July 14, 2008

नमस्कार, सर

वह एक विवेकपूर्ण नमस्कार था
जिसे मैंने ऑफिस की सीढियां चढते
हुए थोडा थोडा खर्च किया
इसके बदले में कई बार मुझे एक मुस्कुराहट मिली कई बार उठा हुआ सीने तक जाता हाथ
पर मेरे लिए इनका कोई मतलब नहीं था
नमस्कार मेरे पास बहुत से थे
सो उनके खर्च में कंजूसी का कोई बहुत मतलब नहीं था

लांग टर्म बेनिफिट इनका मिलना ही था
ये नमस्कार अभी के अभी नहीं बदल जाते मिल्कियत में
सिगरेट की तरह नहीं होते नमस्कार
कि दोस्त तुम्हारी जेबों से निकाल ले पूरा पैकेट और तुम्हें नाराज करके भी लगाता रहे लंबे लंबे कश
हालांकि यह दीगर बात कि बाद में दोस्त की यह हरकत आपके चेहरे पर हंसी ला देती है
जिसे आप यादों से निकले एक खूबसूरत दृश्य की हंसी का नाम दे सकते हैं
खैर यह किस्सा कुछ और है
और मार्के की बात यह कि अभी नमस्कारों ने फिर अपने रंग बदलना शुरू कर दिए हैं
जिन्हें कभी हम नमस्कार करते थे वे अब खुद पहले हाथ मिलाने के लिए आगे आने लगे हैं
जो महज चश्में के ऊपर से झांकते थे वे मुंडी हिलाने लगे हैं
और जो अपनी कुर्सी से खडे हो जाते थे
अब झुकने लगे हैं
यह वही दौर है
जब दुश्मन को सीधे सीधे हुंकारा भरकर नहीं ललकारा जाता
अब जड से उखाडने के लिए नींव टटोली जा रही है
भला इसके लिए झुकना तो पडेगा ही

8 comments:

Udan Tashtari said...

अब जड से उखाडने के लिए नींव टटोली जा रही है
भला इसके लिए झुकना तो पडेगा ही

-Sahi kah rahe hain.

आशेन्द्र सिंह said...

जड़ भी क्यों उखाडो ? अकड़ कर खड़े रहो और अमर बेल डाल दो...

अबरार अहमद said...

क्या हाल हैं दोस्त। कभी कभार याद कर लिया करो।

aditya shukla said...

क्या बात कही है
क्या बात कही है
क्या बात कही है
क्या बात कही है...

neelima sukhija arora said...

namaskar sir

vipinkizindagi said...

पोस्ट अच्छी लगी

नदीम अख़्तर said...

आपने लिखना छोड़ दिया या हमने पढ़ना?

Imran Jalandhari said...

कई बार पढ़ा, पर समझ में नहीं आया...