August 6, 2010

इस लक को क्या नाम दूं?

अंधविश्वास : कुछ फुटकर नोट्स और टॉप के अंधविश्वासियों पर एक नजर- आखिरी पोस्ट
अंधविश्वास और लकी चाम का रिश्ता बेहद मजबूत है और जर्मनी के कॉलेगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस पर अध्ययन भी कर डाला। इनके अनुसार किसी तरह की लकी चीज न केवल आपके आत्म-विश्वास को बढ़ाती है, बल्कि परफॉरमेंस में भी सुधार लाती है। शोध की प्रमुख लेसन डेमिच के अनुसार बड़े-बड़े खिलाडिय़ों सहित कई एथलेटिक्स किसी न किसी तरह की चीजों में विश्वास रखते हैं। वह कहती हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि लोग ऐसा क्यों करते है? इसके बाद वह अनुमान लगाते हुए कहती है कि इस तरह के अंधविश्वास में यकीन करने से उनके आत्मविश्वास में गजब की बढ़ोतरी होती है जो उनकी कार्यकुशलता को बढ़ाती है। लकी चाम का मतलब यह नहीं है कि आप जीतेगें ही। ऐसा कैसे होता है, यह जानने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ लोगों के समूह से अपने लकी चाम के साथ आने को कहा। इसके बाद फोटो खींचने के लिए सभी से लकी चाम ले लिए गए।
इसके बाद उनमें से आधे लोगों को तो लकी चाम दे दिए गए, लेकिन आधे लोगों को कैमरे में परेशानी आने का बहाना लगाकर उनके लकी चाम वापस नहीं किए गए। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों को लकी चाम वापस किए गए थे उन्होंने दूसरों की तुलना में कंप्यूटर मैमोरी गेम्स में अच्छा प्रदर्शन किया था। उन्होंने पाया किसी काम को करने से पहले व्यक्ति को गुड लक कहने से भी लोगों का आत्मविश्वास बढ़ता है।
और अंत में : पूरी दाल ही काली है
असल में भाग्यवादी होना ही प्रतिक्रियावाद से जुड़ा हुआ है। अपनी प्रतिभा और मेहनत के अलावा लोगों को लगता है कि कोई तीसरी शक्ति है जो उनकी सफलता के बीच है। इसी तीसरी शक्ति या अज्ञात के भय को पाटने के लिए टोटके या अंधविश्वास प्रयोग में लाये जाते हैं। फै्रंकफर्ट स्कूल के समाजशास्त्री एडोर्नो के मुताबिक, समाज में भाग्य और फलित ज्योतिष के प्रति जितना आकर्षण बढ़ेगा प्रतिक्रियावादी और फासीवादी ताकतों का उतनी ही तेजी से वर्चस्व बढ़ेगा। अविवेकवादी परंपरा में एक ओर झाड़-फूंक करके जीने वालों का समूह है, कर्मकाण्ड, पौरोहित्य आदि की तर्कहीन परंपराएं हैं, दूसरी ओर व्यक्ति के निजी हितों की रक्षा के नाम पर प्रचलित ज्योतिषशास्त्र भी है। निजी हितों की रक्षा का चरम हिटलर के उत्थान में देखा जा सकता है। हिटलर ने निजी हितों को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाकर पूरी दुनिया को ऐसा जख्म दिया है, जिसकी टीस जब तब जोर मार देती है। निजी हितों पर जोर देने के कारण हम निजी हितों के परे नहीं देख पाते। आखिरकार अपने ही हितों के खिलाफ काम करने लगते हैं। जरूरी नहीं है कि यह अविवेकवाद, विवेक की सीमारेखा के बाहर मिले, बल्कि यह भी संभव है कि वह खुद को संरक्षित करने की विवेकवादी प्रक्रिया में ही मौजूद हो।
ज्योतिषशास्त्र अपने तर्क का उन क्षेत्रों में इस्तेमाल करता है जहां व्यक्ति की बुद्धि प्रवेश नहीं करती। अखबारों में छपने वाले राशिफल हमेशा उन बातों पर रोशनी डालते हैं, जहां पाठक सक्रिय रूप से भाग नहीं लेता। इसी परा अनुभव से अलगाव के कारण पाठक अविश्वास और पलायनबोध में जीता है, जिसका फायदा सीधे तौर पर ज्योतिष को मिलता है।
भविष्यफल में रोचक और विलक्षण भविष्यवाणियां होती हैं, जिन पर पाठक संदेह करता है। यही संदेह आधुनिक अविवेकवाद की सबसे बड़ी पूंजी है। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। इनमें सबसे पहला और बड़ा कारण गंभीरता का अभाव है। गंभीरता के अभाव के कारण ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, कर्मकाण्ड आदि की तरफ ध्यान जाता है। आम तौर पर ज्योतिषी से जब कोई सवाल पूछा जाता है तो वास्तव में वह समस्या होती है कि क्या होगा या क्या करें? पूछने वाला यह मानकर चलता है कि उसके जीवन को ग्रहों ने घेरा हुआ है और ग्रहों की चाल के बारे में ज्योतिषी अच्छी तरह से जानता है। इसके कारण अति-वास्तविकता पैदा हो जाती है। यह अति-वास्तविकता स्वयं में अविवेकपूर्ण है।
साधारण आदमी एक पल के लिए धार्मिक होने से इंकार कर सकता है, किन्तु भाग्य को लेकर ज्योतिषी के कहे हुए को अस्वीकार करने में उसे असुविधा होती है क्योंकि वह मानता है कि फलादेश का ग्रहों से संबंध है। फिर भी फलित ज्योतिष को अंधविश्वास की मनोवैज्ञानिक संरचना कहना मुश्किल है। इसका सरलीकरण भी असुविधा पैदा कर सकता है। इसका व्यक्ति के इगो और सामाजिक हैसियत से गहरा संबंध है। इससे लोगों में आत्मविश्वास पैदा होता है।

1 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बढिया प्रस्तुति रही श्रृंखला की बंधु...