April 10, 2010

मुझे कविताएं पढकर उबकाई आती है

इधर कुछ दिनों से मेल पर, बज्ज पर और कभी कभार चेट बॉक्स में भी कुछ लिंक आते हैं। कविताओं के लिंक। मन में जो आया सो भेज दिया। मुझे महसूस होता है कि ये तमाम कविताएं कोई एक ही शख्स लिख रहा है। वही भाषा, वही विन्यास, वही भाव। मन, पेड, पहाड, हृदय, अभिव्यक्ति, सुकून, सपना, मौन, आलाप, दरिया,...... ये कुछ स्थायी शब्द हैं। इस सभी कवियों से बात करने में एक साझी बात जो दिखती है कि उन्होंने अपने पूर्व कवियों को पढा ही नहीं है। आज मेरी ऐसे ही तीन कवियों से बातचीत हुई। ये तीनों ही मुक्तिबोध के नाम से वाकिफ नहीं हैं। पाब्लो नेरूदा इन्हें कोई साइंटिस्ट लगते हैं। पिछले एक साल में इन्होंने किसी किताब को नहीं पढा है। अगर हिंदी की इंटरनेटी कविता के यही लक्षण है, तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि ये सभी कवि इंटरनेट पर बेहद सराहे गये हैं। इनकी कविताओं पर 20 से 30 तक टिप्पणियां आई हैं। ज्यादातर टिप्पणियों में बहुत अच्छा, बधाई, खूबसूरत, अछूता ख्याल टाइप वाह वाही है। ज्यादा हुआ तो कविता की ही चार पंक्तियां पेस्ट कर दी गई हैं।
मैं इसे हिंदी कविता के साथ की जा रही बदतमीजी करार देता हूं।
इस पीठ खुजाऊ वाह वाही का दूसरा दुखद पहलू यह भी है कि ऐसी ज्यादातर कविताएं महिलाओं के ब्लॉग पर हैं, जिन्हें बिना कंटेट की गुणवत्ता के सराहा गया है। कविताओं की सराहना कुछ इस अंदाज में की जा रही है जैसे सौंदर्य से अभिभूत होकर गुणगान किया जा रहा हो। क्या यह महिला लेखन को बदनाम करने की साजिश है? हिंदी पत्रिकाओं के संपादकों ने जिस चालाकी से हिंदी कविताओं का स्तर गिराया है, इंटरनेट का योगदान भी उसमें कम नहीं है। हिंदी को बचाने के नाम पर कूडा करकट की सराहना एक खतरनाक प्रवृत्ति है इसे तत्काल रोका जाना चाहिए।
पर कैसे? कैसे? कैसे?
जो सहमत हैं, वे बात आगे बढायें। असहमत अपने तर्क रखें।

18 comments:

गिरिजेश राव said...

धन्यवाद बन्धु!
साफ साफ बात कहने के लिए।

मैं आप से सहमत हूँ। अध्ययन की कमी तो है। हिन्द युग्म या कविता कोश या अभिव्यक्ति आदि पर तमाम कवि और कविताएँ ऑनलाइन उपलब्ध हैं फिर भी लोग जहमत नहीं उठाते कि उन्हें पढ़ें।

himani said...

hello

swati said...

यह साजिशन महिला लेखन को छोटा करने की कोशिश की राजनीति है। जैसे महिलाओं की सुंदरता और श्रंग्रार की तारीफ कर उन्हें दूसरे कामों से अलग किया गया और दुनिया की सत्ता पर पुरुषों ने कब्जा जमाया यह उसी राजनीति का बेहद ओछा और छोटा रूप है।

Rahul said...

कविता की गुणवत्ता को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। महिलाओं को दीगर कामों में उलझाकर गैर राजनीतिक बनाने की साजिश के तहत उनकी कमजोर कविताओं को भी सराहा जाता है। इस पर गौर करना चाहिए।
अच्छा मसला उठाया। बहस होनी चाहिए

कुमार क्षितिज said...

सिर्फ मसले को छू देने भर से काम नहीं चलेगा बताया जाना चाहिए कि कौन से ब्लॉग पर ऐसी कविताएं आ रही हैं। आपको और साफगोई बरतनी चाहिए। आपने जो ब्लॉग देखे उनके लिंक और टिप्पणियों के लिंक भी दें

himani said...

आपने भावनाओं में बहती कविताओं को बेहद तथ्यात्मक और गूढ़ लहजे में लेते हुये यह बात कही है... लिखने से पहले पढ़ने का अभ्यास निशि्चत रुप से जरुरी है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हम गांधी के बारे में पढ़े बिना गांधी बनने की सोच ही नहीं सकते। अनुसरण और प्रेरणा अपनी जगह हैं और हमारी निजी कुशलता अपनी जगह...हां लेकिन पढ़ने का मसला गंभीर है और जिस विषय पर हम कलम चला रहे है उसके साथ न्याय करने के लिये पढ़ना चाहिये

Raju Neera said...

तुम्हारी बातों से सहमति है, पर बात इससे भी आगे की है. मुझे तो यह लगता है कि इन दिनों कविता के नाम पर जो कचरे का उत्पादन किया जा रहा है, वाह उस प्रवृति का द्योतक है कि जिसमें लोगों को लगता है कि वे सब कुछ कर सकते हैं. अब देखो ना, तुम्हारे इस पोस्ट पर भी अजीब-अजीब से कमेन्ट आएंगे, जिसे पढ़ कर तुम सर खुजाते रहोगे. हमेंशा से ही समाज में एक ऐसा कौम रहा है, जो कभी आलोचना नहीं कर सकता और ना ही सह सकता है. ऐसे लोगों का एक गुट बन जाता है और फिर तुम मेरी खुजाओ और मैं तेरी खुजाऊं की प्रवृति शुरू हो जाती है. ऐसे लोग अब खुले स्पेस का सहारा ले रहे हैं और खुद के चार खुजाने वालों की वाहवाही से अपने को कवि मानने पर तुले हैं. अब इस कमेन्ट को पढो 'इसका ये मतलब नहीं है कि हम गांधी के बारे में पढ़े बिना गांधी बनने की सोच ही नहीं सकते। अनुसरण और प्रेरणा अपनी जगह हैं और हमारी निजी कुशलता अपनी जगह..' इसे क्या कहोगे. माना कि बिना किसी को पढ़े भी कुछ कर सकते हैं, पर उसकी तमीज भी तो हो. कविता को लोग चार लाइन कि तुकबंदी मान लेते हैं और शुरू हो जाते हैं कुछ भी किसी भी चीज पर और कभी भी. ऐसा लगता है कि यह कोई उत्पाद है और दे दना दान. वाह.. बहुत सुन्दर...किप इट अप...लगे रहो...लिखते रहो..हगते रहो...

सचिन .......... said...

बात को आगे बढाने का शुक्रिया। काफी चीजें साफ हुई हैं राजू भाई आप सही कह रहे हैं किसी भी काम की तमीज सबसे जरूरी बात है। कविता की जिन्हें न तमीज है न उसके प्रति इज्जत का भाव वे कवि होना चाहते हैं। कवि होने की जिम्मेदारी के बारे में कुमार अंबुज का यह बयान कि हम बच नहीं सकते अपनी जिम्मेदारी से काफी कुछ कहता है। कल तक इंतजार कीजिए मैं एक लिस्ट तैयार करने की कोशिश कर रहा हूं जिसमें कचरे का उत्पादन करने वाले ब्लॉग का जिक्र होगा। अगर समय मिला तो हर ब्लॉग पर टिप्पणी की कोशिश करूंगा। उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे।

लवली कुमारी said...

सहमत.

मुनीश ( munish ) said...

Yes most of this stuff is TRASH !

Jyotsna said...

आपकी बात में दम है. बबली के ब्लौग पर बिना क्रेडिट दिए रचना चोरी करके लगा देने के इलज़ाम कई बार लगे हैं लेकिन अभी भी बड़े-बड़े शास्त्री और वैयाकरण आदि वाह-वही करते नहीं थकते जबकि सभी जानते हैं की वह रचनाओं की चोरी करके लगती है. कई बार मैंने उसके ब्लौग पर कमेन्ट किये की आपको कम से कम रचनाकार का नाम तो देना ही चाहिए पर उसने हर बार कमेन्ट डिलीट कर दिए. उसकी हर पोस्ट पर एवरेज पच्चीस टिप्पणियां होती हैं.
यह बात सही है कि अधिकांश पुरुष ब्लौगर चेहरा देखकर टिपण्णी देते हैं.
और स्वाती जी यह साजिशन महिला लेखन को छोटा करने की कोशिश की राजनीति नहीं है. मैं ब्लौगर नहीं हूँ लेकिन रोजाना कई घंटे ब्लौग पढ़ती हूँ. कोई भी सामान्य बुद्धि व्यक्ति पोस्ट में कही गयी बातों से इत्तेफाक रखेगा. इसका पुरुष-महिला लेखन से कम ही सम्बन्ध है. बात यहाँ घटिया कविता या चौर्य लेखन की हो रही है.

Jyotsna said...

कृपया किसी कमेंट को मोडरेट न करें. आजकल मेरे आधे से ज्यादा कमेंट मोडरेट कर दिए जाते हैं.

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

सही प्रश्न उठाया है।

किन्तु महिला व पुरुष का प्रश्न उठाना मानो अपनी बात को थोड़ा कमजोर व पूर्वाग्रह से प्रेरित जैसा दर्शाता है। अन्यथा ब्लॉग जगत में निम्न कविताओं के नाम पर अत्यधिक टिप्पणियाँ बटोरने वालों का कीर्तिमान (?) एक नए पुरुष ब्लॉगर के नाम ही है।
स्वयं मेरे द्वारा पुरुष स्त्री का यह मुद्दा उठाना भी विषयान्तर ही है व मूल प्रश्न की गम्भीरता को कम ही करता है। इसे केवल उस तर्क व उदाहरण के उत्तर में ‘निराकरण हेतु दिया गया तर्क मात्र’ के रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिए।

कविता के प्रश्न पर गम्भीर विमर्श की महती आवश्यकता तो है ही किन्तु केवल नेट सन्दर्भ ही में नहीं अपितु हिन्दी की वरिष्ठ गरिष्ठ पत्रिकाओं के स्तर पर भी। क्योंकि वे भी बड़े सुनियोजित ढंग से कविता ( + साहित्य)के नाम पर अपने लाभ के संबन्धों की राजनीति का कायान्तरित रूप ही छाप रहे हैं। वैसे साहित्य/ विचार/ कविता/ आलोचना आदि आदि की गुणवत्ता की पड़ी किसे है? हिन्दी जाति का साहित्येतिहास रंगा पड़ा है.... बस कोई किस स्तर पर तो कोई किसी स्तर पर। नेट भी भला क्यों आछूता रहेगा, इसके प्रयोक्ता भी अपने अपने स्तर पर उसी सब में लगेंगे ना, जिस भाषा समाज का वे प्रतिनिधित्व करते हैं।

अजय कुमार झा said...

आपने बेबाकी से अपनी बात को रखा अच्छा लगा , और इसमें कसूर किसीका है भी नहीं , आज यदि हजारों ब्लोगगर्स के लेखन की पडताल होने लगे तो परिणाम कुछ कुछ वैसा ही देखने पढने को मिलेगा जैसा आपने बताया है , जरूरत इस बात की है कि स्तरीय को ही प्रोत्साहित किया जाए ताकि बाकी सब पार्श्व में चला जाए ।
अजय कुमार झा

शारदा अरोरा said...

लेखन तभी सार्थक है जब वो किसी मकसद से लिखा गया हो , स्वरचित हो , जिसे किसी दबाव या प्रोत्साहन की परवाह न हो , टिप्पणियों की तो हरगिज नहीं , हुनर तो खुद ही बोलता है | हाँ , कभी कभी किसी उभरती हुई प्रतिभा की पीठ हमें जरुर थपथपानी चाहिए | ये पोस्ट पढ़ कर कम्मेंट किये बिना रुका नहीं जा पा रहा , इसीलिए अपनी राय से अवगत करा रही हूँ |

साहिल said...

यार तुम पहले एक बात बताआे... आग को जंगल की आग बनाना चाहते हो या चूल्हे की।
ख़ैर, इस सारे कुछ में जो मुझे जड़ दिखाई देती है वह न पढ़ना ही है। भैया हिन्दी कविता/लेखन की बात कर रहे हो तो पाब्लो नेरूदा तक भी क्यों जा रहे हो? यही पूछ लो कि निराला, नागार्जुन, सर्वेश्वर को किसने पढ़ा है। अगर ब्लाग या नेट तक ही सीमित हैं लोग तो भी कई नामचीन लेखक/कवियों का लिखा मौजूद है।
हालांकि मेरा ये मानना है कि शुरूआती दौर में तुकबंदी आैर बादल, नदिया, प्रेम ही होता है यानि जिस कूड़े का तुम ज़िक्र कर रहे हो वही उत्पादित होता है, पर यह स्थाई भाव बनता है सिर्फ न पढ़ने के कारण। जब स्थाई भाव बन गया तो बेचारा आदमी क्या करे, खुजाने की बीमारी लगाकर आत्मतुष्ट होता है। (खूब जमता है रंग जब मिल बैठते हैं तीन यार...दो एक ही कश्ती की सवार आैर तीसरा....जिसका ज़िक्र है)।
एक बात आैर ... यह बीमारी पुरूषों में भी व्यापक है। जिस राजनीति की तुम बात कर रहे हो उसके साथ।

रंजना said...

आपके आलेख के शीर्षक ने चौंका दिया और जिज्ञासु मन कारण जानने को उत्सुक हो इस आलेख तक आ पहुंचा...
बात तो आपने सही कही है...स्तरहीनता की बात वो सभी महसूस करते हैं जो भी अच्छा स्तरीय पढने में अभिरुचि रखते हैं...पर इस समस्या का कोई असरकारक समाधान नहीं दीखता...

रवि कुमार, रावतभाटा said...

क्या बात है भाई...
हम तो पहली बार आए...यहां...
और अफ़सोस हुआ...कि पहले आना भी हो सकता था...

खैर...यह सिर्फ़ कविताओं की ही बात ही नहीं है...हर मुआमलात में यह हो रहा है...

ब्लॉग के साथ यही मुश्किल भी है...और यही इसकी ताकत भी...इसीलिए यह हो पा रहा है...

जहां यह वाज़िब प्रस्तुतियों की संभावना पैदा करता है...वहीं अपनी किसी भी स्तर की व्यक्तिगत आकांक्षाओं के तुष्टिकरण का जरिया भी है...

गंभीर पक्ष को प्रबल होना ही चाहिए...
पर थोड़ी सहिष्णुता भी होनी ही चाहिए...परिष्कार का अवसर तो प्रदान होना ही चाहिए...संतुलित आलोचना के जरिए...