July 1, 2010

समानता

वह 47 के पहले था
कि दूर देश से आये दुर्दांत हत्यारों ने
कंपनी में भरती किये जवान
इसी देश के
और थमा दिये उन्हें कारतूस बंदूकों समेत, जिनमें थीं संगीनें
बंदूकों के निशाने पर थे
इसी देश के आमजन
जो कराह रहे थे कंपनी राज में

यह 2010 है
जहां-जहां थी कंपनी वहां-वहां है केंद्र
बाकी सब जस का तस
और अपने ही खिलाफ हम
(नारायणपुर में माओवादी हमले में मारे गये जवानों और हर रोज मर रहे लाखों लोगों को समर्पित)

5 comments:

हिमानी said...

तब बंदूक का निशाना था आज बारूद का ढेर हैं
बम कभी भी फट सकते है

हर्षिता said...

यही तो हमारे देश की विडम्बना है,जो समस्याएं कल थी वो आज भी सिर्फ शक्ल बदल गई है।

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया....

रंजीत/ Ranjit said...

dear, it an eye opener. top class poetic feeling for me ...

मोनिका गुप्ता said...

बिल्कुल सही कहा आपने। समानता की बीमारी इस देश को ऐसी लगी कि बुरी बातों में समानता आज तक नहीं गयी। लोग बदल गये, चेहरे बदल गये, लेकिन जो समस्याएं आजादी के पहले पनपे थे, वे आज नासूर बन गये है। तब तो यह विश्वास था कि सामने वाला विदेशी है, लेकिन आज तो हथियार अपने ही लोगों के हाथ में है, जो अपने ही लोगों को मार रहे है। इससे बड़ी दुर्गति इस देश की और क्या हो सकती है कि मारे जा रहे है दोनों तरीके से अपने ही लोग। फर्क सिर्फ इतना है कि 47 के पहले मारने के बाद अफसोस नहीं होता था, अब यह एक अफसोस बनकर रह गया है। यह पहले से अधिक पीड़ादायक है। लेकिन बदलाव प्रकृति का अंग है, फिर चाहे वह बाहरी कारकों द्वारा हो या फिर अंदरूनी।