July 15, 2007

हिंदीवाद और हिंदूवाद दो अलग अलग चीजें हैं

विश्व हिंदी सम्मेलन के बहाने
मंगलेश डबराल


दुनिया के कई देशों में यह सम्मेलन आयोजित हो चुका है. अब यह आठवाँ हिंदी सम्मेलन न्यूयॉर्क में हो रहा है. पिछले सात सम्मेलनों में क्या हुआ- इसका कोई लेखा-जोखा हमारे पास नहीं है. लेकिन इन सभी सम्मेलनों के उद्देश्य संदिग्ध रहे हैं. अभी तक जहाँ भी हिंदी सम्मेलन हुए हैं उन पर हिंदूवादियों और पुनरुत्थानवादियों का ही वर्चस्व रहा है. दरअसल हिंदीवाद और हिंदूवाद दो अलग अलग चीजें हैं. हिंदूवाद से हिंदी का भला होना संभव नहीं है. इनके वर्चस्व को कम करने की कोई कोशिश अबतक नहीं की गई है. ऐसी हिंदी की स्थापना की कोशिश नहीं की गई जो सच्चे अर्थों में आधुनिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष हो. जहाँ हिंदी का स्वरूप लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने की कोशिश नहीं दिखाई दे रही हो उस सम्मेलन में मैं एक लेखक की हैसियत से शामिल नहीं हो सकताइस सम्मेलन में कौन लोग जा रहे हैं उससे अधिक महत्वपूर्ण ये जानना है कि ये लोग क्यों जा रहे हैं. इस बार सम्मेलन में लगभग एक हज़ार लोग इकट्ठा हो रहे हैं. और ये लोग कुछ ठोस कर पाने में सक्षम नहीं दिखते.न्यूयॉर्क जाकर कुछ नहीं किया जा सकता. संयुक्त राष्ट संघ के समक्ष जुलूस लेकर निकलने से हिंदी का भला नहीं होने वाला यह बात हमें समझ लेनी चाहिए. हमारे देश में हिंदी जाति की अपनी समस्याएँ हैं, हिंदी साहित्य के संकट हैं उन्हें कोई भी संबोधित नहीं कर रहा है. अगर हिंदी के लेखकों पर नजर डालें तो कम से 20 लेखक तो ऐसे हैं ही जो नोबल पुरस्कार पाने के हकदार थे/हैं, लेकिन इस बारे में कोई पहल नहीं की गई. इसके लिए दुनिया के दूसरे देशों में हिंदी को सही रूप में पेश किए जाने की ज़रूरत है. इस सम्मेलन में जिन लोगों को इस बार सम्मानित किया जा रहा है उनसे तो हिंदी साहित्य समाज परिचित भी नहीं है. अगर मैं कहूँ कि सम्मेलन के आयोजन में बड़ी भूमिका निभाने वाले लक्ष्मीमल सिंघवी का हिंदी साहित्य में क्या योगदान है तो शायद ही कोई कुछ जानता होगा. हिंदी के जानेमाने कवि केदारनाथ सिंह का हिंदी सम्मेलन में सम्मान होना तय हुआ लेकिन उनके जाने में ही कई तरह की दिक्कतें सामने आईं. केदारनाथ सिंह ने हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में लिखा कि उन्हें विदेश मंत्रालय से संदेश आया कि पहले वो 4200 रुपए वीज़ा शुल्क जमा करें. इंटरनेट से वीज़ा के लिए अर्जी दें. अमरीकी दूतावास से वीज़ा लें. वीज़ा मिलने पर किसी ट्रैवल एजेंट से टिकट के लिए संपर्क करें.इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार इन आयोजनों और हिंदी साहित्यकारों को लेकर कितनी गंभीर है.इन सरकारी आयोजनों के समानांतर सम्मेलन किए जाने की बात भी संभव नहीं लगती क्योंकि हिंदी का साहित्यकार एक निर्धन समाज का साहित्यकार है.हिंदीभाषी क्षेत्र ही अपनेआप में निर्धन हैं. हिंदी के साहित्कारों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे समानांतर सम्मेलन आयोजित कर सकें. सरकार का यह दायित्व है कि वो अपनी भाषा के विकास और समृद्धि के लिए कोशिश करे और अपने साहित्कारों का सम्मान करे. चिंता इस बात को लेकर होनी चाहिए कि हम हिंदी को दूसरे देशों में सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. जो हिंदी आज न्यूयॉर्क पहुँच रही है उसके किसी लेखक को आज तक नोबल पुरस्कार नहीं मिला है।
(बीबीसी से साभार)

2 comments:

अनुनाद सिंह said...

जैसे हिन्दीवाद और हिन्दूवाद भिन्न हैं उसी प्रकार हिन्दीवाद और मार्क्सवाद भी भिन्न हैं। डबराल जी इसका कितना ध्यान रखते हैं? क्या ये सत्य नहीं है कि मार्क्सवादी कवियों/लेखकों का लिखा हुआ साहित्य के बजाय "मार्क्स्वादी प्रोपेगैण्डा" ज्यादा लगता है?

Sanjay Tiwari said...

अनुनाद का सवाल वाजिब है.