May 7, 2008

एक अपील भरोसेमंद

भरपूर आंख से रिसते आंसू से
बनता है भरोसा
एक सधे हुए वाक्य के ठोस लगते सच को
पढता है भरोसा
किसी दोस्त का फिसलन भरी राह पर
पकडा गया मजबूत हाथ होता है भरोसा

कभी डगमगाते शरीरों में
पानी बनकर बहता
कभी मवाद रिसते जख्म में
मछली की शक्ल में चोटता
कभी पहले प्रसव की पीढा सा चीखता
अबोले शिशु की तालू चिपकी जुबान सा
ठिनकता है भरोसा

भरोसा कभी टूटता नहीं
भरोसे की नदी का पानी कभी नहीं सूखेगा
जितनी बार बहेगा आंख का पानी
उतनी उतनी बढेगी नदी भरोसे की

इस शंकाग्रस्त समय में
मुनादी हुई है
इसी ओर से
"जिन जिन के सपने टंगे हैं
भरोसे की खूंटी पर
जल्द-अ-जल्द उतार लें
कि भरोसा अब नहीं रहेगा
कि सड चुकी है भरोसे की लकडी
कि बह चुका है सारा पानी"

आपकी आंख का जरा सा पानी चाहिए
हो सके तो
इस नदी को सूखने से बचा लेना दोस्तो!!!

6 comments:

सोचना पडेगा said...

इस शंकाग्रस्त समय में
मुनादी हुई है
इसी ओर से
"जिन जिन के सपने टंगे हैं
भरोसे की खूंटी पर
जल्द-अ-जल्द उतार लें
कि भरोसा अब नहीं रहेगा
कि सड चुकी है भरोसे की लकडी
कि बह चुका है सारा पानी"


सचिन भैया हम तो हरगिज न उतारेंगे अपने सपने, भरोसे की खूंटी पर से। भरोसा है तो नदी कभी सूख नहीं सकती।
कविता अच्‍छी है।
शायदा

lovely kumari said...

भरोसे की खूंटी पर
जल्द-अ-जल्द उतार लें
कि भरोसा अब नहीं रहेगा
कि सड चुकी है भरोसे की लकडी
कि बह चुका है सारा पानी"
ham to bhayi aashavadi haiaaap bhi hmare sath ho lo :-)

nav pravah said...

सचिन जी,पहली बार आपको पढने का मौका मिला,खुशी हुई,सबसे बड़ी बात की आपकी कविता ने मुझे छुआ,बधाई
आलोक सिंह "साहिल"

Udan Tashtari said...

गहरी रचना है!

take'a'leap said...

jis samay mein ye munadi kii gayi hai usi samay ke kisi second, minute ya ghante mein ye kavita agar likh saki gayi hai wo bhi ek bharose ke saath toh nishchay hee ye samay utna balwaan nahi jitna kii nazar aata hai, fir sapno ko darne kii jaroorat nahi hai sapne theekana dhoondh lenge aandhi aur tufaan mein bhi kahin na kahin..

navya said...

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