January 20, 2009

तकरीबन आखिरी











तनी हुई मुट्ठियों से निकल रही थी आंच
सत्ता के माथे पर छलकने का लगा था पसीना
गर्म हो रही थी हौसले की भट्टी

वे आए
अखबार लेकर
पहले हवा की ठंडक पहुंचाई
फिर पोंछने लगे सत्ता के पसीने को
खबरों की स्याही से

बस एक बात थी जो भरोसा देती थी
ऐसा करने वाले
संख्या में बहुत थोडे थे

5 comments:

Udan Tashtari said...

बस, ऐसे ही किसी तरह भरोसा मिलता रहे...बहुत उम्दा भाई. कम दिखते हो..जरा नियमित हो जायें अब.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लिखा।

MANVINDER BHIMBER said...

after a long time.....

neelima sukhija arora said...

तुम हमेशा की ही तरह बहुत अच्छा लिखते हो, पर इन दिनों इतना कम क्यों

अशोक कुमार पाण्डेय said...

पर उनकी सन्ख्या बढती ही जा रही है दोस्त