June 25, 2008

भास्कर का टैलेंट पूल: जिम्मदारी की तैयारी

भोपाल में बारिश हो रही है. मूसलाधार बारिश नहीं. रूकी-रुकी सी. फुहार वाली. मलमली दुपट्टे से झोंके उड रहे होते हैं न, उसी तरह की. लाल घाटी से देखो तो शहर यूं लगता है कि जैसे किसी अनगढ हाथ ने तीन चौथाई शीट पर हरा रंग फैला दिया हो. बस छोला रोड से भारत टॉकीज चौराहे तक नजर न पडे.
खैर मैं इन दिनों ये सब देख पा रहा हूं ये जलाने की शुरुआत है मैं देख सकता हूं इस खूबसूरती को. मजा यह कि मैं छह साल बाद फिर सूरज को डूबते और उगते भी देख सकता हूं. कोई एडीटर या खबर मुझे परेशान नहीं करती- दोनों ही वक्त. हालांकि मेरे आसपास एडीटर्स का जमावडा है. चलिए सिरे से, तफसील से बयान करता हूं. बीते दिनों यानी मई के तीसरे हफ्ते में आदत से लाचार मैं छुट्टी पर निकल पडा. रांची, इलाहाबाद, सागर, जबलपुर की खाक छानकर घर पहुंचा तो राजीव जी का मैसेज इंतजार कर रहा था कि तुरंत भोपाल पहुंचकर सेवाएं दूं. तब से "डीबी स्टार" ने मेरी सुबह हसीन और शाम रंगीन कर दी है. यानी काम में कभी तो आराम मिलता ही है.
चलिए अभी बात टैलेंट पूल की
भास्कर ने टैलेंट पूल के लिए देश भर के विभिन्न एडीशन से क्रीम निकालकर भोपाल बुलाया है. यह वो टैलेंट है, जिस पर संस्थान भरोसा करता है, जिसे आगे जिम्मेदारियां संभालनी हैं, जिन्हें संस्थान को आगे ले जाना है, जिन्हें अलग अलग मोर्चों पर तैनात होना है, मैदान मारना है या खेत हो जाना है.
एक जून से शुरू हुए टैलेंट पूल में 13 लोगों को बुलाया गया है. इनमें शामिल हैं जालंधर से अजय गर्ग, ग्वालियर से मनोज पमार, जोधपुर से तरुण रावल, जयपुर से महावीर राठीमुकेश माथुर, इंदौर से रुमनी घोष, महेश लिलोरियाविजय सिंह चौहान, हिसार से प्रमोद वशिष्ठप्रियेश ठाकुर, सीकर से नरेन्द्र शर्मापवन शर्मा और श्रीगंगानगर से नीरज खत्री. इनमें से मुकेश माथुर जी और विजय जी को इंदौर में नई जिम्मेदारियों के साथ तैनाती मिल गई है. बाकी के कमांडोज अभी ट्रेनिंग ले रहे हैं. इधर एक और इंसान टाइप प्राणी से भी मुलाकात हुई है. जाहिद मीर साहब से. जनाब रतलाम से बीते महीने ही भोपाल आए हैं. उनके लिए इस पोस्ट का दायरा का थोडा कम है. उनके बारे में एक पूरी पोस्ट में बयान करूंगा.

2 comments:

Imran Jalandhari said...

सर, जो जिस काबिल होता है उसे उस स्थान पर भेजना ही एक अच्छे संस्थान की अच्छी जिम्मेदारी है। चलिए एक नई जंग के लिए तैयार हो जाइए... अभी तो बहुत कुछ करना है जिंदगी में...। बहुत कुछ सीखा आपके साथ काम करके अब लगता है कि कुछ समय और साथ गुजार लेते तो अच्छा होता...

कभी-कभी जब बहुत थक जाता हूं मैं
कुछ यांदों को ही अपने पास पाता हूं मैं
फिर सोचता हूं चला जाऊं कहीं
कब तक अपने आप से मुंह छिपाऊं इस तरह
कुछ टूटे हुए पत्ते हवा के झोंके से मिल जाते हैं जिस तरह...

अबरार अहमद said...

कुछ इस तरह गुजर गए वो मेरे दयार से।
हर वो बात अधूरी रही गई जिसे हम मुकम्मिल ना कर सके।।

मुबारक हो।