February 19, 2010

दुश्मन का घेराव : यानी अमेरिकी सेना की चहलकदमी दक्षिण एशिया में

ईरान। इराक, सउदी अरब, कुवैत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से घिरा देश। दूसरे शब्दों में अमेरिकी फौजों की बंदूक का अगला निशाना। तेल की राजनीति को जब आतंकवाद, इस्लामिक कट्टरता और परमाणु संधि के लच्छों में उलझाने की तरकीबें तेज की गई थीं तब विनीत तिवारी ने एक बातचीत में कहा था कि "दुनिया की तेल राजनीति और युद्ध राजनीति का नक्शा एक ही है।"
दिलचस्प यह भी है कि इस राजनीति का संचालक अमेरिका है और इसमें जीत किसी की भी हो सबसे ज्यादा (शायद अकेला भी) फायदे में रहने वाला देश अमेरिका ही होगा। अगले 10-20 साल इस राजनीति के कई अन्य मोहरों और नयी बिसातों के बिछने वाले होंगे। ऐसे में देखना जरूरी हो जाता है कि यह हालिया विश्व राजनीति को कितना और किस हद तक प्रभावित कर रहा है। ईरान पर प्रतिबंध, उसकी राजनीतिक मजबूरियों, साम्रज्यवादी दुष्चक्र के साथ इस लेख में क्षिण एशिया के तीन बेहद महत्वपूर्ण देशों भारत, पाकिस्तान और ईरान के आपसी रिश्तों के पर जमी गर्द भी झाडी गई है। कैसे इन तीनों देशों के हित एक हैं, लेकिन वे साम्रज्यवाद के चालू हथकंडों की जद में एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा लिए हुए हैं? विश्व राजनीति के मौजूदा परिदृश्य पर विनीत तिवारी का यह लेख की लंबाई और आपके वक्त को ध्यान में रखते हुए इसे चार किश्तों में दिया जा रहा है।

साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान-1

ईरान क्यों?
-क्योंकि ईरान परमाणु बम बना रहा है.
-क्योंकि ईरान में इस्लामिक कट्टरपन्थ मौजूद है.
-क्योंकि ईरान इजरायल पर हमला कर सकता है.
-क्योंकि खुद जॉर्ज बुश उसे शैतान की धुरी का हिस्सा घोषित कर चुके हैं, वगैरह....
कुछ इसी तरह के जवाबों से अमेरिकी और अमेरिकापरस्त लोग सच्चाई पर नकाब चढ़ाने की कोशिश करते हैं। अमेरिका की ईरान पर होने वाली इस खास नज़रे-इनायत को समझने के लिए पश्चिम एशिया की भौगोलिक, आर्थिक स्थितियों और उससे जुड़ी राजनीति को समझना और वहां के हालिया घटनाक्रम पर एक नज़र डालनी जरूरी है।

दुनिया से शैतानियत का खात्मा करने का संकल्प लेने वाले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने शैतानियत की धुरी (एक्सिस ऑफ इविल) के तौर पर जिन देशों की पहचान की थी, उनमें से इराक को उसकी सारी बेगुनाही के सबूतों के बावजूद लाशों से पाट दिया गया। दूसरा है उत्तरी कोरिया, जिसने अमेरिकी मंशाओं को समझकर अपने आपको एक परमाणु ताकत बना लिया है। आकार और ताकत के मानकों से देखा जाए तो अमेरिका और उत्तरी कोरिया की तुलना शेर और बिल्ली के रूपक से की जा सकती है। लेकिन अब शेर को बिल्ली पर हाथ डालने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा क्योंकि अब बिल्ली के पंजों में परमाण्विक ताकत वाले नाखून आ गये हैं। उत्तरी कोरिया से निपटने की रणनीति का ही हिस्सा है कि पहले बड़े दुश्मन से निपट लिया जाए। और वो बड़ा दुश्मन है ईरान।
यह सच है कि इराक को जमीन्दोज करने के बावजूद अमेरिका अभी तक अपने मंसूबों में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है, लेकिन ये सच्चाई भी अपनी जगह बहुत अहम है कि इराक पर जंग के बहाने से अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी को कई गुना बढ़ा लिया है। पश्चिम एशिया का मौजूदा सूरते हाल ये है कि इजराएल, कुवैत, जॉर्डन और सउदी अरब में पहले से ही अमेरिकापरस्त सरकारें मौजूद थीं, लेबनान के प्रतिरोध को अमेरिकी शह पर इजराएल ने बारूद के गुबारों से ढांप दिया है और सीरिया, ओमान, जॉर्जिया, यमन, जैसे छोटे देशों की कोई परवाह अमेरिका को है नहीं। भले ही तुर्क जनता में अमेरिका द्वारा इराक पर छेड़ी गई जंग का विरोध बढ़ रहा है लेकिन अपनी राजनीतिक, व्यापारिक व भौगोलिक स्थितियों की वजह से तुर्की की सरकार योरप और अमेरिका के खिलाफ ईरान के साथ खड़ी होगी, इसमें सन्देह ही है। कुवैत में अमेरिकी पैट्रियट मिसाइलें तनी हुई हैं, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के पानी में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा डेरा डाले हुए है। कतर ने इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौर में अमेरिकी वायु सेना के लिए अपनी जमीन और आसमान मुहैया कराये ही थे।

दरअसल इराक और फिलिस्तीन के भीतर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ व्यापक विद्रोह को कुचलने के बाद अब ईरान ही अहम देश है जहां से अमेरिकी वर्चस्ववाद के विरोध को जनता के साथ-सा किसी हद तक राज्य का भी समर्थन हासिल है।
ईरान की अन्दरुनी मुश्किलें
यूं तो पश्चिम एशिया के लगभग हर देश में बीती सदी में बहुत नाटकीय घटनाक्रम हुए हैं और बेतहाशा रक्तपात भी। पिछले लगभग 50 बरसों से तो बहुत हद तक अन्तरराष्ट्रीय राजनीति भी पश्चिम एशियाई देशों की करवट के साथ बदलती रही है। और इनमें भी इराक और ईरान, ये दोनों देश अपने इतिहास, साम्राज्यवादविरोधी राजनीति और भौगोलिक विस्तार की वजह से पश्चिम एशिया के सबसे प्रमुख केन्द्र रहे हैं 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध ने दोनों देशों की जनता और हुकूमत पर ऐसे जख्म छोड़े हैं जो पूरी ईमानदार और दशकों की लगातार कोशिशों के बाद भी मुिश्कल से ही पाटे जा सकते हैं। सीमाओं के विवाद, शिया-सुन्नी पन्थों के विवादों, अमेरिकी साजिशों और मौकापरस्ती से उपजी इस जंग में दोनों देशों के कुल पांच लाख से ज्यादा फौजी और आम नागरिक मारे गये थे।

एक ओर जहां ईरान के पड़ोसी मुल्क इराक में राजनीतिक घटनाक्रम 1958 से ही राजशाही और सामन्तवाद के सैकड़ों बरसों के दायरे को तोड़कर आधुनिक दुनिया के निर्माण का हिस्सा बन रहा था, वहीं ये प्रक्रिया ईरान में 1979 में जड़ें पकड़ सकी जब अयातुल्ला खुमैनी ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी की राजशाही को खत्म करके ईरान को इस्लामिक गणतन्त्र का रूप दिया। ये क्रान्ति इस मायने में बहुत अहम थी कि इसने कठमुल्लापन को एक ऐतिहासिक प्रगतिशील शक्ल दी लेकिन वहीं इसकी सीमाओं को पार करना जरूरी था क्योंकि अपने होने में योरपीय व अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनक्रान्ति जैसी लगने के बावजूद उस क्रान्ति में बहुत से प्रतिगामी तत्व मौजूद थे। मसलन् एक तरफ तो वो क्रान्ति शाह की गैरबराबरी को बढ़ावा देने और शोषणकारी नीतियों के विरोध में थी, लेकि दूसरी तरफ वो औरतों को वोट देने के अधिकार के, उन्हें शादी में बराबरी के हक दिये जाने, अन्य धर्मावलंबी अल्पसंख्यकों को नौकरियां दिये जाने और संपत्ति के बंटवारे के भी विरोध में थी, और अपने आप में धार्मिक लगने वाली वो क्रान्ति दरअसल उसी समाज के निम्न पूंजीपतियों के कंधों पर सवार होकर आयी थी।

इसलिए 1979 की क्रान्ति के बाद राजशाही से आजाद होकर भी जो शक्ल ईरान ने अख्तियार की, वो एक कोण से दकियानूस और रूढ़िवादी थी और दूसरे कोण से अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी संप्रभुता के गौरव में डूबी दृढ़ता की झलक देती थी। तीस बरस बीतने के बाद भी ईरान की इस दो कोणों से जुदा-जुदा लगती शक्ल में कोई खास तब्दीली नहीं आयी है। ईरान के संविधान के अनुसार दे की सर्वोच्च सत्ता अभी भी देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी के धार्मिक वारिस अयातुल्ला अली हुसैनी खामैनी के हाथों में है। यहां तक कि मौजूदा राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की राजनीतिक दीक्षा भी उसी 1979 के धार्मिक-राजनीतिक आन्दोलन के दौरान हुई है।

इस तरह के आन्दोलन में यह खतरा होता है कि राजनीति धार्मिक दायरे का अतिक्रमण कर पाने के बजाय उस घेरे में और ज्यादा उलझती जाती है। ईरान की राजनीति के सामने भी ये जोखिम शुरू से बना हुआ है। रोजमर्रा की जिन्दगी से लेकर अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व के ऐतिहासिक मसलों तक धार्मिक नज़रिया अहम होता है और धर्म के इस्तेमाल से आर्थिक-राजनीतिक सन्दर्भ बनाये और बिगाड़े जा सकते हैं।

12 जून 2009 में हुए राष्ट्रपति चुनावों में भले ही अहमदीनेजाद फिर चुन कर आ गये हों लेकिन उनके खिलाफ ईरान में लगातार हुए प्रदर्शनों से और जिस तरह प्रदर्शनकारियों का दमन किया गया, करीब 15 लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हुए, 11 प्रदर्शनकारियों को फांसी की सजा सुनायी गई, उससे ईरान के भीतर राजनीतिक असन्तोष के बढ़ने का अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं है। हालांकि ईरान सरकार उन प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी साजिशें होना बता रही है जो काफी हद तक मुमकिन भी हो सकता है, लेकिन सच ये है कि ईरान के भीतर जो ताकतें क्रान्ति के साथ राजनीति में मजबूती से उभर कर आयीं, उनमें एक बड़ा तबका उनका है जो धर्म और स्थानीय आर्थिक हितों की साझेदारी से तीस बरसों में काफी बड़ी पूंजी की मालिक बन चुकी हैं और अब उनमें से अनेक अमेरिका व पश्चिम के साथ रिश्ते बढ़ाकर वैश्विक पूंजी की छोटी भागीदार बनना चाहती हैं। ऐसा ही हम भारत में भी देखते हैं कि आजादी के आन्दोलन में स्वदेशी आन्दोलन से मुनाफा कमाने वाले अनेक व्यापारिक घरानों की रुचि विदेशी पूंजी के साथ गठबंधन में मुनाफा कमाने में है। ईरान में ये ताकतें भारत की तरह पृष्ठभूमि में नहीं बल्कि राजनीति में खुलकर सक्रिय रही हैं।

उन्हीं में से मीर हुसैन मौसावी, मोहम्मद खातमी और अकबर हाशमी रफसंजानी देश के सर्वोच्च राजनीतिक ओहदों तक पहुंचने में कामयाब भी हुए हैं।
बेशक ये धारा ईरान में बहुत गहरी जड़ें पकड़ी हुई धार्मिक मान्यताओं और पिश्चम व अमेरिका विरोध की भावनाओं को आसानी से बदल नहीं सकती, इसीलिए इस धारा के लोग भी धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल से ही विरोध को एकजुट कर रहे हैं। वे अपने आपको इस्लाम का सही प्रतिनिधि और ईरान की क्रान्ति के असली हकदार बताने की कोशिश कर रहे हैं। भले आखिरी तौर पर वे अपने इस मकसद में कामयाब हो सकें या नहीं लेकिन जिस तरह से 12 जून 2009 के राष्ट्रपति चुनावों के बाद से हाल में दिसम्बर 2009 में हजारों लोगों के प्रदर्शनों से इन ताकतों ने ईरान को हिलाये रखा है, उससे एक बात तो साफ है कि वे अहमदीनेजाद सरकार को अस्थिर और कमजोर तो कर ही सकते हैं।

वैश्विक आर्थिक संकट के असर ईरान पर भी पड़े हैं और ईरान की अर्थव्यवस्था भी संकट के दौर से गुजर रही है। अमेरिका प्रेरित तमाम आर्थिक प्रतिबंध भी ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रहे हैं। ईरान की आर्थिक वृद्धि दर 2009 में महज आधा प्रतिशत रही है, तेल से होने वाली आमदनी भी 2008 की 82 अरब डॉलर से घटकर 60 अरब डॉलर रह गई। मुद्रास्फीति 15 प्रतिशत से ज्यादा और बेरोजगारी दर 11 प्रतिशत से अधिक थी।

इन सारी परेशानियों से ईरानी जनता के भीतर उभरने वाले असन्तोष को अहमदीनेजाद और उन्हें समर्थन करने वाले खामैनी की तरफ मोड़ने की रणनीति में मौसावी, खातमी और रफसंजानी का गुट कुछ हद तक तो कामयाब हुआ भी है। अमेरिका की दिलचस्पी भी इसमें अधिक हो सकती है क्योंकि अपनी माफिक सत्ता आ जाने से युद्ध को टाला जा सकेगा। मोहम्मद खातमी और रफसंजानी ने ईरान की सत्ता में अपने कार्यकाल के दौरान अमेरिकापरस्त नव उदारवादी नीतियों को बढ़ावा भी दिया था।
तनावयुक्त सीमाएं
इन राजनीतिक और आर्थिक मुिश्कलों के अलावा ईरान में जातीय और अन्य सामाजिक समस्याओं का अंबार भी कम नहीं है। एक तरफ ईरान की सीमा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मिली हुई है जहां न केवल अमेरिकी फौजें तालिबानी आतंकवादियों से निपटने का बहाना लेकर जमी हुई हैं बल्कि वहां रहने वाले बलूच लोगों के ईरान और अफगानिस्तान में रहने वाले बलूच लोगों के साथ दोस्ती और दुश्मनी, दोनों के ही गहरे रिश्ते भी हैं।

दूसरी तरफ इराक और तुर्की के साथ लगी हुई सीमाओं पर कुर्द लोगों की मौजूदगी है। तीनों देशों की सीमाओं के इलाके में करीब 40 लाख कुर्द लोगों की आबादी ईरान, अजरबैजान, इराक और तुर्की में बंटी हुई है। कुर्द ईरान की आबादी का करीब 7 फीसदी हिस्सा यानी करीब 70 लाख हैं। सीमा के इलाके में इनकी आबादी करीब 40 लाख है और उनमें से भी 25 लाख सुन्नी हैं। कुर्द लोगों के साथ ईरानी हुकूमत का खूनी रिश्ता रहा है। 1979 के वक्त ही अयातुल्ला खुमैनी के जमाने में ईरान में करीब 10 हजार कुर्द अलगाववाद के इल्जाम में कत्ल किये गये थे। ईरान की करीब 90 फीसदी आबादी शिया मुसलमानों की है और 8 फीसदी सुन्नी हैं। जबकि उसके पड़ोसी इराक में 40 फीसदी सुन्नी मुसलमान हैं। ईरानी कुर्द लोगों की राजनीतिक पार्टी केडीपीआई पर मौजूदा सरकार ने प्रतिबंध लगाये हुए हैं और केडीपीआई का राष्ट्रपति अहमदीनेजाद पर 1989 में उनके नेता डॉ. कासिमलू की हत्या करवाने का आरोप है।

ये ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है कि ईरान के चारों तरफ अमेरिकी फौजों की मौजूदगी लगातार बढ़ती गई है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सउदी अरब और अब इराक में भी अमेरिकी फौज की मौजूदगी ईरान के लिए लगातार बढ़ते खतरे का संकेत है। अमेरिका व नाटो के सैनिकों की इराक में 1 लाख 40 हजार की मौजूदगी है, जॉर्डन और इजरायल में विश्वसनीय फौजी बेस है, अफगानिस्तान में 21000 फौजी और भेजे जा चुके हैं जबकि अमेरिका के फौजी जनरल द्वारा 40000 सैनिकों को और भेजने की मांग की गई है। फौज और हथियारों के जमावड़े के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया एजेंसियां पहले से ईरान के भीतर के और पड़ोसी देशों के साथ के अंतर्द्वंद्वों को ईरान में अस्थिरता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं चूकेंगी। देश के भीतर असन्तोष को बढ़ने से रोकने में अगर अहमदीनेजाद प्रशासन कामयाब नहीं रहता है तो देश के बाहर के मोर्चों की मजबूती पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।

विनीत तिवारी,
पताः 2, चिनार अपार्टमेंट्स, 172, श्रीनगर एक्सटेंशन, इन्दौर - 452018,
संपर्कः +9198931-92740, +91-731-2561836
(समाजवाद के यकीनी स्वप्न को आंख में पालने वाले विनीत यांत्रिकी में पत्रोपाधि के बाद बारास्ता पत्रकारिता आंदोलनों में शरीक हुए। नर्मदा बचाओ आंदोलन से गहरा जुडाव। मार्क्सवादी दुनिया के पैरोकार। इन दिनों भारतीय कृषि पर एक विस्तृत अध्ययन करने वाली टीम के कोर मेंबर्स में से एक।)

3 comments:

कुमार क्षितिज said...

इंतजार रहेगा अगली किश्त का।
ईरान पर नजरें गडाए अमेरिका के इरादे तो सबकी समझ में साफ हैं, लेकिन डंडे के जोर के आगे कौन रोके। भारत पर भरोसा किया जा सकता है बशर्ते वह कोपनहेगन के तेवर बरकरार रखे।

Rahul said...

असल बात तो यही है। सब जानते हैं। मानते भी हैं, फिर क्यों नहीं अमेरिका की आंख में आंख डालकर कहते कि बस बहुत हुआ बंद करो ये दादागीरी।
अमेरिकी फौजियों के बीच असंतोष की खबरें आ रही हैं, लेकिन इसे उम्मीद की किरण मानना बेवकूफी है। हम खुद कुछ नहीं करेंगे और दूसरे की हरकतों पर छींटाकशी करते रहेंगे वाले हालात हैं अभी

Rahul said...

भारतीय मीडिया को भी ओबामा की मुस्कान के आगे सब फीका लगता है। क्यूबा और वेनुजुएला से सबक लेना चाहिए कि वे अमेरिकी नाक के नीचे अपनी संप्रभुता बचाए हुए हैं। एक ये बडे बडे देश हैं जो तलवे चाटकर गुजर कर रहे हैं। मनमोहन सुन रहे हैं?