोचते हैं। आज जब सारी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग पर बतकही कर रही है, यह कविता उस ज़मीन की आवाज़ है जिसे कतरा-क़तरा बेचना अब भी ज़ारी है। अश्विनी आैर तुम्हें, दोनों को ही शुक्रिया इस ज़रूरी कविता के लिये।

pratham said...

इन पंक्तियों को समझपाना पाना बेहद मुश्किल था ,मेरे लिए अगर मै अस्वनी जी से उन दिनों मिला ना होता ! बहुत ही ओजपूर्ण पंक्तिया है ,यह मेरा मानना है

Kulwant Happy said...

युवा सोच के युवा कवि को सलाम।

अजित वडनेरकर said...

ज़रूरी कविता....

Ajayarchana said...

good