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Showing posts from August, 2007

गीता के साथ न्यूक डील की खबरें

ओशो को पढ रहा था। युद्ध और शांति-गीता का विश्लेषण. टीवी चल रही थी, बताया जा रहा है कि लेफ्ट न्यूक्लियर डील पर सवाल खडे कर रहा है. प्रकाश करात चश्मा ठीक करते हुए कह रहे हैं - न्यूक्लियर समझौता हमें कतई मंजूर नहीं सरकार को इस पर आगे नहीं बढना चाहिए. डी राजा बात आगे बढाते हैं -सरकार और लेफ्ट के बीच सहयोग अब पहले से कम हो जाएगा. असर समन्वय पर भी पडेगा. कांग्रेस अपना पक्ष रख रही है, उसकी तरफ से अभिषेक मनु कहते हैं- सारे मामले में सरकार की नीति राष्ट्रीय हितों को ही सबसे ज्यादा तवज्जोह देने की रहेगी. उधर, भाजपा है वह कहती है सरकार गिर जाएगी. मध्यावधि चुनाव होंगे। वैसे यह लेफ्ट की गीदड भभकी है.

ओशो देख रहे हैं कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं। अर्जुन का द्वंद्व है, उसे खत्म करने के लिए तर्क दे रहे हैं. द्वंद्व अर्जुन के यहां है. वह सोचता हैं. इसलिए द्वंद्व है. दुर्योधन को कोई दिक्कत नहीं है. वह सिर्फ युद्ध चाहता हैं. कोई मरे जिये फर्क नहीं पडता. उसे युद्ध से मतलब. अर्जुन को दिक्कत है, कुटुंब के लोग मर जाएंगे. कृष्ण समझा रहे हैं अर्जुन द्वंद्व छोड, जो आज तेरे पितामह हैं, वे कभी तेरे बेटे थे, शरीर…

तेजाब से छिले चेहरे

"मुझे अब कोई स्वीकार करता है और कोई नहीं भी। मुझे बहुत बुरा लगता है. मैं चाहती हूँ कि जो कुछ मेरे साथ हुआ वैसा किसी और के साथ न हो."
यह शब्द दिल्ली में रहने वाली लक्ष्मी के हैं। तस्लीमा नसरीन पर हमले और हाल ही में देवबंद से जारी एक फतवे के साथ इस बयान को रखने पर जो दृश्य बनता है उसमें अर्ध सामंती देश की एक मूंछदार मर्दवादी तस्वीर उभरती है. इसमें महिलाएं महज एक जिंस की तरह हैं, और पुरुष खरीदार अपनी जरूरत के हिसाब से उसका इस्तेमाल करते हैं. जाहिर है इस स्थिति को बदलने के फिलवक्त कोई आसार नजर नहीं आते.दरअसल लक्ष्मी के इस बयान की कहानी साढे तीन साल पुरानी है। 22 अप्रैल 2004 को लक्ष्मी के चेहरे पर खान मार्केट में कुछ लडकों ने तेजाब फेंक दिया था. तेजाब की झुलस का दर्द तो लक्ष्मी ने सहन कर लिया, लेकिन उस दिन को याद करते हुए आज भी उसकी आंखों में पानी आ जाता है. लक्ष्मी के चेहरे की पाँच बार सर्जरी हो चुकी है और जिस पर लाखों रुपए ख़र्च हो चुके हैं. इसके बावजूद उसे अपना चेहरा छुपाना पडता है. लक्ष्मी पर तेजाब फेंकने वाले दोनों लडके जेल तो गए लेकिन ज़मानत पर रिहा भी हो गए. इस तरह के मामल…

कोई फर्क नहीं रह गया मेरठ और रांची में

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इन दिनों जब घर लौटते हुए अंधेरा अपने पूरे कालेपन के साथ चटचटा रहा होता है, मुझे तुम्हारी याद आती है। इन दिनों जब सुबह जागते समय धूप अपने भरपूर तीखेपन के साथ आंख पर पडती है, मुझे तुम्हारी याद आती है. इन दिनों जब दोपहर का खाना खाने में महज पांच मिनट लगते हैं और कोई मेरी उंगलियों से आ रही सिगरेट की गंध पर भौहें नहीं चढाता, मुझे तुम्हारी याद आती है. इन दिनों जब दिन अपनी पहचान नहीं बताते, दोस्त अपनी परेशानियां छुपाते हैं, बच्चे पानी से बचकर चलते हैं यानी वैसा कुछ भी नहीं होता जैसा जब तुम मेरे बालों को खींचतीं थी तब होता था मैं तुम्हे याद कर रहा हूं. अपने ही शोर से परेशान मैं, तुम्हे याद कर रहा हूं अपने पूरे स्वार्थीपने के साथ। कितना कितना संभाल लेती थीं तुम मुझे, कितना कितना सहेज लेती थीं तुम मुझे. मैं तुम्हे याद करते हुए याद कर रहा हूं कोकर के उन मकानों को जिनसे धुएं को उठता हुए देखता था मैं तुम्हारी आंखों से, याद कर रहा हूं बरियातु की पहाडी को जहां से गुजरते हुए ठिठक जाती थीं तुम. मैं याद कर रहा हूं यूरोपियन हिस्ट्री का पेपर, फिर मछलीघर, फिर पहाडी मंदिर. क्या प्रेम में यूं होता है कि डेस…

मैं, मुक्तिबोध, राजेश जोशी और आसमान की सैर

पूरी हकीकत पूरा फसाना-एक
कल रात तकरीबन साढे 11 बजे मैं और रूपेश आफिस से घर के लिए निकले। मेरे कमरे की गली के मुहाने पर रूपेश ने गाडी रोक दी. लाइट नहीं थी इसलिए सन्नाट में मह मोटरसाइकिल के इंजिन की घरघराहट ही सुनाई दे रही थी. ऊंघते कुत्ते हमें नजरअंदाज कर मुंह फेर चुके थे. मैंने अलविदा के अंदाज में हाथ उठाया और रूपेश ने एक्सीलेटर ले लिया. खरामा खरामा मैं कमरे की और बढने लगा. पांच सात कदम ही चला होउंगा कि देखा गुप्ता जी के मकान के करीब कोई खडा था. बीडी सुलगाए. मैं करीब पहुंचा तो साए ने पूछा - "खत्म कर आए दिहाडी". कोई परिचित ही था, आवाज ने बताया, ऐसा सवाल क्यों. ठंडे अंधेरे में....समझ में आ न सकता हो कि जैसे बात का आधार, लेकिन बात गहरी हो. पास पहुंचा तो देखा मुक्तिबोध ही थे. बीडी खत्म हो गई थी. ठूंठ फेंकते हुए बोले - "पार्टनर नींद तो नहीं आ रही". मैंने इनकार में सिर हिलाया. उन्होंने नहीं देखा. बोले- "भोपाल से आ रहा हूं. कुछ दिन से वहीं था. नौ तारीख को वहां राज्य स्तरीय फुटकर व्यापार बचाओ सम्मेलन था." कहीं गहरे से आती उनकी आवाज में बेचैनी थी - तीस करोड कमजोर भ…

कलाकारों को जनता के लिए संघर्ष करने की जरूरत

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आधुनिक कला क्षेत्र में जिन झारखंडी प्रतिभाओं ने अपना लोहा मनवाया है, दिलीप टोप्पो उनमें से एक हैं। लोहरदगा के जोरी से बीएचयू होते हुए रांची तक के सफर में दिलीप ने हर जगह खुद को साबित किया। दिलीप का बीएचयू से स्कल्पचर में एमए करना जाहिर करता है कि उनका मिट्टी से गहरा जुडाव है, उनका मन मिट्टी में रमता है. पिता छटठु उरांव और मां सनिल उरांव की आंखों में पलते सपने को दिलीप ने अपनी जमीन पर ही साकार किया. यही कारण था कि बडे शहरों की दौड से दूर दिलीप अपने लोगों के बीच जीवन गढ रहे हैं. झारखंड के कई चौक चौराहों पर लगीं दिलीप के सधे हाथों से बनीं मूर्तियां इस जीवन का एक हिस्सा हैं. दिलीप की कलात्मक खूबसूरती और संघर्ष का एक पहलू झारखंड का पहला आदिवासी संस्कृति संग्रहालय है, जिसे अपनी जिद और जद्दोजहद के बीच उन्होंने साकार किया है. संस्कृतिकर्मी एक्टिविस्ट अश्वनी पंकजने झारखंड के पहले बहुभाषायी पाक्षिक जोहार दिसुम खबर के लिए दिलीप टोप्पो से नागपुरी में लंबी बातचीत की। उसके कुछ अंशों का अनुवाद।
दिलीप अपने बारे में कुछ बताएं? -मेरी शुरुआती पढाई लोहरदगा में हुई। कला में रुचि थी सो बीएचयू में फाइन आर्ट…

मां

हर मां एक जैसे होती हैभीतर सेऔर बेटे- बाहर से
इन दिनों 10 साल बाद फिर मां के साथ रह रहा हूं। पिछले महीने आईं थी, तब से उनका जी नहीं किया जाने का. मां का मन कभी कभी गांव की तरफ भागता है वहां के रिश्ते नाते उन्हें बुलाते होंगे, लेकिन दिल बेटे(मुझ)को छोडकर नहीं जा पाता. रात 1-2 बजे खाने पर इंतजार करती हैं और आंखें कमजोर होने के बावजूद आवाज से देख लेतीं हैं कि मैं कितना खा रहा हूं और कितना छोड रहा हूं. जब मां को छोडकर (1997 में) सफर पे निकला था तो सोचा था कि मैं कभी मुड न सकूंगा... अब सोचता हूं हर आदमी क्यों घर छोडते समय पीछे मुडकर देखता है...सचिन