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Showing posts from September, 2010

पीपी सिंह दोषी हैं, तो सजा जरूर मिले, लेकिन...

(भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता यूनिवर्सिटी (संस्थान) में इन दिनों छात्र धरने पर हैं। पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष पुष्पेन्द्र पाल सिंह को पद से हटाने के बाद शुरू हुए बवाल ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। कुलपति श्री कुठियाला, पीपी सिंह, परीक्षाएं, व्यवस्था और शिक्षा संस्कृति से होते हुए बात उस माहौल की जो माखनलाल यूनिवर्सिटी की पहचान हुआ करता था। इस संबंध में विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अनुराग द्वारी का यह बयान)
साथियोमैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का छात्र हूं. यूनिवर्सिटी से छोड़े लगभग ९ साल हो गए लेकिन ताउम्र इस विश्वविद्यालय का छात्र रहूंगा, वजह ये नहीं है कि यहां से पढ़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला फिर नौकरी मिली। वजह ये है कि यहां से जीने और सवाल करने का सलीका, लोकतंत्र में आस्था और बहस तलब के लिए तैयार जमात का हिस्सा बना। उद्वेलित इसलिए नहीं हूं कि पीपी सिंह को यूनिवर्सिटी ने निलंबत किया है, वो मेरे शिक्षक थे, हैं और रहेंगे, लेकिन अगर अंश मात्र भी वो दोषी हैं तो उन्हें सज़ा मिलने का मैं पक्षधर हूं। जहां तक मेरी जानका…

ख्वाब मरते नहीं : जिंदा दिलों में जीते कॉमरेड लागू

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(इंदौर में कम्यूनिस्ट आंदोलन की नींव रखने वाले दिवंगत कॉमरेड अनंत लागू का कल (23 सितंबर को) जन्मदिन था। इस मौके पर इंदौर में संदर्भ केंद्र की और से कॉमरेड लागू पर एक पुस्तिका प्रकाशित की गई है, जिसका लोकार्पण सीपीआई की राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड अमरजीत कौर ने किया। इसी पुस्तिका से लिया गया कॉमरेड लागू के प्रिय और करीबी रहे विनीत तिवारी का यह लंबा लेख।)



विनीत तिवारी
मरने का मतलब क्या होता है? कोई मर गया, माने क्या मर गया? क्या मेरे दिल में उसके लिए जो इज्जत थी, वो मर गई? क्या उसके लिए, मेरे कॉमरेड के लिए मेरा प्यार मर गया? क्या उसके शिद्दत से किए गए कामों की यादें मर गयीं? क्या उसकी मेहनत, उसका श्रम और उससे हुए कारनामे मर गए? एक नायक की तरह जी गयी जिंदगी की वो सारी छाप क्या बगैर निशान छोड़े मिट गयी? क्या ये सब खत्म हो गया? मैं जानता हूँ कि उसका जो बेहतरीन है, वो मेरे भीतर कभी नहीं मरेगा। मुझे लगता है कि हम ये मानने की हड़बड़ी में रहते हैं कि ‘वो नहीं रहा।’ इसी हड़बड़ाहट में हम ये भी जल्द भूल जाते हैं कि अगर हम एक इंसान की जिंदगी की जिंदादिली, सच्चाई की जीत के लिए उठायी गयीं उसकी बेतहाशा …

एक अकेला दिन और चंद चालू खबरें

अभी-अभी टीवी ऑन किया है। पता चला यमुना अपने हिंसक रूप में घरों की और बढ़ रही है। एक टीवी रिपोर्टर तिब्बती मार्केट की बस्ती में छतों में सांस लेती जिंदगी को पकडऩे की कोशिश कर रहा है। एंकर उसे भयावहता की तस्वीरें और तीखी खींचने के लिए उकसाती है। जब वह रिपोर्टर बहुत ज्यादा नहीं चीख पाता तो एंकर दूसरी खबर की ओर बढ़ जाती है, जिसमें लारा दत्ता और महेश भूपति के सहारे बांधने की कोशिश की जाती है। चैनल चेंज किया तो कश्मीर गये प्रतिनिधिमंडल की आकृतियां नुमायां हुईं। 39 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल, सुनने में अच्छा लगता है। नाम और चेहरे सामने आते हैं, तो यकीन डिगने लगा कि कोई हल निकलेगा। कश्मीर की पूरी समस्या के बीच यह चंद लाइनों का क्षेपक सा है। सरकारों को गंभीर दिखाने की कोशिश में इस तरह के प्रतिनिधिमंडलों की लंबी श्रृंखला हम देख चुके हैं। फिर चैनल बदलता हूं, गणपति बप्पा, 20 हजारी सेंसेक्स, अयोध्या, चैंपियंस लीग के बीच पता चला कि भारत दुनिया की तीसरी बड़ी ताकत बना गया है। ताकत में भारत का शेयर आठ फीसदी है, जो अमेरिका की 22 फीसदी और चीन की 12 फीसदी के बाद सबसे ज्यादा है। यूरोपीय यूनियन की संयु…

हर कालखंड को चौंकाता रहा अपने समय का हरफनमौला रचनाकार

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9 सितंबर को जन्मदिन पर विशेष
भारतेन्दु हरिश्चंद्र। नाटककार, कवि, पत्रकार, निबंधकार, व्यंग्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार और भी कई रूप, यानी संपूर्ण लेखक। यात्रा-प्रेमी, शिक्षा-प्रेमी और लेखन-प्रेमी इस अद्भुत शख्सियत को याद करने की यूं तो कोई तारीख नहीं, वे हमेशा याद आते हैं। उन्हें याद करना अपने समय को परखने की तरह ही है। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता जब आखिरी सांसें ले रही हो, तो आधुनिक हिंदी के जन्मदाता के जन्मदिन के बहाने उनके समय पर गौर करना चाहिए। 1850 में 9 सितंबर को काशी के एक धनी वैश्य परिवार में जन्में भारतेंदु हरिश्चंद्र के पिता गोपाल चंद्र खुद भी एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविताएं लिखा करते थे। मूल नाम हरिश्चन्द्र था, भारतेन्दु उनकी उपाधि थी, जो काशी के विद्वानों ने सन् 1980 में दी थी। किसी जीवन का सही उपयोग क्या होता है, यह हिंदी नाटकों का सूत्रपात करने वाले भारतेंदु जी के जीवन पर नजर डालकर समझा जा सकता है। 35 साल की छोटी उम्र पाने वाले भारतेन्दु ने हिंदी साहित्य में जो जोड़ा है वह बेजोड़ है। शुरुआत से देखें तो, उन्हें स्कूली शिक्षा नहीं मिली। घर में ही …

बाबरी विवाद: एक ही आंख से देखता मीडिया और झूठ की छपाई

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(अयोध्याकाजिन्नफिरबाहरआनेकोबेताबहै।दोदशकपहलेहमदेखचुकेहैंकिहिंदूधर्मान्धताकीसीढीपरचढकरभाजपाविहिपनेजोगुलखिलायेथेवेअबकमोबेशबासीपडचुकेहैंऔरनयेसिरेसेवहीगंधफिरफैलानेकीतैयारीतेजहोगईहै।ऐसेमेंएकपत्रकारकारुखक्याहो? 92 में हिंदू उन्माद में रंगे अखबारी पन्नों की गलीज रिपोर्टिंग भारतीय पत्रकारिता के नाम पर जो धब्बा लगा चुकी है, उसे दोहराते हुए देखें या फिर जरूरी पहल में हिस्सेदारी कर सच को सच की तरह सामने लायें? जिम्मेदारी बडी है, जिसके लिए तर्क की पारंपरिक शैली में सवालों को टटोलने और रंग, संप्रदाय, जाति व प्रादेशिक सीमाओं से बाहर आकर सोचने की दरकार है। सूचनाओंकेसंजालमेंसचकोतलाशनेकीबेचैनीकेबीच; पत्रकारीयउसूलोंकीमिसालकेरूपमें, अभीअभीमेलबॉक्सआयाफैजाबादसेनिकलनेवालेजनमोर्चाकेपत्रकाररहेकृष्ण प्रताप सिंहकालेखयहांदियाजारहाहै।अयोध्याकेमुद्देपरनई पीढी केमाध्यमसेजर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) औरमीडिया स्टडीज सेंटर सच

एक मर चुके दोस्त के लिए

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विनयतरुणकीमौत 22 जून कोहुई। 28 अगस्तकोउनकेगृहनगरपूर्णियामेंएककार्यक्रमहुआ।कार्यक्रममेंहिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व नहोनेपरसाथियोंमेंरोषहै।जिसमैंअखबारी संवेदनहीनतासेऊपरसवालोंसेबचनेकीकोशिशमानताहूं।सत्तासंचालितमीडियासवालपसंदनहींकरता।बडेअखबारतोबिल्कुलनहीं।ऐसेसमयमेंहमेंहरिवंशजीजैसेसंपादकभीयादआतेहैं, जोसाथियोंकीनिजीसमस्याओंकेव्यावहारिकहलसुझातेहैंऔरमौकेबेमौकेनिजीपरेशानियोंकोव्यक्तिगतस्तरपरहलभीकरतेहैं।बहरकैफयहबहसकामुद्दाहैकिक्योंसंपादकहृदयहीनहोतेजारहेंहैं, औरक्योंहमगधापचीसीकरतेहुएघोडेहोनेकाभ्रमपालेहुएहैं? मुझेलगताहैअबबातचीतकार्यक्रममेंउठायेगयेबिंदुओंपरकरनीचाहिए।क्षेत्रीयपत्रकारिताकेजिसमर्जपरहमबातकररहेथे, कार्यक्रममेंनआनाउसकाबेहदछोटाहिस्साहै।सोबातआगेबढे।मैंकार्यक्रममेंनहींथा, सोअभीमहजविनयकोहीयादकरलूं।विनयकोयादकरतेहुएयहकुछशब्दजोस्मारिकाकेलिएलिखेथे।


होने और न होने का अफसोस
(विनयतरुण को समर्पित)

जरा-सा फासला होता है
जिंदगी और मौत के बीच
एक सूत भर
एक सांस भर
एक फैसले का वक्त
जिस वक्त तुमने एक जरूरी फैसले की जल्दबाजी की
ठीक उसी वक्त की बेचैनी में
हम सब अपनी-अपनी मांदों में पुरसुकून थे
तुम्हारी आखिरी सांस के सा…